Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • एक जैसे मुसफिरोकी मुलाकात हुई थी

    एक जैसे मुसफिरोकी मुलाकात हुई थी

    अर्सो बाद जिंदगी आफरीन हुई थी
    एक जैसे मुसफिरोकी मुलाकात हुई थी

    शकसियत तो सबकी बेबाक थी
    जमुरियत मे थोडी, मुरझा सी गयी थी
    जब आन पडे आमने सामने
    आगाज-ए-नये-दौर की मेहेक आगायी थी

    एक जैसे मुसफिरोकी…. मुलाकात हुई थी

    फलसफा उनका एक ही था
    फिरदोउस भी उनका एक ही था
    फकत जिस्म थे उनके अलग
    पर कुरबत सबमे एक सी थी

    एक जैसे मुसफिरोकी…. मुलाकात हुई थी

    मयखानो की जरूरत अब फिझहूल थी
    दोस्ती ही नशे सी चढ गई थी
    मयस्सार थे एक दुजे के लिये वो
    रंजीशे कही आसपास भी ना थी

    एक जैसे मुसफिरोकी…. मुलाकात हुई थी

    एक सुकून सा है साथ तुम्हारे यारो
    हम रफीक् भी है ओर रिशतेदार भी
    नायाब सा बन बैठा है रिशता हमारा
    तस्किन-इ-परचम रहा है लेहरा

    एक जैसे मुसफिरोका ,……चल रहा है कारवा

    डर कल भी था…..
    डर कल भी रहेगा…..……..
    क्या ये कारवा युही चलता रहेगा !!!!!!….
    या बस कही थम जायेगा !!!!!!…….

    केहते है दोस्ती वो मिलकीयत है
    जहाँ ना कोई हुक्म है ना कोई इलतजा
    ये तो जसबातो की परस्तीश है
    जो खुशनसीबोको मिली बक्षिसं है

    ख्वाहिश् यही हैं के
    इसका वजुद मेरे वजूद तक बरकरार रहे

    एक जैसे मुसाफिरोकी, ….मुलाकात होती रहे

    एक जैसे मुसाफिरोकी,…..मुलाकात होती रहे

  • तन्हा-तन्हा

    दिल खाली-खाली क्यू है
    शाम भी क्यू तन्हा-तन्हा लागे है ।
    बिन कारन, क्यू बेचैनी का साया है
    यह कैसा उलझन वाला पल आया है
    उम्मीदों की किरण कहाँ अब,
    घोर निराशाओं की काली छाया है
    अपने भी अब बेगाना-सा भागे है,
    शाम भी क्यू तन्हा-तन्हा लागे है ।
    निन्द नहीं इन नयनों में, ख्वाब गये हैं दूर कहीं
    मुस्कान कहाँ इन अधरों पे, आशाओं की गीत नहीं
    जज़्बा कहाँ हासिल करने की अब,
    शील बना यह तन मेरा, इस मन में है जज़्बात नहीं
    ओझल पथ है मेरा, घोर अँधेरा आगे है ,
    शाम भी क्यू तन्हा-तन्हा लागे है ।

  • जीवन का दर्पण है कविता

    कोई साधारण चीज नहीं
    ईश्वर की वाणी है कविता,
    मन के भीतर उग रहे भाव का
    मधुर प्रकटन है कविता।
    दूजे का दर्द, स्वयं का मन
    जीवन के सुख-दुख का लेखन,
    कुछ अपनी और पराई कुछ
    जीवन का दर्पण है कविता।
    चाहत की आंख मिचोली है
    प्रेमी जोड़ों की हमजोली है,
    मिलने का सुख, जाने का दुख
    पल-पल का वर्णन है कविता।
    उनके मन का मनुहार कहो,
    अपनों में रमता प्यार कहो
    ममता कहो, दुलार कहो
    कहने का माध्यम है कविता।
    – —- डॉ0 सतीश पाण्डेय

  • बालश्रम:- “गरीबी का थप्पड़”

    दूध के दाँत पालने में ही
    टूट गये
    गरीबी का थप्पड़ इतनी
    जोर से पड़ा
    लाद दी जिम्मेदारी की पोटली
    कंधों पर
    बचपन के खिलौने पल में
    टूट गये
    थमा दी चाय की केतली
    जब मुझे
    तब जानी मैंने शिक्षा की कीमत
    जिन्दगी की आड़ी-सीधी रेखाएं
    यूँ खिंच गईं
    माजते-माजते ढाबे के बर्तन
    कोमल हथेलियां वयस्क
    हो गईं
    जरूरी नहीं चाय बेंचने वाला
    हर प्राणी राजा बन जाए !
    बालश्रम बचपन को
    लील जाता है
    गरीबी का थप्पड़ जब
    जोर से पड़ता है..

  • बीता कल

    जब उसने आँखे खोली,
    तब पाया एक नया संसार,
    रंग बिरंगी थी दुनिया उसकी,
    और खुशिया आपार,
    खेलती थी आँख मिचौली,
    संग अपने हमजोली,
    न पड़ती थी डॉट उन्हें,
    दो बोल मीठे बोलते,
    पा लेते थे, सब हँसकर,
    क्या नया था क्या पुराना,
    जो भी था; सब था प्यारा,
    खेल घरौंदे के खेले उसने,
    छुपकर करते थे श्रृंगार,
    न बंधी वो, बंधन में,
    नाचती गाती अपनी मगन में,
    क्या कब कौन जान है पाता,
    क्या है अगले ही पल में,
    और कौन छुपा है,
    किसके भीतर,
    छिपा बैठा था ,एक शैतान!
    और वो भी थी; उससे अंजान,
    जा फंसी वो उस चंगुल में,
    बोध नहीं रहा उस पल में,
    आँसु भी न बह पाए,
    थी बैठी वो सब गवांए,
    क्या विडंबना कि बच न पाई,
    जा पहुंची गर्त की खाई में,
    छिन सा गया उसका बचपन,
    भागती रही अपनो से दुर,
    खोती रही वो अपना सकुन,
    हो जाती कमरें में बंद,
    बोल गए ! सब मीठे,
    न चाहती थी मिलना जुलना,
    सिर्फ अपनें गम में घुलना,
    न सुबह की लाली पाती,
    न सर्दी की धुप,
    हर एक व्यक्ति तब मुजरिम लगता,
    मन में यह सब; कब तक चलता,
    होकर सबसे दुर,
    कैद हो गई वो
    जा गमों के पिंजरों में,
    उड़ने की अभिलाषा न जगी,
    न कुछ पाने की चाह,
    वक्त भी न भर पाया,
    उस बीते कल को.
    सोचती रही; वो जब उस पल को।…

