11 Comments

  1. वाह अनु…
    बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आवाज उठाई है आपने..
    मुझे सच में बहुत बुरा लगता है जब कोई ऐसे लोगों का मजाक उड़ाता है…
    आपकी कविता पढ़कर मुझे निमिषा सिंहल की कविता याद आ गई..

      1. अगर सुधार की बात करूं तो आप निपात शब्दों का प्रयोग नहीं करती हो..यदि करो तो वाक्य पर बल पड़ता है..क्योंकि निपात के प्रयोग बिना वाक्य अधूरा लगता है अनु….
        एक बात और अनु आप कविता लिखकर एक बार पढ़ लिया करो…
        गलती स्वयं नजर आ जाएगी..
        बाकी भाव आपके उच्च स्तरीय होते ही जा रहे हैं काफी सकारात्मक बदलाव देखा है मैंने…

  2. धन्यवाद प्रज्ञा जी मार्ग दर्शन के लिए
    उम्मीद करती हूँ कि आप आगे भी मेरा मार्गदर्शन करती रहेगी।

  3. किन्नरों को समाज में सम्मान दिलवाने हेतु लिखी गई बहुत सुंदर रचना बहुत ही भाव पूर्ण और उच्च स्तरीय विचारों से सुसज्जित बहुत संवेदनशील रचना

  4. किन्नर कहाँ, अक्सर लोग हिजरे कहा करते हैं।
    इनके कुछ भी मांगने पर नखरे किया करते हैं।।
    दुआओं में बल हैं इनके तो भला संताप क्यों कहते हो?
    सम्मान करो इनका कुछ पूर्वाजित पाप क्यों कहते हो?

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