Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • बड़े शहर की जिंदगी…

    बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
    अब छोटे शहर की जिंदगी को,
    जीकर देख रहे हैं
    यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
    यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
    न निभाते हैं रिश्ते को,
    न जानते हैं इंसानियत को,
    कौन आपका अपना है,
    कौन आपका पराया,
    पर जुड़े हैं अब भी सब,
    रुपए की चाह में,
    हैसियत की छांव में…….

  • सच्ची मोहब्बत ही, ताजमहल बनवाती है

    कविता : सच्ची मोहब्बत ही, ताजमहल बनवाती है
    जो खो गया है मेरी जिंदगी में आकर
    उस पर गजल लिखने के दिन आ गए हैं
    दिल दिमाग का हुआ है बुरा हाल
    अब तो रात भर जागने के दिन आ गए हैं
    प्यार की लहरें जब से दिल में उठ गई
    सजने संवरने के दिन आ गए हैं
    मोहब्बत ने वो एहसास जगाया है दिल में
    अब तो तकदीर पलटने के दिन आ गए हैं
    सच्ची मोहब्बत वो मझधार है
    संग इसके तैरने के दिन आ गए हैं
    वो ही करना पड़ा जो चाहा न दिल ने कभी
    इंतज़ार करने के दिन आ गए हैं
    अब न कुछ खोने का गम है न पाने की ख़ुशी
    तुम्हे याद करने के दिन आ गए हैं
    याद करके उनको ,सांस दोगुनी हुई
    प्यार के शुरुर के दिन आ गए हैं
    याद करके तुमको भीड़ में पाता हूँ अकेला
    सांसों की तपिश में पिघलने के दिन आ गए हैं
    ये दूरियाँ हम दोनों के दरमियान कैसी
    अब तो ख्वाब सजाने के दिन आ गए हैं
    मोहब्बत की दुनिया निःस्वार्थ की दुनिया है
    धोखा ,मौकापरस्ती की कोई जगह नहीं है
    अगर ये नहीं कर सकते ,तो मोहब्बत न करना
    क्योंकि सच्चे जज़्बातों की ये नगरी है
    सच्ची मोहब्बत ही ताजमहल बनवाती है
    नहीं तो सुशांत रिया सा हस्र करवाती है
    सच्ची मोहब्बत को जो प्रोफेशन बनाते हैं
    अंत में वो सब कुछ गंवाते हैं …..

  • हम ही चले जाते हैं

    किसी की रूसवायी की वज़ह क्यूँ बनें
    ऐ मेरी जिंदगी, चलो हम ही चले जाते हैं ।
    औरों की परेशानी का सबब क्यूँ बने
    किसी की आँखों की चुभन क्यूँ बने
    तेरा चैन यूँ ही बना रहे, चलो हम ही चले जाते हैं ।
    क्यूँ किसी से गिला हम करें
    क्यूँ किसी की हसरतो से हम जले
    सारे स्वप्न पलकों पे लिए, चलो हम ही चले जाते हैं ।
    कयी उम्मीदों के सुमन थे तुमसे खिले
    बिखर गए सब, कयी ज़ख्म ऐसे तूने दिये
    कोई आश फिर से पले, चलो हम ही चले जाते हैं ।

  • गीत, गज़लें लिख रही हूँ..

    गीत, गज़लें लिख रही हूँ
    कुछ अलग ही दिख रही हूँ
    होंठों पर हैं लफ्ज अटके
    मन ही मन में पिस रही हूँ
    आ गई अब शाम, दिन की
    दोपहर ही लग रही हूँ
    गुनगुनी-सी देह है और
    ठण्डी-ठण्डी रात है
    नींद है भटकी हुई सी
    सिमटी-सिमटी लग रही हूँ
    कुछ अलग ही दिख रही हूँ..

  • हँसते -रोते देखा

    पाकर सब नदियों का पानी
    सागर को खूब मचलते देखा।
    पत्थर के कलेजे रखनेवाले
    हिमालय को पिघलते देखा।।
    गम्भीर बड़ा आकाश मगर
    हमने उसको भी रोते देखा।
    सबको पाक करे जो नदियाँ
    बीच कीचड़ में सोते देखा।।
    ‘विनयचंद ‘ इस दुनिया में
    किसी को हँसते -हँसते देखा।
    और किसी को रोते -रोते देखा।।

  • कुछ नहीं

    हमें आता जाता कुछ भी नहीं,
    सिर्फ शब्दों में खेल रहा हूं|
    परिणाम का हमें कुछ पता नहीं,
    मीठा खट्टा बोल रहा हूं|

    शब्द आन मान शान हैं,
    शब्द शब्द वेदी बाण है|
    शब्द राजाओं की तलवार यदि,
    भिखारियों की ढाल और पहचान है|

    शब्द सिंहासन दे सकता है,
    शब्द ही सब कुछ ले सकता है|
    बनो गवार ज्ञानी चाहे,
    शब्द ही जान ले दे सकता है|

    मां के शब्दों में संस्कार भरा है,
    पापा के शब्दों में प्यार भरा है|
    बढ़ा हुआ जब लाल वहीं,
    देखो बेटे के शब्दों में जहर भरा है|

    करो निरीक्षण उन्नत खातिर,
    मान प्रतिष्ठा वैभव खातिर|
    कुल कुल की लज्जा,
    शब्द सुधारों परिवार के खातिर|

    ऋषि कुमार “प्रभाकर”

  • भाईदूज की मिठाई..!!