  • शिक्षा की चौपाल

    शिक्षा की चौपाल लगी
    कहाँ रहे अब पढ़ने वाले।
    संभावित प्रश्नों को रटकर
    कागज पर हीं बढ़ने वाले।।
    कई तरह के बोर्ड यहाँ हैं
    हर भाषा हैं माध्यम के।
    अंग्रेजी में काम करे सब
    डाले अचार माध्यम के।।
    होमवर्क नहीं बच्चे करते ।
    शिक्षक भी न डण्डे रखते।।
    शासन का जब कहना इतना
    पास करे सब पढ़ने वाले।।
    शिक्षा की चौपाल लगी
    कहाँ रहे अब पढ़ने वाले।।
    नब्बे पे उत्तान खड़े बस
    झुके हुए पैंतालीस वाले।
    नम्र बने बिन का विद्या
    क्या करे कम चालीस वाले।।
    जितना पढ़ो गुणो तुम जादा।
    कामयाबी का लेकर वादा।।
    जीवन सफल बनेगा तेरा
    यही बड़ों का कहना है।
    ‘विनयचंद ‘नहीं स्वर्ण तू
    पीतल भी तो गहना है।।
    आत्मबल रख रे सदा सर्वदा
    जीवन पथ पर बढ़ने वाले।।
    हार तुम्हारी नहीं कभी है
    पौरुष निज पथ गढ़ने वाले।।

  • रुकना है नहीं

    हम भी हैं मुश्किलों से, हारने वालों में से है नहीं
    कोई भी चुनौती क्यू न आए, घबरायेगे हम तो नहीं
    कैसा भी हो अनल, स्वर्ण जैसे जलता है नहीं
    पर जबतक ना तपे वो, कुन्दन सा निखरता भी नहीं
    किसी अवलम्बन की आश इस मन में है नहीं
    हौसलों के पंख की उङान ये, हम हारने वालो में नहीं
    जहाँ मैं न होऊ, हरगिज़ वो लम्हा आने वाला है नहीं
    बोलियों में हो समाहित भाषा का रूप यूँ पाया है नहीं
    मातृभाषा से राजभाषा का सफ़र, बस मंजिल है नहीं
    दशकों से अनवरत चलके भी,रूप ‘राष्ट्रभाषा’पाया नहीं
    संघर्ष लम्बा है यह मेरा, पर हताश होना, सीखा है नहीं
    विश्व-संपर्क भाषा का दर्जा हासिल किए बिन रूकना है
    नहीं ।

  • समझ न पाए

    बहुत ही कोशिश की,जरा हम भी बदले से जाएँ
    पर कैसे अब तक यह मन, बात समझ न पाए ।
    अपनों से दर्द मिले थे अकसर
    शिकवा-शिकायत चलता ज्यादा- कमतर
    अनजान भी कैसे चोट पहुँचाए, मन समझ न पाए ।
    ना कोई रिश्ता, शत्रुता की ठौर कहाँ
    बिन समझे ही, कैसा शोर यहाँ
    सब एक हैं, काहे को पछताए, मन समझ न पाए ।
    चन्द दिवस का साथ है अपना
    यहाँ कहाँ हमको, इतिहास है रचना
    बिन समझे ही क्यू बैर बढाय, मन समझ न पाए ।
    दोष कयी मुझमें भी है, पर अनजाने में भूल गयी मैं
    मिथ्या आरोप से आरोपित, गरिमा पद की विसर गयी मैं
    खुद से खुद को कैसे वेधित कर, मन समझ न पाए ।

  • मेरे मन का मोती…

    मेरे मन का मोती,
    मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम…
    प्रभु मैं जपु तेरा नाम पल पल,
    तुझमें ही खो जाऊं ।
    मेरे मन का मोती ,
    मैं तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम ।
    सुध लो प्रभु दुनिया की ,
    यह नैन भी तरस गए ।
    किस और किनारा है मेरा ,
    बस नौका पार लगा दो ।
    मेरे राम मेरे श्याम….
    भूलूं कभी न तेरा नाम ,
    यह अरदास जगा दे ।
    तेरे से ही हो रौशन दुनिया मेरी,
    तेरे पर ही वारी जाऊं।
    मेरे मन का मोती मैं ,
    तुझको अर्पण कर जाऊं।
    मेरे राम मेरे श्याम….

  • एक फूल दो माली***

    करुण रस की कविता:-
    *****************
    जिसने हमको प्यार किया
    मेरी राह में सुबहो से शाम किया
    ना कद्र की हमनें
    एक पल भी उसकी
    अपशब्दों का उस पर वार किया
    एक रोज़ मैं बैठी थी
    अपने प्रिय के साथ जहाँ
    आ पहुँचा लेकर
    वो पागल फूल वहाँ
    मैं अपने प्रिय की संगिनी थी
    प्रेम में मेरे निष्ठा थी
    मैं बोली उठ चल ओ पगले !
    तेरा मेरा कोई मेल नहीं
    प्यार मोहब्बत एक इबादत है
    बच्चों का कोई खेल नहीं
    वह सुनता रहा चुपचाप खड़ा
    मेरे प्रिय की ओर मुड़ा
    मैं बोली मेरे साजन हैं
    मेरे हिय के बसते आँगन हैं
    वह टूटा जैसे पुच्छल तारा
    गिर पड़ा मोहब्बत का मारा
    लग रहा था जैसे कोई जुआरी
    चौंसर में अपना सबकुछ हारा
    पड़ी हुई थी ब्लेड वहाँ पर
    वह बिखरा हुआ पड़ा था जहाँ पर
    झट से उसनें काटी अपनी कलाई
    उसकी जान पे यूँ बन आई
    हमनें सबको वहाँ बुलाया
    सरकारी में भर्ती करवाया
    बिलख-बिलखकर रो मैं रही थी
    उसकी माँ बेहाल पड़ी थी
    खबर आई वह कोमा में गया है
    फिर पता चला वह दुनियाँ छोड़ चला है।

