बिजली चले जाने पर हम
रात चांद के तले बिताते हैं
क्रंक्रीट की छत पर
बैठ हम प्रकृति को कोसते हैं
हवाओं से मिन्नते करते
शहरों की छतों पर
तपती गरमी में नई सभ्यता रचते
दौड़ जाती हमारी आवेषों में बिजली
कंदराओं के मानव
आग की खोज में इतरा रहा था
एडिषन एक बल्ब में इतना परेषान था
हम उस बिजली के लिए शहरों में
तपते छतों में
इतिहास नहीं बने
हवाओं के बहने और पानी के बरसने में
हमने रूकावटे खड़ी कर दी
क्रंक्रीट की छतों और छज्जों में
कोसते हम प्रकृति को
और चांद देखता छतों पर
अपनी ओर बढते इंसानी कदमों पर
रोकने की सोच में डूबा
हम अपनी छतों पर सोचते
चांद पर क्या होगा?
मन में बिजली-सी कौंध जाती
छतों पर गरमी में तपते हम।
Author: Abhishek kant pandey
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बिजली चले जाने पर हम
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हुकूमत बदल जाओ
चंद वक्त ले लो
दुनिया भी बदल लो।
एक एहसान करो
तुम ही बदल जाओ
आजकल में
चीखों को सुनो
फिर सोचो
क्या तुम काबिल हो।
एक बार तुम घर में बैठ जाओ
देखों लोग कैसे बदलते हैं- जमाना।
बस तुम चले जाओ
देखो की कैसे बदलता है
सबका जीवन
तुम सब जिम्मेदार बनो
तो जानो की
कैसे बदलता है
हुकूमत की सत्ता
देखो कैसे बनते लोग
तख्त तुम उलट जाओ
फिर देखो बदलती
नई तस्वीर।
जिंदा है हम
तैयार हैं
बस तुम चले जाओ
अबकी बार हमें बैठाओ
हम बदल देंगे भारत।
अभिषेक कांत पाण्डे