    अपने भाई दूज की तुमको
    खिला मिठाई
    आँखों में थी हया
    ग्लास पानी का लाई…

    तुम तिरछी नज़रों से
    मुझको यूँ देख रहे थे
    मन ही मन में कितने
    लड्डू फूट रहे थे…

    ना तुम बोले ना हम बोले
    दोनों में यूँ लाज भरी थी
    कुछ मजबूरी भी थी
    क्योंकि घरवाले भी देख रहे थे…

    मैं बोली इसी लायक हो तुम
    भाई दूज की खाओ मिठाई
    तुमने कितनी तैश में
    मुझको प्लेट घुमाई…

    तब तक पीछे से आ
    धमकीं मेरी भौजाई
    तुम फिर से खाने लगे
    लड्डू और मिठाई…

    मैं रोंक सकी ना खुद को
    हँसी जोर से आई
    हालातों ने कुछ ऐसी
    प्रेम की वाट’ लगाई…

  • महबूब

    जूम गूगल मीट पे
    क्लास चल रही है |
    नेटवर्क भी सही नहीं,
    फिर भी बात हो रही है|

    मोर मोरनी बिछड़ गए,
    राधा बन घर रो रही|
    है गरीबी की मार से,
    खुद फोन नहीं ले पा रही|

    स्वाभिमान नहीं वह छोड़ रही,
    प्रेमी से ना कुछ बोल रही|
    अब गूगल जुम पर देख देख कर,
    रो रो कर जीवन गुजार रही|

    करके सिंगार सभी वह आती है,
    प्रेमी को वह देख रही है|
    हाय गरीबी हाय कोरोना,
    खुद को वह धिक्कार रही है|

    मन को वश में करके, .
    करती खूब पढ़ाई है|
    सबके लिए वह समय है देती,
    प्रथम वरीयता पढ़ाई को देती है

  • आओ ताली बजाते हैं!

    आओ थाली बजाते हैं!
    गरीबी का मुंह दिखाने वाली,
    बेरोजगारी के लिए ,
    आओ ताली बजाते हैं!

    देश की कमर तोड़ने वाली
    मरी हुई अर्थव्यवस्था के लिए,
    आओ थाली बजाते हैं!

    झूठ को सच बनाने वाली
    दलाल मीडिया के लिए ,
    आओ ताली बजाते हैं!

  • तुम नारी हो

    तुम नारी हो, यूं अबला न बनो ।
    दुर्गा – अवतारी हो, सबला तो बनो ।
    बीती बातों को छोड़ परे,
    आगे के रस्ते तय तो करो ।
    रस्ता था, कांटो वाला बीत गया
    रस्ता अब , फूलों वाला आएगा ।
    जीवन में तेरे ए, प्यारी सखी,
    कोई सुखद संदेशा लाएगा ।
    सौगंध तुम्हे तुम ना हारोगी,
    भीतर की उदासीनता मारोगी ।

  • बहुत दिनों के बाद…

    बहुत दिनों के बाद ,
    जब खोला मैंने यादों का पिटारा ।
    कुछ बचपन की किलकारियां गूंजी,
    कुछ मां की मीठी लोरी,
    कुछ पापा की डांट मिली।
    कुछ दिखे खेल पुराने जो खेलें अपनों संग,
    कुछ बचपन के हमजोली मिले,
    कुछ नटखट-सी शैतानियां ,
    कुछ हार जीत का रोना मिला,
    कुछ बचपन की नादानियां।
    बहुत दिनों के बाद
    जब खोला मैंने यादों का पिटारा ।

  • ऐ जिन्दगी

    ऐ जिन्दगी ! कभी तो तू मेरी होती
    जिधर को मैं कहती, उधर रूख़ करती ।।

    तू जिधर इशारा करती, मुङ जाते हैं उधर
    तेरे आगे अपनी मर्जी चलती है किधर
    काश! बस एक बार मेरा अनुसरण करती।

    थक गये हैं, तेरी इच्छाओं की कद्र करके
    भीगी है पलकें मेरी, उभरे हैं जो दर्द बनके
    इस पीङा की अनुभूति तू भी जिया करती ।

    पथ पर पथिक बहुत हैं पर,अपनी-अपनी मंजिल है
    कहाँ मिलता है सबको , जो जिसके काबिल है
    मनचाही मंजिल का फिक्र,तू भी करती ।

  • मुझको सो जाने दो जीवन !!

