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संपादक की पसंद

  • पिता पुत्री का संवाद

    कविता- पिता पुत्री का संवाद
    ————————————-
    तेरे खातिर दर-दर भटके,
    हर धर्मों का चौखट चुमू,
    आजा बेटी मां के सूनी आंचल में,
    मैं सीता मरियम नाम से बोलूं|

    तुमको पाने के खातिर मैं,
    कहां-कहां नहीं जाता हूं ,
    चारों धाम कि यात्रा करके,
    तू आए सब से विनती करता हूं|

    मान सरोवर बालाजी के धाम गया,
    शिर्ड़ी चौखट अंबे मां के शरण गया,
    मैहर मां कि यात्रा कर दक्षिण भारत जाता हूं,
    दानी बनकर दान करूं गाय की पूजा करता हूं|

    शर्म त्याग कर मस्जिद में भी जाता हूं,
    सर पर टोपी –
    घुटना टेकू तू आए कहता हूं,
    व्रत रख,घुटना टेके कईयो रात बिताया था,
    धर्म कार्य में दिल खोल के चंदा देता हूं|

    ऐसा कोई धर्म नहीं,
    जहां मेरी अब पहुंच नहीं,
    ऐसा कोई ईश्वर ना,
    जिससे किया फरियाद नहीं|

    चर्च मे घुटना टेक टेक,
    कई दिनों तक रोता था,
    मैं लेकर आंखों में आंसू,
    ईशा से सब बोल रहा था|

    हर मंदिर मस्जिद जा जा,
    मै सब को दुख सुनाया हूं,
    हार के आया जग से मैं,
    अब आशा तुमसे लगाया हूं|

    घर आया रोते-रोते मैं,
    आंख लगी सोने लगा,
    सपना देखा बड़ा भयंकर,
    एक लड़की हमसे बोल रही,
    एक ही काया एक ही माया-
    एक शक्ति की सृष्टि है,
    देख व्रत पूजा मैं-
    मैं तुमको पाऊं यह मेरी सौभाग्य रही|

    जग में आने से डरती हूं,
    मां की कोख में पलने से,
    भ्रूण हत्या से मर ना जाऊं,
    क्या बच पाऊंगी लड़कों से|

    देख रूप यौवन मेरा-
    कईयों पीछे चल देते,
    सारी तपस्या मिट्टी होगी-
    शायद पापा मेरे आने से|

    भारत को ना गंदा करो,
    गंदे हैं कुछ लोग यहां,
    जिस कन्या को देवी कहके पूजे,
    तीन वर्षीय बच्ची का रेप यहां|

    जाति धर्म का आतंक यहा,
    कैसे प्रेम को पाऊगी,
    हुई सयानी जब मैं पापा,
    कैसे अंतर्जातीय प्रेमी से मिलवाऊगी|

    सह न पाऊं आपकी ताना,
    क्या एसिड से बच पाऊंगी,
    जग का ताना सह लूंगी,
    बिन कान्हा ना रह पाऊंगी,
    सब कुछ अच्छा हो जाए-
    एक बात हमें सताती है,
    आधी रात को लाश जले,
    नरभक्षी से जान बचे,
    चलती बस से ,मैं भी चिल्लाऊंगी|

    यह सब कुछ तो सपना था,
    इसमें कुछ खता भी तो अपना था,
    यह संवाद सुनकर कसम लिया हूं,
    अब ना बेटी मागू ना हिम्मत था|

    कहे “ऋषि” अब जोर लगा कर,
    सब कोई बेटी को सम्मान दो,
    दहेज प्रथा अब खत्म करो,
    लड़कों को संस्कार दो|
    ———————————-
    —–ऋषि कुमार “प्रभाकर”—-

  • ओस की चंद बूंदे

    ओस की चंद बूंदे,
    इधर भी दे-दे, ए खुदा
    वीरान मेरे दिल की,
    ज़मीन पड़ी है ।।

    *****✍️गीता

  • प्रेम की बारिश

    सुनो! अपने घर की छत से देर
    तक जिस आसमान को
    निहारा करते हो न..

    उस आसमान के एक छोटे से टुकड़े में
    अपने दिल में बसे प्रेम का इक कतरा
    भर कर इन हवाओं के साथ
    मेरे पास भेज दो…

    जब वह प्रेममय बादल मुझपर बरसेगा तो
    उसकी बारिश में भीग कर फिर से हरी
    हो जायेगी मुद्दतों से बंजर पड़ी
    मेरे दिल की ज़मीं..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • कांटों सी क्यों चुभन रखूं

    कांटों सी क्यों चुभन रखूं
    जब मिट्टी में मिल जाना है,
    कभी किसी ने कभी किसी ने
    निश्चित ही है जाना है।
    फूलों सी खुशबू फैला दूं
    जिधर चलूँ उधर महका दूँ,
    प्यार का बीजारोपण करके
    नफरत सारी दूर भगा दूँ।

  • नया सवेरा नई उमंगें

    नया सवेरा नई उमंगें
    छोड़ो मन की सभी उलझनें,
    बीते बातें एक तरफ कर
    जीतो, पा लो नई मंजिलें।
    रात निराशा की थी जो भी
    बीत गई सो बात गई,
    अब वो सारा दर्द भुला दो
    गूंजे कुछ आवाज नई।
    आशा की इक नई किरण से
    ओस बूंद सुखें आखों में
    उड़ने की फिर से बेचैनी
    साफ दिखे तेरे पाँखों में।
    नया सवेरा नई उमंगें
    छोड़ो मन की सभी उलझनें,
    बीते बातें एक तरफ कर
    जीतो, पा लो नई मंजिलें।

