दिल क्यों टूट जाता
May 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी
आलिंगन भी दिल से दिल को ना मिलाता।
फिर बेबफाई से दिल आखिर क्यों टूट जाता।।
May 13, 2020 in शेर-ओ-शायरी
आलिंगन भी दिल से दिल को ना मिलाता।
फिर बेबफाई से दिल आखिर क्यों टूट जाता।।
May 13, 2020 in हाइकु
हर कसम टूट जाते हैं
मुहब्बत के एक कसम खाने के बाद।
इश्क़ रंग लाता है जुदाई के बाद।।
May 12, 2020 in मुक्तक
तुम कृपाण रखते हो
तो मैं भी कटार रखती हूँ।
तुम एतवार रखते हो
तो मैं भी प्यार रखती हूँ।।
May 12, 2020 in मुक्तक
बेशक़ कड़ा है लोहे का
फिर भी है चूड़ियों का भाई।
भाई वीर कहलाता है तो
बहना क्यों कहाती अबला दाई।।
May 12, 2020 in मुक्तक
जब भी देखता हूँ मैं
इस रोटी के खुरचन को
तो माँ आ जाती है यादों में।
तवे पे रोटियाँ बनाती जब
जला -जला के रोटियाँ की
सौंधी सुगन्ध फैल जाती वातों में।।
तोड़ -तोड़ के खुरचन सारे
करती साफ रोटियों को।
चुपड़-चुपड़ घी से मैया
हमें खिलाती रोटियों को।
जब पूछता कारण इसका
मुस्कुरा के रह जाती माता।
आ परदेश में अपने हाथों
बना के रोटी जब भी खाता।।
मैया याद में आती है और
खुद हीं समझ जाता हूँ मैं।
सेहतमंद यही रोटी है
सबको अब बतलाता हूँ मैं।।
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May 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
अक्सर कहा करता था मैं
माँ जाऊँगा परदेश को।
“”ना ना वश कर”कहती
माँ को मत कलेश दो।।
दृढ़ संकल्प होकर ऐसा
एक दिन निश्चय कर डाला।
आजिज होकर मान गई
और कहने तू सुन ले लाला।।
खाना पकाना हाथ का खाना
बाहरी को ना हाथ लगाना।
तवे पड़ा रोटी का खुरचन
मेरे ख़ातिर लेकर तू आना।।
साल महीना काट के आया
जब मैया के पास में।
आखिर खुरचन क्यों मंगवाई
बोलो मैया साथ में।।
जली हुई रोटी अच्छी है
कहीं कच्ची रोटी खाने से।
‘विनयचंद ‘तो समझ गया
और कहता आज जमाने से।।
माँ तो माँ होती है इसकी
ममता का कोई हिसाब नहीं।
बच्चों की जाँ तो माँ होती है
करना कभी बुरे बर्ताव नहीं।।
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May 11, 2020 in हाइकु
जेठ का महिना भी
अबकी कमजोर लगता है।
शायद कोरोना ने इसे भी लाॅकडाउन कर दिया।
May 11, 2020 in Other
काश मुकर जो जाता कर्ण
कुण्डल कवच देने से पहले ।
संकल्प विखण्डित हो जाते
और मर जाता मरने से पहले।।
May 11, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
चटपटी स्वाद की इमली
व कड़वा होता नीम यहाँ।
मूँह में पानी आ जाते हैं
देख इमली जहाँ -तहाँ।।
बिन खाए सांसों से केवल
स्वास्थ्यलाभ दे नीम हमेशा।
‘विनयचंद ‘ ऐसे हीं संतन
हरे सकल जग जीव कलेशा।।
May 11, 2020 in हाइकु
तू मेरा मनमीत है
तुझसे मेरे जीवन का हर गीत है
तेरा साथ जो हो तो हार भी एक जीत है।
May 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
माँ तेरी ममता का कोई हिसाब नहीं।
तेरी आँचल की छाया
और जिसको तेरी गोद मिले।
खुशनसीब है वो संतान
जिसको ममता की मोद मिले।।
तेरे मन की शीतलता के
सम कोई माहताब नहीं ।
माँ तेरी ममता का कोई हिसाब नहीं।
May 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
मातृदिवस पर माँ को बच्चे
याद बखूबी करते हैं।
सोशल मीडिया पर आकर
अह्लाद बखूबी करते हैं।
माँ ने अपने दूध की ममता
फेसबुक पर डाला क्या?
