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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

@pt-vinay-shastri-vinaychand • Joined Oct 2019 • Active 5 months ago

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

टिम टिम करते लाखों तारे

January 6, 2021 in Other

टिम टिम करते लाखों तारे
***********************
टिम टिम करते लाखों तारे।
देखो लगते कितने प्यारे।।
सुन्दर आकास सजा है ऐसे।
हीरे-मोती से थाल भरा है जैसे।।

बैठ के अंगना सदा निहारूँ।
एक भी मोती कभी न पाऊँ।।
एक तो आओ मेरे आंगन।
साथ में खेलूँ होय मगन।।

एक तारा जब टूटा था।
शुभ सगुन ये छूटा था।।
एक मनौती पूरण कर दो।
खाली झोली मेरी भर दो।।

चंदा को अपने पास रखो।
चंदा सम वीरा खास करो।।
सबकी मनौती पूरी होती।
तभी तो नाहीं गिनती घटती।।
*********बाकलम*********
बालकवि पुनीतकुमार ‘ऋषि ‘
बस्सी पठाना (पंजाब)

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

मुख खोलो

January 6, 2021 in Other

मुख खोलो कुछ बचन कहो
इसमें क्या कोई घाटा है।
रौनक क्योंकर खोई -सी है
आज पटल पर सन्नाटा है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

हाय मैं सड़क बेचारी

January 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मैं सड़क बेचारी
ज्यों अबला नारी।
पग पग दलित
परम दुखियारी।। हाय मैं सड़क बेचारी
काट दिया कोई कहीं पर
और बहा दिया पानी घर का।
भोजन के दोनें और छिलके
सब फेंक रहे मेरे ऊपर आ।।
चले बटोही नाक बन्द कर
थूके और देकर कुछ गारी।। हाय मैं सड़क बेचारी……
गंदे लोग गंदी प्रशासन
कमर टूट गई जिसके कारण।।
आखिर कहाँ गुहार लगाऊँ
मैं नहीं जाती दफ्तर सरकारी।। हाय मैं सड़क बेचारी…
जीर्णोद्धार होगा पुनर्निर्माण होगा
हो जाएगी अब मेरी काया पलट।
योजनाएं बनी कागज पर
और हो गई मेरी कुछ काटम- कट।।
निर्माणाधीन हीं बीत गए
कुछ मास वर्ष दो – चारी।। हाय मैं सड़क बेचारी….
ठेकेदार अभियन्ता आफिसर
दे लेके एक राग अलापे।
हमने तो कर निर्माण दिया था
टूट गए सब बाढ़ के ढाहे।।
‘विनयचंद ‘ अब मान भी जाओ
है फरमान सरकारी।। हाय मैं सड़क बेचारी…..

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

पूस में किसान

January 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कुछ दिन बचे हैं पूस के
ये भी निकल हीं जाऐंगे।
सर्दी है चारों ओर व्यापित
कब तक हमें सताऐंगे।।
क्या कंबल रजाई कफी है
सर्दी भगाने के खातिर।
तन मन की गर्मी काफी है
खुद को बचाने के खातिर।।
बेशक़ बिछौना पुआल का
सुख नींद सुला जाऐंगे।।
तन पे फटी है चादर
जलती अंगीठी आगे।
बैठे हैं खेतों के मेड़ पे
सारी सारी रात जाने।
कुछ दिन की तो बात है
अच्छी फसल ही पाऐंगे।
बादल घने आकाश मे
घनी अंधेरी रात है।
किनमिन -सी हो रही
कैसी ये झंझावात है।।
किस आश में ‘विनयचंद ‘
गिर कर संभल जाऐंगे ।
मजदूरों और किसानों की
विरले ही नकल लगाऐंगे।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

वही सागर का तट

January 1, 2021 in Poetry on Picture Contest

वही सागर का तट
बालुकामय सतह।
जहाँ आनन्द मनाया
कुछ इस तरह।।
खाया -खेला
नाचा-गया।
गीले बालुका पर
अंगूठा घुमाया।
कुछ इस तरह।।
अंकित हुआ
बीस सौ बीस।
कितने दुखो के
भरे हैं टीश।।
सागर के लहरों ने
मिटा दिया वो अंकन।
पर दिल में एक
अधूरी यादों का है कंपन।।
शायद लिखा हुआ होगा
अब तक ज्यों का त्यों।
चल पड़े आज फिर
उसी ओर आखिर क्यों।।
शायद कुछ खोजने
और करने मन को हल्का।
वही अधूरी यादे
अंकित बीस बीस हल्का।।
समझ न पाया क्या था
हकीकत या फिर मन का टीश।
होकर आदत के वशीभूत
लिख डला बीस सौ एकीश।
ठीक उसी तरह
जैसे पृष्ठ पलट रहा हो कैलेंडर का।
‘विनयचंद ‘ ने भी लिख डाला
अपने मन के अन्दर का।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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एक बार यमराज आया धरती पर