  • विजदेव नारायण साही

    विजदेव नारायण साही जी का
    आज जन्मदिन है,
    उनको श्रद्धांजलि अर्पित कर लूं
    यह कवि का मन है।
    तीसरा सप्तक में उदित हुए,
    अंदाज कबीरी मिलता है
    मछलीघर, साखी में उनका
    बौद्धिक परिचय मिलता है।
    आलोचना क्षेत्र में ऐसी
    धमक रही जिससे उनको
    कुजात मार्क्सवादी कहते थे
    ऐसा परिचय मिलता है।
    हिन्दी कविता में ‘लघुमानव’ का
    बिंब प्रस्तुत कर जिसने
    मानव के उत्थान पतन को
    शिद्दत से महसूस किया,
    आज जन्मदिन पर उस कवि को
    श्रद्धांजलि देने का मन है,
    चार पंक्तियों की कविता से
    साही जी को आज नमन है।

  • दुर्गा भाभी – 02

    अनगिनत वर्ज़नाओ की बंदिशो में, नारी जकङी हुई थी
    क्रांति की अलख जगाने,धधकती विद्रोह में कुद पङीथी
    मुखबिर, कभी भार्या बन, वतन का कर्ज चुका रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    जीवट-भरी थी वो महिला, दुर्गा भाभी थी कहाती
    जिनके बिना अधूरी, आजादी की दासताँ रह ज़ाती
    भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव के पनाह दे रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    वीरों की फाँसी के बदले, दम्पति सर्जेट पे गोली चला दी
    इन दिलेर कारनामों ने फिरंगियों की निन्द उङा रखी थी
    अंग्रेजों के आँखो में किरकिरी बन खटक रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    अपना सर्वस्व लुटा के, कालकोठरी भी गयी वो
    पर हम कृतघ्न ऐसे, उनके अहसान भूल बैठे
    स्वतंत्रता दिला के, अंतिम क्षणों में, गुमनाम मर रही थी
    उम्मीद की लौ, जल-जल के, बुझ रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    ” श्रद्धा सुमन है ज्ञापित, उन देव तुल्य आत्मा को
    नि:स्वार्थ त्याग भावना से, जो मर मिटे थे ”

  • कोरे मेरे,सपने मेरे…..

    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२
    उम्मीदें देंगी,दस्तक उन तक,
    उम्मीदें ही रह जाएंगी….
    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे…२
    शामें देगी,उल्फत उनको,
    शामें ही रह जाएंगी…
    कोरे मेरे,सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२
    यादें लेगी, करवट उन तक,
    यादें ही रह जाएंगी…
    कोरे मेरे, सपने मेरे,
    कोरे ही रह जाएंगे….२

  • दुर्गा भाभी-01

    उम्मीद की लौ जल-जल के बुझ रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी
    परालम्बन भरे जीवन से मुक्ति हमें दिलाने
    वीर- वीरान्गनाओ की टोली कफ़न बाँध चल रही थी ।।
    दिन के उजाले में भी, तमस से हम घिरे थे
    खुद के ही घरों में, हम बंधक बन रह गये थे
    तब दुर्गा रूपी पुष्प, कौशांबी में, खिल रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी —-
    “हिंद की अग्नि” से थी जो विभूषित
    वीरता से अपनी, ब्रिटिशों को थर्राने वाली
    पराधीनता के प्रारब्ध से मुक्ति दिलाने चल रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    सहधर्मिणी वोहरा की, क्रांति का व्रत लिया था
    पग-पग पर, दुर्गा ने, साथ-साथ चल लिया था
    “इरविन” को बम से उङाने की नीति बना रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    गहनों की लालसा, हम महिलाओं की है पुरानी
    सौभाग्यचिन्ह आभूषणों को भेंट चढाने वाली
    पति को भी गंवा के, पराभव न मान ,वो रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी–
    पिस्तौलबाजी में , महारत उन्हें हासिल थी
    बम बनाने की कला में भी निपुणता लिए थी
    गृहिणी होकर भी क्रांति की अलख जगा रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
    अनगिनत वर्ज़नाओ की बंदिशो में, नारी जकङी हुई थी
    क्रांति की अलख जगाने,धधकती विद्रोह में कुद पङीथी
    मुखबिर, कभी भार्या बन, वतन का कर्ज चुका रही थी
    नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-

  • आज पा पा बोल दिया

    आठ महीने की गुड़िया ने
    आज पा पा बोल दिया
    धीरे-धीरे साफ शब्द कहकर
    वाणी को खोल दिया।
    वैसे तो गुड़िया रानी,
    अपनी भाषा में गाती है,
    कहती है कुछ, इठलाती है
    देखो तो मुस्काती है।
    लेकिन आज अचानक उसने
    पा पा मुझसे बोल दिया,
    आज अचानक साफ शब्द
    कहकर वाणी को खोल दिया।

  • हाथरस की बेटी

    कैसी है ये दरिन्दगी?
    हाथरस की बेटी संग जो
    होता है कुकर्म उसे
    जनता से छुपाया जाता है..
    मीडिया की आवाज को
    आखिर क्यों दबाया जाता है…
    पहुँचते हैं कुछ राजनीतिक दल
    राजनीतिक रोटियाँ सेंकने
    आखिर गैंग रेप को क्यों
    मुद्दा बनाया जाता है..
    कानून के रखवाले ही करते है
    कानून का भक्षण
    पीड़िता के शव को क्यों आखिर
    आधी रात जलाया जाता है..
    यह कहाँ का न्याय है
    आखिर क्या घोटाला है ?
    इतनी पुलिस थी क्यों तैनात वहाँ
    दाल में लगता कुछ काला है..
    यदि इतनी ही पुलिस सतर्क
    होती तो क्यों हाथरस की
    बेटी मरती
    आखिर किन सबूतों को
    चुपके-चुपके मिटाया जाता है…

