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Satish Chandra Pandey

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Satish Chandra Pandey

@satish_2 • Joined Jul 2020 • Active 3 years ago

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

वाणी में मधुरिमा चाहिए

January 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

नजरों में मुहब्बत और
वाणी में मधुरिमा चाहिए
इंसान ने इंसानियत को
साथ रखना चाहिए।
साँस ईश्वर की अमानत है
समझना चाहिए,
साँस रहने तक उसे
नेकी निभानी चाहिए।
दूसरे की साँस में अवरोध
बिल्कुल भी न कर,
जा रही साँसों को मुख से
साँस देनी चाहिए।
देन हैं प्रकृति की ये
जीव सारे दोस्तो,
जीभ को देने मजा
हत्या न करनी चाहिए।
फर्क है मानव व दानव में
समझना चाहिए,
इंसान को इंसानियत की
हद में रहना चाहिए।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

निराशा दूर करो (कुंडलिया छन्द)

January 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अगर निराशा है कहीं, दूर करो तत्काल,
मन में अपने जोश को, सदा रखो संभाल।
सदा रखो संभाल, जोश में जोश न खोना,
आप हमेशा आग नहीं शीतलता बोना।
कहे लेखनी नहीं, निराशा में रहना तुम,
हिम्मत रखना दूर रहेंगी सारी उलझन।
——- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
प्रस्तुति- कुंडलिया छन्द

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

निन्दारत रहना नहीं (कुंडलिया छन्द)

January 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

निन्दारत रहना नहीं, निंदा जहर समान,
निन्दारत इंसान का, कौन करे सम्मान।
कौन करे सम्मान, सभी दूरी रखते हैं,
निन्दारत को देख, सब मन में हंसते हैं।
कहे लेखनी छोड़, मनुज निंदा की बातें,
अपने में रह मगन, न कर दूजे की बातें।
————– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
प्रस्तुति- कुंडलिया ,छन्द

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

बेकारी (कुंडलिया छन्द)

January 16, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बेकारी पर आप कुछ, नया करो सरकार,
युवाजनों को आज है, राहत की दरकार।
राहत की दरकार, उन्हें, वे चिंता में हैं,
पायेंगे या नहीं नौकरी शंका में हैं।
कहे ‘लेखनी’ दूर, करो उनकी आशंका,
आज बजा दो आप, जोश का कोई डंका।
*************************
बेकारी पर नीतियां, बनी अनेकों बार,
लेकिन उस हुआ नहीं, सच्चा सा प्रहार,
सच्चा सा प्रहार, नहीं होने से बढ़कर
बेकारी की बाढ़, चली लहरों सी बनकर।
कहे लेखनी करो, आज ऐसा कुछ नूतन,
जिससे राहत पाए, मेरे मुल्क का युवजन।
————— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय।
प्रस्तुति- कुंडलिया छन्द में

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

दिल दुखाओ मत किसी का

January 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठिठोली करो तुम खूब
लेकिन दिल दुखाओ मत किसी का,
जोर से गाओ मगर
मत चैन लूटो तुम किसी का।
किसी बीमार की जब रात को
आँखें लगी हों मुश्किलों से
जोर से डीजे बजाकर
मत बनो जरिया दुःखों का।
जब कभी कोई व्यथित हो
दुख व पीड़ा से,
सामने उसके
न प्रदर्शन करो अपने सुखों का।
आँख में पर्दा लगाकर
मत चलो ऐसे सड़क पर
भान रख लो तुम
दिखावे के मुखों का।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

कुछ नहीं साथ जाता

January 15, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सदा को कौन रहता है
यहां इस जमीं में
समय करके पूरा
चले जाते सब हैं।
तेरा व मेरा सभी
कुछ यहीं पर
रह जाता है
कुछ नहीं साथ जाता।
न आने का मालूम
न जाने का मालूम
बीच के ही सपनों में
होता है मन गुम।
खुली नींद
सपना जैसे ही टूटा
वैसे ही डोरों से
नाता छूटा।
जद्दोजहद सब
यहीं छोड़कर वे
सांसें न जाने
कहाँ भागती हैं।
जानते हुए सब
सच्चाइयों को
इच्छाएं मानव को
नहीं छोड़ती हैं।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

