Category: मुक्तक

  • जल – धारा

    कुंदन सी निखर गई,
    टूटे मोती सी बिखर गई।
    अंतर्मुखी सब कहने लगे,
    सबका कहना सह गई मैं,
    जल – धारा सी बह गई मैं ।

  • उम्मीद

    उम्मीद की लौ रोशन रहे,
    ये जीवन जीने की चाह कहे।
    ना हो कभी ना उम्मीद मनुज,
    अवसाद की पीड़ा भी ना सहे।

  • मेरी शिक्षक मेरी मां

    मेरी शिक्षक मेरी मां ही तो है ,
    सिखाया उसने चलना ,
    बोलना और पढ़ना -लिखना।
    अर्थ न जाने कितने समझाएं ।
    पूछो कितनी ही बार ;वह प्रश्न ,
    फिर भी कभी ना डांट लगाए ।
    मुस्कुराकर ;माथे को चुमे
    और प्रेम से बतलाए।

  • गुरुवर के प्रति

    मान हैं
    सम्मान हैं
    देश की जान हैं।
    आम नहीं खास नहीं
    राष्ट्र निर्माता हैं शिक्षक।
    नाक से नेटा टपक रहा था।
    आंसू का कतरा लुढक रहा था।
    बाहुपाश में भरकर जिसने अपनाया
    वो मेरे भाग्यविधाता हैं वही ज्ञान के दाता हैं।।
    ऐसे शिक्षक गुरुगरीष्ट को वन्दन है बारम्बार।
    भूलोक से स्वर्गलोक तक खुशियाँ मिले अपार।।
    गुरुवर आपके चरणों में कोटि-कोटि नमस्कार ।।

  • दिखावे के पीछे -पीछे

    दिखावे का मायाजाल बड़ा भयंकर,
    जो फंस जाएं निकल ना पाए,
    फिर उचित ,अनुचित सब परे-सा,
    अलग-अलग हाथी के दन्तों -सा।

  • विश्वास

    विश्वास में विष भी है, और आस भी है।
    धोखा मिले या घात,ये तो अपने नसीब की बात है

  • क्यों कुछ कहते नहीं।

    क्यों कुछ कहते नहीं,
    सब गूंगे बहरे बैठे हैं ,
    सबके भीतर जलती है आग,
    फिर क्यों खामोश बैठे हैं,
    खो दिया है सम्मान को ,
    अपने भीतर के इंसान को,
    तभी तो चुप ही रहते हैं,
    होती है वारदातें आंखों के सामने ,
    फिर क्यों ,आवाज दबाए रहते हैं।

  • नारी तुम पर कविता लिखने को

    नारी तुम पर कविता लिखने को
    वर्णांका असफल है मेरी
    तुम तो जीवन की जननी हो
    सब कुछ तो तुम ही हो मेरी।
    माँ बनकर जन्म दिया मुझको
    यह सुन्दर सा संसार दिखाया,
    अच्छी-अच्छी शिक्षा देकर
    मानव बनने की ओर बढ़ाया।
    दीदी बनकर स्नेह लुटाया
    बहन बनी, खुशियों को सजाया
    दादी बनकर लोरी गाई
    नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया।
    भार्या का रूप मधुर धर कर
    जीवन में नईं खुशी लाई,
    सारा भार स्वयं पर लेकर
    पीड़ा में भी मुस्काई।
    बेटी बनकर घर आंगन में
    रौनक की किलकारी भर दी
    बेटों की बराबरी करके
    सब ओर नींव नई रख दी।
    तुम पर कविताएं लिखना
    सूरज को दिया दिखाना है,
    तुम सूरज हो इस जीवन की
    तुम पर नतमस्तक होना है।

  • भरी बरसात है,

    ओढ़ लो छतरी
    भरी बरसात है,
    आंसुओं से भीग जाओगे कहीं।
    मेघ अब भी हैं घुमड़ते वक्ष पर
    इसलिए छतरी बिना आओ नहीं।

  • बुराइयों की जड़े

    हम काटते ही नहीं ,
    बुराइयों की जड़ें,
    पालते हैं ,पोषते हैं ,
    कभी इच्छाओं के लोभ से,
    कभी रूपयों की चाह से,
    जब लगता है ,
    वह जड़े हमें बांधती है,
    हम उठ खड़े होते हैं,
    अपने विचारों के ;औजार लेकर
    दौड़ते हैं, काटते हैं ,
    जब क्षमता होती नहीं ,
    हमारे भीतर; उसे मिटाने की..

