Pratibha Joshi's Posts

मैं अन्नदाता

मैं अन्नदाता देख अपनी थाली में खाना रूखा सूखा, हो उदास सोचे किसान फ़िर एक बार, हूँ किसान कहलाता मैं जग में अन्नदाता, रहता साथ अन्न के, मिले मुझे ये मुश्किलों से, मेहनत मेरी रोटी बन भूख मिटाती जग की, न देख सके वो सुबह सुहावनी सब सी, पसीना मेरा शर्माए गर्मी जेठ बैसाख की, बैलों संग मेरे हल के धरा मेरी निखरती, बीज लिए आशाएं धरा के मैं बोता, आशाएं अब मेरी देखें बादल वो चंचल, आता सावन घुमड़ घुमड़ लाये मुस्... »

मां

लिये छः ऋतुयें आये नया साल, हर ऋतु गुजरे मेरी संग मां के, त्यौहार मेरे न तुमसे, संग मां के, मेहनत मेरी ,उगले सोना मेरी माँ, समझता मैं खिलखिलाना मां का, सिसकता मैं देख सुखी धरा को, सुनी सुखी आंखे मेरी देखे अंबर, सुख गया वो भी जैसे भूख मेरी, जा रहा मैं अब उसके द्वारे, लिये जा रहा अपने शिकवे, सौप दिये जा रहा मां अपनी, विलाप मेरा भरेगा अंबर, बन बूंदे टपकेंगे मेरे आँसू, मेहनत से थाम लेना मेरी माँ, जा र... »