चंद सिक्के मिले हैं
October 3, 2025 in ग़ज़ल
चंद सिक्के मिले हैं मुझे दिनभर की मज़दूरी के,
आँखों में आँसू आते हैं मेरी मजबूर मजबूरी के।
कौन उठाए आवाज़ आज नाइंसाफ़ी के खिलाफ़,
बहुत मालदार होते हैं शख़्स यहाँ जी-हुज़ूरी1 के।
क्यों लिखें मुकम्मल 2 दास्ताँ 3 हम अपनी यारों,
बहुत सारे मायने निकलते हैं कहानी अधूरी के।
सोचता हूँ चला जाऊँ अब दूर कहीं मैं अपनों से,
बहुत करीब लगने लगते हैं सबको लोग दूरी के।
जी रहे हैं हम मजबूर रुस्वाइयों 4 के बीच मगर,
मर भी नहीं सकते यहाँ चुकाए बिना दस्तूरी5 के।
1. चापलूसी; 2. पूरी; 3. कहानी; 4. अपमान; 5. कमीशन।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना


