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संपादक की पसंद

  • आम का बाग़

    भगवान् की कृपा से मैने आमों के पेड़ों से भरा इक घर पाया
    हरेक पेड़ ने अलग-अलग रंग रूप पाया
    सबका आकार अलग,महक अलग
    फ़िजा में अलग ही महक उठी जब पेड़ों पर बौर आया
    जब पेड़ों पर फल आया तो सब का मन ललचाया
    फिर सब आमों से स्वाद भी अलग-अलग आया
    फिर आमों ने मुझे भिन्न-भिन्न किरदारों से मिलवाया
    किसी ने मांगे आम खुद तो किसी के घर मैने भिजवाया
    बहुतों को स्वाद खूब भाया तो कुछेक के मन को छू नहीं पाया
    किसी ने भगवान जी को भोग लगाया तो किसी ने आभार जताया
    किसी ने जब लालच दिखाया तो माली को गुस्सा आया
    किसी ने अपनी पाक कला का नमूना दिखाया
    तो किसी ने पकवान बना कर चित्र भिजवाया
    आम बाँटते मुझे खुद का भी भिन्न रूप नजर आया
    इस उत्सव ने मुझे जीवन का नूतन और अविस्मरणीय अनुभव करवाया।

  • प्रभु तुझ बिन

    आज किन रंगों से सजा होगा यह दिन
    क़ोई पल न गुजरे प्रभु तुझ बिन
    आज किन रंगों से सजा होगा यह दिन
    क़ोई पल न गुजरे प्रभु तुझ बिन

    त्राहि त्राहि कर रही तेरी धरा
    खतरे में पङा ये सारा जहाँ
    मनुज काल का ग्रास बन जा रहा
    तू क्यू छिपा, बता बैठा कहाँ
    कितने घर बिखर गए
    कितने नन्हें बिलट गये
    मानव घर तक सिमट गये
    फिरभी संक्रमण से हैं जकड़े हुए

    अब और हम जैसों से सहा जाता नहीं
    भूखे पेट घर पे, चुपचाप रहा जाता नहीं
    बाहर संक्रमण का कहर, बढ़ रहा घटता नहीं
    क्या करें कैसे रहें समझ में आता नहीं

    भूल जो हम सबसे हुई, उसे अब तो माफ कर
    थक गए हैं मनुज, अब इनका तू संताप हर
    संक्रमण, बेरोजगारी, कमी, भूख से पीड़ित है नर
    इन सभी दु:ख-दर्द से, बसुन्धरा को मुक्त कर!!
    !शुभ प्रभात!

  • धूप में बाप ….

    धूप में बाप और
    चूल्हे पर मां जलती है,
    तब कहीं जाकर एक औलाद पलती है।

  • मोहब्बत का सफर

    यारा! तुझ संग जिंदगी गुजारनी है
    मोहब्बत में तेरी हर शाम महकानी है,

    तेरे ही नाम से लहराता है आँचल मेरा
    तेरी दीवानी बन हर रात महकानी है,

    बिन तेरे प्यासी हूँ मेरे हमसफ़र
    प्रेम की गहराई में कश्ती डुबोनी है,

    दर्द भी मेरे तेरे प्यार में सिमट गए
    मेरी हर अदा में तेरी ही कहानी है,

    जिंदगी और जग में सब जायज है”मीता ‘
    जमाने से लड़कर मोहब्बत रंगीन बनानी है,

    किस किस को दूँ तेरे मेरे रिश्ते की दुहाई
    ‘पूनम रात है चांद की पालकी आज सजानी है।

  • उम्मीदों के बीज

    चलो आज अपनी तन्हा जिन्दगी को नया रूप देते हैं
    सशंकित ह्रदय में फिर से नव उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
    रोज की भागदौड़, दोहरे कामों से मन है बेहाल
    घर-बाहर की जिम्मेदारियां, फिर भी उठते सवाल
    अब भी ठहरो, खुद को समझो, खुद को वक्त देते हैं
    सशंकित ह्रदय में, फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
    वो बचपन के दिन, माटी के कच्चे सात घङकुल्ले
    सात मिठाइयाँ, सतन्जा, सात रंगीले मिट्टी के खिलौने
    उल्लास के पलों की तरह,जीवन को सातरंग देते हैं
    सशंकित ह्रदय में फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।
    घरेलू कपङो से बने अद्वितीय गुड्डे-गुड़िया का खेल
    खेल-खेल में भी था कैसा वास्तविकता का अद्भुत मेल
    खिलखिलाहटो के साथ फिर से नव संसार रचते हैं
    सशंकित ह्रदय में फिर से उम्मीदों के बीज बोते हैं ।।

  • नम्रता

    नम्रता ही तो है आभूषण
    हर्षित करता है सबका मन

    जीवन में कोई अवरोध नहीं
    प्रगति भी रुकता है कहीं
    कर्महीन का सहारा भाग्य
    उत्साही का तो हर दिन सौभाग्य —

    सब कुछ वह तुरंत ही पाता
    औरों को भाग्य समझ आता
    लगन से होता जन जागरण
    साधारण भी बनता प्रतिभावान

    विश्वास शक्ति और महानता का रास्ता
    अविश्वासी को नहीं इससे वास्ता
    न सीखने से इंसान बूढ़ा बनता जाता
    सीख सीख बूढ़ा भी होता जवान

    हर विचार तो है इक स्वप्न
    कर्म से होता साकार तत्छन
    आत्मविश्वास मनुज का बड़ा सद्गुण
    अविश्वासी कहां समझ पाए ये गुण

  • अन्नदाता

    समझ में बिलकुल नहीं आता
    ये कैसी फितरत है इनकी
    जहाँ देखा नफ़ा अपना
    हाथ थाम ली उनकी ।
    हल्ला मचा करके बस बात रखनी है
    फिक्र कहाँ इनको, अपनी भेट भरनी है
    हमारे धरतीपुत्र भटकते फिर रहे दर-दर
    इन्हे तो बस अपने मन की करनी है ।
    हमारे देश की धूरी “कृषि” जो कहलाती है
    किसानों के बल पर ही, धरा खिलखिलाती है
    उन किसानों की ये मजबूरियाँ कैसी
    खुदकुशी करने को जो उकसाती है ।
    कोई खुशी से कैसे खुदको लील जाएगा
    कृषक क्यूँ भला खुद को आजमाएगा
    विकास भला क्या उस मुल्क का हो पाएगा
    जहाँ अन्नदाता ही जिन्दगी से हार जाएगा ।
    कुछ नयी कोशिश इन्हें एकबार करने दो
    नीति बना ऐसी, वाजिब हक तो मिलने दो
    कृषि करके भी उन्हें खुद पे फक्र करने दो
    सही मायने में,अन्नदाता को अधिकार मिलने दो।