    मुझको सो जाने दो जीवन
    रात हुई अब बहुत घनी

    नैनों से ओझल हैं सपनें
    साँसों से भी ठनी-ठनी

    आसमान बाँहें फैलाकर
    मेरे स्वागत को आतुर है

    धरती पर बस बोझ बनी हूँ
    मिट्टी में मिल जाने दो

    रो-रोकर धो दिए दाग हैं
    मैंने सूखे अश्कों के

    ओ तकिये ! मेरे आँसू पोंछो
    तन्हाई मुझको जाने दो !!

    मुझको सो जाने दो जीवन
    मिट्टी में मिल जाने दो ||

  • बचपन जल रहा है

    बचपन जल रहा है,
    जल उसे बुझा न सकेगा,
    जल रहा है बड़ों की इच्छाओं के तले,
    उनकी आशाओं के तले,
    चाहते हैं पूरे हो सब ख्वाब,
    पर कभी पूछते नहीं उनसे,
    बांधकर एक सीमित दायरे में,
    कैसे बचपन पल रहा है,
    जहां टिमटिमाती आंखों में,
    खेलकूद के सपने कम,
    और जिम्मेदारियों का बोझ,
    ज्यादा पड़ रहा है,
    बचपन जल रहा है।

  • लफ्जों की पोटली

    लफ्जों की पोटली ,
    बांध लो ना तुम ,
    क्या कहते हैं ,वो जरा
    सुन लो ना तुम,
    तब मांपना और तोलना ,
    उनकी बातों को ,
    फिर वह पोटली खोल देना तुम,
    तर्क वितर्क के भीतर नहीं फंसोगे ,
    इससे पहले ना बोलना तुम ।
    रखते हो राय अगर अलग अपनी,
    फिर ना झिझक ना तुम
    अगर है सही विचार तुम्हारे,
    तो उसे समझाना ,बतलाना जरूर ।
    कहीं गर्म ना हो जाए बातों से मसला
    लफ्जों की पोटली,
    फिर से बांध लेना तुम।

  • जल-जीवन

    जिंदगी को कहीं कैद कहीं आजाद देखा
    फिर भी न बदलता उसका स्वभाव देखा

    बुंद बनकर आसमां से लहराते आते देखा
    कयी बोझिल चेहरे को पल में हर्षाते देखा

    चूल्हे पर जलकर फिर आसमां में जाते देखा
    प्यालों में जा तन मन की थकान मिटाते देखा

    स्वयं को जमाकर औरों पे शीतलता लुटाते देखा
    जिनके तन जले उन पर मरहम बन छाते देखा

    पर हित लुट जाने वाले को नित भोजन बनाते हैं
    तब भी जीवन भर स्वार्थि बन सांसों को घटाते देखा

  • घर जलाना औरों का आसान है

    अगर जग बदलता है बदलने दीजिए
    वक्त के साथ ही चलना सीखिए
    आसमानों को छूने की हसरत है अगर
    दिल में कोई ख्वाब पालना सीखिए
    जीवन जीने का आनन्द है तभी
    दर्द औरों का उठाकर देखिये
    खुद ब खुद जीना तुम्हे आ जायेगा
    निज पसीने को बहाकर देखिये
    मुश्किलों का अपना मजा है दोस्तों
    मुश्किलों को जीत कर देखिये
    रहोगे भीड़ में लोगों की कब तक
    कभी खुद की पहचान बना कर देखिये
    घर जलाना औरों का आसान है
    किसी का घर बसाकर देखिये
    हर ह्रदय में छुपा हुआ भगवान है
    सच्चे ह्रदय से गले लगाकर देखिये
    अगर गलती से भी पैसे का गुमान है
    अन्त सबका एक सा ,श्मशान जाकर देखिये ….

  • मां ने जब रोटियां…

    मां ने जब रोटियां बनाना सिखाया ,
    मुझे कुछ समझ ना आया ,
    कभी रोटियां जली तो कभी हाथ,
    फिर सीख ही गई मैं,
    रोटियां बनाना,
    और अब रोटियां नहीं जलती ,
    बस जलते हैं हाथ।

  • हैसियत क्या थी मेरी…

    हैसियत क्या थी मेरी पूछिए मत,
    बस किताब के कोरे पन्ने थे ,
    लिखते रहे अपनी रूबानी,
    जब बनी ना कोई गजल ना कोई नज़्म,
    फटकर सिमटकर पैरों तले बस कुचले गए।

  • आज कर दूं, आंखें नम

    आज कर दूं, आंखें नम या समंदर कर दूं ,
    मेरे भीतर का वो दर्द ; कैसे संदल कर दूं।

  • कंघी

    कविता- कंघी
    ——————

    कभी इसको
    रख गोदी मे रोटी देती थी,

    कभी इसको
    काजल कंघी तेल कराती थी,

    कभी इसको
    कंधो पर रख कर,
    मेले कि शैर कराती थी,

    थक! जाता था, लाल मेरा जब,
    रख सर पर गठरी गोदी मे लेके,
    कभी अपने मैके जाया करती थी|