  • मैं हिन्दी

    हिन्द भाषाओं का सागर है l

    मैं हिन्दी उसमें से एक हूँ , उद्भव मेरी संस्कृत से है l

    हिन्द की सारी भाषाओं में भाईचारा था l

    अंग्रेजी ने हमें स्वार्थ के लिए बांटा था l

    मेरे संस्कार ने आजादी की चिंगारी डाला था l

    फिर क्या था मैं इतिहास रचने निकल पड़ा था l

    हिंद की कड़ी बनी, शंखनाद किया आजादी का l

    मैंने जुल्मों सितम सहा, पर अडिग रहा l

    आजादी का मंत्र हिंद के जनमानस में फूंका l

    ऐसे मैंने आजादी का इतिहास रचा l

    राष्ट्रभाषा का मुझे सम्मान मिला l

    मैंने ही संविधान रचा,फिर भी कुछ ने मुझे ठुकराया l

    अंग्रेजी ने अहंकार रूपी बीज जो बोया था l

    मैंने हर भाषा को अपनाया, समानता का अधिकार दिया l

    मैंने ही भेदभाव की जंजीरे तोड़ा, पर मुझे ही धर्म से तोला गया l

    वर्षों से आस लगाए बैठा कभी तो मुझे अपनाओगे l

    सारे बैर भुला राष्ट्रहित के लिए गले लगाओगे l

    Rajiv Mahali

  • कब तक हिन्दी………. भयभीत

    हिन्दी के व्याख्याता एक
    बोल रहे थे सेमिनार में।
    हिन्दी का प्रसार हो
    जन-जन और सरकार में।।
    बजवाई खूब तालियाँ
    बात- बात पे मञ्च से।
    समय खत्म होते ही
    बेमन आए मञ्च से।।
    खूब अनोखे भाषण थे
    मस्त महोदय खाओ पान।
    आप सरीखे हो सब तो
    निश्चय हिन्दी का कल्याण।।
    टन-टन टन-टन घण्टी बज गई
    तत्क्षण उनके खीसे से।
    हलो डीयर हाउ आर यू
    बाहर आए बतीसे से।।
    निहार रहा था केवल मैं
    सुनकर उनकी बातचीत।
    ‘विनयचंद ‘बतलाओ कब तक
    हिन्दी रहेगी यूँ भयभीत।।

  • हिन्दी -भाषा

    सीमित अक्षर, सीमित मात्राऐं
    रचा शब्दों का असीमित भण्डार
    बना विशाल वृन्द
    भरे शब्दकोश बेशुमार
    कैसा खेल रचाया है इन शब्दों ने
    महकाया काव्य दरबार
    वही शब्द
    संभावनाएं अपार
    क्षमता भरपूर
    भिन्न भाव
    अमिल सोच
    तीव्र जज़्बात
    विपरीत परिस्थितियां
    तीक्ष्ण नज़र
    अदृश्य विचार
    स्पष्ट दृष्टिकोण
    नित उदित नवीन रचनाएँ
    खिला कवि परिवार
    सजा साहित्य संसार
    बढ़ाया सम्मान हिंदी ने हिंद का
    बीच विश्व विशाल।
    सन्देश हर हिन्द वासी को
    बना हिंदी-भाषा को अपनी पहचान।

  • “आओ मनाएं हिंदी दिवस”

    हिंदी दिवस:-

    चौदह दिसंबर को हर वर्ष
    हिंदी दिवस मनाया जाता है
    उसी दिन क्यों हिंदी को
    सम्मान दिलाया जाता है
    हिंदी तो ऐसे ही वाणी है
    जो भारतीय परंपरा पर चलती है
    देशी हो या विदेशी
    हर भाषा को आत्मसात करती है
    देवनागरी लिपि की शोभा
    हिंदी ही बढ़ाती है
    भारत माता के माथे की स्वर्णिम
    बिंदी मानी जाती है
    यह कवियों की निज वाणी है
    इसे समझता भारत का हर प्राणी है
    भारत के संविधान में राजभाषा
    से सम्मानित है
    फिर क्यों नव युवकों द्वारा
    यह इतनी अपमानित है
    इसे बोलने में आखिर कुछ लोग
    क्यों सकुचाते हैं
    छब्बीस आखर वाली भाषा बोलकर
    इतना क्यों इतराते हैं
    हर भाषा को सम्मान दिया है
    हमारी प्यारी हिंदी ने
    क्षेत्रीय बोलियों को भी मान दिया है
    हमारी न्यारी हिंदी ने
    तो आओ मनाए हिंदी दिवस
    बनाएं हिंदी को जीवन का सार
    इसकी गौरव गाथा गाये हर प्राणी
    सात समुंदर पार।।

  • हिन्दी हमारी मातृभाषा

    एकता के सूत्र में विविधता को पिङोती, जनमानस की भाषा है जो
    देवनागरी लिपि में गुथी हुई,अपनी राजभाषा रूप धर आई है जो।
    हर जन के दिलों में उमंग सी बहती हुई
    अभिलाषा सी हमारे मन में है बसती हुई
    हर हिन्दुस्तानी के स्वाभिमान की है आधार वो
    हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा रूप धर आई है जो।
    अगर सम्मान इस जग में पाना है हमें
    हिन्दी भाषी होने का अभिमान लाना होगा हमें
    तरक्की के सफ़र में साथ निभाती है वो
    हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा रूप धर आई है जो।
    हिन्दी हमारी मातृभाषा , गुमान है इसपे हमें
    इसके ही बदौलत, पूरे करने हैं अरमान हमें
    हर मन में जगे स्वप्न को करती है साकार वो
    हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा रूप धर आई है जो। माँ की ममता सी आत्मियता की धार बहती है जिसमें
    ममत्व का धर रूप , पर ढाल बन जो बसती है हममें
    विविई रूपों में सुशोभित,सादगी की जीवंत प्रतिमान वो
    हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा रूप धर आई है जो।

  • किताबों के दिन !!

