छोड़कर इन आंसुओं को
छोड़कर इन आंसुओं को,
भाग ना सके।
और थाम भी ना सके।
गिरते रहे उसके बूंदों की तरह,
और मौसम जवां करते रहे।
जमी कुछ पथरा गई थी, इन आंखों की।
बिखरते रहे और इसे संदल करते रहे।
छोड़कर इन आंसुओं को,
भाग ना सके।
और थाम भी ना सके।
गिरते रहे उसके बूंदों की तरह,
और मौसम जवां करते रहे।
जमी कुछ पथरा गई थी, इन आंखों की।
बिखरते रहे और इसे संदल करते रहे।
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क्या बात है!❤😍
बहुत-बहुत धन्यवाद समीक्षा के लिए
अतिसुंदर रचना
हौसला बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर
बहुत सुंदर पंक्तियां
मार्गदर्शन करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर
अतिसुंदर
Thanks
बहोत ही बढ़िया रचना!
धन्यवाद
Awesome line
धन्यवाद सर
Good
Thank you