एक सुनहरी धूप थी तुम ओ सखी !!

एक सुनहरी धूप थी तुम ओ सखी !
पर गैर की टुकड़ी में तुम जा मिल गई ।
ना सोच पाई मैं ना संभल सकी
बस अकेली थी अकेली रह गई ।।

Comments

4 responses to “एक सुनहरी धूप थी तुम ओ सखी !!”

  1. Master sahab

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    1. जी बिल्कुल बहुत-बहुत धन्यवाद आपका

  2. बहुत ही उच्च कोटि का लेखन मनोहर से अपनी सखी को मनाते हुए रचना

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