कुछ बोलना होगा

January 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

समस्याएं बहुत हैं
आपको मुँह खोलना होगा
जरा बिंदास होकर
आज तो कुछ बोलना होगा।
गरीबी मिटाने के लगे
जितने भी नारे हैं,
उनको हकीकत में
हमें अब तोलना होगा।
बेरोजगारी से युवा
हैं दर्द में काफी,
हमारी लेखनी को
आज तो कुछ बोलना होगा।
न हमें पक्ष से प्यार
ना ही है विपक्षी से
यौवन का भला तो आज
हमने सोचना होगा।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

आज कुछ गा लूँ मैं

January 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज कुछ गा लूँ मैं
तुम्हें सुना लूँ मैं,
गीत ही गीत में भुला कर के
दिल में अपने बसा लूँ मैं।
मिटा दूँ सब की सब
गलतफहमी,
सच्चा गायक हूँ
यह बता दूँ मैं,
पूरा लायक हूँ
यह दिखा दूँ मैं
निकाल कर
पलों की फुर्सत तुम
बैठ जाओ, तुम्हें सुना दूँ
गीत के बोल की देकर थपकी
गोद में प्यार से सुला दूँ मैं।
तुम्हारे स्वप्न में भी शामिल हो
आज अपना तुम्हें बना दूँ मैं।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

चलो पतंग उड़ाएं

January 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

चलो पतंग उड़ाएं
लूट लें, काट लें पतंग उनकी
सभी रंगीनियां अपनी बनायें
चलो पतंग उड़ाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
उनके चेहरे की
खुशियों को चुराकर
चलो आनंद मनायें
चलो पतंग उड़ाएं।
कटी पतंग दूसरे की
जिस दिशा में हो
उस तरफ दौड़ लगाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
वो उड़ाने में कुशल हों न हों
मगर हम
काटने में कुशल बन जायें,
न कोई प्यार, न झिझक रखनी
बस काटने में लग जाएं
चलो पतंग उड़ाएं।
आंख से आंख लड़ाकर उनसे
खुद की आंखों में जरा उलझा कर
काट लें डोर, लूट लें उनको
चलो पतंग उड़ाएं।
गर किसी की पतंग अपने पथ
उड़ रही हो न कर बाधा हमको
तब हम टाँग अड़ायें
चलो पतंग अड़ायें,
जरा इंसान कहायें।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

आपको नींद आ गई आधी

January 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आपको नींद आ गई आधी
और हम गीत लिख रहे हैं अब
क्या करें यह कलम भी चंचल है
जागती तब है, सो गए जब सब।
स्वप्न में भी मनुष्य की पीड़ा
भाव को शिल्प को जगाती है
तन अगर चाहता है सोना भी
ये कलम खुद ब खुद लिखाती है।
कुछ न कुछ बात उठा जीवन की
लेखनी नींद उड़ा देती है,
आपके स्वप्न में भी आकर यह
हंसाती और रुला देती है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

इस सड़क पर लिखी कहानी है

January 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

राग कहाँ रागिनी कहाँ मेरी
इस सड़क पर लिखी कहानी है,
दो घड़ी आप भी खड़े होकर
देख लो क्या है मेरी कहानी है।
लोहड़ी क्या, कई त्यौहार आये
आपने खीर पुए खूब खाये
मगर मुझे तो बस सुगन्ध आई
वो भी जब यह हवा बहा लाई।
कभी तो सोचता हूँ मैं नहीं मानव
मगर ये हाथ-पांव, मुंह-आंखें
किसी मनुष्य की तरह ही हैं
जो मुझे भी मनुष्य कहती हैं।
ठंड क्या गर्मियां हों बारिश हो
कोई त्यौहार हो या रौनक हो
मगर मैं एक सा रहा अब तक
पड़ा हूँ इस तरह से बेदम हो।
राग कहाँ रागिनी कहाँ मेरी
इस सड़क पर लिखी कहानी है,
दो घड़ी आप भी खड़े होकर
देख लो क्या है मेरी कहानी है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

मदद की तरफ बढ़ना है

January 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठोस के साथ हमें
कुछ उदार रहना है
अपनी आदत में हमें
अब सुधार करना है।
स्वहित के साथ हमें
दूसरों के हित में भी
थोड़ा रुझान रखना है
मदद की तरफ बढ़ना है।
जिन्हें जरूरत है
उन्हें मदद करने
डगर उनकी सरल करने
हमें भी बढ़ना है,
इंसान की तरह बर्ताव कर
इंसान से प्रेम करना है
इंसानियत में रख निष्ठा
इंसान बनना है।
महान बन सकें न हम भले
मगर महानता की सीख लेकर
उसे व्यवहार में
उतारना है,
खुद के व्यक्तित्व को निखारना है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

