Author: Kundan Shrivastava

  • सच

    * सच *

    अब तो
    बाज़ारों में
    बेचारी सच्चाई
    सिसकियाँ भरती हैं
    कोई भी
    ख़रीददार नहीं उनका
    जो भी आता है
    बेईमानी , मक्कारी
    ख़रीद कर ले जाता है
    हां , कभी कभार
    भूला भटका
    कोई जिस्म
    आ जाता है
    ‘ सच ‘ ख़रीदने
    न तन पर
    पूरे कपडे़
    कमबख़्त पेट भी
    पीठ से चिपकी हुई
    फ़िर भी
    ख़रीदने आ जाते हैं सच
    चंद ऐसे ही
    लोगों से
    सच्चाई की झोपड़ी में
    सब्र ओ सुक़ून की
    अंगिठियां जलती हैं
    तभी तो
    वो आज भी
    बापू ( गांधी ) के
    इस देश में
    ज़िंदा है… ! ! !
    – कुन्दन श्रीवास्तव

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