    कहाँ रहे अब किताबों के दिन !!
    अब तो बस अलमारी में
    रखी हुई किताबें
    धूल खाया करती हैं
    गुजरती हूं जब कभी
    उनके करीब से तो
    मुझे बड़ी उम्मीद से देखती हैं
    कि शायद आज मैं उन्हें
    स्पर्श करूंगी, उठाऊंगी,
    खोलूंगी, पढूँगी और झाड़ूगी
    उनके ऊपर से धूल की परतें !
    जो न जाने कब से जमी हैं
    और जब मैं मुंह मोड़कर चल देती हूँ
    तो वह ना-उम्मीद उठती हैं।।

  • धूप तो रहेगी।

    मैंने बड़े प्यार से पूछा आज उससे
    अगर मैं ना रहूं तो
    मेरी कमी तुम्हें खलेगी ?
    उसनें जवाब दिया-
    बादल चाहे जितने हों पर धूप तो रहेगी।

  • आब-ए-चश्म

    आब-ए-चश्म रातों में न आओ आँख में
    रात सोने दो, जरा आराम करने दो,
    सुबह को फिर वही,
    उनकी जुदाई याद कर के हम,
    बुला लेंगे तुम्हें, लेकिन अभी आराम करने दो।
    आब-ए-चश्म – आँसू

  • पूरी रात भर उडगन

    सोचता है मन
    कि पूरी रात भर उडगन,
    समय कैसे बिताते हैं
    अपने घौंसलों मे रह।
    न मोबाइल न टीवी है
    न खाना बनाना है,
    साँझ होते ही
    दुबक कर बैठ जाना है।
    जो पा लिया दिनभर
    उसे ही खा लिया दिनभर,
    आठ-दस घंटे
    न खाना न पीना है।
    बड़ी अद्भुत कहानी है
    बड़ा विस्मय है मन मे यह
    कि प्रकृति का कैसा
    बनाया ताना-बाना है।

  • जंगल में दाने

    कबूतरों का झुंड एक
    उड़ रहा था आकास में।
    बीच झाड़ियों के बहुत
    दाने पड़े थे पास में।।
    युवा कबूतर देख-देख
    ललचाया खाने के आश में ।
    बोल उठा वो सबके आगे
    उतर चलें चुगने को साथ में।।
    ना ना करके बूढ़ा बोला
    यहाँ न कोई है जनवासा।
    जंगल में दाने कहाँ से आए
    इसमें लगता है कुछ अंदेशा।।
    क्यों दादा तू बक-बक करते
    खाने दो हम सबको थोड़ा।
    जल्दी -जल्दी चुगकर दाने
    आ जाएंगे हम सब छोरा।।
    बात न मानी किसी ने उसकी
    उतर के आ गए नीचे सब।
    मस्ती में हो मस्त एक संग
    खाए अंखिया मीचे सब। ।
    तभी गिरा एक जाल बड़ा-सा
    उन मासूमों के ऊपर।
    एक संग में फँस सारे
    खींझ रहे थे खुद के ऊपर।।
    फर-फर फर-फर करने लगे सब
    आकुल-व्याकुल सारे।
    दूर खड़ा था एक बहेलिया
    लेकर बृझ सहारे।।
    आर्तनाद करते बच्चों को
    देख पसीजा बूढ़ा।
    जोड़ लगाओ उठा चलो
    लेकर जाल सब पूरा।।
    वही हुआ सब एक साथ में
    उड़ने लगे ले जाल को।
    दूर कहीं जाके जंगल में
    ले धरती आए जाल को।।
    मूषक मित्र महान ने क्षण में
    कुतर जाल को काटा।
    मनमानी और लालच का फल
    दुखी करे कह डांटा।।
    मान ‘विनयचंद ‘ बड़ों का कहना।
    लालच में तू कभी न पड़ना।।
    सबसे बड़ा बल होता दुनिया में
    एक साथ में रहना,
    साथ साथ हीं रहना।

  • खुद पर एतवार करते हैं

    चलिए एकबार फिर से,
    खुद पर एतवार करते हैं ।
    बहुत कर लिया गैरो से,
    इसबार खुद से ही प्यार करते हैं ।।
    बहुत किया भरोसा,
    जो भरोसे के हरगिज़ काबिल नहीं थे,
    खुद पर भरोसा
    चलो अबकी बार करते हैं ।
    वक्त के साथ चलने की
    हर बार कोशिश की
    वक्त को अपने साथ करने की
    कोशिश इस बार करते हैं ।
    वक़्त कैसा भी हो बीत ही जाता है
    बीत गया जो कब लौट के आता है
    बीते हुए कल की क्यू अफसोस मनाते हैं
    खुद पे भरोसा करके, खुद को आजमाते हैं ।
    ये जो आँसू हैं ,आखों में अकसर, कैसे तैर आते हैं
    गम के साथी हैं, खुशियों में भी हमेशा साथ निभाते है
    इनके ही जैसा बन के चलते हैं ।

  • ज़िन्दगी एक पहेली

    ************ हास्य रचना*********
    एक सखी ने पूछा वॉट्सअप पर दूजी से,
    क्या चल रहा है ज़िन्दगी में…
    दूजी वाली बोली…
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    पहली ने कहा, ये क्या है,कुछ समझ नहीं आया..
    दुजी वाली बोली, वो ही तो..
    तुम्हें कैसे बताऊं, कैसे समझाऊं
    समझ तो मुझे भी नहीं आया..

  • हिन्दू मुस्लिम

    गायब इस धरा से आज, इंसान क्यूं है।।
    कोई हिन्दू, कोई यहां मुसलमान क्यूं है,
    एक थाली में खाने वाले,
    सुख दुख में साथ निभाने वाले
    मिलके त्यौहार मनाने वाले
    बने आज शैतान क्यूं हैं,
    प्यार भरे दिलो में आज, नफरत के पैगाम क्यूं हैं,

    इंसानियत है बची नहीं, कहते
    इंसान क्यूं हैं,
    गीता और कुरान का आज
    अपमान क्यूं है।
    बुरा नहीं है हिन्दू
    ना ही बुरा मुसलमान है,
    राजनीति की गंदी चालो का
    विनाशकारी ये तूफान क्यूं है।।
    गुरुकुल और मदरसों का भूले
    ज्ञान क्यूं है।
    ना दीवाली में अली, रमजान से
    गायब राम क्यूं हैं।।

    आओ भूलें हिन्दू- मुस्लिम
    एक दूजे को गले लगाएं,
    अपनी एकता से फिर हम
    देश भारत महान बनाएं।।
    AK

  • इंतजार

    लहरें होकर अपने सागर से आज़ाद
    तेज़ दौड़ती हुई समुद्र तट को आती हैं ,
    नहीं देखती जब सागर को पीछे आता
    तो घबरा कर सागर को लौट जाती हैं ,

    कुछ ऐसा था मेरा प्यार
    खुद से ज्यादा था उसपे विश्वास,
    के मुझसे परे, जहाँ कही भी वो जायेगा
    फिर लौट कर मुझ तक ही आएगा ,

    इंतजार कैसा भी हो सिर्फ
    सब्र और आस का दामन थामे ही कट पाता है ,
    क्या ख़ुशी क्या गम , दोनों ही सूरतों में
    पल पल गिनना मुश्किल हो जाता है ,

    आज जीवन के इस तट पर मैं
    आस लगाये बैठी हूँ
    सागर से सीख रही हूँ इंतजार करना
    और ढलते सूरज के साथ पक्षियों का घर लौट आना देख रही हूँ…

