ये ग़म मेरे प्यार का उन्वान 1 बन गया,
जो था अपना आज अनजान बन गया।
मलहम की चाह में सूखे सारे ज़ख़्म,
हर ज़ख़्म अब एक निशान बन गया।
रहम-ए-इश्क़ की दरकार 2 थी हमें,
इंतज़ार अब मेरा इम्तिहान बन गया।
ख़ामोशी भी मुझसे बोलने लगी है,
पसरा सन्नाटा मेरा बयान बन गया।
जिस तरफ़ देखूँ, बस तुझे ही देखूँ,
हर नज़र मेरी तेरा पैग़ाम बन गया।
अंधेरों से घिरे मकाँ में गुज़री जिंदगी,
अँधेरा ही मेरा रोशनदान बन गया।
हो गया नाम मेरे नाम का तेरे नाम से,
अब तेरा नाम ही मेरा ईमान बन गया।
1. परिचय; 2. ज़रूरत।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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