  • बेटी का घर।

    तुम बांध लो अपना सामान,
    कुछ भूल ना जाना,
    यह सुनते ही,
    बेटी का दिल बोला!
    यह घर भी,
    अपना-सा नहीं लगता।
    चार दिन बीत जाने के बाद,
    दोहराए जाते हैं यही सवाल!
    कि कब आएंगे मेहमान!
    कब जाने की तैयारी है!
    कुछ पल और रुक जाऊं,
    ऐसा दिल चाहता है।
    पर ना जाने,
    सबके दिल में क्या होता है।
    इन रिश्तो में उलझ कर,
    समझ नहीं पाती हूं मैं,
    कि कौन-सा घर मेरा अपना है।

  • तेरी मुस्कुराहट

    कुछ तो खास है उसकी मुस्कुराहट में,
    जब भी देखता हूं, दिल मिजाज़ करने लगता है।
    लाख समझा लूं मैं इस दिल को मगर कमबख्त,
    तुझे देखकर बेवजह ही धड़कने लगता है।
    शाम की चादर जैसे ही आसमां ओढ़ लेता है,
    तब मेरा दिल भी धड़कने के बहाने ढूंढ लेता है,
    न जाने कौन अजनबी है वो,
    जब भी उसे देखता हूं, अपना सा लगता है।
    कुछ तो खास है उसकी मुस्कुराहट में,
    जब भी देखता हूं, दिल मिजाज़ करने लगता है।
    तू है तो अजनबी ही, लेकिन फिर भी……
    तुझे अजनबी कहने से डर लगता है।
    तू और सिर्फ तू ही रहे मेरे पास,
    बस यही दुआ मेरा दिल ये करता है।
    कुछ तो खास है उसकी मुस्कुराहट में,
    जब भी देखता हूं, दिल मिजाज़ करने लगता है।
    …. शिवम्

  • नन्ही-सी परी मेरी लाडली

    नन्ही-सी परी मेरी लाडली
    अब बड़ी हो गई
    बैग लेकर स्कूल पढ़ने जाने लगी
    हाथों में कॉपी पेन लेकर
    लिखने लगी
    अंग्रेजी में कविता सुनाने लगी
    आँखों में उसके हैं
    अनगिनत सपनें
    मेरी आँखों में भी सपने
    सजाने लगी
    स्कूली परिवेश पहनकर
    कितनी सोनी लगती है
    अब तो अपनी चोटी खुद
    ही बनाने लगी
    ए, बी, सी, डी उसकी उंगली
    पर रहते हैं
    अब तो वह जोड़ने-घटाने लगी..

  • वृद्धाश्रम में छोड़कर बूढ़े पिता को

    वृद्धाश्रम में छोड़कर बूढ़े पिता को
    लौट आया घर, जरा सा चैन पाया
    मुस्का रही अर्धांगिनी ने जल पिलाया
    आज उसकी रुचि भरा भोजन बनाया।
    बोली बड़ी आफत हुई है दूर हमसे
    खांसी की आवाजों से छुटकारा मिलेगा
    चाय देने को उठो पानी पिलाओ
    इन सभी बातों से छुटकारा मिलेगा।
    ज्यों ही बैठे, भोजन को परोसा
    बारह बरस का पुत्र बोला बाप से
    क्या सभी जाते हैं वृद्धा आश्रम में
    जब वो बन जाते हैं दादा जी किसी के,
    एक दिन क्या आप भी वृद्धाश्रम में,
    रहने लगोगे आप जब दादा बनोगे।
    चोट खाकर पुत्र की इस बात से
    दो कौर भोजन के नहीं खा पाया वो,
    आक़िबत का आईना अपना दिखा जब,
    पुत्र से कुछ भी नहीं कह पाया वो।

  • राष्ट्रकवि:- रामधारी सिंह दिनकर’ को नमन

    दिनकर ऐसा सूर्य है जिसने
    हिन्दी जगत को अपनी लेखनी की
    किरणों से चमकाया
    देशहित में लिखकर
    देश का गौरव खूब बढ़ाया
    जिनके सूर्यातप के आगे
    शशि भी मलिन हो जाए
    ऐसे राष्ट्रकवि को प्रज्ञा
    शीश नवाए
    हिन्दी की खड़ी बोली का गौरव
    दिनकर ने खूब बढ़ाया
    उर्वशी लिखकर दिनकर जी ने
    हिन्दी साहित्य को एक रत्न
    चढ़ाया
    मीठी सरल, सरस भाषा में दिनकर जी
    लिखते थे
    पीड़ितों के दर्द को अपने
    काव्य में स्वर देते थे
    राष्ट्र चेतना जगाकर कवि ने
    विश्व में ख्याति है पाई
    बाल साहित्य और गद्य-पद्य
    दोनों विधा अपनाई
    पद्मविभूषण और मिला
    ज्ञानपीठ पुरस्कार
    रामधारी सिंह ‘दिनकर को
    जन्म दिवस पर हम सबका
    नमस्कार…

  • साई भजन – तुही तू है |

    साई भजन – तुही तू है |
    साई तेरी दुआ से दुनिया मे रोशनी है |
    गर कर दे तू करम यहा कुछ नहीं कमी है |
    तेरी रहमतों से कायम ये दुनिया जहा है |
    जिधर भी देखो हर तरफ नूर तेरा वहा है|
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |
    गर तू न होता बाबा कुछ भी न होता |
    तेरे मुरीदों को क्या क्या न हस्र होता |
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |
    डाल दे तू नजर जिधर उधर कमाल हो जाये |
    अन्धो को आंखे गूंगे की बोली धमाल हो जाये |
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |
    कहा से तू आया सिर्डी मे धुनि रमाया |
    हर दुखियो के दुख तूने पल मे भगाया |
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |
    होके मजबूर तेरी चौखट सिर झुकाने आया |
    दिल के दर्द साई बाबा को सुनाने आया |
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |
    अब तेरे सिवा न कोई यहा सहारा मेरा |
    अंधेरी जिंदगी मेरी करो उजियारा मेरा |
    साई बाबा हर तरफ तुही तू है |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • बेजान कर गया वो

    जाना ही था उसको,चला ही गया वो,
    जाते-जाते बेजान कर गया वो।।
    जाने वाले को रोक पाया है कहाँ कोई
    होता है वही जो, नसीब में सबके होई
    जिन्दा हैं पर जान ले गया वो
    जाते- जाते बेजान कर गया वो ।।
    सबके जीवन में जोखिम भरा पङा है
    कहाँ कब कोई, यहाँ सब दिन रहा है
    फिर भी देखो हैरान कर गया वो
    जाते-जाते बेजान कर गया वो ।।
    वो कौन है धरा पे इतना नसीब वाला,
    गमों से जिसका, कभी पङा नहीं हो पाला
    बोध है पर, नादान कर गया वो
    जाते-जाते बेजान कर गया वो ।।
    थोड़ा सा मन मेरे, धीर अब तो धर ले
    बङे धीर-वीर भी, यहाँ से गये अकेले
    समझाये खुद को कैसे, अधीर कर गया वो
    जाते-जाते बेजान कर गया वो ।।

