आ बैठ जा मैं गीत लिख दूँ आज तुझ पर है उपेक्षित तू सदा से ठण्ड की रातों में सोता है खुली ठंडी सड़क पर। ठेके का रिक्शा खींच दिन भर जो कमाता है उसे […]

मन !!जरा सी बात पर तू मत दुखित हो इस तरह जिन्दगी है हार भी है जीत भी, संघर्ष भी। गर कभी है अवनयन तो है यहां उत्कर्ष भी। डूबने का भय कभी है तो […]

जाड़ा का मौसम बड़ा सुहाना। भाँति -भाँति के बनते खाना।। गाजर का हलुआ सबको प्यारा। खाओ मूंगफली भगाओ जाड़ा।। गाजर शलग़म मूली का अचार। बड़े स्वाद लेकर खाए सब यार।। आंवले को खा पानी पीना। […]

भ्रष्टाचार खत्म करो ऊपर की कमाई पर रोक लगाओ सत्यता के भाव जगाओ रातों-रात करोड़पति बनने की प्रवृत्ति पर विराम लगाओ नियम कानून जो बने हैं उन्हें काम पर लगाओ, गरीबों की योजनाओं को उन […]

यह संसार है यहां के कुछ नियम होते हैं यहाँ दिखावे की बजाय लोग दिल से अपने बनाने होते हैं। यहां इज्जत पाने से पहले दूसरे को सम्मान देना पड़ता है। शिखर में चढ़ने के […]

ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया ज़िन्दगी तूने जो दिया, उसके लिए तेरा शुक्रिया कल कहने का वक्त मिले ना मिले, जो भी तूने मेरे लिए किया उसके लिए तेरा शुक्रिया बचपन में ऐ ज़िन्दगी तूने ख़ूब […]

विचार कर सको तो जरूर कर लेना, असुर हो या मनुज हिसाब रख लेना। अपने कृत्यों की सजाकर डायरी जा रहे वक्त के पन्नों में आप लिख लेना। जिन माता-पिता ने जन्म दिया, पालन किया […]

राशन   भाषण  का  आश्वासन  देकर कर  बेगार  खा गई। रोजी रोटी लक्कड़ झक्कड़ खप्पड़ सब सरकार खा गई।   देश   हमारा   है    खतरे   में,   कह    जंजीर    लगाती   है। बचे   हुए   थे  अब तक […]

हमारी मुफलिसी को क्या समझो तुम तुम्हारे महल, हमारी झोपड़ी है, हमारी राह में संघर्ष खड़ा तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है। हमें नसीब बड़ी मुश्किल से रोटियां पेट भर को खाने को, तुम्हारे पास फेंकने […]

आ मेरे मीत!! कर बहाने मत दे मुझे अश्रु से नहाने मत, बह रहे भाव खूब आंखों से अब इन्हें रोक ले, दे आने मत। जब से फेरी है तूने पीठ मुझे तब से मन […]

मुक्तक-कवि का धर्म ————————- कवि का कोई धर्म नहीं हो सकता है, मंदिर मस्जिद चर्चो में भगवान नहीं हो सकता है, दुख को दुख कहता है जो सुख को सुख कहता है जो खुद के […]

सुबह सुबह की गरम चाय हो तुम आलस्य छोड़ने में सहाय हो तुम, खुद ही बुनता रहा उधेड़ रहा, उलझी बातों में मेरी राय हो तुम। जिन्दगी को जरूरी मुहब्बत हो तुम दिल में राज […]

गांव वीरान हो गए छोड़कर वे मनोरम वादियां शहर की ओर चल दिये, फिर नहीं लौट पाये वापस शहर में भीड़ थी वे भीड़ में समा गये। उधर वे खो गए इधर गांव के आंगन […]

कुछ जहाँ थे वहीं हैं कुछ पहुँचे आकाश कुछ की हालत दीन है कुछ हैं मालामाल। बेकारी ने छीन लिया युवा दिलों का जोश, मेहनत की मजदूर ने फिर भी खाली कोष। फिर भी खाली […]

पूस की ठंड में, वह सिकुड़ता सिमटता सा जा रहा था कोहरा भी उसकी ओर आ रहा था सूर्य भी धरा से विदा लेकर, अपने भवन जा रहा था दिन ढलने लगा था, तिमिर छलने […]