  • सोना बाबू

    हास्य कविता,सोना बाबू
    ————————-
    रात रात जग के हम
    पढ़ाई करते थे|
    मेरे पड़ोसी-
    फोन पकड़ के चुमा करते थे|

    आया समय जब पेपर का,
    वो रोया करते थे|
    सोना बाबू फेल हुए,
    बाबू लड़की से-
    कोचिंग करते थे|

    रात रात जागकर,
    वो उपदेश देते थे,
    चटनी खा के जीवन गुजरे,
    लाखों में वह बात करते थे|

    बड़े घरे के बिगड़े बच्चे,
    पैसा खूब उड़ाते हैं|
    खैनी गुटखा सिगरेट पीते-
    रोज सिनेमा रूम पे आके पार्टी करते हैं|

    मजदूर किसान के बच्चे तुम,
    इनकी नकल क्यों करते हो,
    इनके घर तो धन का खजाना,
    इनके संग क्यों रहते हो|

    करो पढ़ाई मन से यारों ,
    या घर आकर बैठो तुम,
    बन जा काबिल दुआ है मेरी,
    ले छोरी फिर बैठो तुम|

    मात पिता और –
    कुल का गौरव बन जाओ,
    इतिहास रचो और बनो उदाहरण,
    ऐसा जीते जी कुछ कर जाओ|
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
    ——ऋषि कुमार “प्रभाकर”——–

  • किससे शिकवा करें..

    ‘किससे शिकवा करें दामन ये चाक होना था,
    मगर करते भी क्या, ये इत्तेफाक होना था..

    गमों की भीड़ हमारी कश्मकश में उलझी रही,
    तय हुआ यूँ हमें गम-ए-फिराक होना था..

    जिसे हवाओं से हमने कभी न घिरने दिया,
    उसके तूफान की हमें खुराक होना था..

    हवा मिलती रही रह-रह के बुझती आतिश को,
    मेरे ही सामने घर मेरा खाक होना था..

    शहर से दूर किया दफ्न ज़माने ने हमें,
    हमारे साथ ही ये भी मज़ाक होना था..

    किससे शिकवा करें दामन ये चाक होना था,
    मगर करते भी क्या, ये इत्तेफाक होना था..’

    – प्रयाग धर्मानी

    मायने :
    शिकवा – शिकायत
    चाक – फटा हुआ
    कश्मकश – असमंजस
    गम-ए-फिराक – जुदाई का गम
    आतिश – आग

  • भोजपुरी कविता- राजनीति होखे के चाही |

    भोजपुरी कविता- राजनीति होखे के चाही |
    केहु मरे चाहे जिये राजनीति होखे के चाही |
    केहु आबरू लूट जाये राजनीति होखे के चाही |

    औरत ना ई खिलौना हई जब चाहे खेल ला |
    जान ना जाए केहु मऊत के मुंह धकेल दा |
    इनकर इज्जत जाये राजनीति होखे के चाही |

    बेटी भईली का भइल कुल क मर्यादा बाड़ी |
    माई बाप क दुलार पूचकार उ जयादा बाड़ी |
    नाम नीलाम हो जाये राजनीति होखे के चाही |

    समाज आज कहा से कहा आ गईल भईया |
    देवी जस नारी दुशमन महा हो गईल दईया |
    दूरदसा नारी हो जाये राजनीति होखे के चाही |

    खिसकल जमीन आपन पाये के मौका मिलल |
    नाम मीडिया मे खूब चमकावे के चौका लगल |
    न्याय नारी उफर जाय राजनीति होखे के चाही |

    बलात्कार भइल की अत्याचार पहीले जान ला |
    भड़के ना कही दंगा जात पांत बात मान ला |
    देश संपत्ति लूटे चाहे टूटे राजनीति होखे के चाही |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • सच सदा से कड़वा होता है

    सच बोलने को हिम्मत चाहिए
    मीठा झूठ सभी को भाता है
    सच सदा से कड़वा होता है
    मधुमेह वालों को भी न सुहाता है
    तब रावण एक अकेला था
    हर घर अब रावण का मेला है
    पागल खाने में भी जगह कहां
    जहां मुफ्त में भोजन मिलता है
    मुश्किल में हंसने वालों के लिए
    इक जगह वहीं बस दिखता है
    सुख मिलने पर भी लोग हंसते कहां
    याद दिलाते तो कष्ट से हो पाता है
    मुस्कुराने में जो भी मेहनत लगती
    चेहरे पर स्पष्ट नजर आ जाता है

  • आशीष देने वाले

    बस-दस पंद्रह साल में,
    इस दुनियां के माया – जाल से,
    एक पीढ़ी विदा हो जाएगी
    अफसोस ,जुदा हो जाएगी
    इस पीढ़ी के लोग ही कुछ अलग हैं
    रात को जल्दी सोने वाले,
    भोर होते ही घूमने वाले
    आंगन के पौधों को पानी देते,
    बच्चों के दादाजी-नानाजी कहलाते
    स्नान कर करते हैैं पूजा
    उनके जैसा नहीं कोई दूजा
    मंदिर भी जाते हर रोज़
    वो चले गए तो,
    कहां से लाएंगे उनको खोज
    पुराने छोटे से फोन से ही,
    बात करें गौर से
    मित्रों, रिश्तेदारों के नंबर भी,
    डायरी में लिखते, आज के दौर में
    आते-जाते को नमस्ते करें झुका कर शीश
    छोटों को हरदम, देते हैं आशीष
    गर्मियों में अचार,पापड़ भी बनाते,
    सदा देसी टमाटर और ताजे फल ही लाते
    उनका अपना अनोखा सा संसार है,
    उनके पास औषधियों और
    तजुर्बों की भरमार है
    हमें बहुत करना है इनका सम्मान,
    ना जानें कब चले जाएं,
    छोड़ कर ये जहान ।।

    *****✍️गीता

  • खुश रहे मन

    मत हिलो देखकर
    दूजे की चकाचौंध को तुम
    जो भी है पास अपने
    खुश रहो, संतुष्टि पाओ।
    पेट भरने को भोजन
    और वस्त्र हों ढके तन
    सिर छुपाने को छोटा सा
    भवन हो खुश रहे मन।
    इससे ज्यादा, अधिक इससे
    करेगा मानसिक विचलन,
    करो मेहनत , मिले जो भी
    उसी से खुश रखो मन।

  • पत्थर की आंख

    तंग आ चुके दुनियां के ताने से,
    उस बेचारे काने ने
    पत्थर की आंख लगवाली,
    नज़र तो फ़िर भी नहीं आया
    मगर दुनियां की नज़र बदल डाली ।।

    *****✍️गीता

  • कॉलेज के दिन…!!