    अर्चना की रचना “सिर्फ लफ्ज़ नहीं एहसास “

  • बचपन

    जीवन की अवस्था तीन सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    आनंद भरा रहता तन मन पुलकित होता हरेक का संग
    शिशु मुख लगता प्यारा प्यारा हर अंग भाता न्यारा न्यारा
    मुस्कान हो या फिर हो क्रंदन पलक लपकता रहता ही छवि
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    हर नयन में शिशु का आकर्षण न्योछावर हो जाता जन मन
    नन्ही बांहो में मां समा जाती पूर्णता का अहसास करा पाती
    अपनेपन का कोई स्वार्थ नहीं हर जीव से रहता लगाव तभी
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    तब फिर हरी भरी जवानी आती सुख की सौ नयी सौगाते लाती
    नव शक्ति से भरता है शरीर चाहता हरण न पर की पीर
    सामर्थ्यवान रहते हुए भी तन आलस से भरा रहता ये जभी
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    निज पर की आशा बढ़ जाती स्वयंभू क्यों स्वयं को भटकाती
    नित नूतनता का आभास लिए कुछ कर जाने का विश्वास पिए
    यौवन की सुगंध और मादकता कई प्यासों की आस जिलाती रही
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    फिर ज्ञान का दीप जलाता अनचाहा निश्चित बुढ़ापा आता
    अनुभव धन का भंडार भरे चहुओर फैलाने को शिथिल परे
    परन्तु ये कड़वा सच की इससे यौवन न किसी का ललचाये कहीं
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं
    परशुराम सा हो नर का जीवन संस्कार बाँटना चाहे बुझा यौवन
    श्रम का महत्व ही है जग में इसी से ही सुधरता शिक्षित मन
    सद्गुरु मिले अगर कोई सच्चा जीवन सफल बनता है तभी
    जीवन की अवस्था कई सही बचपन का कोई जवाब नहीं

  • अनमोल थी तेरी यादें।

    अनमोल थी तेरी यादें,
    तेरे साथ की।
    वह किस्सें बयान करती है,
    चाहते हैं,
    हम भी अनमोल हो जाते।
    तेरी यादों की तरह,
    छू लेते तुम यादों में कभी।
    पर हकीकत से ,
    उनका राब्ता ना होता।
    तुम चाहते उन्हें पाना,
    और तुम भी तड़पते,
    उन यादों के लिए,
    और हम फना हो जाते।
    तुम्हारी अधखुली आंखों के,
    खुलने से पहले।

  • हीरे जड़ी अंगूठी *****

    ❤❤ अभिव्यक्ति दिल से ❤❤
    ***************************
    पहली मुलाकात
    और पहली भेंट
    आज भी याद है मुझे…
    वह बरगद के नीचे बैठकर
    करी थी जो बातें हमने
    दिल आज भी बेताब है…
    तुम कुछ लाए थे मेरे लिए
    बड़े प्यार से
    दोनों घुटने टेककर मेरे सामने बैठे थे
    और एक अंगूठी निकालकर
    तुमने शिद्दत से मुझे पहनाई
    वो हीरे जड़ी अंगूठी मुझे बहुत भायी…
    वो अंगूठी आज तक मैंने
    नहीं उतारी
    मेरे हाथों की खूबसूरती
    आज भी बढ़ाती है
    जब देखती हूं उसे
    तो तुम्हारी बहुत याद आती है…
    न जाने क्या था हमारे बीच!
    पर जो भी था
    बहुत खूबसूरत-सा एहसास था…
    मेरे दिल की बंजर धरती पर
    तुमने ही प्यार के फूल खिलाए
    तुम ना आते तो शायद हम
    निर्मोही ही रह जाते
    प्यार क्या होता है जान ही नहीं पाते।।

  • भ्रूण हत्या

    मेरा जिससे था प्रेम प्रसंग
    वो रहता था हर पल मेरे संग
    हम एक दूजे के साये थे
    जन्मों बाद करीब आए थे..
    वो हाथों में हाथ लिए बैठा था
    बोला मुझसे विवाह रचा लो
    मुझको अपना पति बना लो
    मैं बोली विधाता को मंजूर नहीं
    घर वालों को करूंगी मजबूर नहीं
    तुम प्रेम हो मेरा यह तय है
    तेरे दिल में ही मेरा घर है
    पर भ्रूण हत्या का पाप
    मुझसे ना हो पाएगा
    तेरे वियोग में ही प्रियतम
    मेरा यह जीवन जाएगा
    वह चौंका उठकर खड़ा हुआ
    कैसी भ्रूण हत्या यह प्रश्न किया
    मैं बोली बेटा-बेटी हैं एक समान पर
    बेटी से ही है परिवार का मान
    दहेज देना नहीं खलता है
    किसी माँ-बाप को
    जब बेटी किसी संग चली जाती है
    घरवालों की नाक कटाती है
    उसी क्षण की खातिर हर दम्पति डरता है
    बेटी पैदा होने से डरता है
    मैं यदि तेरे संग विवाह रचाती हूँ
    वंश की लाज ना बचाती हूँ
    तो कोई भी दम्पति बेटी को कोख
    में ही मार बैठेगा
    मेरा परिवार लोकलाज के कारण
    आत्म हत्या कर बैठेगा
    एक तेरा प्यार पाने की खातिर मैं
    माँ-बाप को जीतेजी ना मार पाऊँगी
    बेवफा बन जाऊँगी पर भ्रूण हत्या का
    पाप सिर ना ले पाऊँगी…

  • सीता-राम की प्रथम भेंट

    सीता वियोग में बहुत
    विकल थे
    प्रज्ञा के श्रीराम !
    एकाएक याद हो आई
    सिय से प्रथम मिलन की बेला !!
    ज्यों घोर तिमिर में कौंध
    उठी हो अकस्मात दामिनी
    त्यों राम हृदय में
    जगमगा उठी
    सीता से जनक वाटिका में
    हुई प्रथम भेंट
    लता-कुंजों की ओट से
    सीता-राम दोंनो एक दूजे को
    निष्पलक देख रहे थे..
    फिर संकोचवश नेत्र संगोपन
    करने लगे
    नेत्र निमीलन और उन्मीलन
    की इस प्रक्रिया से कोयल
    कूँकने लगती हैं
    मकरन्द बिखरने लगते हैं
    आकाशमार्ग से पुष्पों की
    वर्षा होने लगती है
    रामभक्त प्रज्ञा !
    का हृदय
    उनकी तुरीयावस्था देखकर
    अच्युत रह जाता है और
    आत्मविस्तृत हो उठता है…