जीवन का दर्द लिखो कहती है

January 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन का दर्द लिखो कहती है
कलम आज बोलो कहती है
उपेक्षित-शोषित-उत्पीड़ित की
आवाज बनो कहती है।
प्यार-मुहब्बत पर लिखता हूँ
रोमांचित होने लगता हूँ,
जैसे ही रमने लगता हूँ
कलम मुझे कहने लगती है,
भूखे-प्यासे जीवन की
आवाज लिखो कहती है
कर्तव्य न भूलो कहती है।
मानव आधारित भेदभाव को
दूर करो कहती है,
समरसता हो जीवन में कुछ
ऐसा लिखने को कहती है।
सबके अधिकार बराबर हों
ऐसा प्रसार करो कहती है,
मानव-मानव में एका का
प्रसार करो कहती है।
जीवन का दर्द लिखो कहती है
कलम आज बोलो कहती है
उपेक्षित-शोषित-उत्पीड़ित की
आवाज बनो कहती है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

वक्त मत हाथ से जाने देना

January 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

वक्त मत हाथ से जाने देना
वक्त को खूब भुना लेना तुम
कभी आलस अगर आना चाहे
उसको तुम पास मत आने देना।
वक्त जब हाथ से निकल लेगा
तब नहीं लौट कर वो आयेगा
खर्च कितना भी करो
धन लुटा लो
मगर वो बीत चुका वक्त
नहीं आयेगा।
याद वो बालपन करो अब तुम
क्या दुबारा बुला सकोगे उसे,
क्या फिर खेल सकोगे माटी में
क्या फिर से लिख सकोगे पाटी में।
वक्त जो है उसी में खुश होकर
जिंदगी जियो यूँ हल्के में
बोझ सब दूर कर लो मन के तुम
रास्ते छोड़ दो अब गम के तुम।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

बड़े आदमी कब कहलाओगे तुम

January 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बड़े आदमी कब
कहलाओगे तुम
जमीं पर नजर जब
रख पाओगे तुम।
इंसानियत को
बचाकर के मन में
रख पाओगे जब
बड़े आदमी तब
कहलाओगे तुम।
जब तक न दोगे
दूजे को इज्जत
जब तक न समझोगे
इज्जत की कीमत।
जब तक रहोगे
मान-मद में अपने
बड़े आदमी क्यों
कहलाओगे तुम।
नहीं धन किसी को
बनाता बड़ा है,
वरन साफ मन ही
बनाता बड़ा है।
धनवान होकर
मदद कर न पाए
गरीबों को इंसाँ
समझ तक पाए,
समझते हो खुद को
बड़ा आदमी हूँ,
गलतफहमियां क्यों
पाले हो तुम।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

कुछ भी कह देना सरल है

January 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दगा करना सरल है
वफ़ा करना कठिन है
गिराना सरल है किसी को
उठाना कठिन है।
दिल जोड़ लेना और
अपना बोल लेना सरल है,
निभाना कठिन है।
कुछ भी कह देना सरल है
कर पाना कठिन है,
चाँद तोड़कर लाने की
बात करना और भी सरल है,
हर परिस्थिति में मुहब्बत करना
और भी कठिन है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

पूँजी तेरे खेल निराले

January 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

पूँजी तेरे खेल निराले
जिसकी जेब में भर जाती है
उसका संसार बदल जाती है,
धीरे-धीरे आकर तू
मानव व्यवहार बदल जाती है।
दम्भ, दर्प, मद, गर्व आदि
संगी साथी ले आती है।
तेरे आने से मानव की
आंखों में पट्टी बंध जाती है,
सब कमतर से लगते हैं
फिर अहं भावना आ जाती है।
पूँजी तेरे खेल निराले
किसी को नहला जाती है,
लद-कद कर घर भर जाती है,
किसी को सूखा रख देती है,
भूखा ही रख देती है।
कोई मेहनत कर के भी
दो रोटी नहीं कमा पाता है
कोई बिना किये कुछ भी
खातों को भरता जाता है।
पूँजी तेरे खेल निराले
सचमुच तेरे हैं खेल निराले।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

