बेजान हुए पत्तों-सा जीवन
भूमि पर आकर बिखर गया
वृक्ष की डाली रही अकेली
पत्ता भी पीला पड़ गया
यह सब देख के वृक्ष ने बोला-
ओ डाली ! तू क्यूं
इतना संताप करे
रोज ही गिरकर जाने कितने
पत्ते मिट्टी में मिल गये
मैं कितनों पर आँसू बहाऊं
और कितना विलाप करूं
एक पत्ते के गिर जाने पर
क्यों अपना जीवन बर्बाद करूं
आज गिरा है जो पत्ता तो कल फिर से किसलय होगा
तेरे अधूरे तन पर डाली !
कल फूलों का सहरा होगा
बेजान हुए पत्तों-सा जीवन
Comments
4 responses to “बेजान हुए पत्तों-सा जीवन”
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बहुत खूब
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Tq
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अति सुन्दर भाव
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Tq
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