  • लाशों की सेज पर

    सोची समझी चाल से, शायद जानबूझकर
    पार्टियां वे कर रहे, विश्व को मौत में ढकेल कर।
    जिस वुहान से इसकी शुरुआत हुई
    इससे निजात की, तैयारी थी क्या कर रखी।
    मास्क को दे तिलांजली, दुनिया का नुकसान कर
    हजारों मासूम लोग जा रहे, काल का ग्रास बन ।
    लाशों की सेज बिछा चैन वे अलाप रहे
    लद्दाख पे आके, असलियत दिखा रहे ।
    जब सब कोई सहमा सा, दुआ है कर रहा
    तब वे अंधान्ध हो सीमा पर, चील सा मंडरा रहा।
    जमीर जिनमें थी नहीं, जिनकी नियत भी खोटी है
    औकात उनकी बताने को तैयार अपनी बोटी-बोटी है ।

  • जो भी लिखता हूँ कविता

    जो भी लिखता हूँ कविता
    आप इश्रत ही समझना,
    न मुझसे, न खुद से
    बस खुदा से तिश्रगी रखना।
    जब कभी मित्र बनकर
    बैठना चाहोगे तो मैं भी
    बिठाउँगा खुशी से आपको
    दिल के बियाँबा में।

  • ख्वाब।

    अक्सर मैं भूल जाती हूं ,
    अपनी राह।
    ख्वाब अनेकों हैं,
    अब खत्म है चाह।
    कभी उम्र की सीमा रोक देती है,
    कभी दूसरों की सलाह।
    पर भुला कर बढ़ती हूं आगे,
    फिर से उठते हैं,
    यह सवाल।
    कि कब बंधोगी!
    उस बंधन में।
    और मेरा होता है,
    यही जवाब!
    क्या मेरा सबके जैसा होना जरूरी है!
    वही रोज;रोजी रोटी की बाट जोहना जरूरी है!
    आज फुर्सत के चार पल चुरा लूंगी,
    क्या यह सोचना जरूरी है!
    जरूरी है कि मैं किस तरह जीना चाहती हूं,
    किसी के साथ या किसी के बिना।
    क्यों वही करूं जो सब चाहते हैं।
    खैर छोड़ो ! अब मत पूछो यह सवाल।
    मैं बस जीना चाहती हूं ,
    अपने मुक्कमल ख्वाबों के साथ।

  • आजाद किसे कहें!

    आजाद किसे कहें?
    सब बंधे हैं बंधन में।
    हर शाम पंछी,
    अपना घोंसला तलाशता है।
    जहां चाह होती है,
    अपने आशियाने की।
    वह बोलते नहीं तो क्या,
    दिख जाती है उनकी ममता,
    जब चुग कर खिलाती है,
    दाना अपने बच्चों को।
    सिखाती है उसे उड़ना,
    पंख फैलाकर,
    आजाद किसे कहें ,
    सब बंधे हैं बंधन में।

  • नारी हो या खुशियां सारी हो

    कितनी जाजिब हो तुम
    कितना मीठा कहती हो,
    सबको खुश रखने को
    सब कुछ खुद पर सहती हो।
    परिवार बनाने वाली हो
    प्यार लुटाने वाली हो
    खुद तो सब कुछ हो मेरा
    मुझको सब कुछ कहती हो।
    जब से तुम आई जीवन में
    तब से खुशहाली आई,
    बाहर-भीतर घर-आंगन में
    रौनक ही रौनक भर आई।
    जन्नत बना दिया तुमने
    अफसुर्दा आंगन को मेरे,
    गुलशन महक उठा खिलकर
    दसों दिशाओं में मेरे।
    नारी हो या खुशियां सारी हो
    जो जीवन में भर आई हैं,
    तुम हो साथ तब ही मैंने
    मंजिल की राहें पाई हैं।

  • तेरी खता

    कविता – तेरी खता
    ————————-
    तेरी खता फिर से तुझे,
    बदनाम कर सकती|
    तेरे लफ्जों के कारण ही,
    तुझे शैतान कह सकती|

    कहां अगर तू ये सच्चाई,
    तुझे बदनाम करते हैं|
    करें सबसे शिकायत जो ,
    तुझे ओ ,इंसान कहते हैं|

    करना ना भलाई तू ,
    नहीं तू भी ये रोएगा|
    मिला शब्दों में गाली जो|
    कहीं तू भी ये पाएगा|

    तेरे रिश्ते की कीमत को,
    ओ अपने भाव में समझे|
    तुझे गद्दार कहके ओ,
    खुद को ठीक ही समझे|

    करें खुद ही गलती जो,
    तुझे अज्ञान ही समझे|
    अपनी ही चालो जस,
    सभी का चाल ओ समझे|

    दूषित है हवा सारी,
    उसे तेरी ही आशा है|
    भटका है मुसाफिर ओ,
    उसे तेरी जरूरत है|

    मेरे मालिक मेरे ईश्वर,
    तुझे ओ याद करता है|
    संभालो आज उसको तुम,
    नहीं बर्बाद होता है|

    ——–✍ ऋषि कुमार “प्रभाकर”——-

  • नींद हरजाई..!!

    एक सवाल पूंछना है तुमसे
    एक बार आकर तो मिलो
    सब कुछ तो ठीक हो गया है
    तुम्हारे जाने के बाद…
    पर नींद कहाँ गुम हो गई
    यही पूंछना है मुझे
    रातें चाँद, तारे देखकर
    और नगमें
    सुनकर बिता देती हूँ
    ख्वाबों को छत पर सुला
    देती हूँ…
    खिड़कियां खोल के रखती हूँ
    शाम से अपनी
    कल्पनाओं से भी आँख चुरा लेती हूँ…
    बिस्तर रेशम का बिछा रख्खा है
    माँ को भी बाहर सुला
    रख्खा है
    शोर ना करना जरा भी
    मेरे कमरे के आस-पास
    सख्त ये नियम बना रख्खा है…
    निहारती रहती हूँ
    मैं चारों तरफ
    आयेगी नींद तो स्वागत में
    बंदकर लूंगी पलकें
    जाने नहीं दूंगी उसे
    सुबह तलक…
    रोज़ करती हूँ मैं ऐसा ही
    पर ना आती है नींद हरजाई
    पहले तेरे खयालों में ना सो
    पाती थी
    अब सोने ना दे तेरी
    रुसवाई…