हल उठाने वाले देखो, हल मांगने आ गए समस्या का हल, कुछ ना कुछ तो निकलेगा आज नहीं तो कल निकलेगा ट्रैक्टर लेकर खड़े किसान, अपने हक पर अड़े किसान ना सर्दी की फिक्र है, […]

कमा लो धन भले कितना मगर नजरें धरा पर हों, किसी को तुच्छ मत समझो, नजर से सब बराबर हों। पढाई उच्च हासिल कर मिला प्रमाण कागज में वही व्यवहार में दिख जाये तब है […]

तुम्हें भारी पड़ेगा तैरना ऊपर सतह पर, रत्न मिलते नहीं भटकन वहां पर। रत्न मिलते हैं गहराइयों में, तुम्हे आना पड़ेगा, ह्रदयतल में उतरकर।

एक कवि का जाना ———————— एक कवि अपनी दूर दृष्टि और लेखनी से पूरे संसार का दुख सुख समेट बिखेर देता है सुंदरता से कागजों पर कीमती मोतियों की तरह, इनकी चमक से मिलती है […]

पूस की रात ————- कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात ठिठुरन, सिहरन आरंपार। पूस की रात जो हुई बरसात कांप उठी सारी कायनात। ना जाने कब होगी ये प्रातः। ठंड और कोहरे ने गला दिए हाड़ मांस। […]

हरसिंगार ———– रात भर महकता, संवरता करता इंतजार, तड़प कर बिखर जाता धरा पर …. होकर बेकरार। खिल जाती धरा, मुस्कुराकर कहती आओ केसरिया बालम हरसिंगार!

जिंदगी ——— हर किसी को खुश रख सके… यह तो भगवान के भी बस की बात नहीं। किसी के लिए अच्छे हैं तो किसी के लिए बहुत बुरे भी। तो हार जीत से डरना कैसा! […]

तृप्ति —— वाग्देवी सरस्वती लड़खड़ाती जब निकलती हैं पहली बार बोलते किसी बालक के स्वर से… तो रसिक की तरह निहाल हो जाते हैं हम सब। वह पहला मधुर स्वर सुनने को लालायित, हमारे कान […]

अनर्गल पक्षियों की चहचहाहट हमें शोर महसूस होती है जिस ध्वनि को सुनना हमारा मन गंवाया न करें वे सभी शोर हैं

शरद ऋतु का आगाज़ —————————- लंबी हो चली रात , कोहरा और बरसात। ऐसे में तेरा साथ, रूमानी एहसास। गुलाबी होठों के खुलते ही गर्म सांसों की आवाज़। कोहरे की चादर ओढ़े सूरज की तबीयत […]

थोड़ा सा कुछ —————— घर एक कारखाना, काम करते-करते.. थोड़ा सा कुछ रह ही जाता है। तन- मन से बढ़िया से बढ़िया करने के बाद, मुस्कुराहट के साथ परिवारी जनों की प्रतिक्रिया जानने के लिए […]

एक झलक और मुस्कुराहट तुम्हारी, देती रहें खुशियां.. न हो युद्ध की तैयारी। धड़कनें राग बजाती रहें, अभी जिंदा है हम… यह जताती रहे। रौंनके बरकरार रहे, क्या बात हो अगर .. ता उम्र .. […]

लम्हें —– कुछ गहरे घाव से दुखते होंगे, कुछ गहरे तंज जो आज भी चुभते होंगे। कुछ वक्त के मरहम से भर चुके होंगे, कुछ सुगंधित फूल से महकते होंगे। कुछ लम्हें तोहमतें, कुछ तोहफों […]

पुनर्स्थापना ————- गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक और राजा राममोहन राय नहीं जानते होंगे की कुप्रथा पर रोक लगाने के बाद भी…. वे नहीं रोक पायेंगे उन्हे। बस चोला बदल पुनर्स्थापित कर दी जाएंगी अलग-अलग […]