  • गैंग रेप**

    बारी-बारी लूटा मुझको
    बारी-बारी रौंदा
    नारी होने पर बेबस थी
    खत्म हो गया जीवन का औधा
    ना..री…ना रो
    एक दिन मिलेगा तुझको
    इन्साफ सबने यही
    समझाया
    जब कोर्ट में सवालों ने किया शर्मिंदा
    कुछ भी ना समझ आया
    इतना लज्जित ना हुई थी तब
    जब यह कुकृत्य हुआ था
    जैसा लगा है वकीलों के सवाल से
    ऐसा कभी ना लगा था
    मैं पछताई जो सोंचा मैंने
    इन्साफ मुझे मिल पाएगा
    पुरुष प्रधान देश में ऐसा
    कुछ भी ना संभव हो पाएगा
    गैंग रेप से पीड़ित होकर
    इन्साफ की आस में जिन्दा थी
    कोर्ट में सबके सवालों के आगे
    बेबस थी शर्मिंदा थी..

  • मैं तुलसी तेरे आंगन की*****

    क्यों जताया जाता है
    प्रतिपल
    मैं दूसरे घर की लक्ष्मी हूँ
    हूं कुछ दिनों की मेहमान
    क्यों कहा जाता है
    हर पल यह एहसास
    होता है कि किस घर की हूँ मैं
    अपने ही माँ-बाप कहते हैं
    पराई अमानत हूँ मैं
    किसी रीति-रिवाज में
    बेटियों की जगह नहीं होती
    बहुएं ही हर कार्य में हैं आगे होती
    जब विवाह होता है
    जाती हूँ अपने घर
    यह सोंचती हूँ इसकी हर प्रथा मेरी है
    शामिल होती हूँ खुशी से
    हर रिवाज में
    गलती से भी कोई भूल हो जाए तो
    खाती हूँ डाट मैं
    वो कहते हैं तू तो पराया खून है
    तुझे कहाँ पता इस घर का कानून है
    कुल को गाली पल में दे दी जाती है
    घर की लक्ष्मी पल में पराई हो
    जाती है
    आखिर कौन है जो मानना है
    कहता मुझे अपना
    मेरा अस्तित्व बन गया है महज सपना
    कोई तो कहे मुझे प्यार से अपना
    बता दे ऊपरवाले तू ही मुझे
    आखिर किससे कहूँ
    ” मैं तुलसी तेरे आंगन की” !!

  • ससुराल की सूखी रोटी…

    ****************
    मेरी किस्मत रंगी है काले
    रंग में
    दर्द ही है जीवन के हर
    अंग में..
    आँसुओं की लकीरें कभी
    मिटती नहीं बल्कि
    और गहरा जाती हैं
    जब किसी की बातें मेरे
    दिल को दुःखाती हैं..
    बेवजह कैसे कोई अपमान
    कर सकता है ?
    आखिर कब तक कोई ये
    कड़वा घूँट पी सकता है..
    मुस्कुराने की हर वजह
    मुझसे रूठ जाती है
    होंठों की मुस्कान आँख का
    आँसू बन जाती है..
    चली जाऊंगी एक रोज
    ये जहान छोंड़कर
    मुड़ के ना देखूंगी ना आऊंगी
    लौटकर..
    चाहे कितने भी दर्द मिलें
    सब सह लूंगी
    ससुराल की सूखी रोटी का
    भी मान रख लूंगी..
    तकलीफें बर्दास्त के बाहर
    हुईं तो मर ही जाऊंगी
    पर मायके कभी लौटकर
    ना आऊंगी..

  • तड़प

    मेरे जो अपने थे ,न जाने आज वो किधर गये
    जो सपने संजोये थे ,वो सारे टूटकर बिखर गये
    खुशियां मेरे आंगन की ,न जाने कहाँ बरष गयीं
    और एक हम जो बूँद बूँद को तरस गये
    अब तो सुनाई दे रहीं हैं नफरती रुबाइयाँ
    न जाने कहाँ प्यार के नगमात खो गये
    आंशुओं का अबकी बार ऐसा चला सिलसिला
    कि क़त्ल सब दिलों के जज्बात हो गये
    याद में उसके सारे पल गुजर गए
    जैसे प्रेम फाग के सुहाने रंग उतर गए
    याद में उसकी कुछ चित्र उभर कर आ गए
    जैसे बरसों के प्यासे मरुस्थल में ,मेघ उतर कर आ गए
    बह जाये जो अश्कों में कभी दिल को तोड़कर
    तारों के जैसे टूटते ,वो ख्वाब हमको दे गए
    फिर जग गई चमन में कुछ भूली दास्ताँ
    कलियाँ चमन की वो ,सारी खिलाकर चले गए
    अब जलाना बाकी रहा ,कंधों पर यादों का जो बोझा है
    यादों की लकड़ियों की ,वो चिता बनाकर चले गए
    सोंचता हूँ छोड़ दूँ यूँ घुट घुट कर जीना
    मुझ बदनसीब को वो ,यूँ ठुकरा कर चले गए
    हमें लगता था कि ताउम्र उनका साथ होगा
    ढूंढते हैं उनके निशां ,न जाने कहाँ वो चले गए
    कर बैठे थे प्यार जिनको ,वो तो बेवफा निकले
    जिन्हे बादल समझ बैठे हम ,वो धुआं बनकर उड़ गए ….

  • मिलती-जुलती गाथा है

    हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है
    बेटी का कुछ वर्षों का मैके से नाता है ।
    हीना रचने से पहले थी अलहङ
    अब चौका-चुल्हा बना भाग्य विधाता है
    थोड़ी सी भूल, भूलवश हुई हमसे
    माँ-बाप को कोशा जाता है
    हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है ।
    दहेज़ की बोझ से दबे माँ-बाप
    कहते चुप रहकर सह यह संताप
    पगङी की लाज तुझे है रखना
    गम खाकर तुम बस चुप रहना
    समाज के डर से वे, कुछ कहा नहीं जाता है
    हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है ।
    दर्द सहा अब जाता नहीं, आता कोई संदेशा नहीं
    मैके गये हुए अर्सा, उसपर व्यंगो की वर्षा,
    दहेज़ की कमी हर-पल दिखलाया जाता है
    हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है ।
    अब और नहीं, उत्पीड़न यह, मै झेलूगी
    इनकी फरमाइशो को ना, मैके में बोलूंगी
    हर दर्द को ले साथ-साथ, मौत के संग खेलूँगी
    ऐसे ही नहीं कोई मौत को गले लगाता है
    हर घर की यह बस मिलती-जुलती गाथा है ।।

  • वो तेरे जीवन की परी (भाग 2)