  • मेरा वजूद

    वो मेरा बहुत ख्याल रखता ,
    मुझे भले-बुरे की पहचान कराता,
    जब भी संकट आता ,मुझे बचाता,
    मगर उससे ज्यादा ,
    मैंने दूसरों से प्यार किया,
    पर,जब सबने ठुकराया,
    उसी ने मेरा हौसला बढ़ाया,
    बस इसीलिए बहुत प्यारा है,
    मुझे मेरा वजूद।

  • उम्मीद की कश्ती

    हमने ज़माने से पूछा
    मैं बदनामी का बहुत बड़ा धब्बा हूँ
    क्या आपके शहर में पनाह मिलेगा
    मैं उम्मीद की कश्ती पे
    सेहरा बांध के आया हूँ
    ज़माना हंसते हुए कहा —- अरे यार
    सतयुग गया कलयुग गया
    इस भ्रष्टयुग में भी जनाब
    अंधेरे में लाठी चलाते हो
    क्यों तुम अपनी ज़मीर को
    हमारे ज़माने के बही में
    नामांकन कराना चाहते हो
    मैं बुत बन कर कहा —
    अच्छा, अब मैं चलता हूँ।

  • कविता किया करो

    छोंड़कर बातें पुरानी
    कविता किया करो।
    सपनों में नहीं
    हकीकत में जिया करो।
    तोड़ दे दिल कोई तो
    खैर तुम उसकी मनाओ
    दिल के लिए अच्छा
    यही है कि
    पुरानी बातों पर
    मिट्टी डाल दिया करो।

  • तोड़ दो पत्थर उठा कर

    तोड़ दो पत्थर उठा कर
    कांच का दिल तुम हमारा
    ना रहेगा दिल न होगा
    दिल्लगी का भी सहारा।

  • कलम

    बादशाह बनने के लिए,
    कितने झूठ बोलोगे|
    जमाना आपका भक्त होगा,
    पर मेरी कलम की धार से रोओगे|
    ✍✍✍✍✍✍✍✍✍

    मेरी कमी बताने का कष्ट करें

  • अपनी अदा यों न दिखाएँ

    जब जब मैं
    कलम उठाना चाहा
    हसीन शेर लिखने के लिए
    उसने कहा लगता है
    मैं हो जाउंगी बदनाम
    शायद तुम्हारे लिए
    मैं चाह के भी
    उसके लिए शेर नहीं लिख पाया
    अब कोई उनसे कह दो
    अपनी अदा यों न दिखाए
    इन बहारों में खुदा के लिए।

  • छीन लेंगे तेरी सारी फुर्ती

    बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू व सुर्ती
    छीन लेंगे तेरी सारी फुर्ती,
    छोड़ दे तू सहारा नशे का,
    इस नशे से बुरा भी न देखा।

  • मुझे समझने की कोशिश मत करना

    मुझे समझने की कोशिश मत करना,
    मैं उलझा-सा कोई जाल हूं,
    जितना सुलझाओंगे ,
    उतना ही उलझ जाओगे
    अगर सुलझा लिया तो,
    फिर खुद को ही भूल जाओगे।

  • तुच्छ राजनीति

    ये राजनीति बड़ा ही मीठा जहर,
    मानवता पर बड़ा ढहाती कहर ,
    होते दंगे ,बिखर जाती लाशें,
    फिर मिडिया हमारी,
    दिखाती दलाली,
    हाए! हिन्दू मर गया ,
    हाए! मुस्लिम मर गया,
    पर कौन बताए?
    और कौन समझाए ?
    केवल इंसान मरता है,
    तुम्हारे तुच्छ मंसूबों से,
    केवल इंसान मर गया,
    हां ,इंसान मर गया।

  • पत्थर का दिल

    पत्थर का दिल कभी पिघलता नहीं
    इसलिए तो इसमें गुमान भी नहीं होता।
    तभी तो इसकी पूजा होती,
    हर घर में नित सम्मान हीं होता।।

  • क्या नारी तेरी यही कहानी ?

    युग युग से तू ,आंसू बहाती आई
    पुरुष के अधीन तू, सदा रहती आई
    अपने घर, अपने बच्चो के लिए
    युग युग से तू ,मर मिटती आई
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    आंचल में दूध है, आंखों में पानी
    अपनो ने ही ,तुझ पे बनायी नयी कहानी
    खुद दलदल में फंस के,अपनो को आज़ाद किया
    एहसान के बदले में, अपनो ने तुझे क्या दिया
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    इस युग में भी, तू पुरुष से कम नहीं
    जब कि, संसार तुझ से ही बना पुरुष से नहीं
    झुका दिया है ,आज तुमने अंबर को
    सब कुछ पा के भी, अपनायी विवशता को
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?
    आज घर घर में ,तू ही घर की मुखिया है
    फिर भी पुरुष के आगे, तेरी क्या औकात है
    दुःख सह के भी ,अपनो को सुख देती रही
    अपनी सिंदूर को सदा,अपना सुहागन समझती रही
    क्या नारी तेरी यही कहानी ?

