किसान

दो रोटी देने को तुमको,
रह जाता है भूखा वो;
दूध-दही देने को तुमको,
खा लेता है सुखा वो,
कभी बारिश कभी जाड़े में;
फसल हो जाती हैं चौपट,
माँगता है बस मेहनताना;
नहीं माँगता वो फोकट।
बेईमानी चोरी आदि से,
रहता कोसो दुर है;
चलता सन्मार्ग पर वह है,
करता मेहनत भरपूर है;
फिर भी दशा वही है उसकी,
स्तर नहीं सुधरता है
करता हैं क्यों आत्महत्या?
दुख से क्यों गुजरता है?

Comments

13 responses to “किसान”

  1. सुरेन्द्र 'सुरेश' Avatar
    सुरेन्द्र ‘सुरेश’

    अत्यंत सुंदर कविता

    1. सुरेन्द्र 'सुरेश' Avatar
      सुरेन्द्र ‘सुरेश’

      धन्यवाद

  2. DV Avatar

    अन्नदाता की व्यथा का सटीक चित्रण .. सुंदर रचना

    1. सुरेन्द्र 'सुरेश' Avatar
      सुरेन्द्र ‘सुरेश’

      धन्यवाद चाचा जी

  3. Abhishek kumar

    Gr8

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