    प्रभु ने कुछ और भी बाते समझाई थीं
    20-25 साल हुए थे,नन्हे फ़रिश्ते ने कुछ भुलाई थीं
    किसी -किसी के याद रही,
    पर कोई फरिश्ता भूल गया
    प्रभु ने कुछ यूं समझाया था ………
    फ़िर आंखों पर चश्मा चढ़ जायेगा
    उसके बालों में , चांदी आ जाएगी
    फ़िर भी तेरे “मां” कहने पर
    वो पास तेरे आ जाएगी
    लाठी का सहारा जब लेने लगे
    तू उसकी लाठी बन जाना
    काम तेरे कर ना पाएगी, पर
    काम तेरे बहुत वो आएगी
    इस दुनियां से जाते – जाते भी
    तुझको दुआ दे जाएगी
    इस दुनियां से जाते – जाते भी
    तुझको दुआ दे जाएगी ……
    वो तेरे जीवन की परी, वो तेरे जीवन की परी..
    ……✍️ गीता……

  • एसिड अटैक

    मेरी जिंदगी की एक शाम थी
    मैं घर जा रही थी
    कोई नहीं था साथ में
    अकेली ही आ रही थी..
    कुछ मनचले पीछा कर रहे
    थे रोज की तरह
    मैंने भी नजरंदाज कर दिया
    रोज की तरह..
    एकाएक चारों ओर से
    घेर लिया मुझे
    कुछ फेंका मेरे चेहरे पर
    पानी जैसा लगा मुझे..
    भाग गये सारे मुझ पर एसिड फेंक कर
    मैं सड़क पे तड़प के गिर पड़ी
    चेहरे की एक-एक हड्डी हो
    जैसे गल गई..
    जाने कौन ले गया उठाकर
    किसने किया उपचार ?
    मुझे होश आया तो परिजन
    बैठे थे आस-पास..
    मेरे सौन्दर्य के साथ मेरी आत्मा
    भी मर गई
    देखा जब आईना तो मैं
    स्वयं से डर गई..
    जिस चेहरे से पहचान थी
    वह भयावह हो गया
    जिसने किया था प्रेम को परिणय
    तक पहुंचाने का वादा
    वह अनायास ही मुकर गया..
    जी रही हूँ आज भी एक
    अलग पहचान से
    जानते हैं सब मुझे और
    देखते हैं मान से..
    मेरी आत्मा मरी नहीं
    जला है सिर्फ रूप ही
    जीने के मायने बदल गये
    हौंसलों ने संवार दी जिंदगी…..

  • वो तेरे जीवन की परी (भाग 1)

    प्रभु ने कहा , नन्हे फ़रिश्ते से,
    तुम्हे धरा पर जाना होगा
    मानव रूप मिलेगा तुमको
    इस धरा को स्वर्ग सा सुंदर बनाना होगा
    नन्हा फरिश्ता पूछे प्रभु से,
    उस दुनियां में कैसे रह पाऊंगा,
    इतना छोटा बना के भेज रहे हो प्रभु
    मैं अपने भी काम कैसे कर पाऊंगा ?
    प्रभु मुस्काए, बोले ..चिंता ना कर
    धरा पर जाने से बिल्कुल ना डर
    तेरे लिए वहां , तेरी एक परी होगी
    जो तेरे लिए, तेरी इक मुस्कान के लिए खड़ी होगी
    लेकिन प्रभु , वहां तो और भी पारियां होंगी !
    मै कैसे अपनी परी को पहचानूंगा ,
    कैसे में उसको जानूंगा……
    प्रभु बोले, ये तो है बहुत आसां ,
    वो दौड़ के आएगी, बस एक बार कहना मां
    तू उसको ना जाना कभी छोड़ के ,
    तेरे मां कहते ही , वो आएगी दौड़ के
    बचपन से लेकर जवानी तक
    हर गीत से लेकर कहानी तक,
    वो तेरी सेवा में खड़ी होगी
    तू एक मुराद मांग कर तो देखना,
    पूरी करने को, सारी दुनियां से लड़ी होगी ।
    फरिश्ता फिर मुस्कुरा के बोला….
    जैसी आप की इच्छा प्रभु….
    फरिश्ता धरा पर आया, मां के रूप में सचमुच एक परी को पाया
    20-25 साल बड़े आराम से निकले,
    फ़िर साहबजादे कुछ कमाने को घर से निकले….
    ………फिर क्या हुआ ,अगले भाग में पढ़ें…..✍️गीता..

  • बलात्कार:- एक अभिशाप

    जीवन के पहले प्रभात में
    ली मैंने अंगड़ाई
    बाल्यकाल था बीता किशोरावस्था
    की बेला आई..
    रोंक-टोंक थी ज्यादा मुझ पर
    समझ नहीं मैं पाती थी
    बचपन से मैं ट्यूशन पढ़ने
    चाचा जी के घर जाती थी..
    एक दिन ऐसा हुआ कि मैं
    पहुँच गई चाचा से पढ़ने
    चाची जी कहीं गई थीं बाहर
    केवल चाचा ही थे घर में…
    वैसे रोज़ डाटते थे उस दिन
    प्यार से मुझको पास बुलाया
    पानी में कुछ मिला-जुला के
    कोल्डड्रिंक बोल के मुझे पिलाया…
    उनकी हरकतें कुछ ठीक ना थीं
    मैं घर जाने को आतुर हो आई
    हाथ पकड़कर मेरा चाचा ने
    फिर एक चपाट लगाई…
    भूखे भेंड़िये सम वह मेरे
    अंग-अंग को नोच रहे थे
    मैं वो कोमल-सी कली थी
    जिसको पैरों से वह रौंद रहे थे…
    चाचा मैं तो तेरी बेटी हूँ
    यह हाथ जोड़ मैं बोल रही थी
    कृष्ण सुदर्शन धर आएगे
    मन ही मन में सोंच रही थी…
    बूंद-बूंद रस पीकर उसने
    तन को मेरे जीर्ण किया
    मेरे मृत शरीर को उसने
    सौ टुकड़े कर बोरी में किया…
    फेंक दिया नदिया में जाकर
    घरवालों को फिर फोन मिलाकर
    आज ना आई ट्यूशन पढ़ने
    थाने में आया ये रपट लिखाकर…
    दो महीने के बाद मिला
    मेरा शव बोरी में भरा हुआ
    मेरा फोन उसी बोरी में था
    जिससे सारा पर्दाफाश हुआ…
    वह भाग गया था, पकड़ा गया
    कानून ने भी इन्साफ किया
    मेरी सखी ने जब उस पापी
    का पुलिस को असली पता दिया..

  • वो कौन थी..

