Sukhmangal, Author at Saavan's Posts

“कवि हूँ मैं सरयू तट का “

“कवि हूँ मैं सरयू तट का ” कवि हूँ मैं सरयू तट का समय चक्र के उलट पलट का मानव मर्यादा की खातिर सिर्फ अयोध्या खड़ी हुई क्यों कि युगों से मेरी अयोध्या जाने हाल हर घट पनघट का समय चक्र के उलट पलट का कवि हूँ मैं सरयू तट का श्री विष्णु का हुआ प्रादुर्भाव पृथु – समक्ष विष्णु ने रखा प्रस्ताव इन्द्र को क्षमा करो महाराज निन्यानबे यज्ञों के विध्वंसवान क्षमा चाहते हैं देवराज | अपराध क्षमा हो उ... »

“सहपाठी मिले “

फिर वही संगी हमारा फिर वही साथी मिले हो जनम यदि पुनः तो, मुझे फिर वही सहपाठी मिले | लड़ता ही रहता है वह हर समय हर मोड़ पर संघर्ष में संग रहता सदर ,जाता न मुझको छोड़ कर | हिम्मत -हौसले में है ,उसका तो शानी नहीं एक सच्चा मित्र है वह ,चलता सबको जोड़कर | उसका संग वैसे ही जैसे ,बृद्ध बृद्ध को लाठी मिले हो जनम यदि पुनः ,तो मुझे फिर वही सहपाठी मिले || एक रिस्ता है जुड़ा वर्षों पुरानी दोस्ती का, जिंदगी का एक र... »

अभियान नवगीत “

अभियान नवगीत ” ———————— बांधे सर पे मस्त पगड़िया राह कठिन हो,चलना साथी दुराचार ख़तम करने अब उतार चलो काँधे की गाँती आन ,बान और शान हमारे अच्छे- सच्चे हैं वनवासी दिलों – दिलों को दर्द बताने महफिल – महफिल खड़ी उदासी आँखें भर – भर उठती हैं मां जब अपनी कहर सुनाती बांधे सर पे ……………. जोते – बोये ,कोड़... »

रिश्तों का सम्मान

भांप गया सत्य बात ,जो मानता नहीं सच कहे ‘मंगल ‘देश में,दुश्मन बड़ा वही ! भूख – प्यास जकड़न भल ,भरमता कहा सही पूजी मिली प्यार की ,ठुकराता चला कहीं | सम्मान रिश्तों का नहीं ,उड़ान आकाशे बही पास फेसबुक साथ लिए ,हताश जिंदगी रही ! मंगल रिश्तों का सम्मान ,निभाया जिसने नहीं रचनात्मकता फीकी पड़ी,वह टिकता नहीं कही|| -SUKHMANGAL SINGH “ »

नव वर्ष

“नव वर्ष की शुभकामनाएं ” ————————— नव वर्ष की शुभकामनाएं / बच्चों में उत्साह जगाएं | प्रांगन मंदिर संस्कृति अपनाएँ / देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ || भगवा ध्वज की पताकायें | तिलक चन्दन टीका लगाएं ? नव वर्ष धूम से मनाएं | देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ || शंख ध्वनि मृदंग बजाएं / पुरुषोत्तम राम को याद दिलायें | विक्रमादित्य का विक्रमी मनाएं / ... »

“चिड़िया”

“चिड़िया” चीं चीं करती चिड़िया आती अम्बर ऊपर घोसला बनातीं | पानी जहां पर वहाँ मडरातीं औ जमी से उड़ -उड़ जाती | »

”भौरे गायें “

अब गीत कुसुम कमनीय सूना मंद -मंद मत मुस्का रंग -चित्र रच -रच के इठला और बल खा | तेरी -मेरी गढ़ी कहानी उल्लासों से भरी जवानी कविता में आ गई रवानी हुआ सबेरा अब कुछ सोचो क्षणिक विभव है पानी -पानी | विमल धरा का रूप रंग रस भू पर पैर की रही निशानी | रसिक रसीले भौरे आते प्रीति-प्रतीति पथ दिखलाते यहाँ वहाँ उपभोग में लेकर छले-डाले कहाँ तुम जाते ? बन कोमल कमनीय- कलेवर देवों के भी मन को भाते | रसिकों का श्रृं... »

“हलाला देती बरबादी ?”

“हलाला देती बरबादी ?” मुद्दा तलाक का तीन तलाक लाना | बिना विचार किये महिला को हटाना || हजरत उमर का था वह रहा ज़माना | तीन तलाक पर चालीस कोड़ा लगाना || किस्सा था पुराना जब दुल्हन का लाना | खोलकर नकाब उसका घर उसे लौटाना || मजहवी बहाना करता रहा है मनमाना | महिला को अधिकार जनता को दिलाना || उपयोग की वस्तु नही! बदला नव ज़माना | तरक्की पसंद जहां है कुछ करके दिखाना || आओ मिल बैठकर परिवार को है ब... »

“मैहर वाली माई”

मैहर वाली माई के , मनावै के होई | जागि जागी जगत के , देखावै के होई | दुनिया में माई  को , बतावै के होई | नारियल माला फूल , चढ़ावै के होई | माँ की ममता गितिया , सुनावै के होई | निमिया दरिया पालना , झुलावै के होई | माई के चुनरी , चढ़ावै के होई | »

ताला कहाँ लटकता

ताला कहाँ लटकता

ह्रदय में ताला कहाँ लटकता ,मन में केवल भ्रम पलता है | आश्वासन में दुनिया चलती ,आमंत्रण मरण मात्र बेचैनी | नजरें मंजिल पर टिकी हुई ,संवाद हकीकत हो जाता है | स्याही सूख गई हों तो भी ,यह दिल तो एक समंदर सा है || »