दिल के एस डी कार्ड से भैया
तेरा फोटो निकाला क्या?
ऐसी ममतामयी को केवल
न फेसबुक पर याद करो।
‘विनयचंद ‘कुछ समय निकालो
बैठ पास में बात करो।।
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
हम देश के सिपाही
ये हिन्द है हमारा।
चंदन लगे हैं माटी
अभिमान है हमारा।।
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
देश के भीतर कोरोना है
और सरहद पर आतंकवाद।
संयम और धीरज से हमसब
निज देश को रखेंगे आबाद।।
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
यूँ हीं नौराता बीत गया
और गई बैशाखी खाली-खाली।
कहर कोरोना के कारण
जेब तिजोरी सब हो गए खाली।।
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ना तीर से डरते हैं
ना तलवार से डरते हैं।
हम तो वीर सैनिक हैं
सिर्फ गद्दार से डरते हैं।।
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
नब्ज टटोलकर भी पूछते हो
तुम्हें रोग क्या है ?
दिल दिलदार का पूछता है
दवा-ए-वियोग क्या है?
May 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी
कोरोना कें कहर में
न ताली काम आई
न थाली काम आई।
काम आई तो सिर्फ
घर घर कंगाली
ईनाम आई।।
May 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी
कैसे होगी शहरी अब
कैसे होगा इफ्तार भला।
कहर कोरोना के कारण
बन्द पड़ा बाजार भला।।
May 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी
न फूल मिला न हार मिला।
न नारियल चुन्नी सिंगार मिला।
मन्दिर में ताले लटक रहे
यूँ हीं नौराते का त्यौहार गया।।
May 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी
मन का घोड़ा ,बेशक़ लंगड़ा
हरदम जाए भागे-भागे।
जन्नत भी फीका लगता है
महबूब की गलियों के आगे।
May 8, 2020 in शेर-ओ-शायरी
ज्ञान और विज्ञान की धरती
त्याग और बलिदान की धरती।
क्यों बन रही है आज एक
जालिम और बेईमान की धरती।।
May 7, 2020 in Other
एकांतवास में रहकर भी
नहीं हुई तपस्या पूर्ण।
खान -पान में समय बिताया
सोया पूरम पूर्ण।।
घटा नहीं कोरोना जालिम
घट गया सीधा-पानी।
‘विनयचंद ‘कुछ ऐसा कर
जो सुखी बसे सब प्राणी।।
May 6, 2020 in ग़ज़ल
अब तो घर में भी रहना कारावास है
क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।
देख विरयानी में भी है खिचड़ी का स्वाद
क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।।
क्यों अनजाना -सा लगता है अपना शहर
क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।
बड़ी मुश्किल -सी लगती ज़िन्दगी वसर
क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।।
May 6, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
सचिव सयाने कुटिया में
रहते थे चाणक्य यहाँ पर।
निर्मल हृदयकुञ्ज मनोहर
निर्मल गंगा बहे जहाँ पर।।
एक छत्र राज था भारत
मुँह की खाई जहाँ सिकन्दर।
ह्वेनसांग भी हतप्रभ रह गया
झाँक झाँक भारत के अन्दर।।
जब शासक शोषक बन जाए
प्रजातन्त्र ये आखिर कैसा?
‘विनयचंद ‘ कुछ करो विचार
कैसे बने ये पूर्व के जैसा।।
May 5, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
फूलों की खुशबू को
बोलो आखिर किसने देखा?
बहती हवाओं को
बोलो आखिर किसने देखा?