    तुम्हे याद हैं वो लम्हे
    जब हम साथ पढ़ा करते थे
    तुम्हारी कॉपी से देखकर
    परीक्षा में लिखा करते थे
    तुम मुझे कॉफी के लिए
    रोज़ पूंछते थे और हम
    मना कर दिया करते थे
    आते थे कभी सज-धज कर
    तुम हमारे सामने तो हम
    तुम्हारा मजाक
    उड़ा दिया करते थे
    कभी लड़ते थे तुमसे
    आँखें दिखाकर
    तो कभी
    परदे के पीछे छुप जाया करते थे
    अब कहाँ रहे
    वो कॉलेज के दिन
    जब हम मुस्कुराया करते थे !!

  • राष्ट्रपिता:-महात्मा गाँधी

    दुबली-पतली कद काठी थी
    धोती पहनकर चलते थे
    आँखों में थे अनमोल सपने
    ऐनक लगाकर चलते थे
    राष्ट्रपिता थे प्यारे बापू
    सबकी आँख के तारे थे
    अंग्रेजों के छक्के छूटे
    जब वह सत्याग्रह पर
    जाते थे
    पूरा देश था डटा हुआ
    गाँधी जी के साथ खड़ा
    हल्की-सी मुस्कान से वह
    दुश्मन को मार गिराते थे
    ना हथियार उठाते थे
    अहिंसा के पुजारी थे
    जब चलते थे वह
    तन कर तो
    दिल दुश्मन के हिल जाते थे..

  • अचरज है कैसे

    अचरज में हूं मैं न जाने कब से

    भारी भरकम आदमी की बोली हल्की कैसे
    हल्के आदमी की बातों में वजन है कैसे

    चींटियां आंख बिन चढ़ती दुर्गम पहाड़ों पर
    आंखवालों की कमर टूटती बिस्तर पर कैसे

    सुंदरता झुकाती है अकड़ वाले पहाड़ों को भी
    पहाड़ी तन निर्मित न करते इक फूल भी कैसे

    दूध दही की नदियां बहाते हैं जो नित निज घर
    फीके पेय की घूंट को हर दिन गले लगाते कैसे

    बड़ों की सीख पल भर भी न सिर टिकने दिया
    बच्चों को वही सिखलाते हुए न शरमाते कैसे

    जिंदगी को खुशी की इक बुंद भी तोहफे में न दी
    औरों की जीवन की खुशियों को खा जाते कैसे

  • मिठास दूँगा

    शब्द हूँ
    भुने चने सा
    सूखा सा,
    आपकी रसना के रस
    में मिलकर मिठास दूँगा।
    कह डालो कि
    मैं भी आपका हूँ
    फिर मैं भी
    अपनेपन का एहसास दूँगा।

  • वन-सम्पदा

    वृक्षों को काट-काट कर,
    इति करे सब वन
    प्रकृति का सर्वनाश किया है,
    कमाने को केवल कुछ धन।
    दोहन कर-कर प्रकृति का भी,
    चैन मनुज को ना आया
    पशु , पक्षियों को बेघर किया है,
    लालच वृद्धि करता प्रति क्षण।
    प्रतिकार प्रकृति भी लेती है ,
    फ़िर शुद्ध पवन कम देती है
    फ़िर भी मानव को चैन नहीं,
    काट रहा है फिर भी वन
    हे मनुज तेरी ही हानि हो रही,
    लगा लगाम लालच पर अपने
    अब भी करदे ये सब बंद ,
    अब भी करदे ये सब बंद ।।

    *****✍️गीता*****

  • मृगतृष्णा

    रेत सी है अपनी ज़िन्दगी
    रेगिस्तान है ये दुनिया,
    रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी
    कभी कुछ पैरों के निशान बनाती
    और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती,
    कांटों को आसानी से पनाह देती
    फूलों को ये रेत हमेशा नकार देती,
    जो रह सकता है प्यासा उसे रखती,
    बाकियों को मृगतृष्णा में उलझा देती।
    दूर तक भी कोई नहीं नजर आता
    रेत ही रेत में सब ओझल हो जाता,
    प्यास से जब मन बावला होता है,
    हर मृगतृष्णा उसे अपना पराव लगता है,
    और एक कोने से दूसरे कोने भागते हुए
    रेत में ही रेत दफन हो जाता है,
    रेगिस्तान राज यूं ही चलता है
    हर रोज़ कई कहानियों को रेत में कैद कर
    अपने राज्य की शान बनाए रखता है।
    ©अनुपम मिश्र

  • समन्दर

    समन्दर का वो किनारा साथी है हमारा,
    जहां बैठ घंटों है वक्त हमने गुजारा,
    जैसे कि उनसे सदियों से नाता हो हमारा,
    बहुत बार तो मिलना नहीं हुआ है
    पर एक अनोखा रिश्ता सा कायम रहा है,
    मिलन का अनुभव हर बार उम्दा ही रहा है;