December 30, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक बार यमराज आया धरती पर।
सोच में पड़ गया मानव को देखकर।।
क्या खुशनसीब हैं ये इन्सां।
मरणशील को कारें कारें
मैं अमर यमराज को केवल भैंसा।।
देखा सोचा झल्लाना बैठ गया सिर ठोंककर।
एक बार यमराज आया धरती पर।।
कुछ क्षण बीता नजरें दौड़ा।
दिखा नहीं कुछ आवाजें आई।।
नारेबाजी कर ले हाथ में झंडा।
दौड़ रहे हैं साथ साथ मुस्टंडा।।
पूछन लागे यमराज महाशय
हाथ जोड़ विनती कर।। एक बार
भाई साहब बतलाओ
क्या कर रहे आप लोग।
भजन -कीर्तन,कथा- वार्ता
जप- तप या दान -भोग।।
हट जा दोसिंघा नाटक से भागा अभिनेता।
काम कर रहा हरताल का मैं हूँ कर्मठ नेता।।
न काम करे न करने दे जाए बेकारी किधर।। एक बार
बेकारी खतम होगी
हरताल करो -हरताल करो।
कोई कहीं न काम करे
पड़ताल करो -पड़ताल करो।।
यमराज ने कहा कामगारों को बेकार बनाकर।
बेकारी कैसे दूर करोगे मुझे बताओ समझाकर।।
नेताजी सोचे क्यों न दूँ
भाषण हाथों को चमकाकर।।
एक बार यमराज आया धरती पर
नेताजी बोले भैया!
मैं मजदूर यूनियन का नेता।
मेरे पीछे भोली जनता
जनता को मैं क्या देता।।
जनता मेरे पीछे -पीछे
मैं जनता के आगे।
मुखिया सरपंच विधायक
बन जाऊँ एम पी आगे।।
जनता सीखेगी मुझसे
ये संदेशा पाकर।। एक बार
ऐ मेरे माँ -बाप-भगवान
सुन लो मेरी वाणी।
तुम जनता हो
तुम डंडा हो
पीटो-पीटो ,पीट -पीटकर
घी निकलेगा
यद्यपि थोड़ा पानी।।
एक पाँव ,दो पाँव
तीन पाँव या बिना पाँव के।
भागेगी तेरे पीछे सब जनता
शहर शहर या गाँव गाँव के।।
मैं तो केवल एम पी ठहरा
तुम ठहरोगे पी एम होकर।। एक बार यमराज आया धरती पर।।
पी एम बनना क्या भारी है
तुझे महासचिव बनाऊँ राष्ट्रसंघ का।
अब क्या बोलूँ सोच रहे
बहुत पिलाया शर्बत सबको भंग का।।
हर कीमत पर वोट सब देना
जब आऊँ चुनाव में खड़कर ।।
एक बार यमराज आया धरती पर
नशा चढ़ा यमराज को भी
ये भी क्या जीना है।
राज मिला यमलोक का
पर मुर्दों में जीना है।।
यमलोक मिल जाए खाक में
अब धरती पर हीं रहना है।
नेता बनूँ कामचोर पर
इसके ठाठ का क्या कहना है।।
‘विनयचंद ‘ भगवान बचाए
आफत आई सिर पर।। एक बार यमराज आया धरती पर।।

पं. विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘
बस्सी पठाना ( पंजाब)

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

मैं तो बिल्कुल बच्चा था ***********************

December 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब कागज का नाव बनाया
मैं तो बिल्कुल बच्चा था।
तन का थोड़ा कच्चा था
पर दिल का बड़ा ही सच्चा था।।
जब कागज का नाव बनाया ….
पतंग बनाया कागज का
और एक जहाज भी कागज का।
कार बनाया ट्रक बनाया
ट्रैक्टर ट्राली भी था कागज का।।
बिन ईंधन के चलते थे सब
सोचो कितना सब अच्छा था!
जब कागज का नाव बनाया….
*****बाकलम****
बालकवि पुनीतकुमार ‘ऋषि ‘
बस्सी पठाना ( पंजाब)

