मुक्तक

न मैं तुलसी जैसा हूँ ,और न मैं खुसरो जैसा हूँ,
मेरी कल्पना अपनी है ,सच नहीं दुसरो जैसा हूँ ।

हम सभी एक ही ग्रन्थ के ,हाँ हर पन्नो सिमटे है,
छन्दों में जो सिमट जाऊ तो,सुंदर बहरो जैसा हूँ ।।

लालजी ठाकुर

Comments

4 responses to “मुक्तक”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Nice

  2. राम नरेशपुरवाला

    सुन्दर

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