    उसकी लहरे खूब बतियाती हैं पास आके,
    कहती हैं, “आना जाना तो लगा रहेगा यूं ही,
    वक्त भी चलता रहेगा हर आने जाने के साथ ही,
    फिर भी, हर गमन पर दुख होगा उतना ही
    जितना की आगमन पर अपरिमित खुशी होगी,”
    इस सांसारिक नियम का अलग ही आनंद है,
    जिसमें जीवन के हर रस रंग की अनुभूति होती है,
    वो रंग आसमान के रंग से साफ़ या दुधीले,
    लाल, नारंगी, सतरंगी, बदरंगी, या नीले
    और कभी बादलों से घिरे काले रंग जैसे ही होते हैं,
    जिन रंगों में जीवन के अलग अलग आयाम मिलते हैं,
    वो दिल में आस व उमंगों को गतिमान रखते हैं,
    येे उमंगे अग्नि के उस गोले सरीखे होते हैं
    जो उसी आंधी से धधक उठते हैं
    जो कभी उन्हें बुझा दिया करती हैं;
    आरजू है बस इतनी सी,
    इन लहरों की तरह ही गतिमान रहूं हमेशा ही,
    चाहे आंधी आए कैसी भी।
    ©अनुपम मिश्र

  • पिंजरे में कैद पंछी

    किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह
    जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है,
    सामने खुली चांदनी नजर आती है
    पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती,
    कुछ रस्मों की दीवारें हैं
    कुछ मर्यादाओं की रेखाएं हैं
    और कुछ ऊसूलों की सलाखें हैं
    जिनको तोड़कर जाने की उम्मीद नहीं
    बस देखकर सुकून मिले अब वही सही,
    ऐसा नहीं कि भीतर जोश या हिम्मत नहीं
    पर यह सोचकर हूं मन को बांध लेती
    कि जब इस पंछी का अंत निश्चित है ही
    फिर क्यूं इसे खुले में छोड़ना कभी,
    येे बावला तो देख लेता है कभी भी कुछ भी
    और चाहता है कि सब मिल जाए उसे यहीं,
    बेहतर है कि ये पिंजरे में बंद रहे यूं ही
    पता नहीं फट पड़े कब कौन सी ज्वालामुखी।
    ©अनुपम मिश्र

  • मैं हिन्दी हूं

    मैं हिन्दी हूं
    भारत की भक्त हिन्दी,
    संस्कृत मेरी जननी
    जिसमें अंकित है संस्कृति,
    उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी,
    उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी,
    उर्दू, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी,
    हरियाणवी, गढ़वाली व दक्खिनी,
    पर बस गई सब अपनी नगर में ही,
    मैं ही कहीं एक जगह न बैठी रही,
    भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक चलती रही,
    देश को एक कोने से दूसरे तक जोड़ती रही,
    प्रेम के पैगाम अपने संग लेकर चलती रही,
    सब अपनाते गए मुझे, अपने हिसाब से बदलते रहे,
    मैं हर भाषा को खुद में ढालकर खुद को निखारती रही,
    हर प्रान्त से कुछ लेकर उसे देश को समर्पित करती रही,
    खड़ी बोली से शुरू होकर अब तक उसी प्रयत्न में रही,
    कि भारतवर्ष को एक लड़ी में पिड़ो कर बढ़ती रहूं,
    हजारों वर्ष का सफ़र मैं यहां तय कर चुकी
    पर अफसोस की मेरी इज्जत मेरे अपनों ने ही नीलाम की,
    न जाने क्यूं मेरे साथ से उनका ओहदा कम होने लगा,
    मुझे एक एक कर कितनों ने ही त्याग दिया,
    मेरी जगह अपने शोषकों की भाषा तक को अपना लिया,
    मुझे अपनाने में उन्हें शायद गुलामी का बोझ याद आ गया
    तभी तो दो सौ वर्ष के उन अत्याचारी साहबों को अपना बना लिया,
    और मुझे अपनी जिंदगी से दरकिनार कर दिया,
    अपने ही देश में आज मेरी दशा गुलाम भारत सा कर दिया,
    देशी को फ्लॉप और विदेशी को हीरो बना दिया,
    अब भी एक आस है, कोई तो मेरा सही परिचय दे दे,
    नई पीढ़ी को कोई तो मेरा इतिहास भी बता दे,
    मुझे कफ़न ओढ़ाने से पहले कोई
    नई पीढ़ी को मेरा असली चेहरा तो दिखा दे,
    जो आज मुझे बकवास समझ कर मुझे देखता भी नहीं,
    मेरी रचनायें तो दूर, मेरी लिपि तक को समझता भी नहीं!
    ©अनुपम मिश्र

  • पाखंड

    अजीब नौटंकी लगा रखी है जमाने ने
    मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं
    और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं;
    गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से
    अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे खूब वे
    पर जब खुद अंधे हुए धूल में चलने से
    अपने आप को गमगीन बेचारा बताते रहे।
    ©अनुपम मिश्र

  • दर्द का उम्र

    जीवन के इस सफर में टूटी हूं कई बार,
    घायल होकर दर्द में तड़पी हूं कई बार,
    पर हर दर्द का अपना हिसाब रहा,
    कोई बस तन पर एक दाग बन जमा रहा,
    और कोई टीस बनकर हृदय में चुभता रहा;
    कभी किसी पत्थर से हुई हमारी टकरार
    कभी घायल हुई लगके चाकू की नुकीली धार,
    गिरी हूं कई बार सीखते हुए सायकल सवार
    छलनी हुआ था बदन जब बसा था मेरा संसार,
    पर इन क्षणिक दर्दों का नहीं कोई भार,
    इनसे तो आई थी जीवन में हमारे बहार,
    उमर पड़ा था जैसे हर तरफ प्यार ही प्यार,
    पर कुछ दर्द ऐसे मिले जिनमें न हुआ कोई प्रहार
    और न हुआ कोई जख्म भीतर या बाहर,
    बस उनका हम पर कुछ ऐसा हुआ असर,
    कि हम टूट कर गए कई टुकड़ों में बिखर
    और जब उठ खड़े हुए होश संभालकर
    तब हुई इस बात की हमें खबर
    कि उन चोटों की कोई खास न रही उम्र
    जो सिर्फ जिश्म पर जख्म बन कर लगे
    पर कुछ शब्द बाण और कुछ मौन बाण,
    इतने नुकीले निकले कि दर्द अब भी ताज़ा है,
    उन चोटों की उम्र मेरी उम्र से ज्यादा है!
    ©अनुपम मिश्र

