कर प्रतिकार
September 22, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
दोष तुम्हारा क्या है अबले
तुम काहे को घबड़ाती हो।
मिले दण्ड अब उन दोषी को
जो तुझको हर पल तड़पाती हो।।
मर जाओगी खुद जाओगी
बस अपनी हस्ती मिटाकर।
तेरे जगह कोई और आएगी
बन काठ की पुतली चाकर।।
‘विनयचंद ‘क्या ऐसे कभी
खतम हो जाएगा अत्याचार।
हे अबले तू सबला बनकर
हार न मानो कर प्रतिकार ।।