    कभी इसको
    झूठ दिलाशा दे करके,
    खुद कामो मे लग जाती थी|

    बड़ा हुआ जब लाल मेरा,
    क्या क्या रंग दिखलाता है|

    कभी भुखे पेट मै सोती हु
    कभी कपड़ो के लिए रोती हु|

    है ऐसा कोई साथ निभाये,
    माँ से बढ़कर कोई प्रित दिखाये,
    मत माँ को डायन कहना भाई,
    माँ ही है जो हर दुख सहके,
    किसी स्त्री का शौहर तो,
    किसी बच्चे का बाप ,बनने खातिर
    दूध दही भोजन संग पेड़ा खिलाये|

    ऋषि कुमार “प्रभाकर ”

  • झूठी है औरत

    हां, झूठी है औरत,
    अपनी ख्वाहिश तक ही नहीं सीमित,
    औरों के लिए जगे रात तक
    हां, झूठी है औरत।
    मायके की तारीफ़ करे ससुराल में,
    ससुराल की कमी ,ना बताए किसी हाल में।
    कोशिश करती है , छिपा सकती है जब तक
    हां …. बहुत झूठी है औरत ।
    पति से कहे मेरा भाई दमदार है,
    भाई से कहती पति शानदार है ।
    यही तो करती आई है अब तक,
    हां जी, … बहुत झूठी है औरत ।।

  • जज़्बाते – दिल

    अजीब सी है ये ज़िन्दगी,
    कभी, फूलों सी कोमल लगी।
    कभी शमशीर की धार हुई,
    दिल के जज्बातों को जब- जब किया बयां,
    एक कविता हर बार हुई ।

  • तमाशा

    तराशने वालों ने, पत्थर को भी तराशा है,
    नदानों के आगे हुआ, हीरे का भी तमाशा है।

  • इन्सान हूँ इंसान समझो

    इस तरह क्यों भेद का
    तुम भाव रखते हो, बताओ,
    मैं तुम्हारी ही तरह
    इन्सान हूँ इंसान समझो।
    मुफलिसी है श्राप मुझ पर
    बस यही है एक खामी,
    अन्यथा सब कुछ है तुम सा
    एक सा पीते हैं पानी।
    जाति मानव जाति है
    धर्म मानव धर्म है
    एक सा आना व जाना
    फिर कहाँ पर फर्क है।
    यह विषमता का जहर अब
    फेंक दो इन्सान तुम
    सब बराबर हैं, करो मत
    भेदगत अपमान तुम।

  • पीर का उपहार !!

    आपको लगता है क्या
    मैं चाँद हूँ या चाँदनी

    रात के झुरमुट में बैठी
    हूँ मैं कोई अप्सरा

    गीत हूँ या हृदय की
    टूटी-फूटी रागिनी…

    आपको लगता है क्या..

    अमरत्व का वरदान हूँ या
    करुणत्व की उत्श्रृंखला

    हूँ सरोवर प्रेम का या
    पीर का उपहार हूँ !!

  • बेरोजगारी पर नया करो कुछ

    नातियाँ धरातल तक पहुंचें
    बेरोजगारी पर नया करो कुछ
    यह सबसे प्रमुख मुद्दा है
    इस मुद्दे पर किया करो कुछ।
    देखो ! देश के नौजवान
    कैसे सड़कों पर भटक रहे हैं,
    रोजगार का संकट सिर पर
    डिप्रेशन के निकट खड़े हैं।
    जिम्मेदारी लेनी होगी
    आज देश की सत्ता तुझको
    ऐसी कोई नीति बनाकर
    पीड़ मिटानी होगी तुझको।

  • यह कैसा अच्छा दिन आया है

    इन्सानियत को हमने रुलाया है
    आज डर ने मुकाम दिल में बनाया है
    मंदिर से अधिक मधुशालाएं हैं
    ऐसा बदलाव अपने देश में आया है
    ये वस्त्रहीन सभ्यता अपने देश की नहीं
    पर्दा ही आज ,लाज पर से उठाया है
    बेकारी ,भूंख प्यास ने सबको रुलाया है
    भारत में यह कैसा अच्छा दिन आया है
    साहित्य से क्यों दूर हैं आज की पीढ़ियां
    इस विषय पर क्यों शोध नहीं है
    कैसा ये सभ्य समाज बन रहा है
    आधुनिक संगीत अश्लीलता परोस रहा है
    आज सियासत क्रूरता को वर रही है
    सच्चाई कहीं कटघरे में डर रही है
    अब खून देखकर भी दिल कांपता नहीं है
    दो गज जमीन के लिए तकरार हो रही है
    फैलाते हैं जो जहर यहाँ धर्म जात की
    वो सोंचते हैं जीत है ,पर ये उनकी हार है
    प्रभात कैसे करे सलाम ऐसे अमीरों को
    जिन्होंने चन्द रुपयों की खातिर ,बेच डाला है जमीर को
    ऐसे लोग बोझ हैं धरा में सोंचिए
    महसूस न करे जो ज़माने के दर्द को …..