क्यों इस तरह हो रूठे

January 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बातें बताओ खुल कर
क्यों इस तरह हो रूठे
कहते थे प्यार दूँगा
अब बन गए हो झूठे।
बिन बात मुँह फुलाकर
चुपचाप क्यों हो बैठे,
क्या कह दिया है हमने
जो इस तरह हो ऐंठे।
लगता है पड़ गए हैं
कुछ नफ़रतों के छींटे,
कसमें थीं प्यार की जो
वो भूल कर यूँ बैठे।
आशा थी जिन फलों से
वे बन रहे हैं खट्टे
छोड़ो ये राह आओ
दो बोल बोलो मीठे।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

घमंड तेरा शत्रु है

January 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

घमंड तेरा शत्रु है
उसे कभी न पास रख
तेरा करेगा अवनयन
उसे कभी न पास रख।
घमंड से कटेंगे तेरे
मित्र और दोस्त सब,
घमंड लील जायेगा ये
आत्मीय भाव सब।
तू शिखर को चूम ले
गगन की यात्राएं कर
मगर न भूल मूल को
सभी से प्रेम भाव रख।
अगर घमंड भाव है तो
पूछता ही कौन है,
स्वाभिमान सब में है
दिख रहा जो मौन है।
न धन बड़ा न तन बड़ा
ये नाशवान चीज है
फिर घमंड क्यों करे
घमंड दुख का बीज है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

बोलो उसकी क्या गलती थी

January 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

तुम्हारी नादानी थी
बोलो उसकी क्या गलती थी
वो पेट में खेला करती थी,
बाहर आकर दुनिया देखूंगी
मन में सोचा करती थी।
वो कलिका अपने जीने के
सपने देखा करती थी,
तुम से मम्मा कहने को
मन ही मन आतुर रहती थी।
लेकिन पैदा होते ही
अपनी लाज बचाने को
तुमने उसका गला दबाया
मार दिया बेचारी को।
तुम्हारी नादानी थी
बोलो उसकी क्या गलती थी
उसको तो कुछ पता नहीं था
वो तो नन्हीं सी कोपल थी।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

ठेके का रिक्शा खींच दिन भर

January 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आ बैठ जा
मैं गीत लिख दूँ आज तुझ पर
है उपेक्षित तू सदा से
ठण्ड की रातों में
सोता है खुली ठंडी सड़क पर।
ठेके का रिक्शा खींच दिन भर
जो कमाता है उसे
भेजता है गांव में परिवार को,
रोज खपता है भले
रविवार हो शनिवार हो।
हांफ जाता है चढ़ाई पर
जोर टांगों से लगाकर
शक्ति को पूरी खपाकर
मंजिलें देता पथिक को,
सब यही कहते हैं कम कर
कोई नहीं देता अधिक तो।
जो मिला कम खा बचा
कर्तव्य अपने है निभाता
पत्नी-बच्चे, वृद्ध वालिद
पेट भरकर है खिलाता।
इस तरह तू इस शहर में
खींच रिक्शा है कमाता
जिन्दगी को जिन्दगी भर
खींच कर अपनी खपाता ।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

दुख-सुख का निरंतर चक्र है

January 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मन !!जरा सी बात पर
तू मत दुखित हो इस तरह
जिन्दगी है हार भी है
जीत भी, संघर्ष भी।
गर कभी है अवनयन तो
है यहां उत्कर्ष भी।
डूबने का भय कभी है
तो कभी है नाव भी
है कभी ढलती पहाड़ी
और है चढ़ाव भी।
है कभी खुशियों की बारिश
है कभी दुःख की डगर
इन सभी को देखकर अब
मन मेरे तू दुख न कर।
सब लगा रहता है
दुख-सुख का निरंतर चक्र है
ईश खुश है तो कभी
उसकी नजर भी वक्र है।
राह में कंटक भले हों
हैं सजे कुछ फूल भी,
याद रख खुशियों की बातें
दर्द के पल भूल भी।
मन !!जरा सी बात पर
तू मत दुखित हो इस तरह
जिन्दगी है हार भी है
जीत भी, संघर्ष भी।
गर कभी है अवनयन तो
है यहां उत्कर्ष भी।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

झूठ में सच मत छिपाने दो

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

भ्रष्टाचार खत्म करो
ऊपर की कमाई पर रोक लगाओ
सत्यता के भाव जगाओ
रातों-रात करोड़पति बनने की
प्रवृत्ति पर विराम लगाओ
नियम कानून जो बने हैं
उन्हें काम पर लगाओ,
गरीबों की योजनाओं को
उन तक पहुंचने दो
बिना लिए-दिये काम होने दो
हकदार तक हक पहुंचने दो।
राशनकार्ड में जितना मिलता है
मिल जाने दो,
मत बचाकर रखो
गरीबों में राशन बंट जाने दो।
अब कुहरा छंट जाने दो।
गांव के रास्ते में खड़ंजे
बिछ जाने दो,
उस पर कंकरीट पड़ जाने दो,
लेकिन कंकरीट में माप का
सीमेंट भी पड़ जाने दो,
खाली रेत मत बिछाने दो।
भ्रष्टाचार में किसी को भी
मत नहाने दो,
झूठ में सच मत छिपाने दो।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

