“कामयाबी की ईमारत”

आज भी वो दिन याद आते है उसे भुलाऊ कैसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

बचपन में कलम थमाई थी आपने, आज वो कलम झुमती है एसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

गली में देख आपको, डरता था मैं भी, ये मीठा डर लाऊ कैसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

दुनिया के सामने जीना सिखाया, ये तरिका अब आझमाऊ एसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

पाठशाला से लेकर आज तक की दूरी, समजा ना पाऊ ये सफर एसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

दुआ से आपकी ख्वाब भी पीछे छुटा, पता नही था मंजिल मीलेगी एसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…

जिंदगी भर चुका न पाऊ इस ईमारत की किंमत, आपकी याद रहेगी बेशक एसे
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे…
ये कामयाबी की ईमारत छोड जाऊ कैसे… Happy Teacher’s Day…

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Responses

  1. कामयाबी की इमारत और बुलंद हो। जीवन में उत्तरोतर प्रगति हो। भाव-भाषा पर पकड़ मजबूत कर अपनी भावनओं को ऐसे ही अभिव्यक्त करते रहें। यह प्रभु श्रीरामजी से प्रार्थना है। बहुत-बहुत बधाई औऱ साधुवाद

  2. कामयाबी की इमारत के माध्यम से अपनी भावनाओं को सुंदर तरीके से व्यक्त करने के लिए जैडी का आभार। ऐसे ही लिखते रहें और कामयाबी के शिखर को छूते रहें।

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