कविता- पिता पुत्री का संवाद ————————————- तेरे खातिर दर-दर भटके, हर धर्मों का चौखट चुमू, आजा बेटी मां के सूनी आंचल में, मैं सीता मरियम नाम से बोलूं| तुमको पाने के खातिर मैं, कहां-कहां नहीं […]
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कविता- पिता पुत्री का संवाद ————————————- तेरे खातिर दर-दर भटके, हर धर्मों का चौखट चुमू, आजा बेटी मां के सूनी आंचल में, मैं सीता मरियम नाम से बोलूं| तुमको पाने के खातिर मैं, कहां-कहां नहीं […]
ओस की चंद बूंदे, इधर भी दे-दे, ए खुदा वीरान मेरे दिल की, ज़मीन पड़ी है ।। *****✍️गीता
सुनो! अपने घर की छत से देर तक जिस आसमान को निहारा करते हो न.. उस आसमान के एक छोटे से टुकड़े में अपने दिल में बसे प्रेम का इक कतरा भर कर इन हवाओं […]
कांटों सी क्यों चुभन रखूं जब मिट्टी में मिल जाना है, कभी किसी ने कभी किसी ने निश्चित ही है जाना है। फूलों सी खुशबू फैला दूं जिधर चलूँ उधर महका दूँ, प्यार का बीजारोपण […]
नया सवेरा नई उमंगें छोड़ो मन की सभी उलझनें, बीते बातें एक तरफ कर जीतो, पा लो नई मंजिलें। रात निराशा की थी जो भी बीत गई सो बात गई, अब वो सारा दर्द भुला […]
विजदेव नारायण साही जी का आज जन्मदिन है, उनको श्रद्धांजलि अर्पित कर लूं यह कवि का मन है। तीसरा सप्तक में उदित हुए, अंदाज कबीरी मिलता है मछलीघर, साखी में उनका बौद्धिक परिचय मिलता है। […]
अनगिनत वर्ज़नाओ की बंदिशो में, नारी जकङी हुई थी क्रांति की अलख जगाने,धधकती विद्रोह में कुद पङीथी मुखबिर, कभी भार्या बन, वतन का कर्ज चुका रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही […]
कोरे मेरे, सपने मेरे, कोरे ही रह जाएंगे….२ उम्मीदें देंगी,दस्तक उन तक, उम्मीदें ही रह जाएंगी…. कोरे मेरे, सपने मेरे, कोरे ही रह जाएंगे…२ शामें देगी,उल्फत उनको, शामें ही रह जाएंगी… कोरे मेरे,सपने मेरे, कोरे […]
उम्मीद की लौ जल-जल के बुझ रही थी नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी परालम्बन भरे जीवन से मुक्ति हमें दिलाने वीर- वीरान्गनाओ की टोली कफ़न बाँध चल रही थी ।। दिन […]
आठ महीने की गुड़िया ने आज पा पा बोल दिया धीरे-धीरे साफ शब्द कहकर वाणी को खोल दिया। वैसे तो गुड़िया रानी, अपनी भाषा में गाती है, कहती है कुछ, इठलाती है देखो तो मुस्काती […]
कैसी है ये दरिन्दगी? हाथरस की बेटी संग जो होता है कुकर्म उसे जनता से छुपाया जाता है.. मीडिया की आवाज को आखिर क्यों दबाया जाता है… पहुँचते हैं कुछ राजनीतिक दल राजनीतिक रोटियाँ सेंकने […]
हास्य कविता,सोना बाबू ————————- रात रात जग के हम पढ़ाई करते थे| मेरे पड़ोसी- फोन पकड़ के चुमा करते थे| आया समय जब पेपर का, वो रोया करते थे| सोना बाबू फेल हुए, बाबू लड़की […]
‘किससे शिकवा करें दामन ये चाक होना था, मगर करते भी क्या, ये इत्तेफाक होना था.. गमों की भीड़ हमारी कश्मकश में उलझी रही, तय हुआ यूँ हमें गम-ए-फिराक होना था.. जिसे हवाओं से हमने […]
भोजपुरी कविता- राजनीति होखे के चाही | केहु मरे चाहे जिये राजनीति होखे के चाही | केहु आबरू लूट जाये राजनीति होखे के चाही | औरत ना ई खिलौना हई जब चाहे खेल ला | […]
सच बोलने को हिम्मत चाहिए मीठा झूठ सभी को भाता है सच सदा से कड़वा होता है मधुमेह वालों को भी न सुहाता है तब रावण एक अकेला था हर घर अब रावण का मेला […]