    वो गोरी भी ना थी,
    ज्यादा सुंदर भी ना थी,
    ना देती थी प्रेम कभी,
    फ़िर भी वो योग्य बहुत थी
    कदम से कदम मिलाती थी
    वो साथ मेरे आती जाती थी
    मैं चाहता तो रुकती थी
    मैं चाहता तो चलती थी
    मंदिर में आने से करती थी इन्कार
    पर बाहर मेरा करती थी इन्तजार
    वो………………………………………..
    जैसी भी थी, चप्पल थी मेरी……
    ना जाने कौन उठा कर ले गया ।

  • कर प्रतिकार तू

    नारी तू जो चाह ले रच दे नव संसार तू
    होने वाले अपमान का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
    कभी दाव पे लगा दिया खुद तेरे ही परमेश्वर ने
    मौन हुए सब देख रहे, बिलखते छोङ दिया हर अपने ने
    तेरे चीरहरण के साक्षी बनने थे सब तैयार खङे
    कान बंद थे जैसे उनके, कैसे सुन पाते चित्कार तेरे
    सोंच हृदय कंपित है मेरा, कैसे वे भारतवंशी थे
    निर्वस्त्र होती कुलवधू, कैसे देख रहे, अत्याचार तेरे
    सत्य शपथ तेरा था, क्यूँ करती क्षमा अपराध तू
    होने वाले अपराधों का करती क्यूँ न प्रतिकार तू ।।
    आज भी दुर्योधन-दुशासन जैसे लोगों की कमी नहीं
    कर्ण सरीखे रणकुवरे की विषैली वाणी थमी नहीं
    देख रहे हैं ऐसे कितने, जैसे हम इन्सान हैं ही नहीं
    पशु भी शरमा जाये, घिनौनी हरकतें थमी नहीं
    बाहर कदम पङे कैसे, सराफत नहीं बची हो जैसे
    इन सरफिरो से डरो नहीं, दुर्गा-चण्डी की अवतार तू
    होने वाले अपराधों का करती क्यूँ नहीं प्रतिकार तू ।।

  • अभी-अभी।

    अभी-अभी कुछ बूंदों से रूबरू हुए,
    चमकते हैं मोती से,
    बरसते हैं बुंदों की तरह।
    पर आयानास ही नहीं बरसते।
    जब बनते हैं गम के बादल,
    सिमट जाते हैं पलकों पर।
    फिर गिरते हैं धीरे-धीरे
    बिना किसी शोर के क्षण-क्षण।

  • बेरोजगारी

    आईने तू इस तरह से
    मत दिखा तो शक्ल मेरी
    इन दिनों यौवन में हूँ
    चिंताएं मेरी लाजमी हैं।
    सोचता था मैं, कड़ी
    मेहनत से तारे तोड़ लाऊं।
    लेकिन यहां तो सारे पथ
    हैं बन्द कैसे लक्ष्य पाऊं।
    हर तरफ छाया अंधेरा
    कल की चिंताओं ने घेरा,
    घेर कर बेरोजगारी
    तोड़ती उत्साह मेरा।
    अब बता तू ही कि कैसे,
    मैं चमक जीवित रखूं
    कुछ नहीं कर पा रहा हूं,
    किस तरह आगे बढूं।

  • उचित सम्मान दूं

    खूबसूरती को तुम्हारी,
    क्या नया उपमान दूँ,
    उपमान तो कितने ही
    बेहतर दूं ,भले न दे सकूँ
    लेकिन इतना तो कर सकूं कि
    घर के बाहर व भीतर
    तुम्हें उचित सम्मान दूं।

  • अन्न- दाता

    आज हमारा जीवन रक्षक, अन्न- दाता कर्म भूमि छोड़ कर
    दर – बदर सड़कों पर,
    संघर्ष करता,
    गरीब हर साल और गरीब होता जाता,
    सदियों से हक के लिए लड़ता ,
    हर बार ठगा जाता ,
    आत्म हत्या का विकल्प चुनता,
    कितना बेबस,सुनता कौन,
    राजनीति की भेंट चढता आया,
    वोट बैंक दिग्भ्रमित करता ,
    अब तो उम्मीद भी हारने लगा,
    भटके कभी इस छोर कभी उस छोर
    कोई रखता नही याद इसका बलिदान
    दुआ करो,
    कही इसकी नई पीढ़ी भूल ना जाए खेत खलिहान ।

  • बन्द नफरत की निगाहें कर ले

    सदा अगलात ही न खोज
    मेरी वाणी में,
    कभी तो सत्य के अल्फाज
    भी ग्रहण कर ले।
    प्यार के नैन को
    उपयोग में ला,
    बन्द नफरत की निगाहें कर ले।
    न भर अस्काम खोज कर
    अपनी झोली को,
    बल्कि इफ्फत से अपनी राहें चल,
    कमी मेरी नजरअंदाज कर ले,
    नफरतों का उबाल कम कर ले।
    शब्दार्थ-
    अगलात- अशुद्धियां
    अस्काम – बुराइयां
    इफ्फत -पवित्रता

  • “बालू का ढेर”

    ख्वाहिशों की बदलियां
    छटने लगी हैं आजकल
    मुहब्बत की रेत फिसलने
    लगी है आजकल
    काजल आँखों का दुश्मन
    बन बैठा है
    मेहंदी से भी अब कोई
    कहाँ नाम लिखता है
    दिल की किताब के सारे
    पन्ने फट गये हैं यूँ
    किसी भी तरह से ना कोई
    पन्ना जुड़ता है
    बालू के ढेर पर बैठी हूँ
    आशियां बनाने समुंदर में
    अब कहाँ कोई ज्वार
    उठता है
    ले जाएगा बहाकर एक रोज़
    कोई समुंदर में बहाकर
    ये खयाल आजकल
    बार-बार उठता है…

  • दिल दियान गल्लां

    सुण वे महिया, सुणंदा जा वे,
    की केंदा है तेनु मेरा ए छल्ला ।
    दिलां विच ही ना रै जावे,
    थोड़ी तू वी सुण जा मेरे दिल दियां गल्लां ।।

    मेरे दिल नू तोड़ तू मूडया या ही नहीं,
    बेरुखिया तेरी मेरा दिल भूल्या ही नहीं ।
    ईक वारी आके देख ता एदा हाल,
    कल्ले बैके सुणदे हां असी अपने ही दिल दिया गल्ला ।।

    ऐहो दिल विच कदी तेरा वसेरा सी,
    एहो दिल मेरा कदी तेरा वी सी।
    मेरे दिल दी हुक बुलावे तेरा नां हर पल,
    तक दी है तेरी ही राह, ते करदी है तेरीया ही गल्ला ।।

    तेरे ज्यां मेरा दिल नई इना पक्का,
    करदा है आज वी इंतजार, क्यों की प्यार है सच्चा ।
    आजा पलट के ईक वार जद तक है सांसा,
    देर करेगा ते कौन दसेगा तेनु मेरे दिल दियां गल्ला ।।

