यह कैसी है आपदाएं।
यह कैसी है आपदाएं,
कितना विनाश करती हैं!
छीन कर सब मेरा,
और मुझसे सवाल करती है।
बाहर की भीषण तबाही,
मेरे भीतर तक मचती है।
सुख-चैन गंवा कर जोड़ा था,
जिंदगी भी तौबा करती है।
थक कर बैठ जाऊं?
या फिर से करू,
तुम्हारा सामना।
ना जाने वो भीतर की ममता,
स्नेह ,करुणा।
जो निष्ठुर हो चुकी है,
तेरे जाने के बाद।
वह फिर से अमृत वर्षा करती हैं।
जिसे कभी अपना नहीं माना,
आज उसी को अपनाती है।
यह कैसी है आपदाएं,
कितना विनाश करती हैं।
देख कर दूसरे के आंसू,
अब अपनी कहानी याद आती है।
पत्थर-सा सीना रखने वाला मन,
आज करुण वर्षा करता है।
यह कैसी है आपदाएं,
कितना विनाश करती हैं।
अति सुन्दर!❤
धन्यवाद प्रियंका
बहुत खूब
थैंक यू सर
जब तक हमारे ऊपर कोई मुसीबत नहीं आती है तब तक हम दूसरों के दुख को महसूस नहीं कर पाते हैं यही कविता में बहुत ही अच्छी तरीके से बताया गया
बहुत सुंदर भाव
हार्दिक धन्यवाद सर
बहुत सुंदर।
धन्यवाद
Awesome line
धन्यवाद सर
धन्यवाद
Very nice