Narendra Singh, Author at Saavan's Posts

Barsaat

इन हाथों में अरसों तक थी उनके हाथ की खुशबु। जैसे रातरानी से महकती रात की खुशबु। इत्र हो गई जो बूंदें लिपटकर उनसे, दुनिया को ये भरम कि ये बरसात की खुशबु। »

मुक्तक

है परिभाषित सतत संघर्ष और संग्राम अभिनंदन। हैं हम सारे अयोध्या के निवासी, राम अभिनंदन। वो जो हर भौंकते से श्वान का मुंह वाण से भर दे। कि इस कलयुग में उस एकलव्य है नाम अभिनंदन। »

मुक्तक

मात्र श्रृंगार की ना रहे पराकाष्ठा इसमें अंगार भी चरम होना चाहिए। मात्र प्रेम और आसक्ति ना बने कविता पंक्तियों में वंदे मातरम होना चाहिए। »

विचार

तुम बॉलिवुड अभिनेत्री सी, मैं भागलपुर का अभियंता। तुम भरी विद्वता की चर्चा, मैं चुटकुलों का सन्ता बन्ता। तुम झांसी की रानी जैसी, मैं धरने पर बैठी ममता। तुम कॉर्पोरेट की लीडर, मैं जनधन खाते की निर्धनता। »

व्यंग्य मुक्तक

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लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध

लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध आ गया अंततः वह भी क्षण आरंभ हुआ समर भीषण। दो वीर अडिग, अटल वीरत्व था साक्ष्य धरा का तत्व तत्व। एक ओर अहीश स्वयं लक्ष्मण है मही सकल टिकी जिनके फण। डटे सामने मेघनाद ले शुक्र से शिक्षा का प्रसाद। एक इंद्र जयी एक सूर्य वंश दोनों ही में क्षत्रीय अंश। वाणों में पावक सदृश घात नैत्रों में जैसे रक्तपात। तीरों से तीर प्रचण्ड लड़े सब देव असुर थे स्तब्ध खड़े। न कोई आधिक न कोई कमतर दोन... »

एक यादृच्छिक विचार

तुम गणनों में जीते हो, हम गणों में जीते हैं। तुम सिफ़र में जीते हो, हम सफ़र में जीते हैं। »

पिता

किसी अनजान से बोझ से झुका झुका ये फल दरख्त़ की झड़ों में ढूंढ़ता सुकून के चन्द पल। कभी मिले पत्तों के नर्म साए तो कभी इनमे छनकर आती कुछ सख्त़ किरणें भी। बहुत रोया ये हर उस लम्हे जब इस दरख्त़ को आम का पेड़ कहा किसने भी। मुझे मिठास तब मिली जब इस दरख्त ने आसमां से ज़मीं तक हर चीज़ को चखा। गिरते पत्तों के बदलते रंग देखे तो इस उंगली को उम्र भर थामे रखा। मुझे न छुओ चाहे बनादो इन पत्तों के पत्तल किसी अनजान से... »

मुक्तक

मां भारती का सहस्त्र वंदन, रही है आवृत ये गोधुली से यहीं दिगम्बर ये अन्नदाता, लगे है पाथेय संबली से। यहीं पे खेले चराए गैया, जगत खिवैया किशन कन्हैया यहीं त्रिलोकेश सूर्यवंशी, यहीं कपिश्वर महाबली से। मंदाकिनी का है काव्य अविरत, है धैर्य अविचल सा हिमगिरी का प्रथमवृष्टि की सुगंध अनुपम, है स्वाद अद्भुत सा पंजिरी का। युगों युगों से युगों युगों तक रहा सुशोभित रहेगा चिन्हित आशीष है ये स्वयं प्रभु का, है ... »

कवि

रातभर हम ओस पर खींचा किए थे लकीरें, सुबह को सुरज मुआ दुनिया उड़ा कर ले गया। हमने ज़मीं पर बैठकर इंचों में नापा आसमां, जाना तो माना कहां तारे से तारा रह गया। आंखों से नापा तो ये मंज़िल हुई मरीचिका, कल की कहीं कलकल हुई और आज मेरा बह गया। पलकों के आगे यहां चुल्लू भरा और चल दिए, पलकों के पीछे मेरा सागर उलझ कर रह गया। हर मील के पत्थर पे बैठा मुस्कुराता आदमी, देखकर, मुंह फेरकर, वो कवि मुझको कह गया। »

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