छत्तीसगढ़ी कविता

मोर नजर

तै कहूँ जा मोर आँखि के आघू म रैबे भले तोला लागहि कोनो नई देखत हे पर तय का जानिबे मोर नजरे नजर म झूलत रथस कभू मोर पीठ म छुरा झन घोपबे प्रेम म कैबे त अपन जीव दे दह अउ सीना जोरी करबे त जी ले लह काबर कि तै मोर आँखि के आघू म हस सबे दिन मोर नजर म हस »

मोर मन के परेवना

मोर मनके परेवना ★★★★★★★ कोयली कस कुहकत जीवरा के मैना न | महकत अमरैय्या गोंदा तय फूले जोहि || मोर मन म बसे हिरदे के परेवना ओ | संगी घलो हर झूमत नजरे नजर म न || लाली कस परसा दिखत रुपे ह तोरे ओ | दिखत रिकबिक घलो टिकली सिंगारे ह || तोरेच आगोरा म जीवरा ह संगवारी न | कलपत हिरदे हावे रतिहा आगोरा ओ || नइ मिले थोड़कुन आरो ह तोरेच जोहि | मन मे पीरा घलो मन कुमलाये भारी न || तिहि मोर परेवना अस सुवा तय मोर घलो ... »

हमन प्रबुधिया नोएन गा

“हमन परबुधिया नोएन गा” ************************** जांगर पेरत पसीना चुचवावत, भुइय्या के छाती म अन उगावत, चटनी बासी के खवैय्या आवन न, येहर धान के कटोरा हावे गा, हमन परबुधिया नोएन रे, सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा || मोर छाती म बिजली पानी, रुख राई अउ जंगल झाड़ी, कोयला के खदान हावे गा, हमन परबुधिया नोएन रे, सुघ्घर छत्तीसगढ़िया आवन गा || चारो मुड़ा हे नदिया नरवा, हीरा लोहा टिन के भंडार हावे, इहाँ ... »

हमर डाक्टर दवा नही दारु देथे

हमर डाक्टर दवा नही दारु देथे

https://youtu.be/9q3bESm_cFo »

छत्तीसगढीया बघवा पीला मन दहाडेल सीखव रे

छत्तीसगढीया बघवा पीला मन दहाडेल सीखव रे

छत्तीसगढीया बघवा पीला मन दहाड़ेल सीखव रे »

//बेजा कब्जा// (नवगीत)

नाचत हे परिया गावत तरिया घर कुरिया ला, देख बड़े । सुन्ना गोदी अब भरे दिखे आदमी पोठ अब सब झंझट टूट गे सुन के गुरतुर गोठ सब नरवा सगरी अउ पयडगरी सड़क शहर के, माथ जड़े । सोन मितानी हे बदे, करिया लोहा संग कांदी कचरा घाट हा देखत हे हो दंग चौरा नंदागे, पार हरागे बइला गाड़ी, टूट खड़े । छितका कोठा गाय के पथरा कस भगवान पैरा भूसा ले उचक खाय खेत के धान नाचे हे मनखे बहुते तनके खटिया डारे, पाँव खड़े ।। .रमेश चौहान »

हमर जिनगी ल बनाये खातिर

हमर जिनगी ल बनाये खातिर

Cमोर महतारी अऊ मोर ददा कईसन मेहनत करत हे हमर जिनगी ल बनाये खातिर अपन सरीर ल भजथे भिनसहरे ले उठ के दुनो पानी कांजी भरत हे आट परसार अऊ खोर दुवार महतारी सब ल लिपत हे गरुआ भैंइसा के चारा दाना ददा के भरोसे हे गोरस दुह के वो बिचारा दू पइसा म बेचत हे अपन शउख के बलि देके हमर बर पइसा जोरत हे हम पढ़ लिख जाबो कुछ बन जाबो इहि सोच के मरत हे बासी पसिया खा के ददा खार म जांगर पेरत हे घाम छाह अऊ बादर पानी सबो म नां... »