अंजान है जमाना और कुछ अपनो का बहाना है
कहने को उमर भर पर, दो पल का अफसाना है,
लिखे शब्दो मे था जहा सारा, पर हमे हकीकत का दीदार है
चुन-चुन के पत्थर जो आशियाना बनाया, वो काफी वक्त से विरान है,
अब भिखरे मलवे को समेट रहे, एक छत फिरसे हम टेक रहे
पर हल्की-हल्की छींटो से हम अब भी देखो भीग रहे,
आशियाना अब ईमारत हुइ, कुछ तस्वीर पुरानी रखी है
गुलशन था जो ये आगन कभी, पर ये चीज पुरानी लगती है।
हकीकत

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