बस-दस पंद्रह साल में, इस दुनियां के माया – जाल से, एक पीढ़ी विदा हो जाएगी अफसोस ,जुदा हो जाएगी इस पीढ़ी के लोग ही कुछ अलग हैं रात को जल्दी सोने वाले, भोर होते […]
मत हिलो देखकर दूजे की चकाचौंध को तुम जो भी है पास अपने खुश रहो, संतुष्टि पाओ। पेट भरने को भोजन और वस्त्र हों ढके तन सिर छुपाने को छोटा सा भवन हो खुश रहे […]
तंग आ चुके दुनियां के ताने से, उस बेचारे काने ने पत्थर की आंख लगवाली, नज़र तो फ़िर भी नहीं आया मगर दुनियां की नज़र बदल डाली ।। *****✍️गीता
तुम्हे याद हैं वो लम्हे जब हम साथ पढ़ा करते थे तुम्हारी कॉपी से देखकर परीक्षा में लिखा करते थे तुम मुझे कॉफी के लिए रोज़ पूंछते थे और हम मना कर दिया करते थे […]
दुबली-पतली कद काठी थी धोती पहनकर चलते थे आँखों में थे अनमोल सपने ऐनक लगाकर चलते थे राष्ट्रपिता थे प्यारे बापू सबकी आँख के तारे थे अंग्रेजों के छक्के छूटे जब वह सत्याग्रह पर जाते […]
अचरज में हूं मैं न जाने कब से भारी भरकम आदमी की बोली हल्की कैसे हल्के आदमी की बातों में वजन है कैसे चींटियां आंख बिन चढ़ती दुर्गम पहाड़ों पर आंखवालों की कमर टूटती बिस्तर […]
शब्द हूँ भुने चने सा सूखा सा, आपकी रसना के रस में मिलकर मिठास दूँगा। कह डालो कि मैं भी आपका हूँ फिर मैं भी अपनेपन का एहसास दूँगा।
वृक्षों को काट-काट कर, इति करे सब वन प्रकृति का सर्वनाश किया है, कमाने को केवल कुछ धन। दोहन कर-कर प्रकृति का भी, चैन मनुज को ना आया पशु , पक्षियों को बेघर किया है, […]
रेत सी है अपनी ज़िन्दगी रेगिस्तान है ये दुनिया, रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी कभी कुछ पैरों के निशान बनाती और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती, कांटों को आसानी से पनाह देती फूलों को […]
समन्दर का वो किनारा साथी है हमारा, जहां बैठ घंटों है वक्त हमने गुजारा, जैसे कि उनसे सदियों से नाता हो हमारा, बहुत बार तो मिलना नहीं हुआ है पर एक अनोखा रिश्ता सा कायम […]
किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है, सामने खुली चांदनी नजर आती है पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती, कुछ रस्मों की दीवारें हैं कुछ […]
मैं हिन्दी हूं भारत की भक्त हिन्दी, संस्कृत मेरी जननी जिसमें अंकित है संस्कृति, उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी, उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी, हरियाणवी, गढ़वाली […]
अजीब नौटंकी लगा रखी है जमाने ने मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं; गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे […]
जीवन के इस सफर में टूटी हूं कई बार, घायल होकर दर्द में तड़पी हूं कई बार, पर हर दर्द का अपना हिसाब रहा, कोई बस तन पर एक दाग बन जमा रहा, और कोई […]
सोच रही हूँ डालने को बालू समंदर में ताकि राह खुल जाये मुसाफिर की; अजीब दास्ता है ये, हो सकता नहीं ये संभव, पर है ये दुनिया असंभव को संभव करने वाली, हर सपने की […]
पूर्ण समृद्ध न तो मैं हूं और न ही कोई अन्य, सर्वज्ञ तो इस जहाँ में कोई भी नहीं, हर किसी में कुछ न कुछ रिक्तता है जैसे, किसी भी ह्रदय का ज्ञान सम्पूर्ण नहीं, […]
हैं बहुत यहाँ एक से बढ़कर एक, है काबिलों की बस्ती ये जहाँ , हैं कितने ही माहिर आये यहाँ और आकर चले गए न जाने कहाँ, कोई रहा कहाँ एक वक़्त जीकर यहाँ, हर […]
धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है, अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है, कौन किससे भला समान है? समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है छोटी सी झोपड़ी […]
हो चाहे कैसी भी घड़ी, आंधी तूफ़ान की लगी हो लड़ी, या मन को झुलसा रही हो अग्नि, डर हो यदि आगे हार जाने की, या फिर अपना सब खो देने की, शुरुआत जरूरी है; […]
निर्भया कितनी दफा रोई दरिंदों की पनाहों में सिसकता ही रहा यौवन वासना की बाँहों में तब तलक रूठेगा बचपन पूँछती है यही नारी मरेगी कब तलक बेटी बचेगा कब तलक अत्याचारी पुरुष की बन […]
दो पंक्तियाँ तुम पर न लिख पाऊं तो मैं भी कवि नहीं, स्वप्न तक शायरी न पहुंचाऊं तो मैं भी कवि नहीं। जब कभी मन टूट कर बिखरा हुआ हो, दर्द हो, दर्द तक मलहम […]
मनोरम रात है बिखरी हुई है चांदनी तुम्हारी मुस्कुराहट सी दिखाई दे रही है चांदनी। जिस तरह चाँद खिलता है कभी कुछ दिन महीने में, उसी की भांति तुम भी हो जो हंसते हो महीने […]
दिन गुजर जाते हैं हम वहीं रह जाते हैं नये दिनों की तरह कहां नये हो पाते है पुराने जख्म मिले कहीं क्यों न भुला पाते हैं आये नये जो पल हाथ बीती बातों को […]
जब मेरा अंत समय है नज़दीक हो, तब आँखों में छवि मेरे बच्चों की हो, और मेरे हाथों में हाथ तेरा हो… आयी थी जिस क़दर वद्दू बनकर इस घर में, उसी जोड़े में विदा […]
कविता- शास्त्री गांधी से सीख लो | लड़ा जाता कैसे जंगे आजादी गांधी से सीख लो | सत्य अहिंसा की कैसी आजादी गांधी से सीख लो | छोड़ धन दौलत रूप संत का बना लिया […]
पापा की प्यारी हूँ मैं फूलों की क्यारी हूँ मैं पर सबसे पहले नारी हूँ मैं… अहिल्या हूँ मैं सीता हूँ मैं पवित्र पावन गीता हूँ मैं कभी शेरनी तो कभी चीता हूँ मैं पर […]
अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]
दूर – दूर से कवि पधारे, कोई पर्वतीय, कोई मैदानों से । यहां पे आकर , धूम मचा कर, लिखें बड़े अरमानों से । मैं भी आई, नाम है गीता , लिख दी मैनें, भी […]
अचरज भरा आकाश है कहीं धूप है कहीं छांव है आसमान की चादर में सितारों के बूटे हैं बादलों के घोड़े हैं जो दौड़ते हैं इधर-उधर जुगनू भी अपनी प्रेयसी को ढूंढते हैं रात भर […]
नीले आसमान पर सूरज की उपस्थिति सौंदर्य की पराकाष्ठा किरणों की लालिमा से चमक रहा है पृथ्वी का हर कण हर क्षण…. पत्तियों की सरसराहट से मधुमास का सुंदर आगमन चमन की सुगंध से महक […]
विविध काव्यों से सजा है न्यारा कविवर ने है जिसे संवारा समालोचना की मुखरता से मिलकर सबने जिसे निखारा छन्द- अलंकार की बहती धारा हाँ, वह है “सावन” मंच हमारा। बनी एक पहचान हमारी खुद […]
कोई ख्वाहिश कहाँ कोई पछतावा भी नहीं पतझङ-सी है वीरानी बसंत आया ही नहीं दूर तक फैला है सूनापन जैसे शून्य निकल आया हो हाँ, कुछ इस तरह तेरा ख़याल आया हो । काली निशा […]
कुछ वक्त की ज़िन्दगी है, फ़िर तो हमको है जाना कुछ समझौते भी हुए यहां, कुछ उपहार मिले माना खाली हाथ ही तो आए थे, खाली हाथ ही है जाना ये तो निर्भर, करता है […]
तीर, तलवार और तंज की धार से, जब निष्प्राण हुआ शरीर अनुप्रास ही दिखे कवि को, यहां घायल पड़ा शरीर ।। *****✍️गीता*****
ओस की बूंद अब तुम भी न दो यूँ ठेस पांवों में अभी तो चुभ रहे हैं हम कई पैनी निगाहों में।
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