खुशबू हीं तो तितली है
और खुशबू हीं तो मधुकर है।
सुरभित पवन नासिका होकर
दिलो दिमाग बीच सुघर है।।
May 5, 2020 in Other
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हुए जब।
भक्त शिरोमणि हनुमान हुए तब ।।
बन मातु पिता के आज्ञाकारी
श्रीराम अयोध्या छोड़ गए।
श्री राम के सेवा ख़ातिर हनुमत
निज मातु पिता भी छोड़ गए।।
ऐसे स्वामी सेवक को
प्रभुरुप वन्दना करते हैं हम।
‘विनयचंद ‘मर्यादित नर
नारायण कहलाते हैं वर।।
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May 2, 2020 in Other
इन अँखियों न देखी बड़ दुनिया
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?
जब भी देखा दुनिया में तो
देखा पंचविकार कबाड़ी।।
काम दिखा और लोभ दिखा।
मोह महामद क्रोध दिखा।।
इन पांचों ने मिलकर
मुझको बना दिया दुराचारी ।।
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?
बाहर -भीतर तुम हीं तुम हो
फिर क्यों देखूँ बाहर संसार?
अन्तर्मन का नयन खोल रे
‘विनयचंद ‘एक बार।
बिन अँखियाँ तुझे दर्शन देंगे
हरदम कृष्ण मुरारी।।
अब क्या देखूँ हे गिरिधारी?
May 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
एक पीड़ है हृदय में
एक दर्द है भयंकर।
तड़प रही है धरती
और रो रहा है अंबर।।
जिसने मुझे है लूटा
ज़िन्दगी बनाई बदतर।
कहता मुझे लुटेरा
आखिर बताओ क्योंकर।।
मेहमाॅ बानाके जिसको
रखा था घर में अपने।
मालिक -सा वो बनकर
घर को लगे हड़पने।।
कुछ तो करो ‘विनयचंद ‘
भगवान से निवेदन।
इंसान से भरा हो
ये धर्म के निकेतन।।
May 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
मजदूर हूँ मैं
मजबूर नहीं।
नहीं कभी चिंता
अपन रोटी की
सबका घर मैं
भरना चाहूँ।
चिलचिलाती धूपों ने जलाया,
कभी बारिश के पानी ने भींगाया।
कपकपाती ठंढी से भी लड़ना चाहूँ।।
क्योंकि मजदूर हूँ मैं।।
किसानी से कारखाना तक
अपनी सेवा का क्षेत्र बड़ा है।
अपने हीं दम पर तो
व्यापारियों का व्यापार खड़ा है।।
कर्तव्य बोध के कारण
अपनों से दूर हूँ मैं।।
सेवा धर्म है अपना
क्योंकि मैं मानव हूँ।
सेवा के हीं खातिर
कष्ट उठाऊँ न हीं श्रम का दानव हूँ।।
एक मजूरी दे ‘विनयचंद ‘
कह दे जग में नूर हूँ मैं।
मजदूर हूँ मैं।।
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April 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
तीन मित्र थे अपने
वफादारी के परम मिसाल।
मरणासन्न होकर मैं
तीनों से पूछा एक सवाल।।
कौन चलोगे मेरे साथ
किसको पास सदा मैं पाऊँगा?
बहुत दिया मैं साथ
नहीं अब तेरा साथ निभाऊँगा।
बोला पहिला मित्र
है तेरा मेरा साथ यही तक।
घर से निकलकर
काँधे देकर मुख पर मिट्टी डालूँगा।
धोप -थाप के कब्र को
सुन्दरतम कर सुन्दर फूल चढ़ाऊँगा।।
बोला दूजा मित्र
इसके आगे क्या कर सकता हूँ?