  • महफिल सजाए बैठे हैं

    कब से तुम्हारी राह में नजरें बिछाए बैठे हैं।
    चले भी आओ कि महफिल सजाए बैठे हैं।।

  • सैनिक की अंतिम चाहत

    मैं सैनिक हूं,
    मैं देश को संभालता हूं,
    हर रोज मृत्यु को मारता हूं,
    मैं मौत से नहीं डरता हूं,
    मौत को तो मुठ्ठी में लेकर चलता हूं,
    परिवार की चिंता नहीं करता हूं,
    परिवार देश के हवाले करता हूं,
    अंतिम समय में भी स्वार्थ नहीं चाहता हूं,
    बस एक ही ख्वाहिश ही ईश्वर से फरमाता हूं,
    है ईश्वर कुछ ऐसा चमत्कार कर दो ,
    मुझमें फिर से प्राणों को भर दो,
    बस भारती के शत्रुओं को मस्तक विहीन कर दूं,
    हिन्दुस्तान को शत्रुविहीन कर दूं,
    फिर खुशी खुशी प्राणों को न्योछावर कर दूंगा,
    अपने प्राण वतन के हवाले कर दूंगा।2।

      बस मां तू दुखी मत होना,
      देश की सेवा करना तो मेरा भाग्य है,
      देश ही मेरे लिए सबसे बड़ा भगवान है,
      मृत्यु के मारे क्या में मर जाऊंगा,
      पुनर्जन्म पाकर फिर से तेरा बेटा बनकर आऊंगा,
      कालखंड ये जीवन मृत्यु का सदा चलाऊंगा,
      दोबारा से देश सेवा करने को जरूर जाऊंगा,
      देश की रक्षा को ही अपनी नियति बनाऊंगा,
      जरूरत पड़ी तो हर जनम में अपने प्राण वतन के हवाले  कर जाऊंगा।।
    ✍️✍️मयंक व्यास✍️✍️

  • नन्ही सी बिटिया

    शैतान की नानी,
    बन्दर-सी शैतानी,
    जादू की पुड़िया,
    सोने की गुड़िया,
    परियों सी रवानी,
    प्रेम की निशानी,
    बालों को नोचे,
    कान को खींचे,
    शरारतें उसकी मन को भाएं,
    थकान का आलस पल मे उड़जाए,
    बेटी मेरी कलेजे का टुकड़ा,
    दिल में बसा है अब उसका मुखड़ा,
    आंगन की मेरे वो है शोभा,
    परिवार की मेरे शान बढ़ाये।

  • बीड़ी-सिगरेट जहर हैं

    चार दिन की जिंदगी है
    चैन से जीना है,
    बीड़ी-सिगरेट जहर हैं
    इन्हें नहीं पीना है।

  • राह में रोड़े

    ए दोस्त सोचो,अगर राह में रोड़े न होते।
    जीवन के परिभाषा, हम कैसे समझ पाते।।
    यही रोड़े सभी को जीवन धारा बदल दिया।
    वरना संसार के इस सैलाब में हम कहाँ होते।।
    ठोकर पे ठोकर खा के भी हम कब संभल पाए।
    काश हम दुनिया को राह के रोड़े से तौल पाते।।

  • ….. नारी के कर्जदार

    यदि नारी से निर्माण हुआ है नया संसार।
    फिर क्यों नारी पे हुआ घोर अत्याचार।।
    हम कहते है नारी होती है ममता के सागर।
    फिर क्यों हुआ बाजार में आज ममता बेकार।।
    आंचल में हम युग युग से पलते, बढ़ते आए।
    आज हम वही आंचल के बने है खरीदार।।
    माँ, बेटी, बहन, पत्नी के रुप इसमें है समाया।
    फिर क्यों जुर्म की चक्की में पीस रहे है बार बार।।
    कहे कवि “गर नारी न होती, तो हम कहाँ होते।
    इसलिए तो पुरुष आज भी है नारी के कर्जदार”।।
    —–प्रधुम्न अमित

  • देश दर्शन

    शब्दों की सीमा लांघते शिशुपालो को,
    कृष्ण का सुदर्शन दिखलाने आया हूं,
                                     मैं देश दिखाने आया हूं।।