  • अपने घर और दिल को साफ करें

    सुबह सुबह में चलो साफ करें
    अपने घर और दिल को साफ करें,
    सोहती फेर लें, पोछा लगा के साफ करें
    अर्श से फर्श तक न दाग रहें।
    यदि कहीं लूतिका ने
    जाल बुन के छोड़ा हो,
    या चरित्र धूल में सना हुआ हो,
    देख कर जांच कर के तबियत से
    अपने घर और दिल को साफ करें।
    सुबह सुबह में चलो साफ करें
    अपने घर और दिल को साफ करें,
    सोहती फेर लें, पोछा लगा के साफ करें
    अर्श से फर्श तक न दाग रहें।

  • हाँ मैंने उसको रोका था..

    ‘हाँ मैंने उसको रोका था,
    फिर भी वो चौखट लाँघ गई..
    जैसे बस जागने वाले तक,
    हो इस मुर्गे की बाँग गई..

    बाकी सब निष्फल सिद्ध हुआ,
    हम क्या थे वो कल सिद्ध हुआ..
    उस मिथ्या प्रेम की निद्रा में,
    बस झूठ ही निश्छल सिद्ध हुआ..
    इक बेबस बाप ने बेटी को,
    पहली ही बार तो टोका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..

    क्यूँ आज मेरी समझाइश भी,
    उसकी निजता का प्रश्न बनी,
    ये जो स्वच्छंद उड़ाने थी,
    अब की पीढ़ी का जश्न बनी
    उतनी ही बार सचेत किया,
    जब-जब भी मिलता मौका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..

    यह सहजबोध था मुझमे कि,
    वो लड़का ठीक नही लेकिन..
    सब उसको माना बेटी ने,
    ली मेरी सीख नही लेकिन..
    जो उस जल्लाद ने लौटाया,
    वो बस इक खाली खोका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..
    हाँ मैंने उसको रोका था..’

    #धोखा/लवजिहाद

    – प्रयाग धर्मानी

  • ताबीर

    महज़ ख़्वाब देखने से उसकी ताबीर नहीं होती

    ज़िन्दगी हादसों की मोहताज़ हुआ करती है ..

    बहुत कुछ दे कर, एक झटके में छीन लेती है

    कभी कभी बड़ी बेरहम हुआ करती है …

    नहीं चलता है किसी का बस इस पर

    ये सिर्फ अपनी धुन में रहा करती है ..

    न इतराने देगी तुम्हें ये, अपनी शख्सियत पे

    बड़े बड़ों को घुटनों पे ला खड़ा करती है ….

    खुद को सिपहसलार समझ लो ,इसे जीने के खातिर

    ये हर रोज़ एक नयी जंग का आगाज़ करती है ……

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास “

  • कविता- ज्ञान दाता |

    शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई |
    कविता- ज्ञान दाता |
    ज्ञान दाता विज्ञान दाता तुम ही हो |
    हे गुरु प्रकाश दाता मुक्ति दाता तुम ही हो |
    जीवन मे अंधेरा बहुत था तुमसे पहले|
    था घना कोहरा तुम्हारी दृस्टी से पहले |
    मूल्य कुछ भी न था मेरा संसार मे |
    खा रही थी हिचकोले नाव मजधार मे |
    देवता मेरे माता पिता तुम ही हो |
    उससे पहले माँ मेरी गुरु बन गई |
    मेरे अवगुण दूर करने की ठन गई|
    गिरना उठना चलना बोलना सिखा |
    कौन क्या बताया बचपन गोद मे बिता |
    मुझ अज्ञानी चरण धूल दाता तुम ही हो |
    शिक्षक गर जहा मे न होते |
    हर तरफ मूढ़ अज्ञानी भटक रहे होते |
    गुरु की महिमा अद्द्भुत अनमोल है |
    गुरुबीन जीवन अधूरा सत्य बचन बोल है |
    समाज सुधारक राष्ट्र निर्माता तुम ही हो |
    हे गुरु प्रकाश दाता मुक्ति दाता तुम ही हो |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • सावन की रिमझिम बूंदें

    सावन की रिमझिम बूंदों में,
    भीगे तुम भी, भीगे हम भी
    भीग गया है तन – मन सारा।
    नभ से मेघा जल बरसाते,
    धरती को हैं सरस बनाते
    गीले हैं आगे के रस्ते।
    अरे! अरे, आगे फिसलन है,
    ज़रा संभलकर, हाथ पकड़कर
    फिसल ना जाए पांव हमारा।
    पवन तेज़ है, छतरी भी उड़ गई
    कैसे पहुंचें अभी दूर है, लक्ष्य हमारा।