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

अनोखा जी चले बाजार

December 26, 2020 in Other

अनोखाजी चले बाजार।
टौर से हो फटफटि सवार।।
साथ में चली श्रीमति जी।
चहक रहे थे आज पतिजी।।
कितने अच्छे हैं टमाटर।
आओ खरीदे साथ मटर।।
क्या यार तुम भी हद करती हो।
क्या फिर साॅपिंग रद करती हो?
फेरीवाला था एक फुटपाथ पे।
लेकर बैठा वस्तु बहुत साथ में ।।
छलनी सूप और झाड़ू पोछा ।
आओ खरीदे चलकर सोझा।।
बस भी करो यार।
ये कैसा बाजार।।
मोहतमा गुमसुम चलती रही।
कुछ बातें उसको खलती रही।।
जैसे दिखा एक बर्तन दूकान।
फूटी कराही का आया ध्यान।।
कराही एक खरीदूँ क्या?
वही जवाब फिर से ‘क्या’!!
जबरन रुक गई मनिहारी के दूकान पर।
“ऊन सलाई दे दो भैया” लाई निज जुबान पर।।
व्यस्क मर्द के खातिर जितना ।
दे दो भैया मुझको उतना।।
घर आए हो गुस्से में लाल।
वस चीख रहे अनोखलाल।।
क्या करी खरीददारी तुमने?
यही खरीदी साड़ी तुमने ?
गुस्सा तो शांत करो मेरे लाला।
मेरे पास तो है दुसाला।।
मुझे तो रहना है घर में ।
तुम जाओगे दफ्तर में।।
निरुत्तर हुए अनोखा जी।
क्या पत्नी पाए चोखा जी।।
‘विनयचंद ‘ ये नारी है
ममता की अवतारी है।।
त्याग बलिदान की मूरत है ।
सम्मान की इन्हें जरुरत है ।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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गीत

December 20, 2020 in गीत

मेरी सांसों पे तेरा अधिकार हो गया।
लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
ना सूरत पसन्द, ना शोहरत पसन्द
तेरी चाहत पे ऐसा इकरार हो गया।
लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
मुझे चंदा-सी सूरत नहीं चाहिए।
संगमरमर की मूरत नहीं चाहिए।।
तेरी सीरत हीं तेरा सिंगार हो गया।
लो सजनी मुझे तुमसे प्यार हो गया।।
दूरियां अब अपनी खतम हो गई।
मेरा सजना मैं तेरी सनम हो गई।।
दिल की दुनिया पे अपना अधिकार हो गया।
लो सजना मुझे तुमसे प्यार हो गया।
लो सजनी मुझे तुमसे प्यार हो गया।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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ज़िन्दगी के इस खेल में

December 18, 2020 in शेर-ओ-शायरी

तेरी परछाई को देख लेता हूँ
चेहरे को देखने का मौका कहाँ मिलता।
ज़िन्दगी के इस खेल में
दौड़-दौड़ दौड़ लेता हूँ चौका कहाँ मिलता।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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एकादशी नामावली

December 11, 2020 in Other

मार्गशीर्ष मास अतिपावन।
उत्पना व मोक्षदा सुहावन।।
सफला अरु पुत्रदा एकादशी।
पौष मास मह बहु सुखरासी ।।
षटतिला अरु जया बड़नामी।
माघ मास के उत्तम फलकामी ।।
विजया आमलकी फागुन मास।
पापमोचनी कामदा मधुमास।।
बरुथिनी और मोहिनी बैशाखे।
जेठ अपरा व निर्जला आखे।।
योगिनी देवशयनी कहलावे।
आषाढ़ महिने में मन भावे।।
पवित्रा पुत्रदा सावन मासा।
अजा परिवर्तनी भादो माना।।
आसिन इन्दिरा पाशांकुशा आवे।
रमा देवोत्थानी कार्तिक कहलावे।।
पद्ममा और परमा तब आवे।
अधिकमास जब-जब आवे।।
नाम अनुरुप बहुफलदाई।
पापविनाशनि एकादशी माई।।
असक पुरुष जे व्रत करन मह।
नाम लेते तव पाप हरण तह।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

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बड़ी अजीब है ये घुँघरू

December 9, 2020 in Other

बड़ी अजीब है ये घुँघरू।
बन्धे जब दुल्हन के पैरों में
बड़े खुशनसीब है ये घुँघरू।।
झनकती जब ये कोठों पर
बड़े हीं गरीब हैं ये घुँघरू ।
बांध के किन्नर भी नाचे
पर बदनसीब है घुँघरू।।
पीतल के हो या हो चांदी के
कला के नींब है ये घुँघरू।
विनयचंद साहित्य सरगम के
सदा करीब है ये घुँघरू।।

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हम किसान धरने पर

December 8, 2020 in Other

एक तो शीतलहर
दूजा बेगाना शहर।
फिर भी अटल रहेंगे
हम किसान धरने पर।।
हम क्यों माने हार बंधु
हम तो हैं अन्नदाता जग में।
पेट चले संग फैक्टरी चले
व्यापार पले अपनी पग में।।
मांग नहीं अपनी सोना है
ना मांगें हीरा-मोती हम।
अपनी फसल के घटे दाम
कभी न बर्दाश्त करेंगे हम।।
आलू होवे दो की अपनी
लेज बिके चालीस की।
अपना चिप्स बना खाऐंगे
मनो बात ख़ालिस की।।
विनयचंद ना दुखी रे
जिसका हम सब खाते हैं।
हट जा बादल नभ मंडल से
स्वर्ग लूटने हम आते हैं। ।