सत्य के लिए लड़ना पड़ता है

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

यह संसार है
यहां के कुछ नियम होते हैं
यहाँ दिखावे की बजाय
लोग दिल से अपने बनाने होते हैं।
यहां इज्जत पाने से पहले
दूसरे को सम्मान देना पड़ता है।
शिखर में चढ़ने के लिए
झुकना भी पड़ता है,
दिलों में राज करने के लिए
त्याग करना पड़ता है,
स्वार्थ त्याग कर
दूसरों के लिए भी
कुछ करना पड़ता है।
सत्य के लिए लड़ना पड़ता है,
अन्यथा सब नहले के दहले होते हैं,
कौन किस से कमतर होता है,
वक्त आने पर
सीधा भी प्रखर होता है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

विचार कर सको तो जरूर करना

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

विचार कर सको तो
जरूर कर लेना,
असुर हो या मनुज
हिसाब रख लेना।
अपने कृत्यों की
सजाकर डायरी
जा रहे वक्त के पन्नों में
आप लिख लेना।
जिन माता-पिता ने
जन्म दिया, पालन किया
उनकी सेवा का था
कर्तव्य जो,
क्या उसे आप निभा पाये हो
सच्ची संतान कहा पाये हो,
सात फेरों की सपथ खाकर तुम
जिस अर्धांगिनी को लाये हो
क्या उसे सच में जिम्मेदारी से
खूब सम्मान दिला पाये हो।
जा रहे वक्त के पन्नों में
आप लिख लेना,
अपने बच्चों प्रति सचमुच में
अपने दायित्व निभा पाये हो।
और चारों तरफ स्वयं के तुम
किसी अनाथ की
असहाय की
जरा सी भी मदद कर पाए हो।
कहीं किसी का
कभी किसी का तुम
कहीं हक तो न छीन लाये हो।
विचार कर सको तो
जरूर कर लेना,
असुर हो या मनुज
हिसाब रख लेना।
अपने कृत्यों की
सजाकर डायरी
जा रहे वक्त के पन्नों में
आप लिख लेना।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हमारी मुफलिसी को क्या समझो तुम
तुम्हारे महल, हमारी झोपड़ी है,
हमारी राह में संघर्ष खड़ा
तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है।
हमें नसीब बड़ी मुश्किल से
रोटियां पेट भर को खाने को,
तुम्हारे पास फेंकने को है,
कूड़ेदानों में डालने को है।
तुम्हें तो मूल्य का पता ही नहीं
दाने-दाने में कितना जीवन है,
उसके एवज में रात-दिन खपते
तब कहीं साँस लेता जीवन है।
तुन्हें जीवन मिला है वरदानी
विधाता ने दिया है धन-पानी
उड़ाओ खूब मजे ले लो मगर
नजर बना के रखो इंसानी।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

आ मेरे मीत!! कर बहाने मत

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आ मेरे मीत!! कर बहाने मत
दे मुझे अश्रु से नहाने मत,
बह रहे भाव खूब आंखों से
अब इन्हें रोक ले, दे आने मत।
जब से फेरी है तूने पीठ मुझे
तब से मन के चिराग मेरे बुझे,
ऐसा लगता है तनिक सी भी नहीं
रही परवाह मेरे मन की तुझे।
यह हवा चल रही है छू कर तन
तेरे बिन हो रही है बस सिहरन
चैन लेकर चला गया है तू
अब यहां बच गई केवल उलझन।
आ मेरी उलझी लट बना जा तू
विरह के गम को अब मिटा जा तू,
आ भले दो घड़ी को आ जा तू
खुद का चेहरा मुझे दिखा जा तू।
———- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
काव्य विशेषता- यह परकीय विरह की कविता है। इसमें श्रृंगार के वियोग पक्ष को अभिव्यक्त करने का प्रयास है। नायिका की विरह वेदना है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

