पप्पू ही पल रहे हैं
क्या सोंचकर चुना था
ये क्या कर रहें हैं
भेंड़ बनके वोट मांगने वाले
भेड़िये निकल रहे हैं
अरबों किया इकट्ठा पर
पप्पू ही पल रहें हैं
कुत्तों के घर में कैसे
लोमड़ी पल रहें हैं
रक्षक बने फिरते हैं
देश को निगल रहें हैं
आसमान पे थूकने वाले
खाक सिर धर फिर रहें हैं
राजनीति का सुन्दर चित्रण
राजनीति पर तंज कसती हुई सुन्दर और सटीक रचना