मुखौटे के पीछे

मुखौटे के पीछे !!

सब कुछ तो है मेरे पास, पर शायद कुछ भी नहीं

एक गाड़ी है, बैठ कर चल देता हूं

पर अकेले सफ़र करना डराता है मुझे

एक घर तो है, बड़ा सा

पर कमरों के दरवाज़े न जाने कब खुले थे

एक बड़ा सा बगीचा, घर के सामने

पर भंवरो को मेरा आना खलता है शायद

और फूल मुरझा गए हैं।

एक मुस्कुराहट के साथ जीवन व्यतीत कर रहा हूं

पर जीने का उत्साह नहीं

कोई रंग नहीं, उल्लास नहीं।।

कैसी यंत्रणा है ये, जिसमें जी रहा हूं मैं

बिखरे हुए पंखों को अब क्यों सी रहा हूं मैं

अब अतीत की डायरी को खोले हुए वर्षों बीत गए

पर कुछ अधूरे पल, लगता है मानो कल ही हुए

अब आज में जीने की आशा लिए ही मैं चल पड़ा हूं

लहरों में भीगी नाव है, पर अर्णव से भी लड़ रहा हूं

तम छंट रहा,

किरणें इशारा भोर का अब कर रहीं,

मैं रख कलम पहनूं मुखौटा… मुस्कान का।

मुखौटे के पीछे की व्याख्या इसी डायरी में है कहीं ।।

Comments

2 responses to “मुखौटे के पीछे”

  1. Lavanya Singh

    I’m cherishing the way you described loneliness. If we read it carefully, it shows a really deep emotion that is hidden in your poem. The emotions and words are fully giving a vibe. That’s a great masterpiece!

    1. Abhishek Avatar
      Abhishek

      Thanks a lot for this feedback.

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