  • एक भ्रमण स्वपन-लोक का

    कभी कल्पना की गलियों में,
    जब कवि-रूप में मैं चली ।
    फ़िर जो देखा स्वपन-लोक में ,
    उसका वर्णन करने चली ।
    सुन्दर शहर है सपनों का ,
    कुछ अनजाने कुछ अपनों का ।
    सुन्दर-सुंदर नाम सभी के,
    सबसे मैं रू-बरू मिली ।
    स्नेह- प्रेम भी दिखा वहां पर ,
    तारीफें भी लगीं भली ।
    छम – छम मेघा बरस रहे थे ।
    शीतल -शीतल पवन चली ।
    कहीं – कहीं राहें रौशन थीं,
    कहीं -कहीं अंधियारी गली ।
    कोई पुकारे नाम मेरा,
    और कोई बहन बनाए ।
    कोई भाव कहे कविता के ,
    कोई सुंदर सखी मिली ।
    वो सुहाना स्वपन ही था,
    स्वपन -लोक की थी गली ।
    ऐसे मनोहर स्थान से,
    कौन भला आना चाहे..
    सुन्दर था पर, स्वपन ही था,
    तो, मैं अपने घर लौट चली..।

  • बेरोजगारी

    सरकारें बदलती हैं यहाँ पर
    नवयुवकों को आश्वासन देती हैं
    झूठे भाषण देती हैं
    पर नौकरियां नहीं देती हैं
    हर जगह लम्बी हैं कतारें
    व्यवस्था में हैं खामियां
    बड़बड़ाते हुये घिसट जाती हैं ,देखो कितनी जिन्दगानियाँ
    आत्मनिर्भरता का स्वप्न दिखाती
    झूठी दिलासाएँ देती है
    सब कुछ है कागजों पर
    पर नौकरियां नहीं देती हैं
    बेरोजगारी का आलम है ऐसा ,लोग कितना तड़प रहे
    कल तो बस लिखते थे निबंध इस पर
    आज खुद ही इस दौर से गुजर रहे
    सरकारें अपनी महिमामण्डन का गीत गा रही
    डिग्रियां नवुवकों को बेरोजगार कह कर चिढ़ा रहीं
    अधूरे सपनों से लदे इस कंधे पर
    काम का बोझ उठा रहीं
    बेरोजगारी की इस महामारी में ,विद्वता दम तोड़ रही
    मां बाप के सपनों को ये ,पैरों तले रौंद रही
    बेशर्मी का आलम देखो
    सरकारें इसे ही राम राज्य कह रहीं
    देश के इस गम्भीर मुद्दे पर
    मीडिया भी चर्चा नहीं कर रही
    सोंचती क्यों नहीं सरकारें
    भारत कैसे विश्वशक्ति कहलायेगा
    यदि यहाँ का युवा बेरोजगार रह जायेगा

  • गजल

    हर तरफ तेरे नजारे नजर आ रहे है |
    तेरे इश्क के इशारे नजर आ रहे है |
    हुश्न ऐसा चाँद फीका हुआ जाता है |
    अंधेरों हुश्न करारे नजर आ रहे है |
    आंखो शराब का सागर लहराता है |
    हुश्न इश्क किनारे नजर आ रहे है |
    तब्बशुम लबो गुलाबी जिगर पार है |
    बिखरी जुलफ़े कारे नजर आ रहे है |
    देख जलवा ए हुश्न ईमान खतरे मे है |
    ईमान वाला हम बेचारे नजर आ रहे है|
    तुमसे पहले कोई याद न बेकरारी थी |
    शामों शहर तेरे सहारे नजर आ रहे है |
    वक्त ऐसा न गुजरा जब तेरी याद आई |
    दिल लूटा गम के मारे नजर आ रहे है |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • हे हिमाद्रि…!!

    हे हिमाद्रि !
    सदियों से जब मैं नहीं थी
    तब भी
    तुम यूँ ही अडिग खड़े थे
    और आज भी एक इंच
    तक ना हटे
    भारत का शीर्ष मुकुट बनकर
    खड़े हो तुम
    गंगा को बहाकर तुम
    हम सबका उद्धार करते हो
    ना जाने कितनी औषधियों
    को उपजाकर तुम
    प्रतिवर्ष, प्रतिफल देते हो..
    विनाशकारी ओलावृत्तियों
    भूकंप और तूफान में भी तुम जरा भी
    ना घबराये
    बर्फ की चादर ओढ़ कर
    तुमने धूप का आलोक
    बढ़ाया
    पंक्षियों, वृक्षों को अपने
    अंक में सुलाया…
    अपनी विशालकाय भुजाओं से
    सदा तुमने
    देश की रक्षा की
    ऐसे
    सर्वोत्तम, श्रेष्ठतम और निःस्वार्थ सेवा हेतु
    हे हिमाद्रि!
    मैं तुम्हें पद्मश्री,
    पद्मविभूषण और भारत रत्न जैसे पुरस्कारों से
    अलंकृत करती हूँ….

  • पिया कहल चोरन

    शिव गिरिजा संग आए घूमने
    पृथ्वी लोक में एक बार।
    कहीं पे देखा झगड़ा -झंझट
    और कहीं पे देखा प्यार।।
    पति -पत्नी की जोड़ी कोई
    झगड़ रहे थे आपस में।
    छींटाकसी और गालियों से
    माहौल गरम था आपस में।।
    सुन गिरिजा के मन में आया
    क्यों न पूछूँ महादेव से।
    पति से गाली सुनकर भी
    कोई कैसे रहती प्रेम से।।
    उऽऽमा तुम्हें क्या लेना इससे
    फिर कभी बतलाऊँगा मैं।
    घूम-घाम घर आकर गिरिजे
    ले आओ कुछ खाऊँगा मैं।।
    क्या महादेव आप भी
    भांग रोज हीं खाते हो।
    व्यंजन बहुत बने दुनिया में
    बस मुझसे भांग पिसवाते हो।।
    कुछ बाग लगाओ
    कुछ साग लगाओ
    मेरे घर में भी स्वामी अन -धन का भंडार हो ।
    करूँ रसोई अपने हाथों खुशियाँ बेशुमार हो।।
    करुँगा खेती तेरे करके अब तो भांग खिला दो।
    अमर सुधा है तेरे हाथ में बस एक घूंट पिला दो।।
    बाग लगाया साग लगाया शिवगिरिजा ने साथ में।
    मेहनत और रक्षा वो करते सदा दिन और रात में।।
    बात एक दिन हो गई ऐसी भोलेनाथ थे दूर कहीं।
    साग तोड़ने लगी पार्वती होके अकेली तभी वहीं।।
    दूर राह से चिल्लाए तब महादेव जी जोर से।
    कौन चोरनी मेरे खेत में साग चुराए भोर से।।
    खुशी के मारे पागल होके नाच रही थी पार्वती।
    ‘विनयचंद ‘की मैया मस्त हो गा रही थी पार्वती।।
    कहाँ राखूँ डलिया
    कहाँ राखूँ साग।
    पिया कहल चोरनी
    धन्य मोर भाग।।

  • जब से तुझसे मिला..