  • संभव-असंभव

    सोच रही हूँ डालने को बालू समंदर में

    ताकि राह खुल जाये मुसाफिर की;

    अजीब दास्ता है ये, हो सकता नहीं ये संभव,

    पर है ये दुनिया असंभव को संभव करने वाली,

    हर सपने की है इसके पास चाभी निराली,

    लोगों ने तो चाँद मंगल तक की राह बना ली

    तो अब तो बस सपने देखने की ही थी देरी,

    क्या पता कब कौन सी चाभी हाथ लग जाये!

    ©अनुपम मिश्र

  • अधूरापन

    पूर्ण समृद्ध न तो मैं हूं और न ही कोई अन्य,

    सर्वज्ञ तो इस जहाँ में कोई भी नहीं,
    हर किसी में कुछ न कुछ रिक्तता है जैसे,
    किसी भी ह्रदय का ज्ञान सम्पूर्ण नहीं,
    और वही खालीपन उसे प्रेम करना सिखाता है;
    उस रिक्तता की पूर्ति को वो दिन रात भटकता है,
    जो उस खालीपन को दूर करता सा लगता है,
    हृदय उस साधन में तल्लीन सा हो जाता है,
    और उसे अपना अभिन्न हिस्सा मान लेता है;
    इस दीवानगी में कई बार ऐसा भी होता है,
    मरीचिका के पीछे ह्रदय स्वयं स्वत्व को भूल जाता है,
    आजीवन उससे जुड़ने की आस में भटकता रहता है,
    और अधूरे प्रेम के प्यास से दम तोड़ देता है,
    जो ह्रदय की गति को बाधित करे वो प्रेम कैसा!

    यदि यही सत्य है कि पूर्ण इस जहां में कोई नहीं
    फिर अपने अधूरेपन को क्यों बोझ मान जीए,
    खेतों में पलने वालों को पेट की भूख है,
    भरे हुए पेटों को स्वर्ण महलों की भूख है,
    महलों में रहने वालों को शांति की भूख है,
    और शांति बेचारी हर जगह होकर भी
    हर किसी से अजनबी बन कर बैठी है,
    जिस दिन अपने अधूरेपन को स्वीकार लिया,
    उसी दिन सुख शांति से परिचय तय है,
    तो क्यूं न इस अपूर्णता को संजोए हम कहीं,
    और एक दूजे को पूर्ण करे हम बस यूं ही,
    चाहत होती है बस सबसे वह वही सुनने की,
    पर असल में आगे बढ़ाता है हमे वही,
    जो अधूरेपन से परिचय कराये कभी।
    ©अनुपम मिश्र

  • पल दो पल के शायर

    हैं बहुत यहाँ एक से बढ़कर एक,
    है काबिलों की बस्ती ये जहाँ ,
    हैं कितने ही माहिर आये यहाँ
    और आकर चले गए न जाने कहाँ,
    कोई रहा कहाँ एक वक़्त जीकर यहाँ,
    हर किसीको आकर फिर जाना ही पड़ा,
    चाहे वो कितना भी माहिर क्यों न रहा!

    पल दो पल के शायर
    दो शब्द सुनते हैं
    और दो शब्द कह जाते हैं
    पर उन्हीं चंद शब्दों में
    ज़िंदगी के कई मायने दे जाते हैं,
    वो किसी पुष्प का निराला रंग हो
    या अनछुआ सा कोई रस या गंध हो,
    चंद शब्दों में वो कितना कुछ पिड़ो जाते हैं!

    © अनुपम मिश्र

  • समानता क्या है?

    धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है,

    अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है,

    कौन किससे भला समान है?

    समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है

    छोटी सी झोपड़ी हो या ऊंची महल अटारी

    नहीं वो किसी समानता के अधिकारी

    पर दोनो का एक ही प्रयोजन है,

    अब भला नर हो या नारी

    दोनो की अपनी अपनी जिम्मेदारी,

    इसमें समानता असामनता की बात क्यूं आई?

    दोनो मिलकर ही तो सजाते जग की क्यारी

    अब जलाए अग्नि या बुझाए जल,

    जलाए जल या बुझाए अग्नि

    सबकी करनी अपनी अपनी,

    इससे क्या फर्क पड़ता है कि

    वो कौन से जिस्म में रहता है

    फल तो सब कर्मों के ही भोगता है।

    ©अनुपम मिश्र

  • शुरुआत जरूरी है

    हो चाहे कैसी भी घड़ी,
    आंधी तूफ़ान की लगी हो लड़ी,
    या मन को झुलसा रही हो अग्नि,
    डर हो यदि आगे हार जाने की,
    या फिर अपना सब खो देने की,
    शुरुआत जरूरी है;

    महल खड़ी करने को,
    नीव बेहद जरूरी है,
    मीठे फल खाने को
    बीज बोना जरूरी है,
    अँधेरे को बुझाने को,
    लौ जलाना जरूरी है!