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सर्दी की धूप

December 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सर्दी की धूप बड़ी सुहानी
सेवन कर प्राणी सुखदाई ।
चेतन जीव की क्या कहिये
सुख जड़ जात भी पाई।।
ठण्ड हरे नित जीव जगत के
अमराई नित भोजन पावै।
विनयचंद विटामिन डी से
अश्थि सबल बन जाते।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

लो फिर आ गई है सर्दी

December 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

लो फिर आ गई है सर्दी
पूरे लाव -लश्कर के साथ में।
हवा भी ठण्ढी सूरज मद्धिम
घना कुहासा दिन और रात में।।
बिन बादल के बारिश जैसी
गीलापन हर डाल -डाल व पात में।
आठ नहीं हैं बजे अभी
कम्बल में दुबके हैं सभी
जैसे कर्फ्यू लग गई हो हर रात में ।।
शबनम की बूंदें मोती जैसे
तरुपल्लव और कुसुम कली पर।
चम-चम चमक रहे हैं ऐसे
टिमटिम धवल सितारे से नीलाम्बर।।
दुबले भी मोटे दिखते हैं
चढ़ा गरम कपड़े निज गात में।
‘विनयचंद ‘ इस सर्दी का तू
कर स्वागत जज़्बात में।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

सुप्रभात लिखते लिखते

December 5, 2020 in Other

सुप्रभात लिखते -लिखते
फिर से सबेरा हो गया ।
उपालम्भ आया फिर भी
आखिर ऐसा क्या हो गया?

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

ममता

December 4, 2020 in Other

ममता मूल दुखद तरुवर के ,नैनन नीर बहावे।
निर्मोही जड़ जीव जगत में ,सुख सरिता बहावे।।
श्वान शुका अजशावक जे , मरत मूढ़मति आवे।
निश-दिन मूषक मरत बथेरे, केहू ना दुख मनावै

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ममता

December 4, 2020 in Other

ममता मूल दुखद तरुवर के ,नैनन नीर बहावे।
निर्मोही जड़ जीव जगत में ,सुख सरिता बहावे।।
श्वान शुका अजशावक जे , मरत मूढ़मति आवे।
निश-दिन मूषक भरत बथेरे, केहू ना दुख मनावै।।

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by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

भारत रत्न डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के जन्मदिन पर विशेष

December 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तीन दिसम्बर अठारह सौ चौरासी
का पावन दिवस मनोहर था।
घर-घर मंगल गान गुंजते
बजे बधाईयाँ संग सोहर था।।
आसमान से टपक सितारा
आया बिहार के एक गांव में।
सारण उर्फ सीवान जिले के
जीरादेई नामक सुंदर गांव में।।
लाल थे वो महादेव सहाय के
कमलेश्वरी देवी के आँखों का तारा।
पाँच भाई-बहनों में राजेन्द्र
थे सबसे छोटा और सबसे प्यारा ।।
जगदेव सहाय थे चाचाजी
जमींदार बड़े और दिल के प्यारे।
करते थे नित प्यार इन्हें और
“बाबू-बाबू ” कह सदा पुकारे।।
देर रात से पहले सोते
और जग जाते तड़के-तड़के।
माँ- बापू और दादा-दादी
सबको जगाते एक एक करके।।
फ़ारसी पढ़े अंग्रेजी पढ़े
हिन्दी उर्दू बंगाली का था ज्ञान।
गुजराती और संस्कृत में भी
देते थे बड़ सुन्दर व्याख्यान ।।
जिला स्कूल छपरा और
टी. के. घोष एकेडमी पटना रहकर।
स्कूली शिक्षा पूर्ण किए और
कलकत्ता विश्वविद्यालय में जाकर।।
एल.एल. एम की डिग्री पाई
गोल्ड मेडल के साथ -साथ।
भागलपुर में करी वकालत
जन सेवक बन साथ-साथ।।
सत्य सादगी और सरलता
सेवा धर्म को अपनाया था।
चम्पारण के आन्दोलन में
गांधीजी का संग पाया था।।
विभिन्न पदों को किया सुशोभित
सरकारी और निजी संस्था।
बचपन बीता धार्मिक बनकर
रामायण में थी पूरी आस्था।।
आजाद हुआ भारत जब
राम राज्य का देखा सपना ।
देकर बहुमूल्य सहयोग
भारत को संविधान दिया अपना।।
प्रथम नागरिक भारत का
और राष्ट्रपति पद किया सुशोभित।
छब्बीस जनवरी पचास से
चौदह मई बासठ तक रहे सुशोभित।।
भारत रत्न की मिली उपाधी
बेशक भारत के एक रत्न थे ।
मानव के कल्याण के खातिर
करते सदा-सदा प्रयत्न थे ।।
पटना के सदाक़त आश्रम में
बीता उनका अन्तिम काल।
अठाईस फरवरी उन्नीस सौ तिरसठ
को जा समाए काल के गाल।।
निधन सदा से देह की होती
आत्मा नहीं कभी मरती है।
मरकर भी महामानव की
सुकृति सदा अमर रहती है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