    नारी को अबला समझने वालों को,
    मां काली का रणचंडी अवतार
    याद दिलाने आया हूं,
                             मैं देश दिखाने आया हूं।।

    वचन मर्यादा को शून्य कहने वालो को,
    राम का वनवास याद दिलाने आया हूं,
                                     मैं देश दिखाने आया हूं।।

    प्रेम विरह में मरने वालो को,
    गोपियों का विरह बतलाने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भक्त की भक्ति को मूर्ख समझने वाले को,
    होलिका का अंजाम याद दिलाने आया हूं,
                                       मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भक्ति प्रेम को ज्ञान सिखलाने वालो को,
    उद्धव का हाल बताने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    सत्ता को सबकुछ समझने वालो को,
    भीष्म का त्याग का याद कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    भगवान का पता पहुंचने वालो को,
    खंब से प्रगटे नृसिंह दिखलाने आया हूं,
                                         मैं देश दिखाने आया हूं।।

    माता पिता को बोझ समझने वालो को,
    श्रवण कुमार का सेवाभाव दिखलाने आया हूं,
                                       मैं देश दिखाने आया हूं।।
           
    गंगा को मैली करने वालो को,
    भागीरथ का तप याद कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    आजादी को शून्य समझने वालो को,
    अनन्त बलिदानों का बोध कराने आया हूं,
                                        मैं देश दिखाने आया हूं।।

    राह भटकते  युवाओं को,
    राह बतलाने आया हूं,
                                 मैं देश दिखाने आया हूं।।

    कविता पड़ने वालो को ,
    मयंक की ‘कलम का प्रणाम’ कराने आया हूं,
                                      मैं देश दिखाने आया हूं।।
           🙏🙏✍️✍️मयंक✍️✍️🙏🙏

  • अभागी क़िस्मत

    आज तू हंस ले ,
    खुलकर मुझ पर,
    मगर ,थोड़ा सा सब्र कर;
    अरी; सुन ! मेरी अभागी क़िस्मत!
    मैं सीख तुम्हें सीखलाऊंगा,
    मेहनत की जंजीरों से जकड़कर,
    मुलाजिम तुम्हें बनाऊंगा।
    मुलाजिम, तुम्हें बनाऊंगा!

    ——मोहन सिंह मानुष

  • खुदा मेहरबान हो जाये

    निजी कामों के बीच
    हमारे हाथ से भी
    देश लिए
    कुछ योगदान हो जाये,
    मेरे भारत में
    अमन -चैन रहे,
    खुदा मेहरबान हो जाये।

  • उलझन

    शंका ना थी कोई भी,वो समाधान करने बैठ गए।
    हम तो बात करना चाहते थे,वो व्याख्यान करने बैठ गए।

  • दण्ड पायेगा पथिक

    मुस्कुरा मत इस तरह
    अंजान राही पर अधिक
    दर्ज होगा जब मुकदमा
    दण्ड पायेगा पथिक।

  • स्वार्थ

    कहीं तो छुपा है,
    किसी ना किसी कोने में,
    दुबका हुआ सा,
    मौके की तलाश में,
    कम या फिर ज्यादा,
    मगर छिपा जरूर है,
    हर मस्तिष्क में!
    और बचा तो ‘मानुष’ तू भी नहीं ,
    इस स्वार्थ के जंजाल से।

  • घड़ी

    वो घड़ी है कौन सी
    जिस घड़ी
    खुश रहते हो तुम,
    अब घड़ी की जगह
    मोबाइल ने ले ली
    हर घड़ी उसी में
    गुम रहते हो तुम।

  • धरना प्रदर्शन

    उठो फिर से मेरे यारो, यहाँ कुछ काम करना है|
    शहर है जाम यदि यारो, कही से राह देना है
    लड़ो सरकार से भाई, हमें इतराज ना तुमसे|
    पर परवाह करो मेरी भी,एक जुड़ी जान है मुझसे||

  • आपकी इस कदर है चाह हमें

    आपकी इस कदर है चाह हमें
    हर समय चाहते हैं पास रहें,
    खुशी हो, गम हो, या कयामत हो
    हर घड़ी आप दिल के पास रहें।

  • ओ री!नींद

    आ ! मेरे पास आ ,
    ओ री ! नींद,
    तुम्हें मैं लोरी सुनाता हूं ,
    मुझे तो तुम सुलाती नहीं,
    चल मैं तुझे सुलाता हूं।
    .