पहली जरूरत हो तुम

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुबह सुबह की
गरम चाय हो तुम
आलस्य छोड़ने में
सहाय हो तुम,
खुद ही बुनता रहा
उधेड़ रहा,
उलझी बातों में
मेरी राय हो तुम।
जिन्दगी को जरूरी
मुहब्बत हो तुम
दिल में राज करती
हुकूमत हो तुम।
कुछ कर सकने की
कूबत हो तुम,
पहली से भी पहली
जरूरत हो तुम।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

पलायन

January 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

गांव वीरान हो गए
छोड़कर वे मनोरम वादियां
शहर की ओर चल दिये,
फिर नहीं लौट पाये वापस
शहर में भीड़ थी
वे भीड़ में समा गये।
उधर वे खो गए
इधर गांव के आंगन के
पत्थर तक रो दिए।
खेत-खलिहान
में झाड़ियां उग गईं,
उनकी यादें धीरे-धीरे मिट गईं।

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by Satish Chandra Pandey

बेकारी ने छीन लिया

January 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कुछ जहाँ थे वहीं हैं
कुछ पहुँचे आकाश
कुछ की हालत दीन है
कुछ हैं मालामाल।
बेकारी ने छीन लिया
युवा दिलों का जोश,
मेहनत की मजदूर ने
फिर भी खाली कोष।
फिर भी खाली कोष
कभी कुछ बचा नहीं
रोज कमाया, खाया
हाथ कुछ रहा नहीं।
कुछ के पास अपार
संपदा पड़ी हुई है,
कुछ की निर्धनता
अपने में ही अड़ी हुई है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

कमा लो धन भले कितना

January 8, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कमा लो धन भले कितना
मगर नजरें धरा पर हों,
किसी को तुच्छ मत समझो,
नजर से सब बराबर हों।
पढाई उच्च हासिल कर
मिला प्रमाण कागज में
वही व्यवहार में दिख जाये
तब है बात कागज में।
अन्यथा कुछ नहीं है
शून्य है जो भी पढ़ा हमने
अगर व्यवहार में लाये नहीं
तब क्या पढ़ा हमने।
कमाया हो अरब से भी अधिक
लेकिन किसी धनहीन का
सहारा बन न पाये गर
कमाया क्या भला हमने।
भलाई साथ जाती है
अधिक रहता यहीं पर है,
किसी को भी हमेशा को
नहीं रहना जमीं पर है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

मन अगर साफ है

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मन अगर साफ है
सभी कुछ साफ है
अगर है मैल मन में
दिखावा पाप है।
वार आगे न करके
करे जो पीठ पर,
उसे मत वीर कहना
समझ जाना समय पर।
रखे जो ख्याल दूजे का
सहारा बेसहारे को
उसे कहते फरिश्ता सब
उसे सच में समझना रब।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी

January 7, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

घास पूस की झोपड़ी
मैया है बीमार
चौदह की गुड़िया ने थामी,
है घर की पतवार।
भूख बीमारी बेहाली के
झंझावात घिरे हैं,
गलत नजर से देख रहे
श्वानों से सिरफिरे हैं।
चूल्हा-चौका सब करना है
भैया-बहनों की देखभाल,
नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी
अच्छे से है ली संभाल।
हालातों से जूझ-जूझकर
हुए तजुर्बे जीवन के,
लगी हुई है खूब निभाने
फर्ज-कर्ज इस जीवन के।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

चैन गंवा कर खूब कमाया (चौपाई छन्द)

January 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

खुद खुश रहना औऱ सभी को
खुश रखना हो जीवन का पथ,
याद रखो नश्वर है जीवन
मिट जाना है बस इसका सच।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा
कहते-कहते बीते पल-क्षण
अंत समय तक समझ न पाया,
जीवन का सच्चा सच यह मन।
चैन गंवा कर खूब कमाया,
जमा किया जो खाते में धन,
खाने तक का समय नहीं था,
जीवन भर का था पागलपन।
कुछ भी हाथ नहीं रहता है
आशा में रह जाता है सब
अतः देखकर यह सारा सच
खुश रहने की ठानो तुम अब।
———- चौपाई छन्द में रचना।
————– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

दिल में बैठाया करता हूँ

January 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ज्वाला मेरी क्षीण नहीं
मैं खुद को मंद रखा करता हूँ
धीमे-धीमे जलता हूँ,
खुद में स्वच्छन्द जिया करता हूँ।
सच्चे दिल के लोगों को
दिल में बैठाया करता हूँ,
सच्चे मित्रों की महफ़िल में
मैं प्रेम लुटाया करता हूँ।