सफलता ———– बुझ रहे हो दीयें सारे, ओट कर.. जलाए रखना। जल विहीन भूमि से भी, तुम…. निकाल लोगे जल.. विश्वास को बनाए रखना। अंधकार व्याप्त हो.. सूर्य की तलाश हो, मार्ग जुगनूओं की रोशनी […]

ऊर्जा स्रोत ————- प्रिय! विद्युत सी है वाणी.. चल पड़ती है तो कानों में घुल… रूपांतरित हो जाती है मेरी हंसी और क्रोध में अनायास। याद दिला ही देते हो तुम “जूलियस रॉबर्ट मेयर”की… ऊर्जा […]

दस्तावेज ———– दबे पांव तृष्णायें घेर लेती है एकांत पा, विचारों की बंदिनी बन असहाय हो जाती है चेतना। अवचेतन मन घुमड़ने लगता है बादल बन, लहलहाने लगती है विचारों की फसल। ऋतु परिवर्तित हो..बसंती […]

जिंदगी प्रतिक्षण अंतिम पड़ाव की ओर कदम बढ़ाती है इस सच को हम भूलना चाहते हैं पर किसी न किसी की मौत हमें यह सच बार-बार दिखाती हैं मृत्यु का डर बार-बार हमें अच्छे बुरे […]

ज़ुबान तेज हो तो शूल सी चुभती है बहुत चुभन के दर्द से लोगों को बचाए रखिये। जिंदगी ठहरी है न ठहरेगी कभी, प्यार के दीप, फिजाओं में जलाए रखिए। मौत आगोश में ले लेगी […]

क्रूर व्यवहार अच्छे खासे इंसान को भी कहलवा देता है “जानवर कहीं का”। इंसान का जन्म है इंसान ही रहिए जानवर बनने की कोशिश न करिए। निमिषा

मृगमरिचिका मृगतृष्णा यह जीवन सारा तृष्णा में डूबा जाता है, तृष्णाग्रस्त हो खोया रहता है, हाथ नहीं कुछ आता है। मरुभूमि में उज्जवल जल सा… बार-बार बहकाता है। कस्तूरी की तरह दिशाविहीन हो भटका- भटका […]

महफिल ———- महफिल में हंसते चेहरे भी. … अक्सर बेचैन से रहते हैं, वह हंसते-हंसते जीते हैं आंसुओं को भीतर पीते हैं। महफिल में रौनक छा जाती … जब प्रेम के नग्मे बजते हैं, कुछ […]

बाबुल —————- ‌‌ याद आए बाबुल जब-जब तेरी, आंख भर आए तब तब मेरी। मैं चिड़िया थी अंगना तेरे, चहका करती सांझ सवेरे। गोद में हंसती रोती गाती, थपकी तेरी मुझे सुलाती। थी बाबुल तेरी […]

मधुमक्खियां —————- कालबेलिया नृत्यांगना सी रंगत…. छरहरी… बिजली सी फुर्तीली, योद्धा ….. डंक हथियार लिए… घुमंतू… चकरी सा नृत्य कर जब तेज स्वर में बजाती है सारंगी सी धुन… तो मादकता बिखर जाती है हवाओं […]

जब वक्त मिले तो पढ़ लेना, पढ़ लेना रिश्तों की किताब कुछ रिश्ते मिलते हैं जन्म से, कुछ रिश्ते देता है यह समाज किन्तु निज चुनाव से जो रिश्ता, पुष्पित-पल्लवित होता है हृदय में, वो […]

दो किनारे इक नदिया के, चलें साथ-साथ पर कभी ना हो उनका मिलन एक दूजे को देखकर ही, रहते हैं दोनों प्रसन्न मिलने की भी ना सोचें कभी, दो किनारे इक नदिया के उन दोनों […]

घास पूस की झोपड़ी मैया है बीमार चौदह की गुड़िया ने थामी, है घर की पतवार। भूख बीमारी बेहाली के झंझावात घिरे हैं, गलत नजर से देख रहे श्वानों से सिरफिरे हैं। चूल्हा-चौका सब करना […]

जब रात को मैं सो जाती हूं, तो चाँद ज़मीं पर आता है मेरे आंगन में खूब सारी, वो चाँदनी छोड़ के जाता है सुबह को जब मैं उठती हूं, उस चाँदनी से मुंह धो […]