    जब से तुझसे मिला दुगनी हयात होती गई,
    मेरे लिए तू मेरी कायनात होती गई..

    यूँ रहा रंग भी अब तक की मुलाकातों का,
    के लब खामोश थे आँखों से बात होती गई..

    न कोई थकन, न ख्वाब और नींद का ही पता,
    सहर भी यूँ हुई और यूँ ही रात होती गई..

    मेरे जैसे न जाने कितने शराफत में बिके,
    हँसी खुशी यूँ ही नीलाम-ए-ज़ात होती गई..

    जब से तुझसे मिला दुगनी हयात होती गई,
    मेरे लिए तू मेरी कायनात होती गई..

    – प्रयाग

    मायने :
    हयात – ज़िन्दगी
    कायनात – दुनियाँ
    थकन – थकान
    सहर – सुबह

  • विवाहित व्यक्ति की शिकायत का अंदाज़..

    विवाहित व्यक्ति की शिकायत का अंदाज़..

    …….. हास्य- रचना..
    विवाहित व्यक्ति, पत्नी से शिकायत करे यूं,
    क्या कमाल की सब्जी बनाई है, लव यू ।
    बस, नमक थोड़ा सा ज्यादा है,
    सुनो, आज तुम्हारा क्या इरादा है ।
    मेहमान आएं तो यही सब्जी बनाना,
    बस, थोड़ा सा इसको और ज्यादा पकाना ।
    हां, प्याज़, अदरक थोड़ा कम ही मिलाना,
    उसे कौन सा बिल दे के है जाना ।
    तड़का तो कमाल का लगा है जी,
    लगता है कड़ाही का तला खराब है जी।
    जलने की गंध से, छुटकारा पाएंगे,
    कल ही एक नई कड़ाही लाएंगे ।
    अच्छा किया जो तुमने छीले ना आलू ,
    छिलके में ही तो सारे गुण बसे हैं शालू ।
    अभी फ्रिज में रख दो ये सब्जी ,
    कल फिर से खाएंगे, तुम कर लेना थोड़ी मस्ती ।
    सुनो, ये सब्जी अब कभी बनाना नहीं
    नज़र ना लग जाए तुमको कहीं ।

  • मासूम बचपन

    मासूम बचपन कुचला जा रहा
    भीतर से सहमा, बाहर से उददंड हुया
    बिखरता हुया , गैज़ेटस के तले ,
    अपनों के स्नेह-सानिध्य से वंचित
    सहमा हुया, आयायों के तले ,
    सर्वगुण- संपन्न बनाने की होड़ में
    भागता हुआ, मृग मरीचिका के तले ,
    सम्भाल लो,बचपन के खजाने को,
    मासूम बचपन कुचला जा रहा।

  • एक तरफ़ा प्यार – एक सच्चा ,अजीज़ एहसास

    वो भी क्या दौर था

    जवानी का पहला पहला साल था

    इनायत थी परवरदिगार की

    अचानक वो रूबरू हुआ था ।

    पेहेली नजर में दिल दे बैठा था में शायद

    फ़तेह पाली थी उसने मेरी रूह पे शायद

    मुद्दतो बाद आया नया एहसास था वो शायद

    एक तरफ़ा प्यार का आगाज़ हुआ था शायद ।

    याद है मुझे उस शाम का वो तूफ़ान

    हरे रंग का चूड़ीदार था उसका पेहरान

    हुई थी उससे पेहेली जान पहचान

    आने वाली जुदाई से पूरी तरहसे अनजान

    बिना वजह मुस्कुराना अब आम था

    दिल की रियासत पर उसीका नाम था

    जाहिर करदु सारे राज इब यही में चाहता था

    बया करदु मोहब्बत का पैगाम यही में सोचता था

    मगर उस रोज मेने उसे रोते हुए देखा है

    किसी की याद में सिसकते हुए देखा है

    हैरत में था के हक़ीक़त खौफनाक है

    मेरे ईद के चाँद का आसमा ही कोई और है

    कैसे कहता के तकलीफ है मुझे

    तेरे रफ़ीक से रश्क़ है मुझे

    कैसे कहता के मोहब्बत है मुझे

    एक तरफ़ा ही सही प्यार है मुझे

    दिल ही तो टुटा था , पर वो दगाबाज तो न था

    दूर ही तो गया था , पर वो बेवफा तो न था

    चाँद का आसमान बदला था , पर उसका तसव्वुर तो था

    मोहब्बत के बदले मोहब्बत मिले

    ऐसा कोई दस्तूर नहीं होता

    एक तरफ़ा प्यार में नूर न सही

    मगर वो मजबूर नहीं होता

    शायद में तुझे भूल जाऊ

    पर ये एहसास जिन्दा रहेगा

    एक तरफ़ा मेरे प्यार का

    मिजाज जिन्दा रहेगा

  • सुकूँ मिल रहा है

    अब्सार आपके
    समुन्दर हैं प्यार के,
    सुकूँ मिल रहा है,
    आपको निहार के।
    प्रातः की बेला है
    नई रोशनी है,
    आप हो बगल में
    और क्या कमी है।
    सदा पास रहना
    यूँ ही मुस्कुराना,
    यही इक्तिजा है
    यही कामना है।
    अब्सार आपके
    समुन्दर हैं प्यार के,
    सुकूँ मिल रहा है,
    आपको निहार के।

  • चुन नई राहें पथिक

    कवि कलम कहती है मत रह
    तू निराशा में पथिक,
    भूल जा बीती सभी कुछ
    चुन नई राहें पथिक।
    याद मत कर दर्द को
    या दर्द की उस बात को तू,
    भूल जा बच्चा सा बन जा
    कर नई शुरुआत तू।
    जिन्दगी है, हर तरह के
    लोग होते हैं यहाँ,
    कोई लुटाते नेह कोई
    ठेस देते हैं यहाँ।
    ध्यान रख ले वक्त भी
    रहता नहीं है एक सा,
    क्या पता राहों में कब
    मिल जाये साथी नेक सा।
    इसलिये तू मत समझ
    खुद को अकेला, ओ पथिक,
    आज दुख है तो तुझे कल
    सुख मिलेगा, ओ पथिक।

  • तेरे प्यार मे

    तेरे प्यार मे इतने
    दिवाने थे मेरे सनम
    के तेरे नाम को अपनी
    हतेली पर जबरन
    जोड चुके थे हम

    अच्छी वाली जिंदगी का ख्वाब
    तेरे संग ही बुना करते थे हम
    एक पल भी तेरे बीना
    गवरा नहीं था मुझे सनम

    कितने हसीन वो पल थे
    और कितने सुहाने वो मौसम
    जीस दिशा तेरे नैन कहे
    बस्ससस उसी और उड लिया करते थे हम

    मगर क्यू………

    मगर क्यू हुआ तेरा
    ये दिल अचानक खट्टा

    क्या अच्छा नही था अपना
    वो मधूमख्खी का मिठा छत्ता

    बीच मजधार मे छोडके
    जो जख्म तुने दिया

    बेदर्दी से तोडके सपनो की गठरी……
    ऐसे चखनाचूर किया

    क्या पाया?………
    मेरा गुनाह क्या था?
    क्या थी मेरी खताह ??????

