कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा ।

कपड़े बदले, वेश बदला, बदला घर-संसारा ।
माया-मोह में फँसा रहा तु नर पर बदल सका न अपना व्यवहार ।
रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
तन को धोया नित-नित दिन तु, पर मन को धोया कभी नहीं
अगर एक बार जो मन धो लो हो जाये तन तेरा शुद्ध ।
रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
मन शुद्ध है तो तन शुध्द है, आहार शुध्द तो विचार शुद्ध है ।
जल शुद्ध है तो वाणी शुद्ध है, संगत शुद्ध तो रंगत शुध्द है ।
रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
आया तु सफेद चादर ओढ़ के और मैल किया तु इस जन-जाल में ।
रोवत-रोवत अब क्यूँ मरते है, अब भी क्यूँ न राम सुमिरन करत है ।
रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
माया में तो तु फँसा रहा है, एक बार भी तु नहीं राम जपा है ।
जब जानता है राम नाम है जगत में मोक्ष अधारा तो क्यूँ नहीं जपा अभागा !
रे! क्या-क्या बदला तु इंसान-2
 विकास कुमार

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