तवायफ़

December 2, 2020 in ग़ज़ल

अश्कों का समन्दर है अँखियों में मेरी
एक कागज की किश्ती कहाँ से चलेगी।
है ये बदनाम बस्ती हमारी सनम
इश्क की फिर कलियाँ कहाँ से खिलेगी।।
रोकड़े में खरीदे सभी प्यार आकर
प्यार की ज़िन्दगी पर कहाँ से मिलेगी।
मजबुरियों ने मुझको तवायफ़ बनाया
‘विनयचंद ‘ बीबी कहाँ से बनेगी।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

सौगात माँगता है

December 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मेरी जान तुम्हारे जान का सौगात माँगता है।
ये जान लिया, जब जान मेरी ,
ले जान हथेली दिन-रात माँगता है। ।
लाँघ नफ़रत की दरिया मुश्कत से
इश्क का एक सरोवर आबाद माँगता है।
बीत जाएगी ये रात काली
ऐ ‘विनयचंद ‘ जुगनू -सी औकात माँगता है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

मुस्कुराने की दवा चाहिए

December 2, 2020 in ग़ज़ल

बहुत गमगीन हो रही ज़िन्दगी
मुस्कुराने की दवा चाहिए।
मर्ज बनकर खड़ी है नफरते
प्यार की एक हवा चाहिए।।
चाहते हैं सभी सेकना रोटियाँ
तप्त-सा कोई तवा चाहिए।
इन्सान बनकर रहे सर्वदा
बनने को ना खुदा चाहिए।।
प्रेम की दुनिया सलामत रहे
हर नजर इश्के अदा चाहिए।
ये ‘विनयचंद ‘ मायूस होना नहीं
दिल दरिया दया पे खरा चाहिए।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

घड़ी

December 2, 2020 in मुक्तक

एक छोटी -सी डब्बी में
नाचती हैं सूईयाँ
बेशक बन्द होकर।
पर नचाती है
सारी दुनिया को
अपनी हीं नोंक पर।।
न ठहरती है कभी
न कभी ठहरने देती है।
ये तो घड़ी है ‘विनयचंद ‘
दुनिया को घड़ी बना देती है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

शायरी

December 1, 2020 in शेर-ओ-शायरी

कलम भी वही है दावात भी वही है।
दिल में भरे मेरे जज़्बात भी वही है ।।
लिखना चाहूँ मै एक गजल आप पर
पर क्या करे अपनी मुलाकात नहीं है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

क्या खराबी है कि मियां शराबी है

November 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

क्या खराबी है
कि मियां शराबी है ।
शराबी की बीबी हूँ
इसमें भी नवाबी है।।
रोज पकौरे और सलाद
दिखते घर में हो आबाद
नल में पानी हो न बेशक़
मेज सजा शर्बते गुलाबी है।
क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।
घर में इन्टरी होती जब
करते खूब भले कोहराम।
बच्चे सहमे-सहमे-से
बिना नींद के करे आराम।।
जूठी बासी भोजन को भी
समझ रहा स्वादिष्ट कबाबी है।
क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।
कुत्ते संग भी सो जाता है
नशे में होकर वो कभी चूर।
खैर मनाती मैं रातों में
बेशक़ होकर उससे दूर।।
बची खर्राटे और बदबू से
क्या अपनी रात गुलाबी है।
क्या खराबी है कि मियां शराबी है।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

आखिर ये है कैसा संताप

November 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

पति की गलती पुत्र की गलती
गलती करे चाहे भाई-बाप।
हर गलती पर रोए नारी
आखिर ये है कैसा संताप।।
अपराध नहीं करती कोई
एक अपराधी की बन रहती।
बस यही एक अपराध सदा
अँखियाँ आँसू भर नित सहती।।
‘विनयचंद ‘ ममता नारी की
कवच रूप जो पाकर।
निज उत्कर्ष करे न
न औरों का बने ठहर।।
वीर नहीं कायर है जग में
नारी को रुलानेवाला।
नमकहलाल बनो विनयचंद
नित नित नमक खानेवाला।।

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Pt, vinay shastri 'vinaychand'

by Pt, vinay shastri 'vinaychand'

