कैसा मंजर यह आया है, चहुंओर अंधेरा छाया है! कितने कुलदीपक बुझ ही गए, कितने परिवार यू उजड़ गए, गर नहीं सचेते अब भी तो, उठ सकता सिर से साया है, चहुंओर अंधेरा छाया है! […]
कैसा मंजर यह आया है, चहुंओर अंधेरा छाया है! कितने कुलदीपक बुझ ही गए, कितने परिवार यू उजड़ गए, गर नहीं सचेते अब भी तो, उठ सकता सिर से साया है, चहुंओर अंधेरा छाया है! […]
कोई मेरी व्यथा क्यों समझता नहीं, मैं भी प्यासा हूं,मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं। बढ़ रही उमस इतनी,और धूप कितनी तेज है, पानी के लिए मैं तरसता,इसका मुझको खेद है, सब जानते हैं बिन […]
ये धुंआ धुंआ सा जल रहा है क्या? कहीं कोई हो रहा बेखबर सा क्या? सब में प्रभु पहचान कितना भ्रम है लोगों को सब उसे देख जलते है उसे आगे बढ़ते हुए देख उसकी […]
ऊँची तेरी शान रे बन्दे सब में प्रभु पहचान रे बन्दे कोई बड़ा न कोई छोटा हर चेहरे पे झूठा मुखौटा कहने को ही मन आँखे अपनी कान भी पर दोषों का श्रोता कहने को […]
ऊँची तेरी शान रे बन्दे सब में प्रभु पहचान रे बन्दे कोई बड़ा न कोई छोटा हर चेहरे पे झूठा मुखौटा कहने को ही मन आँखे अपनी कान भी पर दोषों का श्रोता कहने को […]
बचपन से ही न जाने कितने दोस्त बनाये हंसी ख़ुशी उनके संग ज़िंदगी के पल ये विताये जगह बदल जाने पर वे कितने याद आते हैं मायुशियों के पल उनकी यादों से खाश होते हैं […]
यह जीवन जीना जग में साथी, नहीं है सहज सरल। ज़ालिम यह दुनियाँ है, पीना पड़ता है गरल। कोई-कोई ही इस दुनियाँ में, हॅंसकर साथ निभाता है। आगे को जाते देख अक्सर, यह जमाना जल […]
थोड़ा निहारने दो कुदरत की छवि मुझे तुम तुम भी निहार लो ना इस वक्त भूलो सब गम। सूरज निकल रहा है सब ओर लालिमा है, कलरव में उडगनों के प्यारी सी मधुरिमा है। चारों […]
कविता ऐसी कहो कलम, प्रफुल्लित हो उठे मन। दुखी ह्रदय में खुशियों के फूल खिलें, बिछुड़ों के हृदय मिलें। कभी प्रकृति का हो वर्णन, कविता ऐसी कहो कलम। देखें उषा की लाली को, सुबह की […]
अंधेरी राह जीवन की हमारी रोशन करते हैं, हमें जो ज्ञान देते हैं उन्हें हम शिक्षक कहते हैं। दिशा देते हैं जीवन को करा कर बोध अक्षर का नयन में ज्योति देते हैं उन्हें हम […]
स्वच्छता कि हम एक नई मुहिम चलाएंगे, गांधी जी के सपनों को साकार कर दिखाएंगे। धरती हरी भरी होगी,अब स्वच्छ अपनी मति होगी, गंदगी के ढेरों की,अब ना कोई अति होगी, पर्यावरण में चहुंओर सुगंध […]
हर बार चिपकाता है वह पोस्टर। बैनर टाँगता है हर चुनाव में। इस आशा में कि कभी तो बैठूँगा अपने विकास की नाव में। कुछ खिला पिला दिया जाता है तात्कालिक संतुष्टि को, ठेके-पल्ले का […]
हे धारित्री, पञ्च महाभूतों में से एक तुम, तुमसे ही उत्पन्न होकर भी मानव अछूता रहा तुम्हारी सहनशीलता के गुण से..!! काश! तुम्हारे धैर्य का अंशमात्र भी वह आत्मसात कर पाता अपने भीतर तो आज […]
हर दिन हम अच्छे होते जायेंगे बहुत लगाए बाड़ काटों के अब फूल से कोमल होते जायेंगे गलत स्पर्धा में हमें नहीं पड़ना मुरझाये चेहरे अब नहीं गढ़ना हर चेहरे को सच्ची हंसी से सजायेंगे […]
जिसने हमें सम्हाला कितने प्यार से पाला आज उसे सम्हालने की पड़ी है सच कैसी मुश्किल की घडी है माँ जो हमपे गर्व थी सदा ही करती संकट में आज है हमारे कारण वो धरती […]
ऑक्सीजन की कमी हुई है देश में, मार रही है बीमारी, कोरोना के भेष में। प्रदूषित होती जा रही है धरा, वृक्ष लगाकर आओ बनाऍं इसको हरा। ऑक्सीजन के सिलेंडर लेते हो, तुम कुछ दाम […]
