Raju Pandey's Posts

तेरे बिन गुजारा नहीं

रोज मिलने के वादे तोड़ते हो जो तुम बात तेरी ये मुझको गवारा नहीं। बात ही बात पे रूठते हो जो तुम जानते हो तेरे बिन गुजारा नहीं। रोज अपनी गली देखते हो मुझे आशिक हूँ तेरा पर आवारा नहीं। थोड़ा नजरें इनायत फरमाओ तुम गैर नजरों के खातिर सँवारा नहीं। मेरी एकलौती चाहत अरमान तुम डोले हर फूल “राजू” वो भंवरा नहीं।। ~राजू पाण्डेय बगोटी (चम्पावत) »

टूटते क्यों नहीं

टूटते क्यों नहीं सत्ता के पाषाण ह्रदय तटबंध उन आँसुओं के सैलाब से जो बहते है गुमसुम बच्चों की खाली थाली देखकर जब चीख उठते हैं पैरों के बड़े बड़े लहूलुहान चीरे फटे कंधे साहस दिलाते फिर कल की उम्मीद में सो जाते है पीकर उन्हीं अश्रुओं को … »

याद रहे

पार्थ! तुम भटक रहे हो क्या? उस धर्म के मार्ग से जिस मार्ग का अनुसरण करने का पाठ आप पढ़ाते रहे हैं वनवास के समय अपने प्रवचनों में … वो रण वांकुरे, जिन्होंने तुम्हारा वनवास मिटाने और तुम्हें सत्ता तक पहुँचाने के रण को लड़ा है धर्म युद्ध समझ थोड़ा विस्मित है आता देख सुन तेरा नाम सत्ता के षडयंत्रो में … तुम्हें सिर्फ याद रखनी होगी वो मछली की आंख जिसकी केंद्र में थी परिकल्पना एक सक्षम, समर्थ, ... »

ये सांप

सांप! मारना नहीं चाहिए था ये वाला वो बता रहे हैं ये पानी वाला सांप था जानता था कितने सांप, मगरमच्छ और है उस तालाब में उसे रखना चाहिए था एक वीआईपी वाले बिल में बाकी सांपों की तरह रोज पिलाते दूध वो भी बताता बाकी पालतू सांपों की तरह उन तालाबों के राज जहां पल रहे हैं ना जाने और कितने मगरमच्छ और सांप नहीं तो कभी काम आता डंसवाने के फिर सपेरों को… ~ राजू पाण्डेयसांप »

रिश्ता

रिश्ता तो एक ही है तुमारा और मेरा उनसे तुमारे पास जमीन है ना! और वो उसी का भाव जानते है। ~ राजू पाण्डेय »

शहर में भी गांव हूँ मैं

भीड़ है बहुत दिखता तन्हा हर इंसान हैं एक दूजे से मुँह फुलाये खड़े मकान हैं सूरज को भी जगह नहीं झांक पाने की फुर्सत किसे, दूजे की देली लांघ जाने की फिर भी पड़ोसी से पूछता हाल हूँ मैं शहर में भी गांव हूँ मैं। पड़ती बड़ी गर्मी, बूंद को पंछी तरसते हैं बड़ी मुश्किल यहाँ, कभी बादल बरसते हैं पपीहा कहाँ, जिसको तलब हो बूंद पाने की दिखती नहीं बच्चों में हरसत, भीग जाने की फिर भी बनाता कागज की नाव हूँ मैं शहर में भ... »

आंगन के पाथर

पैर जैसे ही पड़े आंगन में बरसों बाद एक एक पाथर मचल उठा, सुबक पड़ा उसके आने के अहसास से ये तो वही पैर थे जो बरसों पहले बच्पन में दिनभर धमाचौकड़ी करते थे आंगन के इन पाथरो पर और कभी कमेड या छोटे पत्थर से लिखते इन पर अ आ इ ई, १ २ ३ ४ कभी पिठ्ठू, कंचे, गिल्ली डण्डा खेलते कभी बैट बॉल घुमाते थे इसी आंगन में कभी ईजा के साथ लीपने में लग जाते गाय के गोबर से नन्हे हाथों से तुरन्त उखाड़ फेकते थे कहीं भी घास उग आय... »