सावन पे

November 21, 2020 in Other

लेके छठी मैया का प्रसाद
हम आए आज सावन पे।
मैया का गाए गुणा नुवाद
देखो आज सावन पे।।
जीवन में ना होवे विषाद
अपने प्यारे सावन पे।
कृपा प्रसाद रहे आबाद
अपने प्यारे सावन पे।।

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सुस्वागतम् पाण्डेयजी

November 21, 2020 in Other

सुस्वागतम् पाण्डेयजी
क्या आप में आकर्षण है
मंच पर आने से सिर्फ सावा घड़ी पहले
खींच लिया मेरे दिल से कविता।
बीत गई वो रातें काली
नव प्रभात ले आया सविता।।

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खुद में खुदा

November 21, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

कतरा -ए-आब लपक लेते हैं सभी
भरे समन्दर को कोई चुराया है क्या ?
पकड़ के कबूतर उड़ा लेते हैं सभी
कोई बाजों को आखिर उड़ाया है क्या?
जलक्रीड़ा करे कोई बर्फों से खेले
आग से भी कोई आखिर खेला है क्या?
एक निर्बल के आगे सभी शेर हैं
कोई बलवानों को आखिर धकेला है क्या?
ऐ ‘विनयचंद ‘ कभी न तू निर्बल बनो
जब खुद में खुदा फिर तू अकेला है क्या?

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दीप ऐसा जलाओ

November 14, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

दीप ऐसा जलाओ
************************

***********************
दीप ऐसा जलाओ ऐ दिलबर
हर तरफ रौशनी -रौशनी हो।
न अमावस की हो रात काली
हर निशा चांदनी -चांदनी हो।।

कोई जलाए दीप कंचन का
और जलाए कोई चांदी का।
श्वेद सिक्त माटी ले वतन की
दीप माला बने सुखराती का।।
प्रेम का तेल निष्ठा की बाती
ज्ञान की राह रौशनी रौशनी हो।। दीप ऐसा

कोई मंदिर में जाके जलाए
और जलाए कोई निज घरों में।
कोई पनघट पे जाके सजाए
और जलाए कोई चौडगरों में ।।
एक दीपक ‘विनयचंद ‘ जलाना
वीर के राह में रौशनी रौशनी हो।। दीप

दिल में दीपक जला देशभक्ति के
हो गए बलिदान जो वीर बेटे।
कर विनयचंद ‘ वहाँ पर उजाला
जहँ समाधि में हो वीर लेटे।।
नाम उनके भी दीपक जलाओ
हर कदम रौशनी रौशनी हो।। दीप ऐसा
********###***************
पं. विनय शास्त्री ‘ विनयचंद ‘
बस्सी पठाना (पंजाब)

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मैथिली गीत

November 13, 2020 in मैथिली कविता

सगरों साल बहानेबाजी
आय नञ चलत सजना।
धनतेरस में चांदी नाही
चाही सोनक गहना।।
पैरक पायल नहियें लेबय
लेबय हाथक कंगना।
धनतेरस में चांदी नाही
चाही सोनक गहना।।
नञ औंठी न लेबय नथिया
कर्णफूल नञ चाही।
सब कंजूसी छोड़ि छाड़ि केॅ
जुनि करू कोताही।।
चमचम हीरा मोती लागल
लेबय सोनक कंगना।
धनतेरस में चांदी नाही
चाही सोनक गहना।।
हम कोनो उपहार न मांगी ।
नौलक्खा हम हार न मांगी। ।
‘विनयचंद ‘हम अहीं के प्यारी
नञ छी कोनो अदना।
धनतेरस में चांदी नाही
चाही सोनक गहना।।

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धनतेरस की शुभकामना

November 13, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

अवतार लिए धन्वंतरि सुधा कुम्भ ले हाथ।
आरोग्य के हैं देवता नमित करो निज माथ।।
आधि व्याधि सब मिटे होय जगत कल्याण।
धनतेरस की शुभकामना विनय करे प्रदान।।
धनपति श्री कुबेर की कृपा रहे दिन रात।
विनयचंद की प्रार्थना सबजन हित सौगात।।

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दिल का दीप

November 9, 2020 in शेर-ओ-शायरी

न होती हर रात अमावस की
न होती हर रोज दिवाली है।
जब दीप जले दिल का दिलबर
समझो उस रोज दिवाली है।।

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चांद से

November 4, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऐ चाँद भला क्यों इतरा रहे हो
जल्दी छत पर आओ ना।
भूखी-प्यासी प्यारी मेरी
कब से बाट निहारे आओ ना।।
कितनी सज-धज के आई
अब तो यूँ इतराओ ना।
जल भी है मिष्ठान्न भी है
फल फूलों का भोग लगाओ ना।।