  • जल्दी जल्दी में (हास्यव्यंग्य)

    श्याम का समय,
    बहुत जल्दी में थे वे लोग,
    तेज तेज कदमों में,
    अजीब सी हलचल,
    चेहरे पर रोनक,
    कुछ पाने की लालसा,
    एक के बाद एक,
    गुजर रहा था हर शख्स,
    मन में मेरे भी पली जिज्ञासा ,
    आखिर क्या हुआ है,
    कोई अनहोनी या कोई सुखद घटना,
    अरे! बहुत जतन से पता चला,
    गांव से बाहर एक ठेका खुला।

  • चलो होड़ लगाते हैं….

    चलो होड़ लगाते हैं, ओ री! बारिश तेरी,
    मेरे नयन झरने से।
    ओह! मगर तुम हार जाओगी,
    ये झरना तो पूरी रात बहता है,
    और तुम बरसती हो कुछ क्षण के लिए।

  • हे भारत!मातृभूमि!

    हे भारत!मातृभूमि!
    तेरे पर्वों को लाख नमन
    उन संतानों को लाख नमन
    जिन संतानों ने जान गंवा
    हमको सौंपा है चैन -अमन।

  • इश्क करना

    जीता था, खुश था मैं तेरे बिन भी
    तूने आकर मुझे इतना बदल दिया..
    अब तेरे बिन एक पल नहीं है कटता
    आखिर तूने इश्क करना सिखा दिया..

  • मीठी बातें

    मीठी- मीठी बातें करते,
    मन में रखें बैर।
    ऐसे अपनों से दूर भले,
    उनसे अच्छे .गैर।

  • हृदय महल

    बहुत भीड़ है मन्दिर में,
    मस्जीद में शोर-शराबा है,
    मेरा हृदय महल बहुत खाली-सा
    यहां विराजमान हो जाओ, प्रभु!
    फिर मेरे लिए
    यहीं अयोध्या और यहीं है काबा ।

  • दो डॉक्टर बर्ताव के

    दो डॉक्टर बर्ताव के !
    एक कड़वी दवा खिलाएं,
    दूजा मीठी दवा पिलाएं,
    ‘मानुष’ मीठी से करें परेहज
    नीम ही नीरोगी होए।

  • 🏡 संसार

    कभी माँ का प्यार तो कभी बहन का प्यार।
    यही प्यार के रिश्ते में बना है हमारा घर संसार।।
    काश!!! यह पवित्र रिश्ते हम में नहीं होते।
    जरा सोचो, कैसे चल पाता हमारा घर संसार ।।
    यही रिश्ते के धागे भगवान को भी है प्यारे।
    इसे कभी न तोड़ना इसी में बसा है घर संसार।।
    तोहफ़ा के रुप में पाया हमने नया जीवन धारा।
    यही जीवन धारा बन गया हमारा घर संसार।।

  • एक दिन

    एक दिन, ऐसे ही मैंने कोशिश की ,
    खुद को खुद में ढूंढने की,
    अपने वजूद को ;
    गहराइयों में टटोलने की,
    अरे! कौन हूं मैं?
    लिंग ,नाम, पहचान ,
    गौत्र, जाति ,धर्म,देश,
    सब पर विचार किया,
    फिर भी संतुष्टि नहीं मिली।
    फिर अचानक, मन से आवाज आई ,
    इन्सान हो और कुछ भी नहीं।

  • एक दिन

    एक दिन ऐसे ही मैंने कोशिश की ,
    खुद को खुद में ढूंढने की,
    वजूद को गहराइयों में टटोलने की,
    अरे! कौन हूं मैं?
    लिंग ,नाम, पहचान ,गौत्र, जाति ,धर्म,देश
    सब पर विचार किया,
    फिर भी संतुष्टि नहीं मिली नहीं।
    फिर मन से आवाज आई ,
    इन्सान हो और कुछ नहीं।

  • नश्वर है, ये जीवन

    जीवन क्या है?
    क्या है जीवन!
    लकड़ी का कोई फट्टा-सा,
    पेड़ का कोई पत्ता-सा
    कब टुट जाएं कुछ पता नहीं,
    मानो कोई गुब्बारा-सा
    तैरता मटका बेचारा-सा
    कब फूट जाए पता नहीं।

  • दुनियां जो कहती, कहने दे

    ओ कर्मनिष्ठ! तू दुःखी न हो
    खुद की क्षमता की कर पहचान
    दुनियां जो कहती, कहने दे
    उसकी बातों को मत दे कान।

  • मुक्तक

    नहीं आँचल कभी खिसकने दी
    वो अपने माथ से।
    आज देख रहे हैं सब उसको
    होकर यूं अनाथ से।।

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