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by Satish Chandra Pandey

अच्छे से कट जाये।

January 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

मन के भीतर तक पहुँच गई,
ठंडक की ठंडी हवा
अब क्या हो इस ठिठुरन का हल
कुछ है क्या इसकी दवा।
होती तो मैं खा लेता,
सबको उसे खिला देता,
जितने भी मौसम होते हैं
उन सबमें खूब मजे लेता।
ठंडक में ठंड सताती है
गर्मी में बदन पसीने से
इतना तर हो जाता है
नींद नहीं आ पाती है।
ठंडा हो या गर्मी हो
या बरसात की नमी हो,
सब सह लेता यह शरीर
बन जाती कोई औषधि तो।
लेकिन हो तो वो सस्ती हो
जिसको गरीब भी खा पाये,
जीवन के कुछ पल उसके भी
जिससे अच्छे से कट जाये।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

बादल घिरे हुये हैं नभ में

January 6, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बादल घिरे हुये हैं नभ में, गरज रहे हैं आज,
बूंदें बरस रही आंगन में, छम छम छम छम बाज।
ऐसे में तन पुलकित होकर, भीतर करता नाच,
बाहर जाने से डरता है, ठंडक की है आंच।
पौधे खुश हैं बहुत दिनों के, बाद नीर मिला है।
तरस गये थे सूख रहे थे, आज पीर मिला है।
पानी है तो जीवन है इस उदक सब सूना है,
पानी से ही धरणी में नव, अँकुर उग पाना है।
——————💐💐—- डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

मत सोचो

January 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ठंड की बरसात में
घर के भीतर छाता ओढ़कर
सोने की मत सोचो
दिखावे का रोना
रोने की मत सोचो।
मुँह चुराकर
निकल जाने की मत सोचो।
केवल खुद ही
खाने की मत सोचो।
अपनी खुशी के ही
गीत गाने की मत सोचो।
जो जरूरतमंद हैं
भूखे हैं, वस्त्रहीन हैं
उनकी भी मदद कर लो
सब कुछ खुद ही
पाने की मत सोचो।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

कब के बुझ चुकी

January 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

वो जगह छूटी
वो लोग छूटे,
वो मन की लगी
कब के बुझ चुकी,
वो चाहत
बहुत दूर जा चुकी,
वो गलियां अब
बेगानी हो चुकी
फिर भी नजरें
उस ओर पडते ही,
आँसू टपक पडे,
वो आँसू
माटी के भाव बिक गये।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

दूजे की भी मदद कर(कुंडलिया छन्द)

January 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दूजे की भी मदद कर, अपना ही मत देख।
ठिठुर रहे जो सड़क पर, उनको भी तो देख।
उनको भी तो देख, खिला दे रोटी उनको,
पहना दे रे वस्त्र, इतना सक्षम है तू तो।
कहे ‘लेखनी’ आज, जरूरत जिनको है वे
पीड़ा में हैं जरा, मदद उनकी तू कर ले।
——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

ठंडी हवाएं

January 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

बारिश की बूंदें
पड़ने लगी हैं,
ठंडी हवाएं
चलने लगी हैं।
सड़कों में बैठे हुए
बेघरों की
जीवन की साँसें
थमने लगी हैं।
समाचार पत्रों में
छपने लगा है
ठंडक से मौतें
होने लगी हैं।
देखो क्या ?
मानव तमद्दुन की बातें
सचमुच बुलंदी
छूने लगी हैं।
जो भी है फिर भी
धरातल में देखो
ठंडक से मौतें
होने लगी हैं।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

गांव की सड़कों में

January 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

योजनाओ!! तुम
धरातल तक
पहुंच जाओ ना,
गांव की सड़कों में
खूब गड्ढे हो गए हैं।
ऐसे झटके हैं कि
बीमार या गर्भावस्था में
ये गड्ढे समस्याओं के
अड्डे हो गए हैं।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

संतोष

January 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सुखी है आदमी कब
जब उसे संतोष है,
अन्यथा उलझन है
मन में रोष है।
जो मिला उस पर
नहीं कुछ चैन है,
इसलिए यह मन मेरा
बेचैन है।
गर मेरे मन में
भरा संतोष है,
चमचामते दिन
मधुर सी रैन है।
हो अगर संतोष
तन पुलकित है यह
होंठ में मुस्कान
मन में चैन है।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