आओ कथा सुनाएं तुम्हें पारिस्थितिकी पारितंत्र की, खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की। दिन-रात खनन हो रहा है चहुंओर हरियाली का, आधुनिक मशीनें बन गई कारण जीवन की खुशहाली का, है आवश्यकता […]
जब बदलियाॅं भरी जल से, वह बारिश बन बरसने लगी। जब पुष्प में आया सुवास, पवन में सुगन्धि बिखरने लगी। जब दीपक को जलने का बल मिला, वह प्रकाशित हो उजाला देने लगा। बिन कोई […]
मुस्कुरा उठे लब मेरे, देख कर नभ में तारे। मुस्कुरा उठे लब मेरे, देख उषा की लालिमा। भोर की ठॅंडी बहती पवन, प्रफुल्लित कर गई है मन। ये परिन्दों का चहचहाना, कह रहा कविता कोई। […]
हैं वह मर्यादा का नाम जिन्हें सब कहते हैं श्रीराम, पुरुषोत्तम, आदर्श संस्थापक, न्यायप्रिय श्रीराम। जन्म हुआ दशरथ जी के घर अयोध्या जैसा धाम, अपमानित थी मात अहिल्या उन्हें दिया सम्मान। लांछन से पत्थर बन […]
अवध में बज रही आज बधाई, हरष रहा मन आज सभी का,हुई धन्य कौशल्या माई, अवध में बज रही आज बधाई। विजय पताका नभ में लहर रही, असत्य की राहें यहीं ठहर गई, दमन हुआ […]
आज है राम जन्म करो सब मिल जय- जय कार, फैली विश्व में महामारी को मिटाने के लिए,फिर ले लो प्रभु अवतार। त्राहि त्राहि कर रहा है जग यह, चहुंओर मची चीत्कार, आकर संभालो प्रभु […]
मर्यादा की पराकाष्ठा सद्गुणों के धाम हे पुरुषोत्तम तुम्हें बारम्बार प्रणाम अवतार पूर्व मनुष्यता थी विकल ज्ञानी ध्यानी सारे संत थे विफल अत्याचार मुक्ति की न थी युक्ति विलुप्ति की ओर अग्रसर थी भक्ति अवतरण […]
राम जी के जन्म दिवस की,, आज सबको है बधाई। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को, अयोध्या में खुशी थी आई। प्रथम बार पिता बने राजा दशरथ, प्रथम बार माता बनीं कौशल्या माई। […]
पूरब हो या हो पश्चिम, उत्तर हो या हो दक्षिण। घर हमारा हमें देता हर्ष है, घर के बाहर तो संघर्ष ही संघर्ष है। हम जीवन के सुख-दुख, घर में ही बाॅंटते हैं। बाहर मिलते […]
आत्मसम्मान जीवित रखो वक्त काफी कठिन क्यों न हो, बस रहो कर्मपथ पर अडिग वक्त काफी कठिन क्यों न हो। मन में घबराहटों के लिए कोई स्थान ही मत रखो, खोज कर खूब सारी उमंगें […]
कैसे हो बेकारी दूर मेहनतकश को काम नहीं है, बैठा है मजबूर। कब तक ऐसा रोग रहेगा, सोच रहा मजदूर। रोजी-रोजी की चिंता है, घर से आया दूर। मन में चिंता है जीवन की, कठिनाई […]
सुनने को कर्ण यह तरस गये कहां अब कोई अच्छी ख़बर है वेवसी का आलम है यह कैसा पल यह कैसा,हर एक की सूनी नज़र है।। सुनने को अंन्तर्मन यह तरस रहा है कहीं से […]
सुन लेंगे भगवान मगर तू सच का रखना ध्यान, कि सच का मत करना अपमान। झूठी झूठी माया जोड़ी, हुआ बहुत धनवान। अंत समय में सब मिट्टी है, यह होता है भान। निंदा, द्वेष बुराई […]
जीवन संघर्षों का नाम बिना किए कुछ भी न मिला है, करना होगा काम। कर्मों का फल देता ही है, देने वाला राम। जिसको पाने में कठिनाई, उसका ऊँचा दाम। पूरब हो पश्चिम हो या […]
अपनी कश्ती खुद ही चला कर दिखदो मंजिल को पास ले आकर नहीं कुछ भी ऐसा जो तेरे बस में नहीं हैं कर सकते हो, बढ़ो बस ये अहसास जगाकर। आसान से गर मिल ही […]
हिम किरीटनी, हिम तरंगनी, युग चरण के रचयिता हे साहित्य देवता है ऋणि हम,करते है अर्पित श्रद्धा-सुमन, साहित्यअकादमी से विभूषित,शोभित पद्यभूषण तेरा यश है फ़ैला, क्या भू-तल क्या गगन।। परतंत्रता के दर्द को दिखाती रची […]