  • फर्क तो जरूर मिलता है।

    तू शक्तिशाली!,मैं दलित !
    तू स्वर्ण ! मैं नीच!
    यह शब्द स्वार्थ में ,
    तूने ही मुझे दिए।
    तू मालिक, मैं दास,
    तेरी विचारधारा में;
    मेरा उपहास,
    शोषण का खाता,
    यहां हर रोज खुलता है,
    अरे!कितना भी अनदेखा करो,
    फर्क तो जरूर मिलता है।
    जरा-सा खून का कतरा निकाल,
    मेरा और अपना,
    फिर देख!
    मिला ,
    मेरे वजूद के साथ अपना वजूद,
    फर्क मिलेगा!
    मगर नस्ल का नहीं ,
    ना ही रूप का ,
    हां! तेरी सोच के बीज का,
    उच्च-नीच के बीच का,
    भेदभाव चीखता,
    तेरे अहम् में गुरुर लाजमी-सा
    मिलता है !
    फर्क तो जरूर मिलता है।

  • दादी माँ की बरसी

    आंगन में एक पाटा रखकर
    पण्डित और परिचितों को
    बुलाकर
    लगा तैयारी में पूरा घर
    पकवान और मिष्ठान
    बनाकर
    हाथ जोड़कर सब बैठे हैं
    दादी की बरसी है आज
    एक बरस होने को आया
    पर दादी को कोई भूल ना
    पाया
    लगता है जैसे कल की ही
    बात हो
    दादी बैठी थी आंगन में
    कुछ हँसकर बोल रही थी
    अपनी पोटलियां टटोल
    रही थी
    मैं लेकर चाय गई दादी के पास
    उन्होनें दिया था आशीर्वाद
    कुछ बातें उनकी आज जब
    मन करता है सुन लेती हूँ
    उनकी आवाज रिकार्ड है
    मेरे पास
    आज उनकी बरसी की बेला
    भी आ गई
    आगन की वो जगह सदा के
    लिए सूनी हो गई..

  • नादान पौधा

    नन्ना-सा ,एक छोटा-सा ,
    टहनी बड़ी, मगर कोमल-सा,
    अकेला मनोहर पौधा,
    तेज हवाओं में ,वो झूला झूले,
    कभी इधर कभी उधर,
    क्रीडा ललाम बड़ी सुहावनी,
    बारिश में वो नृत्य करें,
    मगर माली ठहरा क्रुर-सा,
    पौधा उसे नापसंद करें,
    बांध दिया उसने उसको,
    मोटी-सी एक डंडी से,
    हो गया बेचारा कैदी-सा,
    पकड़ा-सा कोई भेदी-सा,
    कैसे हवाओं में वो झूमे,
    कैसे धरती को वो चूमे ,
    पल-पल पुरानी यादें,
    मन में एक विद्रोह करें,
    मगर बड़ा हुआ जब पौधा,
    माली से क्यों प्रेम करें?
    माली से बहुत प्रेम करें।

  • प्यार है या जख्म

    कविता- प्यार है या जख्म
    ————————–

    क्या कसूर था मेरा,
    बस आके एक बार बता जा|
    खुश है-
    आ उन्नीस बरस का प्यार बता जा|

    करले तुलना प्यार से अपने,
    अब पूछो जरा मन सम्मान से अपने|
    पाके हसले निस दिन सपने,
    आ देख दशा, सपने डरते निस दिन अपने|

    हालात ने मोड़ा नहीं,
    हालात को तू ने मोड़ दिया मोड़ दिया |
    मिली खुशी तुम्हें ,सोच जरा,
    मां बाप को किस हाल में छोड़ दिया|

    तोड़ खुशी को खुशी है पाई,
    जा खुशी तेरी आबाद रहे|
    जा खुश रहना, खुशी में अपने,
    हर जन तेरी खुशियों का सम्मान करें|

    मुंह के गूंगे कान के बहरे,
    अंधे लूले कोढ़ी पूछ रहे|
    जिनके मुख पर कालिख थी,
    हंसी छुपा के दुख बांट रहे|

    कोई संस्कार बताएं,
    कोई दोष दिखाएं|
    हम देख रहे हैं बेटी,
    कोई गाली तुझे दे जाए |

    गोदी में तुझे रख कर के
    दूध पिलाया आंचल में छिपा कर के|
    हमें तो तूने जहर पिलाया,
    सब जन को दिखा करके कर के|
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    ऋषि कुमार प्रभाकर

  • टूटते गुलाब !!

    आज तोड़ दी मैंने
    पीली पत्तियां पौधों से
    उसी तरह जैसे
    मैं दिल से बेदखल
    हुई थी तुम्हारे !
    हरी पत्तियों पर जब पड़ती हैं
    ओस की बूंदें
    तो तुम्हारे होंठों पर
    टूटते गुलाब याद
    आते हैं…
    हरी-हरी घास को जब
    कंघी करती
    ये हवाएं हैं तो
    याद आ जाता है
    वो हसीं लम्हा
    जब तुम गेसुओं में मेरी
    अपनी उंगलियां फेर देते थे
    आज तोड़ दी मैंने वो
    पीली पत्तियां पौधों से
    अब सिर्फ हरी-भरी पत्तियां ही रह गई हैं !!

  • दादा जी के साथ बिताए पल

    बिटिया रानी बाज़ार गयी
    छोटा सा सामान लेने को,
    लौटी तो लगी उदास सी कुछ
    पूछा तो हो गई रोने को।
    दादी माँ ने पुचकारा फिर
    बोलो गुड़िया क्या हुआ तुम्हें,
    कहीं किसी ने कुछ बोला क्या
    क्यों लगी उदासी आज तुम्हें।
    गुड़िया बोली दादी अम्मा
    मैंने देखा एक नजारा,
    दो बच्चे थे मेरी वय के
    साथ में उनके दादा जी थे।
    बच्चे अपने दादा जी से
    यह ले दो, वह ले दो की जिद
    किये जा रहे थे,
    दादा जी लिए जा रहे थे सब चीजें।
    पांच बरस पहले की बातें
    मेरे मन में भी उग आई
    जब मैं अपने दादा जी का
    हाथ पकड़ बाज़ार गई थी।
    कितनी खुशियां हाथ में थी तब
    सपने जैसा लगता है अब
    दादा जी चल दिये स्वर्ग को,
    छह महीने होने को हैं अब।
    दादा जी के साथ बिताए
    पल मेरी यादों में आये
    इसीलिये उनके दादा को
    देख मेरे आंसू भर आये।

  • ऐ! आयतें

    ऐ !आयतें मुझे नजरबंद,
    कर ले कहीं ,
    काश ! कोई दुआ में,
    पढ़ ले कहीं।

  • आरक्षण…

    क्या है आरक्षण और
    क्यों है आरक्षण ?
    क्यों हमें जाति के नाम पर
    अलग करते हो ?
    जब देखो तब हम युवाओं
    का बँटवारा करते रहते हो..