    बस पहला कदम जो ले लिए
    आगे कदम बढ़ते जायेंगे
    हर कांटे पत्थर को पार करते जायेंगे,
    अँधेरे राहों में भी रौशनी धुंध लेंगे,
    बस वो पहला कदम जरूरी है
    वो शुरुआत जरूरी है!

    ©अनुपम मिश्र

  • निर्भया कितनी दफा रोई…

    निर्भया कितनी दफा रोई
    दरिंदों की पनाहों में
    सिसकता ही रहा यौवन
    वासना की बाँहों में
    तब तलक रूठेगा बचपन
    पूँछती है यही नारी
    मरेगी कब तलक बेटी
    बचेगा कब तलक अत्याचारी
    पुरुष की बन के कठपुतली
    नाचती क्यों है हर औरत
    उसी के आँचल में है जन्नत
    और कदमों तले शोहरत
    उसके आगे तो ईश्वर भी
    सिर झुकाता है
    नारी ही जने पुरुष को
    वह ये क्यों भूल जाता है
    तो आखिर क्यों उसी कोख को
    कलंकित करता है कोई
    यही सोंचकर प्रज्ञा’ हाय !
    कितनी दफा रोई..

  • तो मैं भी कवि नहीं

    दो पंक्तियाँ तुम पर न लिख पाऊं
    तो मैं भी कवि नहीं,
    स्वप्न तक शायरी न पहुंचाऊं
    तो मैं भी कवि नहीं।
    जब कभी मन टूट कर
    बिखरा हुआ हो, दर्द हो,
    दर्द तक मलहम न पहुंचाऊं
    तो मैं भी कवि नहीं।

  • हंसते हो महीने में

    मनोरम रात है
    बिखरी हुई है चांदनी
    तुम्हारी मुस्कुराहट सी
    दिखाई दे रही है चांदनी।
    जिस तरह चाँद खिलता है
    कभी कुछ दिन महीने में,
    उसी की भांति तुम भी हो
    जो हंसते हो महीने में,
    देता है जब मालिक कभी
    वेतन महीने में।

  • हम वहीं रह जाते हैं

    दिन गुजर जाते हैं
    हम वहीं रह जाते हैं
    नये दिनों की तरह
    कहां नये हो पाते है

    पुराने जख्म मिले कहीं
    क्यों न भुला पाते हैं
    आये नये जो पल हाथ
    बीती बातों को दुहराते हैं

    आशा रख कर औरों से
    हर दिन क्यूं जलते जाते हैं
    भूत के बोए बबूल को भूल
    आम की चाहत किये जाते हैं

    आंखें बाहर को खुलती है
    स्वयं का अनदेखा करती है
    विश्वास खुद पे होना चाहिए
    औरों पे भरोसा क्यूं करती है

    आज जो अहं में डूबे हैं
    कल पर अहं को झेलेंगे
    जो फसल आज बोयेंगे
    कल उसी स्वाद मजे लेंगे

    जिंदगी पृथ्वी की तरह पाक
    जो न करती कहीं ताक झांक
    इसका सदा अटल स्वभाव है
    न किसी के लिए भेदभाव है

  • जब अंत समय नज़दीक हो

    जब मेरा अंत समय है नज़दीक हो,
    तब आँखों में छवि मेरे बच्चों की हो,
    और मेरे हाथों में हाथ तेरा हो…

    आयी थी जिस क़दर वद्दू बनकर इस घर में,
    उसी जोड़े में विदा करो।
    जितनी उमंगों से लाए थे मुझे,
    उतने ही दुलार के साथ विदा करो।
    जब वो मेरा अंत समय नज़दीक हो…

    जिनके प्रेम की पात्र बनी मैं,
    उन लोगो से माँगू क्षमा।
    कि कोई दूसरा न क़रीब हो,
    बस तू ही मेरे साथ हो
    मेरी आँखों में छवि मेरे बच्चों की हो
    हाथों में हाथ दे रहा हो।

    उन मासूमों की अठखेलियों को,
    बड़ों के दिए हुए दुलार को,
    समेट ले जाऊँ वहीं।
    तेरे साथ बिताया वह हर लम्हा
    उस अंतिम क्षण में फिर से जी जाऊँ मैं..

    मेरा अंत समय जब नज़दीक हो।
    HEMANKUR❤️

  • कविता- शास्त्री गांधी से सीख लो |

    कविता- शास्त्री गांधी से सीख लो |
    लड़ा जाता कैसे जंगे आजादी गांधी से सीख लो |
    सत्य अहिंसा की कैसी आजादी गांधी से सीख लो |
    छोड़ धन दौलत रूप संत का बना लिया उसने |
    कैसे हो बुलंद हौसला सबका गांधी से सीख लो |
    साबरमती का संत कपड़ा सूत चरखा चलाया |
    राम रहीम एक है गाया कैसे गांधी से सीख लो |
    जाड़ा धूप गरमी सब पहन धोती सहता रहा |
    लड़ा कैसे अंग्रेज़ो एक संत गांधी से सीख लो |
    अवतरित हुये आज सादगी के प्रतीक शास्त्री |
    थर्राया दुशमनों घर घुस कैसे शास्त्री से सीख लो |
    हुई अचानक मौत शास्त्री देश बड़ा मर्माहत हुआ|
    खड़ा पंक्ति पुत्र फार्म भरा शास्त्री से सीख लो |
    रह प्रधान मंत्री शास्त्री ने पद न दुर्पयोग किया |
    गुजारा तंख्वाह पर कैसे सब शास्त्री से सीख लो |
    गांधी शास्त्री भारत के गौरव संत महापुरुष हुये |
    बढ़ाया कैसे भाल भारत गांधी शास्त्री से सीख लो |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • नारी हूँ मैं…!!

