दिन का वो कोना जिसे सब शाम कहते हैं , मैं उनको काट कर अलग रख देता हूँ.. मेरी सब शामें बंद हैं अलमारी में बरसों से… चुभती हुई रातों से जो एक सुई मिल […]

तू उड़ता रह आसमाँ में कहीं, मैं ज़मीं का हूँ तो रहूंगा यहीं, मैं अब तुझे दिखाई भी नही देता, तू मेरा इम्तेहान क्या लेगा? सर को गोद में रखे मैं सज़दे में रहा, मैं […]

ये नज़्म पोछ के आँखों से.. इन्हें कानों में पहन लो तुम, तो एक आवाज़.. दौड़ के पास आएगी, और..मेरा पता गुनगुनाएगी. फुरसत हो तो आ जाना .

बारिश में भीगे कुछ ख्वाब.. कल उठा कर लेता आया, सुखा कर इन्हें, पूछुंगा आज.. कहाँ से आए? किसने छोड़ा तुम्हें सड़कों पे? अखबार में इश्तिहार दे दूंगा.. जिसके हों… वो ले जाये.. कुछ दिन […]

मैं एक नज़्म तेरी आँखों मे सजा कर, पलकों पे तेरी ख़ुद का पता लिख जाऊंगा. खुर्दबीन से भी ग़र मैं अब नज़र नहीं आता, देखो गिरेबाँ अपना.. शायद वहीं मिल जाऊंगा.

मैं एक नज़्म हूँ मुझे जी कर देखो, कोई ख़्वाब नहीं कि भूल जाओ मुझे, मैं एहसास हूँ मुझे महसूस करो, कोई गीत नहीं कि गुनगुनाओ मुझे.