  • भगवान की लीला

    हास्य- कविता

    सत्य – नारायण जी की पूजा थी,
    शर्मा जी के धाम।
    गुप्ता जी भी पहुंच गए,
    छोड़ के सारे काम।
    आरती के समय सामने,
    जब थाली आई,
    डाला दस रुपए का फटा नोट,
    लोगों से नजर बचाई।
    भीड़ ज़रा कुछ ज़्यादा थी,
    अब निकालने को आमादा थी।
    तभी पीछे से एक आंटी ने,
    उनका कंधा थपथपाया।
    और गुप्ता जी को ,
    2000 का कड़क नोट थमाया।
    गुप्ता जी ने हाथ जोड़,
    थाली में नोट चढ़ाया।
    प्रशाद ले अपना कदम भी,
    घर की ओर बढ़ाया ।
    देख के ये सारी घटना,
    आंटी थोड़ी सी मुस्कुराई।
    केवल दस का नोट चढ़ाने पर,
    गुप्ता जी को थोड़ी लज्जा भी आई।
    बाहर निकल कर आंटी ने,
    गुप्ता जी को बतलाया..
    दस का नोट निकलते वक्त ,
    तुमने 2000 का नीचे गिराया
    वो ही नोट था मैनें तुम्हे थमाया।
    यह सुनकर गुप्ता जी को,
    चक्कर आ रहे हैं।
    कल से अब तक गुप्ता जी कुछ नहींं खा रहे हैं।

  • मैं शिक्षक हूं वर्तमान का!

    मैं शिक्षक हूं वर्तमान का,
    मुझे बच्चों से डर लगता है,
    मजबूर-सा हूं पढ़ाने में,
    बेरोजगारी से डर लगता है।

    सम्मान-वम्मान जुति बराबर
    मगर लाचारी से डर लगता है,
    अध्यापन ही एक काम नहीं
    अतिरिक्त कार्य बहुत से होते है,
    मालिक बड़े ही प्रताड़ित करते,
    सैलरी रुकने से डर लगता है।

    क़तरा-क़तरा ख़ून निचोड़े
    फिर जेब से पैसा निकलता है,
    ना पढ़ाएं तो खानें के लाले,
    भूखमारी से डर लगता है।

    गुरु है , गोविंद समान ,
    कहने को अच्छा लगता है।
    मैं अध्यापक हूं निजी संस्थान का,
    दुत्कारी से डर लगता है।

  • गुरू की महिमा

    गुरू की महिमा का मैं,
    कैसे करूं बखान ।
    गुरू से ही तो किया है,
    ये सब अर्जित ज्ञान।
    ऐसा कोई कागज़ नहीं,
    जिसमे वो शब्द समाएं।
    ऐसी कोई स्याही नहीं,
    जिससे सारे गुरू – गुण लिखे जाएं
    वाणी भी कितना बोलेगी,
    कितनी कलम चलाऊं।
    दूर – दूर तक सोचूं जितना भी,
    गुरू – गुण लिख ना पाऊं।
    गुरू के गुण असीमित भंडार,
    गुरू ने ही किया बेड़ा पार
    मात – पिता इस दुनियां में लाए,
    गुरू ने यहां के तौर – तरीक़े सिखाए।
    बिना ज्ञान के क्या जीवन कुछ है?
    बिना गुरू के हम तुच्छ है।
    प्रातः वंदन,मेरे गुरुओं को मेरा अभिनन्दन,
    बना दिया जिन्होंने इस जीवन को चंदन।

  • गुरु महिमा

    गुरु अर्चना ,गुरु प्रार्थना ,गुरु जीवन का आलंबन है
    गुरु की महिमा ,गुरु की वाणी जैसे परमात्मा का वंदन है
    प्रेम का आधार गुरु है ,ज्ञान का विस्तार गुरु है
    भविष्य का निर्माण वही है ,कर्म का आकाश वही है
    मैं तो हूँ एक कोरा कागज़ ,मेरा अंतरज्ञान वही है
    वो उद्धारक ,वो विस्तारक, वक्क की आवाज वही है
    ज्ञान रूपी गागर भर दे ,सच्चा द्रोणाचार्य वही है
    अर्जुन और एकलव्य सा जीवन देखे सब में
    सच्चे गुरु का ज्ञान वही है
    ज्ञान मार्ग पर सफल परीक्षण करता अनुसन्धान वही है
    वंदन है उस कर्मयोगी को
    जिसने जीवन राह पे चलना सिखलाया
    माँ की ममता सा ,प्यार पिता सा
    तपते जीवन की है छाया
    हूँ ह्रदय से आज आभारी पथ के अनमोल प्रदर्शक का
    दिल से है अभिनंदन उस कर्म के पुजारी का ….
    (शिक्षक दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं)

  • जिसे जिंदगी कहते हैं

    कितनी उधेड़बुन करती हूं,
    मैं इन धागों के साथ ।
    जिसे जिंदगी कहते हैं ,
    कभी गम की गांठ खोलती हूं।
    कभी खुशियों की गांठ बांधती हूं ।
    बस लगी रहती हूं ,इसे सुलझाने में।
    कितनी उधेड़बुन करती हूं,
    मैं इन धागों के साथ।
    जिसे जिंदगी कहते हैं।