जन्म से पहले व जीवन भर का
साथी मैं तुमसे अब भी कहता हूँ।।
बाद कयामत और जन्मों तक
प्यारे मैं तेरा साथ निभाऊँगा।
तीजा का ये कहना
तेरा हरदम साथ निभाऊँगा।।
पहिला मित्र माल है भैया
दूजा इयाल कहलाता है।
तीजा साथी आमाल है
जो पग-पग साथ निभाता है।।
माल इयाल को छोड़ ‘विनयचंद ‘
अर्जन कर आमाल सदा।
जीवन सुखमय होंगे तेरे
सुखकर हो इन्तकाल सदा।।
माल :धन
इयाल: परिवार
आमाल: कर्म, सेवा
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April 23, 2020 in Other
पांडव चले वनवास को ,लिए द्रोपदी साथ।
हृदय भरा प्रतिशोध एक, है अनाथ के साथ।।
April 22, 2020 in मुक्तक
कानून के रक्षक
भी अब
भक्षक हो गए ,
करें भरोसा
आखिर
किस पर?
खाकी वर्दी
भी
गुलाम बन
हुक्म बजाती
सफेदपोश की।
काले कोट के जेब
बड़े हो गए,
करें भरोसा
आखिर
किस पर?
लुच्चे,
लम्पट,
चोर,
आतंकी
खुल्ला
घूम रहे हैं
देखो।
हिंसक भीर
भेरिये की चहुदिश
हो गई
ज़िन्दगी
मुश्किल खरगोश की।
साधु
संत
सन्यासी
को चोर समझ
अनाचार
कर रहा समाज।
मुर्खता और
गलतफहमी के
सब शिकार
हो गए,
करें भरोसा
आखिर
किस पर?
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April 22, 2020 in शेर-ओ-शायरी
मानवता का वास है
या फिर दानवता का त्रास है।
दुनिया के हर बसर को देखा
मतलबपरस्ती हीं अब खास है।।
April 21, 2020 in Other
निर्दोष समर्थ गुरू को भी
पीटा था नादान किसान।
छत्रपति से माफ कराकर
गन्ने का दिया खेत बथान।।
संत सदा से इस दुनिया में
होते दया धर्म के मूल।
‘विनयचंद ‘कभी होना
ना इनके प्रतिकूल।।
April 21, 2020 in Other
खुद को साध रहा जो मानव
औरों के कल्याण को।
सुख-सविधा और परिजन
त्याग दिए अरमान को।।
ऐसे साधु सन्यासी को
पीट -पीटकर मार दिया।
दुख इतना है यही है रोना
आस्था को भी मार दिया।।
जिस कानून के रक्षक ने
ऐसा कहर वरपाया है।
ऐसे कानून व्यवस्था से
न्याय भला कोई पाया है।।
अंधा समाज और अंधी कानून
पर विश्वास करें अब कैसे?
‘विनयचंद ‘इस निन्दनीय कृत्य
को मुआफ करें अब कैसे?
April 19, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
कागज का टुकड़ा बना पतंग
उड़ना चाहे नील गगन में।
हम पंछी का जीवन क्योंकर
डाल रहे हो पिंजर बन्ध में।।
पतंड उड़ाने के शौकीनों
मुझको भी तो उड़ने दो।
मेरे भी हैं कुछ अरमान
‘विनयचंद ‘नभ चढ़ने दो।।
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April 18, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
चमक रहा चांद पूनम का
जगमग आज आंगन है।
प्रफुल्लित हर कण वसुधा का
सुहानी रात साजन है।।
हृदय के कुंज में प्रीतम
सजाया सेज फूलों का।
नयन पथ से उतर आओ
नहीं है आतंक शूलों का।।
पाक हो दिल दिलवर का
नहीं जन्नत से कम होता।
‘विनयचंद ‘प्रेम की दुनिया
नंदनवन के सम होता।।
April 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
फिर बैसाखी आई है
देखो आज पंजाब में।
दर्द पुराना जाग गया है
उन सूखे हुए घाव में।।
क्रूर फिरंगी ने हम पर
कितना जुल्म किया था।
जालियावाला बाग में वीरों
जन समूह भून दिया था।।
‘विनयचंद ‘निज पुरखों की
कुर्बानी को रखना याद।
वो थे तो हम सब हैं
और अपना भारत है आजाद।।
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