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सरगी लेकर आई है

November 4, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

उठ जा लाडो सरगी लेकर
तेरी सासु अम्मा आई है।
हाथ दिखाओ मेंहदीवाली
कित प्रीत पिया की पाई है।।
पहिला रंग पिया का प्यार ।
दूजा सास-ससुर का लाड़।।
तीजे गण गौरी की भक्ति
बीच हथेली छाई है।। उठ जा….
उपवास रखेगी लाडो मेरी
गणपति जी की भक्ति में।
रहो सुहागन सुख शांति से
धन आयु बल बुद्धि में।।
पौ बारह नित रहे पिया की
भावना हृदय समाई है।। उठ जा…
सास बहू में अन्तर कैसा
दोनों नारी ममता की मूरत।
एक पति की एक बेटे की
बनी हितैषी और जरूरत।।
‘विनयचंद ‘ की लेखनी भी
एक माँ की ममता गाई है।। उठ जा…

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लाॅकडाउन ने खाया सब

November 3, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

यूँ हीं बैशाखी चली गई
बिन भंगरा बिन गिद्दा के।
फीके सारे पर्व पर गए
बिना खीर -मलिद्दा के।।
लाॅकडाउन ने खाया सब
हम क्या खाऊँ मुँह को बांध।
धूंधली रह गई रात पूनम की
करवा में क्या करेगा चांद।।
दिन में तारे देखे सौहर
बीबी को है चाँद का इन्तजार।
कपड़े गहने मेंहदी मेकअप
बिन कैसा करवा का त्यौहार।।
फीके रह गए करवा जो तो
धनतेरस भी फीका होगा।
दिवाली की खुशहाली बिन
कैसा ‘ विनयचंद ‘टीका होगा।।

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चांद भी फीका पड़ गया

October 12, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

चाँद भी फीका पड़ गया
तेरे छत पे आने के बाद।
सूरज भी नभ में ढक गया
जुल्फ घटा लहराने के बाद।।
कोयल भी सुनकर मौन है
तेरे सरगम गाने के बाद।
‘विनयचंद ‘ सब पा लिया
एक तुझको पाने के बाद।।

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एक ******कवि बना दिया

October 10, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मुझको निगोड़े ने
न सोने दिया।
डी जे बजाया
और भँगरा किया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।
बड़ी मुश्किल से
थोड़ी- सी आँखें लगी।
ख्वाब में भी आए
और एक सूई लगी।।
ख्वाब को भी न उसने
पूरा होने दिया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।।
सुबह हो गई
यूँही जाग जागकर।
फिर भी कहीं
गया न वो भागकर।।
नींद छाई थी
अँखियों में न ढोने दिया।।
रात भर मुझको
न सोने दिया।।
एक हाथ मोबाइल
और दूजे में चाय का प्याला।
लेकर चुस्की एक
सावन को लाॅग इन कर डाल।।
न लिखने दिया
न हीं पढ़ने दिया।।
पर एक *मच्छर *
‘विनयचंद ‘को कवि बना दिया।।

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गुलाब मत देना

October 7, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम अपने मुहब्बत का
हिसाब मत देना।
अबकी वेलेंटाइन पे यारा
गुलाब मत देना।।
फूल तो देना मगर काँटों का
घाव मत देना।
खुली आँखों में अधूरा कोई
ख्वाब मत देना।।

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अँखियों में समन्दर

October 6, 2020 in शेर-ओ-शायरी

दिल दरिया है तेरा
तो मेरा भी कोई सरोवर नहीं।
झाँक के देखो तो
इन अँखियों में समन्दर मिलेगा।।

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बापू तुम्हारे सपनों को हम साकार करेंगे

October 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

बापू तुम्हारे सपनों को हम साकार करेंगे।
हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।।

मूल मंत्र जो दिया आपने, सत्य अहिंसा का सबको।
अपनाऐंगे हम जीवन में, जीवन को साकार करेंगे।।
हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।।

पहले सेवा करूँ पिता का और माता का मन से।
फिर जन-जन का सेवक बनकर परोपकार करेंगे।।
हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।।

तन-मन को हम निर्मल करके घर बाहर हम साफ करे।
स्वच्छ -स्वस्थ भारत हो अपना ऐसा ही व्यवहार करेंगे।।
हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।।

पढ़े -लिखें और नेक बनें हम देश धर्म के ख़ातिर।
‘विनयचंद ‘बापू के बचन को दिल अंगीकार करेंगे।।
हम हिन्द के हैं बालक सेवादार बनेंगे।। इसे प्यार करेंगे।।
बापू तुम्हारे सपनों को साकार करेंगे।। कर्णधार बनेंगे।।

पं़विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘
बस्सी पठाना
पंजाब

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महात्मा गांधी

October 2, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

महात्मा गांधी
सत्य अहिंसा को अपनाकर
जीवन को साकार किया।
एक वस्त्र में खुद को रखकर
जन जन का उद्धार किया।।

