* सच * अब तो बाज़ारों में बेचारी सच्चाई सिसकियाँ भरती हैं कोई भी ख़रीददार नहीं उनका जो भी आता है बेईमानी , मक्कारी ख़रीद कर ले जाता है हां , कभी कभार भूला भटका […]