  • नींद

    पलकों पर नींद बिखरी पड़ी होती है ,
    फुर्सत में समेट कर सोते हैं।।

  • क्या उकेर देती

    क्या उकेर देती ,
    मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर।
    अपने भीतर की वेदना या दूसरों की प्रेरणा ।
    अनकही बातें या सुनी सुनाई बातें।
    नहीं जानती इसका अर्थ क्या होता ।
    क्या उकेर देती,
    मैं इन कोरे पन्नों के ऊपर ।
    किसी की हास्य परिहास या कसमों वादों का साथ ।
    मां की मीठी लोरी या बचपन की हमजोली।
    वही रोज की थकान या फिर अपने अरमान ।
    क्या उकेर देती ,इन कोरे पन्नों के ऊपर ।
    बचपन की खुशहाली या युवा रोजगारी।
    उकेर देती देश की पुकार या पीड़ितों की चित्कार ।
    उकेर देती आरोप-प्रत्यारोपों की दुकान,
    जो खुली रहती है दिन रात ।
    क्या उकेर देती, इन कोरे पन्नों के ऊपर।
    तुम्हारे कुछ न कहने के बाद ।
    तुम्हारे कुछ न कहने के बाद।

  • आगज़नी किसकी है..

    ‘उलझ पड़ें न कहीं हम, के इस ज़िन्दगी से,
    अपनी क्या बनेगी, आज तक बनी किसकी है..
    इसलिए रखता हूँ हर आतिश को खुद में दफन,
    कहीं वो पूछ न बैठे कि आगज़नी किसकी है..’

    – प्रयाग

    मायनें :
    आतिश – चिंगारी

  • कैसे बैठे हुए हो यौवन

    यूँ रास्तों में कैसे
    बैठे हुए हो यौवन
    क्यों बाजुओं में माथा
    टेके हुए हो यौवन।
    क्या कोई ऐसा गम है
    या कोई ऐसी पीड़ा,
    जिसकी तपिश से इतने
    मुरझा गए हो यौवन।
    यह बात सुनी तो
    उसने उठाई आंखें,
    पल भर मुझे निहारा
    देखी सभी दिशाएं।
    चुपचाप सिर झुकाया
    आंसू लगा बहाने
    मैं मौन हो खड़ा था
    सब कुछ समझ रहा था।
    कहने लगा सुनो तुम,
    यौवन बता रहा है
    निस्सार है ये जीवन
    हार है ये जीवन।
    बचपन में आस थी कुछ
    सपने सजे थे अपने,
    सम्पूर्ण यत्न करके
    जीवन संवार लेंगे।
    जलता चिराग लेकर,
    मंजिल को खूब खोजा
    फिर नही मिला न हमको
    पाथेय इस सफर का।
    जीवन जलधि है आगे
    दुर्लंघ्य है कठिन है
    विश्रांत से पड़े हैं
    बस धूल फांकते है।
    तुमने व्यथित समझ कर
    उपकार ही किया है,
    वरना ज़मीं पे कौन है
    हम पर हंसा न हो जो।
    यौवन का राग सुनकर
    छाती उमड़ सी आई,
    कोसा जमाना हमने
    मन में सवाल आये,
    जिस देश का युवा यूँ
    सड़कों की धूल फांकें
    उस देश की कमर कल
    कैसे खड़ी रहेगी।

  • माँ

    प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है
    माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है
    भूल कर अपनी सारी खुशियां
    हमको मुस्कुराहट भरा समंदर दे जाती है
    अगर ईश्वर कहीं है ,उसे देखा कहाँ किसने
    माँ धरा पर तो तू ही ,ईश्वर का रूप है
    हमारी आँखों के अंशु ,अपनी आँखों में समा लेती है
    अपने ओंठों की हंसी हम पर लुटा देती है
    हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती है
    दुःख में हमारे आंसू बहाती है
    हम निभाएं न निभाएं
    अपना फ़र्ज़ निभाती है
    ऐसे ही नहीं वो करुणामयी कहलाती है
    व्यर्थ के प्रेम के पीछे घूमती है दुनिया
    माँ के प्रेम से बढ़कर कोई प्रेम नहीं है
    आवाज़ में उसके शब्द मृदुल हैं
    ममता रूपी औरत के प्रेम में देवी है
    अपलक निहारूं उसके रूप को
    ऐसी करुणामयी प्यार की मूरत है
    प्रेम के सागर में अमृत रूपी गागर है
    माँ मेरे सपनों की सच्ची सौदागर है

  • नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं

    कौन कहता है कि बारिश थम गई
    नैन में अब भी घुमड़ते मेघ हैं,
    रो रहा आकाश शायद अब नहीं
    यूँ तड़पती बून्द परिचय दे रही।
    जिंदगी सुनसान सड़कों सी बनी
    लालसाएँ ढेर सारी शेष हैं।
    और कुछ हो या न हो इतना तो है
    बस इरादे आज भी सब नेक हैं।

