परिंदा

सोये हुए मेरे अरमानों को उठाने आया था कोई,
कल रात मुझको चुपके से जगाने आया था कोई,

के एक उम्र बीत गई थी अँधेरी चार दिवारी में मेरी,
खुले आसमाँ में मुझको सैर कराने आया था कोई,

हार कर यूँही छोड़ दिए थे जब हाथ पैर अपने मैंने,
तब परिंदे सा हौसलों के पंख लगाने आया था कोई॥

राही अंजाना

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4 Comments

  1. Antariksha Saha - August 19, 2019, 2:37 pm

    Bahut khoob bhai

  2. Abhilasha Shrivastava - August 20, 2019, 6:11 am

    Ur ideas force us to read ur poems… Too good

  3. Poonam singh - August 22, 2019, 11:04 am

    Good one

  4. Neha - September 6, 2019, 8:31 pm

    Wah

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