    पापा की प्यारी हूँ मैं
    फूलों की क्यारी हूँ मैं
    पर सबसे पहले नारी हूँ मैं…

    अहिल्या हूँ मैं सीता हूँ मैं
    पवित्र पावन गीता हूँ मैं
    कभी शेरनी तो कभी चीता हूँ मैं
    पर सबसे पहले नारी हूँ मैं…

    उम्मीदों का सावन हूँ मैं
    नव सुतों का जीवन हूँ मैं
    मनमोहिनी और मनभावन हूँ मैं
    पर सबसे पहले नारी हूँ मैं…

    सृष्टि की वाहक हूँ मैं
    कुटुंब की संचालक हूँ मैं
    दैवीय आहट हूँ मैं
    पर सबसे पहले नारी हूँ मैं…

    भावों की अनुपम माला हूँ मैं
    कभी चंडी हूँ कभी ज्वाला हूँ मैं
    प्रकृति की सुकोमल बाला हूँ मैं
    पर सबसे पहले नारी हूँ मैं…

  • वो मोती

    अचरज भरा आकाश है
    कहीं धूप है कहीं छांव है
    आसमान की चादर में
    सितारों के बूटे हैं
    बादलों के घोड़े हैं
    जो दौड़ते हैं इधर-उधर
    जुगनू भी अपनी प्रेयसी को
    ढूंढते हैं रात भर
    चाँदनी है छितरी हुई
    सबकी छतों पर इस तरह
    रजत पिघलाकर किसी ने
    फैला दिया हो जैसे हर जगह…

  • ये मंच बड़ा मन-भावन है..

    दूर – दूर से कवि पधारे,
    कोई पर्वतीय, कोई मैदानों से ।
    यहां पे आकर , धूम मचा कर,
    लिखें बड़े अरमानों से ।
    मैं भी आई, नाम है गीता ,
    लिख दी मैनें, भी कुछ कविता ।
    सब का ही स्नेह मिला,
    कुछ प्रमाण-पत्र मिले सम्मानों के ।
    सावन मंच को नमस्कार है ,
    कोटि-कोटि अभिवादन है ।
    गागर में सागर समेटे ,
    ये मंच बड़ा मन-भावन है..
    हां , ये तो सावन है ।
    जी हां, ये सावन है ।।
    *****✍️गीता*****

  • अचरज भरा आकाश

    अचरज भरा आकाश है
    कहीं धूप है कहीं छांव है
    आसमान की चादर में
    सितारों के बूटे हैं
    बादलों के घोड़े हैं
    जो दौड़ते हैं इधर-उधर
    जुगनू भी अपनी प्रेयसी को
    ढूंढते हैं रात भर
    चाँदनी है छितरी हुई
    सबकी छतों पर इस तरह
    रजत पिघलाकर किसी ने
    फैला दिया हो जैसे हर जगह…

  • ‘मधुमास का आगमन’

    नीले आसमान पर
    सूरज की उपस्थिति
    सौंदर्य की पराकाष्ठा
    किरणों की लालिमा से
    चमक रहा है पृथ्वी का
    हर कण हर क्षण….

    पत्तियों की सरसराहट से
    मधुमास का सुंदर आगमन
    चमन की सुगंध से
    महक रहा है सारा मन-गगन…

    स्थिति हृदय की आज है
    मनचली तितलियों की तरह
    उड़ रहें हैं पक्षी गगन में
    मेरे अरमानों की तरह…!!

  • “सावन” मंच हमरा

    विविध काव्यों से सजा है न्यारा
    कविवर ने है जिसे संवारा
    समालोचना की मुखरता से
    मिलकर सबने जिसे निखारा
    छन्द- अलंकार की बहती धारा
    हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा।
    बनी एक पहचान हमारी
    खुद से हुई मुलाकात हमारी
    जहाँ अपने ही अनछुए पहलू को
    जाना, समझा और संवारा
    हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा ।
    भावों की बहती है अविरल सरिता
    विविध उदगारों से बनती है कविता
    हर मुद्दे पे उठते बोल यहाँ पर
    हर क्षेत्र में जिसने किया इशारा
    हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा ।

  • तुम्हारा ख़याल आया हो

    कोई ख्वाहिश कहाँ
    कोई पछतावा भी नहीं
    पतझङ-सी है वीरानी
    बसंत आया ही नहीं
    दूर तक फैला है सूनापन
    जैसे शून्य निकल आया हो
    हाँ, कुछ इस तरह
    तेरा ख़याल आया हो ।
    काली निशा की छाया में
    अर्णव में खामोशी छायी है
    पर उसके तलचर में
    सुनामी की तरंगों ने
    जैसे पनाह पायी हो
    हाँ, कुछ इस तरह
    तेरा खयाल आया हो ।

  • प्यार के दो मीठे बोल

    कुछ वक्त की ज़िन्दगी है,
    फ़िर तो हमको है जाना
    कुछ समझौते भी हुए यहां,
    कुछ उपहार मिले माना
    खाली हाथ ही तो आए थे,
    खाली हाथ ही है जाना
    ये तो निर्भर, करता है हम पर ,
    कैसे करेगा फ़िर याद हमें ज़माना
    बस प्यार के दो मीठे,
    बोल ही रह जाते हैं..
    यही आज इस दिल को है बताना
    इसीलिए “गीता” गाए ये गाना..
    बस , प्यार के दो मीठे
    बोलों का रह जाना..
    बस, यही है मेरी ,
    ज़िन्दगी का अफ़साना..

    *****✍️गीता*****

  • निष्प्राण

    तीर, तलवार और तंज की धार से,
    जब निष्प्राण हुआ शरीर
    अनुप्रास ही दिखे कवि को,
    यहां घायल पड़ा शरीर ।।

    *****✍️गीता*****

  • पैनी निगाहों में

    ओस की बूंद अब तुम भी
    न दो यूँ ठेस पांवों में
    अभी तो चुभ रहे हैं हम
    कई पैनी निगाहों में।

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