  • गमगीन है सारा हिन्दुस्तान

    गमगीन है हिन्दुस्तान
    ———————-
    प्रणवदा थे राजनीति का एक जीता-जागता, सजीव संस्थान
    निधन,राजनीति ही नहीं, जनता के लिए भी बङा नुकसान ।
    गुणी, पढ़े लिखे, सादगी की थे जो जीती-जागती प्रतिमान
    इस दौर में ढूँढे नहीं मिलेगा, उनकी बराबरी का कहीं
    इंसान
    विरोधियों से भी थी जिनकी अपने सगे-संबंधियों जैसी
    पहचान
    करनी कथनी में गज़ब का तालमेल, द्वेष का नहीं नामो-निशान
    सैद्धांतिक नीतियों के बल पर दशकों तक बन रहे सबसे महान
    विदेश मंत्री,रक्षा मंत्री वित्त मंत्री, राष्ट्रपति बन बढाया राष्ट्र का मान
    पद्मविभूषित,सर्वश्रेष्ठ सांसद,प्रशासक,भारत रत्न,पाये बंगला मुक्ति सम्मान
    सिद्धांतों को जीने वाले, दमन के विरोधी,
    मानवता के पोषक पसंद करता जिन्हें सारा जहान
    निधन, एक अपूरणीय क्षति है, गमगीन है सारा हिन्दुस्तान

  • अच्छा लगा

    आज धरा से मिला आकाश ,तो अच्छा लगा।
    नन्हीं – नन्हीं बूंदों से हरी हो गई घास ,तो अच्छा लगा।
    तल्ख़ हो जाए ,कुछ बातों से जब दिल,
    कोई दे जाए बातों की मिठास , तो अच्छा लगा।
    यूं ही तो कोई किसी की परवाह नहीं करता,
    कोई दिलाए “ख़ास” का एहसास, तो अच्छा लगा ।

  • तुम्हारी व्यथा

    कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही
    नही लेती, आंख मेरी नम कर जाती
    रोटी से शुरू हुई पलायन तक गई
    पर मौत पर जा कर रुकी
    तुम्हारी उदर-ज्वाला संग जंग
    आंख मेरी नम कर जाती
    हजारों मील पैदल चले,पांव मे छाले पड़े
    पर गांव तक पहुँच ना पाऐ
    तुम्हारी जड़ो को छूने की कसक
    आंख मेरी नम कर जाती
    हाथगाड़ी से गृहस्थी को ढ़ोते देखा
    बैल की जगह जुटते देखा
    रेल की पटरी पर मरते देखा
    तुम्हारी मिट्टी में मिलने की कहानी
    आंख मेरी नम कर जाती
    नन्ही सी बच्ची की अंगुली थामे गर्भवती औरत
    को मीलों चलते देखा, मासूमियत और मजबूरी
    से भरे चेहरे को देखा
    तुम्हारी जीवन और मृत्यु की संघर्ष यात्रा
    आंख मेरी नम कर जाती
    कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही
    नहीं लेती, आंख मेरी नम कर जाती

  • मां रोती है

    नन्हे से बच्चे को जब
    सड़क पर चाय बेचते देखती हूं
    इक बहन सिसकती है
    मां रोती है
    मेरे अंदर

  • कहां चल दिए!

    यह कहक़हा लगा कर ,
    मुझे झुकाकर कहां चल दिए।
    मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर,
    सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए।
    मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार,
    ठहरा कर कहां चल दिए।
    मैं मांगती रही इंसाफ इस दर पर,
    तुम मुझे ठुकरा कर कहां चल दिए।
    अब बता दो जश्न जीत की या मेरे हार की,
    मनाने कहां चल दिए?
    मैं मिलूंगी कहीं ना कहीं ,
    किसी और सूरत में ,
    फिर से पूछूंगी ये सवाल।
    मेरी अस्मत पर दाग लगा कर कहां चल दिए?
    तुम हंस रहे हो मेरी हार पर,
    अगली जीत मेरी ही होगी ।
    अब तुम लगा सकते हो।
    यह कहकहा, मुझे झुका कर।

  • नारी तुम पर कविता लिखने को

    नारी तुम पर कविता लिखने को
    वर्णांका असफल है मेरी
    तुम तो जीवन की जननी हो
    सब कुछ तो तुम ही हो मेरी।
    माँ बनकर जन्म दिया मुझको
    यह सुन्दर सा संसार दिखाया,
    अच्छी-अच्छी शिक्षा देकर
    मानव बनने की ओर बढ़ाया।
    दीदी बनकर स्नेह लुटाया
    बहन बनी, खुशियों को सजाया
    दादी बनकर लोरी गाई
    नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया।
    भार्या का रूप मधुर धर कर
    जीवन में नईं खुशी लाई,
    सारा भार स्वयं पर लेकर
    पीड़ा में भी मुस्काई।
    बेटी बनकर घर आंगन में
    रौनक की किलकारी भर दी
    बेटों की बराबरी करके
    सब ओर नींव नई रख दी।
    तुम पर कविताएं लिखना
    सूरज को दिया दिखाना है,
    तुम सूरज हो इस जीवन की
    तुम पर नतमस्तक होना है।

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