    सवर्ण के हों इतने नंबर
    तब ही आगे बढ़ पाएगा,
    उससे कम नंबर वाला
    कुर्सी पर इठलाएगा..

    सोंचो कभी बीमार पड़ो तो
    किससे इलाज करवाओगे !
    जो हो मेरिट वाला या आरक्षण
    वाले से चीर-फाड़ करवाओगे ?

    तब तो तुम देखोगे नेताजी!
    जो हो सबसे पढ़ा-लिखा
    उसी डॉक्टर से इलाज करवाओगे,
    यदि हुई गम्भीर बीमारी तो
    एम्स में भर्ती हो जाओगे..

    लेकिन आम जनता का जीवन
    तुम अयोग्य डॉक्टर को सौंप दोगे,
    बोलो आखिर कब तक तुम
    आरक्षण के नाम पर राजनीति करोगे ?

    बहुत पढ़ा है प्रज्ञा ने बुद्धी
    के बारे में,
    बिने, स्पीयरमैन, थार्नडाइक भी
    ना बता सके आरक्षित बुद्धी के बारे में..

    यदि बुद्धी जातिगत होती तो
    अबुल कलाम देश का नाम
    ना रौशन करता,
    विकास दुबे इतना बड़ा
    अत्याचारी ना बनता..

    यदि बुद्धी सिर्फ सवर्ण को मिलती
    तो रावण ऐसे कुकृत्य ना करता,
    राम नाम की नैया खेकर
    कोई केवट भवसागर पार
    ना करता..

    बुद्धी प्रकृति प्रदत्त है कोई
    जातिगत विशेषता नहीं है भाई,
    जैसे सबके लहू का रंग है एक
    हो चाहे हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख
    इसाई…!!

  • पीड़ महसूस हो दूसरे की

    जब तलक राह में आपके
    गम की छाया न हो तब तलक,
    आप महसूस कैसे करोगे
    स्वाद इसका है बिल्कुल अलग।
    जब तलक कोई ठोकर तुम्हें
    गिराती नहीं भूमि पर,
    तब तलक किस तरह इल्म होगा
    अश्फाक भी है जरूरी।
    पीड़ महसूस हो दूसरे की
    आवश्यक है सभी के लिए
    आदमियत की आजिम बढ़ाकर
    सुर्ख करती सदा के लिए।

  • मेरा गुरूर

    मैं अंतर्मुखी हूं,
    इसीलिए कभी – कभी कुछ दुखी हूं,
    और कभी – कभी कुछ सुखी हूं ।
    बोलने से पहले तौलती हूं,
    यदा – कदा मन का कह नहीं पाती,
    तो थोड़ी खौलती हूं ।
    कोई कहे ख़ामोश मुझे,
    कोई कहे मगरूर हूं..
    मगरुर तो नहीं हूं, मगर मैं मेरा ही गुरूर हूं।
    ………..✍️ गीता..

  • लड़की हूं!

    लड़की हूं लड़की होने का,
    दस्तूर निभा रही हूं।
    न जता सकी उस प्यार को,
    फिर भी निभा रही हूं।
    शौक रखती थी कुछ पाने का,
    अब उसे दबा रही हूं।
    कभी कोई सोचता नहीं,
    कभी कोई पूछता नहीं ,
    तुम्हारी खुशी क्या है?
    बस मौन रहकर,
    सहमति जता रही हूं।
    कर्तव्य है मेरा सेवा करना!
    इसलिए बंदिनी बन,
    जीवन निभा रही हूं।
    ना चाहते हुए भी अपनाए हैं,
    चाहे-अनचाहे रिश्तें,
    फिर भी मुस्कुरा रही हूं ।
    जहां बो सकती थी स्वार्थ के बीज,
    वहां खुद ही काटे बिछा रही हूं ।
    अब निस्वार्थ होकर मैं,
    सिर्फ खुशियां लुटा रही हूं।
    मैं लड़की हूं लड़की होने का,
    दस्तूर निभा रही हूं।

  • पाकीज़गी अब दिखती नहीं।

    पाकीज़गी अब दिखती नहीं ,
    इन आबो-हवा में भी ।
    कभी दम घुटता है तो,
    कभी मन ।
    कभी सास भी बेपरवाह हो जाती है ,
    हां, यह रुख भी बदला है ,
    अब सुकून देती नहीं,
    चैन छीन लेती है ,तो कभी नींद।
    परिवेश बदला है, या हम ।
    पाकीज़गी अब दिखती नहीं,
    इन आबो-हवा में भी।

  • कितनी पी लेते हो !!

    कितनी पी लेते हो जो
    होश नहीं रहता है
    जमाना तुम्हें शराबी
    कहके हँसता है…

    इतना धुत हो जाते हो कि
    कुछ भी याद नहीं रहता है!
    किसे क्या कहते हो
    कुछ होश तुम्हें रहता है…

    पीटते बच्चों को हो
    नशे में तुम
    दुःखी करते हो अपनी
    पत्नी को तुम…

    छोंड़ते कहाँ हो तुम
    पुरखों तक को
    हो गली के गीदड़
    बनते शेर हो तुम…

    लाज आती ना तुमको
    करनी पर अपनी
    ताव देते हो तुम
    मूँछों पर अपनी…

    कहाँ की है यह
    मर्दानगी बताओ
    नालियों में गिरते चलते हो
    अब ना और छुपाओ…

    सब रहता है याद तुम्हें
    नशे का सिर्फ बहाना
    ये नाटक जाकर तुम
    कहीं और दिखाना…

    ना जाने कितने घर नशे में
    बर्बाद हो गए
    ना जाने कितने लोग
    मौत की नींद सो गए…

    छोंड़ दो आज से तुम ये
    दारू पीना
    सीख लो बीवी बच्चों की
    खातिर जीना…

  • अधूरी नज्म

    पुरानी सी डायरी के फ़टे पन्ने पर लिखी
    अधूरी नज्म हूं मैं
    जिसकी खूशबू बरकरार है अभी भी
    कई मौसम गुजर जाने के बाद

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