Rajendra Dwivedi, Author at Saavan's Posts

पूस की रात

हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। वो मुझसे दूर क्या हुई, उसके संग गुजरा हर लम्हा याद आता है।। हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। मैं उसका मन था, वो मेरे मन से जुड़ती थी। कैसे छोड़ गयी मुझको, जो अकेले पन से डरती थी।। चन्दा की तरह अब सफर है अकेला,एकाकी मन रोता है।। हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। »

पूस की रात

हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। वो मुझसे दूर क्या हुई, उसके संग गुजरा हर लम्हा याद आता है।। हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। मैं उसका मन था, वो मेरे मन से जुड़ती थी। कैसे छोड़ गयी मुझको, जो अकेले पन से डरती थी।। चन्दा की तरह अब सफर है अकेला,एकाकी मन रोता है।। हॉय पूस की रात, तू कितना दर्द देता है। »

दिल की बस्ती

खुश रहने की वजह ढूंढ़ोगे, तो कम ही मिलेंगें। यहाँ हर चेहरा हस रहा बाहर से, पर अन्दर तो गम ही मिलेंगें।। झाँक कर देखोगे दिल की बस्ती में, तो बस खाली शहर ही मिलेंगें। ‘ नवीन’ नही कोई जहाँ में अपना , यहाँ बस पराये ही मिलेंगें।। »

अपराध

अब न रह विस्वास किसी पे, जब अपने ही दरिन्दगी में उतर आयें। अपराध बढ़ रहा चरम पे, कैसे रुके कोई बतलायें।। »

मीठा दर्द

यूं न मेरी मोहब्बत को रुसवा कर, ज़माने ने बहुत दर्द दी है। बस एक बार मिल रूह से रूह तक, चले जायेंगे हम यहाँ से ज़माने से किसे हमदर्दी है।। नवीन द्विवेदी »