छोटी-छोटी खुशियों की

January 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज एक टूटी हुई
चप्पल मिली उसे
कूड़े के ढेर में,
साथ ही एक पुरानी
बनियान मिली।
दो रुपये का सिक्का
रख गई हाथ में,
सड़क पर चलते
एक धनवान मिली।
खुशी का ठिकाना
नहीं रहा जब उसे
कूड़े के ढेर में
छोटी-छोटी खुशियों की
खान मिली।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

न बोलिये बात ऐसी

January 3, 2021 in मुक्तक

न बोलिये बात ऐसी कि
डर जायें हम,
आपको देखकर चूक
कर जायें हम।
देखिए लाल आंखों से
यूँ मत हमें,
जिससे कि सचमुच
सिहर जायें हम।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

हम समझ न पायेंगे

January 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आपकी बात ऐसे
हम समझ न पायेंगे
जरा सा खुल के कहो
खुल के बता जायेंगे।
दिल में तूफान है पर
आग अब बुझी सी है,
आप चाहो तो उसे
और जला लायेंगे।
ठंड है खूब और
आप भी बुझे से हैं
आग लायेंगे आपको
भी तपा जायेंगे।
आप मुँह मोड़ लो
पूरी तरह भले हमसे
मगर हमें न कभी
आप भुला पायेंगे।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

जीवन कठिन हुआ जीवों का

January 2, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आज धूप नहीं है
बादल छितरे हैं नील गगन में
ठिठुर रहा है जीवन
बर्फ भरी है आज पवन में।
कैसे उठूँ रजाई से,
यह ठंडक मुझे रुलाई दे
कुछ गर्मी लाने की बातें
अब कैसे मुझे सुनाई दें।
चाय हाथ में आने तक
ठंडी हो जाती है, भैया,
ऐसे में कोई छोड़ गया है
सड़कों में बूढ़ी गैया।
जीवन कठिन हुआ जीवों का
खूब पड़ रही है ठंडक,
पाले की चादर चमड़ी पर
दांत कर रहे हैं टक-टक।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

नव वर्ष आ रहा है

January 1, 2021 in Poetry on Picture Contest

समय की धीर लहरें
बढ़े ही जा रही हैं,
खुद में बीते दिनों को
समाते जा रही हैं।
जा रहा यह बरस अब
वक्त के इस जलधि में,
आ रहा नव-बरस है
आज बिंदास गति में।
रेत सी जिन्दगी है,
बीतता वक्त है यह,
काल के इस उदधि में
समाता वक्त है यह।
नए पल आ रहे हैं
पुराने जा रहे हैं,
रेत में चिन्ह अपने
घोलते जा रहे हैं।
पुराना जा रहा है
उसे है नम विदाई,
नया जो आ रहा है
आज उसकी बधाई।
पा सके थे नहीं जो
आप बीते बरस में,
वो मिले आपको अब
आ रहे नव-बरस में।
नैन आशा जगायें
होंठ मुस्कान लायें,
जहां भी आप जायें
वहां सम्मान पायें।
दूर हो रोग -बाधा
सभी का स्वस्थ तन हो
बनें राहें सरल सब
नहीं कुछ भी कठिन हो।
सभी निज लक्ष्य पायें
उदर का भक्ष्य पायें
झूठ के मार्ग को तज
सत्य के गीत गायें।
रेत सा वक्त है यह
लहर गतिमान है यह
नहीं रुकता कभी भी
सभी को भान हो यह।
निरंतर चल रहा है
वक्त, हम भी चलें अब
इस नए वर्ष में अब
सभी संकल्प लें यह।
जा रहे नव बरस को
आज है नम विदाई,
आ रहे नव बरस की
आज सबको बधाई।
——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

नववर्ष की शुभकामनाएं

December 31, 2020 in मुक्तक

नववर्ष की शुभकामनाएं
हैं हमारी ओर से,
जिन्दगी खुशहाल हो
पल पल खिला हो आपका।
स्वस्थ तन हो स्वस्थ मन हो
खूब धन हो आपका।

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Satish Chandra Pandey

by Satish Chandra Pandey

ऐसी लेकर आना युक्ति

December 31, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

मानवता व्याधियों से
जूझती रही,
पूरे साल,
ओ दो हजार बीस !!
अब विदा ले।
दो हजार इक्कीस !!
तू खुशियों की
झोली भर के ला
शुभ बन के आ,
मानवता को
जिससे मिले पीड़ा से मुक्ति
ऐसी लेकर आना युक्ति।

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