बाल्य काल में शिक्षा सेवा
योग मार्ग को अपनाया।
जन हितकारी न्याय के खातिर
देश विदेश में पधराया।।

जननी जन्मभूमि का प्यार
दिल में हर पल भरा रहा।
कष्ट बथेरे सहकर भी
सेवा पथ पर अड़ा रहा।।

कर्मशील योगी के आगे
हार फिरंगी भाग गया।
आजाद हुआ भारत अपना
नवजीवन अब जाग गया।।

तनय कर्मचंद का मानो
काल के आगे हार गया।
अहिंसा के मंदिर में
कलयुग पांव पसार गया।।

आजाद देश मतलब के आगे
खूनी पंथ कटार हुआ।
हिन्द पाक हो खून के प्यासे
झेलम के दोनों पार हुआ।।

देख महात्मा का अन्तर्मन
पीड़ित तार तार हुआ।
अहिंसा का उपदेशक
हिंसा का शिकार हुआ।।

तन छूट गया न अंत हुआ
अविनाशी उस आत्मा का।
विनयचंद रे बनो उपासक
सत्य पथिक महात्मा का।।

पं़ विनय शास्त्री ‘विनयचंद ‘

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आज झुकाओ अपना माथ

October 2, 2020 in Other

गांधीजी और शास्त्रीजी का जन्मदिन है एक साथ।
सम्मान में इनके विनयचंद तू आज झुकाओ अपना माथ।।

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कविता अपनी राजदुलारी

October 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसी ने पूछा पंडितजी
क्यों लिखते हो आखिर कविता।
क्या कुछ हासिल होता है
या फिर यूँही रहे हो समय बिता।।
छन्द हमारा पिता बन्धुओं
और भाषा अपनी जननी प्यारी।
बेशक तुकबन्दी हो अपनी
पर कविता अपनी राजदुलारी।।

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फेसबुक के चक्कर में

October 1, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सदा सड़क पर बांध के मुखरा
घूमने वाली मैं थी जिसका
घुटन भला क्यों हो रही आली
घूंघट में ,क्या कारण इसका?
बेपर्द बनाया जग ने मुझको
या दोषी हूँ खुद हीं इसका ?

सिर से आंचल कैसे हट गई
तन मन कब बेपर्द हुआ?
मान घटा या बढ़ गया अपना
अपनों को कुछ दर्द हुआ।
फेश बुक के चक्कर में
सब रिश्ता बेपर्द हुआ।।

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नदी सुहानी पानी बिन

September 29, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

सागर-सी गहराई बिन।
नदी सुहानी पानी बिन।।
नाच के हाथी नहा रहा था।
और जहाज भी आ रहा था।।
बूटा-बूटा पत्ता -पत्ता
गिरिवर भी हर्षा रहा था।
‘विनयचंद ‘ ले रिक्त घड़ा
बीच नदी पछता रहा था।।

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खेलें हम अन्तराक्षरी

September 29, 2020 in Other

सावन के इस मंच पर
कवियों का है संगम।
सुंदर सुहानी संध्या में
छोड़ें कुछ सरगम।।
दो पद हम लिखते हैं
दो पद तुम भी गाओ।
खेलें हम अन्तराक्षरी
निज कवित्त सुनाओ।

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तिलक तुम्हारी माया नगरी

September 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

तिलक तुम्हारी माया नगरी बदनाम हो रही है।
नशा नग्नता गुण्डागर्दी अब सरेआम हो रही है।।
चोरों का आतंक नगर में -डर नहीं लगता ।
ठगों के गिरोह डगर में – डर नहीं लगता।।
ड्रग्स का सेवन दिन रात करे पर – डर नहीं लगता।
खरीद फरोख्त दिन रात करे पर – डर नहीं लगता।।
अर्द्धनग्न होकर नित रहना- डर नहीं लगता।
रोज रोज नव मित्र बदलना – डर नहीं लगता।।
डर तो तब लागे जब जय जय श्री राम हो रही है।
तिलक तुम्हारी माया नगरी बदनाम हो रही है।।

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सितारों की दुनिया

September 24, 2020 in Other

सितारों की दुनिया में कैसा नशा छा रहा।
दिल ने आदर्श बनाया मन ठगा जा रहा।।
जन- जन ने हीरो बनाया था जिसको
वही आज कैसे ड्रग के लिए मरे जा रहा।।

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राष्ट्र कवि के जन्मदिन पर

September 23, 2020 in Other

हिन्दी साहित्य के कर्णधार हे
हे प्रकाशपुंज नक्षत्र हे दिनकर ।
हे राष्ट्रकवि आजादी के योद्घा
रामधारीसिंह के जन्मदिवस पर।।
पद पंकज में दे पुष्पांजलि
हम प्रणमति शीश झुकाते हैं।
हिन्दी के साहित्य उपासकों
हम मुबारकबाद फरमाते हैं।।

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