कोई अपना सा

मन के दर्पण पर कुछ प्रतिबिम्ब सा छा गया
कुछ कहा नही उसने पर फिर भी कुछ कह गया

जैसे भोर में कोई नया पुष्प खिल गया
हलचल सी हुई फिर हृदय के कोने में
अपनी मधुर सी मुस्कान में जैसे वो मुझे छल गया

उसके आने की आहट का बेसब्री से इंतज़ार किया
और जब वो आया तो अंग अंग खिल गया
मन मे बहुत कुछ था बताने को परंतु
होंठ न खुल सके और वो बिना बोले ही बहुत कुछ कह गया

सुध बुध खो बैठी उसकी झलक देखने को
और बातो ही बातों में वक़्त बेवफा हो गया
ख़्वाह्माखवाह मुस्कुराने लगी मैं
पता चला तो नाम बदनाम हो गया
इश्क़ में जिये तो डूबकर जिये हम
और जमाना हमे आशिक़ कह गया

Comments

3 responses to “कोई अपना सा”

  1. Ritu Soni Avatar
    Ritu Soni

    nice poem

    1. Anirudh sethi Avatar
      Anirudh sethi

      thanks ritu ji

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