Haiku

धैर्य

निश्चित छोड़ अनिश्चित को धावे । मुट्ठी से निश्चित खोवे अनिश्चित हाथ न आवे । “विनयचंद “धैर्य बिना क्या पावे? »

घर: एक मंदिर

हे लक्ष्मी तुम कितनी चंचला हो? खुद भी नहीं ठहरती एक जगह पर और औरों को भी भटकाती। घर से दफ्तर जाकर भी भटके भर दिन गाँव नगरऔर इधरोधर फिर भी बाक बाण छेदे छाती। झल्ला के घर को आया बैठी थी दुर्गा दरवाजे आसन लगाकर शीश चूम मुख माथे सहलाती। आँगन में बैठी काली रूप आव भगत से दुखरे को लेती हर मधुर शब्द कह स्वरा बहलाती। मिल जाए नव तन मन “विनयचंद ” रे सब सुख बसे जहाँ पर वो दुनिया बस घर कहलाती। »

निरखत बाल मुकुंदा

काली कम्बली काँधे पर शोभित अरुण अधर अरुणाभ कपोल श्याम रंग मुखचंदा विनयचंद नित निरखत बाल मुकुंदा।। »

सर्दियाँ

याद करना कभी तीस साल पहले क़ी सर्दियाँ बिस्तर से ना निकलने की कभी होती थी मार्जियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ स्कूल से छुट्टी मरने के लिए खूब लगाते थे अर्जियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ रजाई मे ही पड़े रहते और खूब खेलते थे पर्चियाँ. याद करना कभी तीस साल पहले की सर्दियाँ वो सुहाना मौसम अब कहाँ ना जाने अब कहाँ गई वो इतनी ठंडी सर्दियाँ. »

धूप

धूप,आज कुछ, सरक आयी, मेरे आंगन में…. और, बिखेर गई, मुठ्ठी भर अबीर…… …. कविता मालपानी »

कलाकार

सालो से भीख मांगती भिखारन सोचती मेरे नसीब मे ये ही सही. पेट की ना सही पर दिल की आवाज़ सुनी तो सही. भिखारन कहकर सालो तक दुत्कारा आज कलाकार कहकर पुकार तो d सही. »

Green leaf

Autumn comes, leaf falls Enter spring, new hope occurs Green leaf new life calls. »

हाइकु

हथेली पर सपनों की घड़ियाँ साकार नहीं। नदी के पार रेत के बडे़ टीले हवा नाचती। अशोक बाबू माहौर »

हाइकु

हथेली पर सपनों की घड़ियाँ साकार नहीं। नदी के पार रेत के बडे़ टीले हवा नाचती। »

अच्छे दिन…!

अच्छे दिन…! अच्छे लोग तो खुश हो ही रहे हैं अच्छे दिनों से ..!. आशा बहुत अच्छा जो हो रहा है और भी होगा…! बुरे लोगों के बुरे दिन आये हैं बरबादी के …! ना सुधरेंगे फंसे हुए जो हैं ये घूस लेकर …! सजा मिलेगी लूटा देश जिन्होंने उन्हें जरूर ..! देश भक्ति के दिन अब आये हैं खुशहाली के ..! ” विश्वनंद” An attempt at Haiku in Hindi (5,7,5). »

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