आज वही दिन है जब मेरी मुझसे पहचान हुई मुझमें भी है लेखन क्षमता इक नई खूबी की आभास हुई मेरे अल्फ़ाज़ मेरी ख़ामोशी की आवाज़ बने इक नई सुबहा हुई नयी उम्मीदों से मुलाक़ात […]
आसान बहुत है चाह अच्छा बनने की पाल लेना पर तय सफर पर बढ़ते रहना,बङा ही कठिन है आस किसी के मन में जगाकर, खुद के घर की रौनक घटाकर, पर हित में इच्छा को […]
श्रमिकों पर फ़िर टूटा कहर, चल दिए छोड़ कर शहर। काम नहीं है क्या खाऍंगे, यही सोच गाॅंव जाऍंगे। क्या करें बेचारे मजदूर, लाॅकडाउन में हुए मजबूर। लाॅकडाउन भी जरूरी है, इनकी भी मजबूरी है। […]
बोझ खींचे जा रहा था वह हाथ ठेले से, पेट भीतर तक खींच कर जोर लगा रहा था। आँतें एक दूसरे से चिपक कर सपाट होती जा रही थी। हड्डियां व पेशियाँ खिंचती चली जा […]
पतियों की हालत पत्ति की तरह श्रम कर कर गिरे पत्ति की तरह कहने को ही घर का मालिक है दिन श्रमरत रहा रात चौकीदारी है बीबी की शादी तो हुई शीशे से पति से […]
पृथ्वी ही ग्रह जहां जीवन नदी झरने पहाड़ वाले वन जल वायु मिट्टी जैसे संसाधन अत्यधिक इनका न हो दोहन पृथ्वी दिवस जैसे आयोजन सजग करते हैं हमें सज्जन आलस त्याग आओ हर जन धरती […]
कहने को हम भी कहते हैं धरा को धरती माता, है कितनी पीड़ा धरती मां को,यह कोई क्यों ना समझ पाता। करते हम अपने कृत्यों से,धरती मां को यूं गंदा पर्यावरण को दूषित करने में […]
संतापों क्रम यह कब बदलेगा, मानव जाति पर आया संकट कब निपटेगा। हा हा कार, चीत्कार विभत्स करुण क्रंदन कब रुकेगा, ओ प्रकृति !! तेरा यह आक्रोश कब थमेगा। लाखों जीवन लील चुका यह विनाश […]
बाँधे कमर नई आशा से फिर दिल्ली पंहुचा था वो रोजी रोटी खोज रहा था, बच्चों को भी भेज रहा था। कई दिनों के बाद जिन्दगी ढर्रे में आने वाली थी, मगर वही फिर कोविड़ […]
यह जीवन है अजर-अमर तो क्यों द्वेष-भाव तुम रखते हो वाचन से तो अच्छे हो पर मन में विष क्यों रखते हो, मन में विष क्यों रखते हो जीवन चार दिनों का जीवन ना देता […]
क्यों हो जाते ख्वाब हैं झूठे मिट जाते सब उजियारे चहुँ ओर फैल जाता है अंधियारा उजड़े-उजड़े गलियारे पुष्पों की सुगंध खो जाती निर्मल पावन क्यों गर्म हो जाती पानी की मीठी-मीठी धारे विपरीत दिशा […]
मां की ममता दिखी धरा पर पिता का अविरल प्रेम मिला भाई का स्नेह मिला और
ख्वाबों में जो देखा उसको सच करने की बारी है धोखाधड़ी अब बहुत हुई सच्चाई की बारी है नेताओं के भाषण से अब ना हमको विचलित होना है सच्चा नेता कौन है हमको बस उसको […]
जीना हमने सीख लिया बरसों बाद… गिरे पड़े थे उठ कर बैठे सपने मेरे जग कर बैठे जगती आंखों देखे सपने उनको पूरा करना सीख लिया जीना हमने सीख लिया बरसों बाद…
सीखा तो हमने भी बहुत कुछ है तुम्हारी लेखनी से कैसे अविरल, निर्भीक चलती है शब्दों की सुंदर कारीगरी तो रहती ही है साथ में भावों की लहर बहती है हम तो समझते थे कि […]
अरि के आगे अडिग रहना है, नहीं अरि से झुकना है। हिम की ऊॅंची चोटी से, यह हमने भी सीख लिया है। फलों से लदी डाली ही अक्सर, झुकती देखी दरख़्तों की। सीधे खड़े अकड़े […]
बच्चों की आदत रही खाकर भूल जाने की फल उठा बस ले चले चाहत मरी ठिकाने की किसमें गलतियां ढूंढे हम किससे अब शिकायत करें दोष देगा जमाना दोनों को दरार है जिसके तहखाने में […]
अपनी चाहतों के लो आज वो फिर गुलाम हो गये कैसी होती थी सुबहें अब कैसे शाम हो गये छुपते अपने ही घर जो दोस्तों के आने जाने पर उन्ही दोस्तों की चाह में जहां […]
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