इस महामारी में
आमजन के कष्टों की दासताँ
जानना हो तो
बस एक दिन गुजारिए
उनके बीच, उनसे मिल,
जिनके दिन बितते
आजीविका तलाशते
रातें बीतती आने वाली
परेशानियोंको गिन।
हमें तो बस उन्ही नीतियों की
आश और दरकार है
जिनसे पेट उनका भर सके
जो हो गये बेरोजगार हैं ।
सरकारी राहतों से,
ज़रूरतें पूरी होती नहीं
मिले अनाजों से,
भूख मिटती नहीं
हर जगह फैला भ्रष्टाचार है।
सिर्फ चावल, गेहूं के सहारे
कैसे घर- परिवार चल पाएगा
गैस की किल्लते, बढती महंगाई
मुँह चिढ़ाते सामने आ जाएगा
अंतहीन समस्याओं से जीना दुष्वार है ।
अंतहीन समस्याएँ
Comments
6 responses to “अंतहीन समस्याएँ”
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गरीबों और बेरोजगारों की लाचारी का यथार्थ चित्रण करती हुई बहुत ही भावुक रचना ।
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सादर आभार गीता जी ।
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वर्तमान में जो कुछ हो रहा है
उसका बहुत सुंदर चित्रण
गरीबी तथा बेरोजगारी से अवगत कराती सुंदर कविता-

सादर धन्यवाद
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सादर आभार
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सुंदर
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