ऊंचे-ऊंचे घरों में
ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।
ऊंचे-ऊंचे घरों में ,
रहने वाले लोग,
आजकल घरों में ही रहते हैं,
मगर मैं निकला हूं बाहर, साहेब !
रेहड़ी लेकर,
खाली उदर बच्चों का,
टिकने ही नहीं देता है।
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बहुत सुंदर पंक्तियां
सच यही है कि पापी पेट के लिए कोरोना दौर में भी गरीब लोगों को काम के लिए इधर उधर जाना ही पड़ता है
बहुत सुंदर भाव
सुन्दर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद
बहुत ही सुन्दर ।
एक आम आदमी की बेबसी को प्रकट करती पंक्तियाँ ।
अपने बच्चों के पेट की भूख के आगे न कोरोना का भय
अपने कर्तव्यों को पूरा करने निकला है जो होके अभथ
इतनी सुंदर समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद सुमन जी🙏
सुंदर
बहुत बहुत आभार सर
गरीबों की व्यथा का यथार्थ चित्रण
धन्यवाद मैडम जी
यथार्थ पर आधारित सुन्दर रचना
धन्यवाद सर
अत्यंत ह्रदयस्पर्शी
हार्दिक धन्यवाद सर