    के मैने तुझसे प्यार किया !!!!!!
    या तेरा ऐतबार किया!!!!

    अरे जाआआआ, नहीं आतीईईई

    ऐ दगाबाज

    अब नहींईईईई आती तेरी याद के
    मेरा दर्द समजने वाला मुझे मिल गया

    ऐसे मजबूत हातो से
    मेरा हात मिला है
    के मेरी कशती अब तुफानो से पार है

    शुक्रिया……………….

    शुक्रिया अदा करना चाहता हू
    ‘तेरी बेवफाई का

    के अब मेरी कद्र करने वाला मेरे साथ है
    और तेरी हसीन यादो से भी ज्यादा
    मुझे ऊस दिवानी से प्यार है

    और तेरी हसीन यादो से भी ज्यादा
    मुझे ऊस दिवानी से प्यार है।

  • “मेरी मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों”

    मेरे होंठों की मुस्कान पर
    ना जाओ दोस्तों!
    ये तो मेरे यार की तरह फरेबी है!
    मेरे आँसू हैं मेरी असली पहचान
    जो बंद कमरे निकलते हैं
    कभी तकिये से आकर पूँछों
    हम उसे कितना भिगोते हैं!!
    सिसकियाँ सुन-सुनकर मेरे
    कमरे की दीवारों में दरारे
    आ गई हैं
    तन्हाई से पूँछों हम कितनी
    बातें करते हैं
    चाँद देखते हुए गुजार देते हैं
    रातें
    जुगनू पकड़कर हम
    मुठ्ठियों में बंद करते हैं
    सितारों से पूँछों कभी हम
    उन्हें कितनी बार गिनते हैं…
    मेरी मुस्कान पर ना जाओ दोस्तों !!

  • फिर मुस्कुरा दो

    फिर मुस्कुरा दो
    ठीक वैसे ही
    कि जैसे मुस्कुराए थे
    मिले पहली दफा जब।
    जिंदगी की आपाधापी
    चलती रहेगी अंत तक
    प्रेम को भी दें समय
    सच्चा यही है फलसफा अब।

  • कलम भी रो पड़ी…

    मेरे जीवन की कहानी
    दुःख ही रही
    आखिर क्या लिखूँ आज
    जो अभी तक मैंने लिखा नहीं…
    विधाता ने मेरे भाग्य में
    आँसुओं के सिवा कुछ
    भी लिखा नहीं…
    मेरे पतझड़ समान जीवन पर
    बरसात हमेंशा बनी रहती है
    हर पल नैन बरसते रहते हैं…
    मेरी व्यथा से
    सारे पन्ने भर गये
    कलम भी बेबस होकर
    रोने लगी
    इतना दर्द था मेरे एक-एक
    लफ्ज में…!!

  • पल दो पल

    दो पल बैठो पास हमारे
    ये पल यूँ ही गुजर जाएंगे

    दो पल का है साथ हमारा
    ये पल लौट कर ना आएंगे

    दो पल तुमसे बात तो कर लूँ
    ये पल पलकों में ही सिमट जाएंगे

    दो पल के लिए भी तुम ना आए तो
    ये पल तन्हाई में लिपट जाएंगे

    दो पल खुशी के धीरे धीरे रे मना साथी
    ये पल फिर कभी ना मिल पाएंगे।।

  • कुर्सी क्या है?

    कुर्सी क्या है ?
    कितना मुश्किल है इसे समझना।
    सब राजनीति की संरचना है,
    सुन रखे हैं पुराने वादें,
    अब नए वादों में फंसना है।
    ये तो कुर्सी का मसला है।
    कहीं सत्ता की चाल है ,
    कहीं कुर्सी का दाव है।
    फिर से,
    दो कुर्सियां आपस में जा टकराई।
    जो बच गयी ,
    वो कुर्सी फिर सत्ता में आई।
    आम जनता; आम ही रह गई।
    जो ना बदली , वो बदल ना पाई।
    अब क्या करें !
    भगवान भरोसे सब
    रख छोड़ा है ,
    सब ने कुर्सी से नाता जोड़ा हैं,
    जनकल्याण के नारे,
    किताबों में ही अच्छे लगते हैं,
    अब रोज़ यहां बड़े चाव से,
    कुर्सी के नारे लगते है।

  • “आज जरुरत है हिंदी की”

    “आज जरुरत है हिंदी की”

    आज जरुरत है हिंदी की
    हम सबको जोड़े रखने की
    शोषण – अत्याचार मिटा कर
    देश में अमन जगाने की
    आज जरुरत है हिंदी की …………….

    स्वतंत्रता के घन-घोर संघर्ष में
    हिंदी ने सबको एक सूत्र किया
    जाति और धर्मो की गलियों में भी
    इन्कलाब का उदघोष किया
    आज जरुरत है हिंदी की …………….

    हिंदी ने जीवन आभास दिया है
    भारत को नव अभिमान दिया
    उत्कृष्टता का एहसास करा कर
    संस्कारो का पाठ दिया है
    आज जरुरत है हिंदी की …………….

    आदर्शो की मिशाल यह हिंदी
    सुविचारो की सीख है हिंदी
    शांति का पैगाम यह हिंदी
    स्वर्णिम भारत का इतिहास है हिंदी
    आज जरुरत है हिंदी की ………………..

    इसकी सरलता और सहजता ने
    ज्ञान की राह को आसन किया है
    इसके सुंदर अक्षर और लिपि ने
    रचना को नव आकार दिया है
    आज जरुरत है हिंदी की …………….

    प्रगति की कठिन डगर को हिंदी ने
    सफलता का एक मार्ग दिया है
    विज्ञान और व्यापर गति को
    सतत बढ़ने का संचार दिया है
    आज जरुरत है हिंदी की …………….

    फिल्म और मनोरंजन दुनिया में
    हिंदी का ऐसा जादू चला है
    की हर विज्ञापन और काम-काज में
    हिंदी का वर्चस्व बढ़ने लगा है
    आज जरुरत है हिंदी की ………………….

    हिंदी प्रगति और उन्नति में
    हम सब का है विश्वास जरुरी
    तभी हिंदी का मान बढ़ेगा
    “प्रेम” से इसका सम्मान बढ़ेगा
    आज जरुरत है हिंदी की ………………….

    ***********
    प्रेम कुमार कुलदीप , रावतभाटा राजस्थान
    9413356561 /7023431726

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