Author: Prabhat Pandey

  • अजनबी

    आज किसी ने सोये हुये
    ख्वाबों को जगा दिया
    भूली हुई थी राहें
    भटके हुये मुसाफिर को मिला दिया
    जिंदगी का फलसफा जो
    कहीं रह गया था अधूरा
    मुरझाई हुई तकदीर को
    जीने के काबिल बना दिया
    देना चाहता था मुझे बहुत कुछ
    मगर उसे क्या पता था
    उसकी चाहत की उसी आग ने
    मेरा दामन जला दिया
    बस राख के कुछ ढेर बाकी थे
    वक्त की तेज़ आंधी ने उनको उड़ा दिया
    खाली पड़े उन मकानों में
    परछाईयाँ ही तो बस बाकी हैं
    वरना हालत के इस दौर ने
    सब कुछ मिटा दिया …..

  • महेंद्र सिंह धोनी प्राउड ऑफ़ इंडियन क्रिकेट टीम

    जब जब गरजा धोनी का बल्ला
    विश्व पताका लहराई
    1983 के बाद ,2011 में ट्रॉफी आई
    स्टम्पिंग और बैटिंग देखकर जिसकी
    दुनिया स्तब्ध हो जाती थी
    शान्त रहकर कैसे देते हैं मात
    धोनी ने ही सिखायी थी
    फौलादी था जिगर जिसका
    न झुकने वाला हौसला था
    दुनिया ने माना था लोहा
    जब हेलीकॉप्टर शॉट निकला था
    २८ साल का ख्वाब जब कोई पूरा न कर पाया था
    अपने सिक्सर से जीत दिलाकर
    धोनी ने ही जश्न मनवाया था
    कभी धोनी की उड़ती जुल्फों का
    मुशर्रफ ने गुणगान गाया था
    अपने कप्तानी की कूटनीति से
    पाकिस्तानियों को नचाया था
    जब झुक गए थे भारत के कन्धे
    देश को टी 20 विजेता बनवाया था
    जब चल रहे हों आखरी ओवर
    धोनी का बल्ला आग उगलता था
    ऐसे ही नहीं चेन्नई सुपर किंग्स को
    आईपीएल विजेता बनाया था
    महेंद्र सिंह धोनी ही वह नाम है
    जो कप्तानों का कप्तान है
    वह शूरवीर योद्धा ही नहीं
    पूरे भारत का अभिमान है
    धोनी तुम्हारी खेली पारियों के सम्मत
    मैं शीश झुकाता हूँ
    आगे भी हो उज्जवल भविष्य तुम्हारा
    ईश्वर से यह मनाता हूँ …

  • गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    जहाँ रिश्ते तो हैं ,वह मिठास नहीं
    जहाँ मिट्टी तो है ,पर खुशबू नहीं
    जहाँ तालाब तो है ,पर पानी नहीं
    जहाँ आम बौराते तो हैं ,पर सुगन्ध का महकना नहीं
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    यहाँ लोग बेगाने से हो गये
    लोग सुख साधन के भूंखे हो गये
    गांव अब शहरों में तब्दील हो गये
    गांव अब चकाचौंध से लबरेज हो गये
    बुजर्गों के आशिर्वाद में
    जो स्नेह कीर्ति का भाव था
    पाश्चात्य संस्कृति में ,कहीं विलुप्त हो गया
    मिल जुल कर पर्व मनाने की भावना
    अलगाव समय रूपी भट्ठी में जल गयी
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं
    आदमी को आदमी से मिलने की फुर्सत कहाँ
    इन्सानियत और भाईचारा शहरीकरण में खो गया
    आधुनिकता का नशा हर व्यक्ति पर छा गया
    जो छलकता था प्यार ,वो दिखावा बनकर रह गया
    पैसों के लिए हर शख्श पलायन कर गया
    विश्वास का घर अब खण्डहर बन गया
    गांव की ज़िन्दगी ,अब पहले जैसी नहीं….

  • हमने वक्त को अच्छे से आजमाया है

    वक्त ने किससे क्या क्या न करवाया है
    कभी रोते को हंसाया है तो कभी हँसते को रुलाया है
    कभी ख़ुशी से दामन भर देता है तो कभी
    ग़मों को तकदीर में शामिल कर देता है
    गम और ख़ुशी पर तो वक्त की चिलमन पड़ी है
    जब जिसके चिलमन को गिराया है
    तो वक्त सामने आया है
    वक्त ने किसी का इंतजार कब किया
    हर आदमी वक्त के हांथों मजबूर हुआ
    वक्त ने किससे क्या क्या न करवाया है
    कभी रोते को हंसाया है तो कभी हँसते को रुलाया है
    कई बार वक्त ने मुझे भी तड़पाया है
    हर जगह मैंने फिर भी खुद को समझाया है
    वक्त ने मुझे कभी कभी इस तरह आजमाया है
    कि हर लम्हे आँखों में आंसुओं को पाया है
    वक्त और हालात ने
    ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा किया है
    कि न चाहते हुए भी खुद को मजबूर पाया है
    होठों पर झूठी मुस्कुराहट को पाया है
    आज हमने वक्त को अच्छे से आजमाया है ….

  • 15 अगस्त , स्वतंत्रता का पर्व

    बहुत देखी गमगीन गुलामी आजादी के वीरों ने
    कतरा कतरा बहा दिया भारत माता के चरणों में
    भारत देश हमारा सोने की चिड़िया कहलाता था
    देश का परचम खुले गगन में लहर -लहर लहराता था
    आजादी का अखण्ड दीप तब नित नवनित होकर जलता था
    सतयुग ,त्रेता ,द्धापर युग का संस्कार तब मन में बसता था
    राम कृष्ण के पद चिन्हों पर हर मानव अपनी रचना रचता था
    आया कलियुग कुटिल नीति का दुश्मन ने पासा खेला
    भारत माता के चरणों को अपनी गद्दारी से तोला
    हुये आक्रमण बार बार दुःख की काली बदरी छाई
    व्यक्तिवाद और राष्ट्रवाद की भयंकर हुई लड़ाई
    देशभक्ति और आजादी की तब हमने कसमें खांई
    खूब लड़ी मर्दानी तो पद्मावती ने जौहर दिखलाया
    छँटा अँधेरा गुमनामी का ,वीरों का बलिदान हुआ
    भारत माता की आजादी के लिए भारी एक संग्राम हुआ
    हुआ उदित सूर्य 15 अगस्त को ,धूप सुनहरी बिखर गई
    धरती से अम्बर तक नभ में प्यारी लाली छाई
    वीरों का बलिदान अमर करने की अब अपनी बारी आई
    उठा शस्त्र अब प्रेम अहिंसा का लोगों में उन्माद भरो
    हो कहीं न अब खून की होली
    दीवाली के दीप जलें
    आओ अथक प्रयासों से इस देश की नींव भरें
    पुनः जगा दें गाँधी सुभाष और तिलक की भावना जन जन में
    देश भक्ति का राग निहित हो हर मानस और जन जन में। ।

  • :कुछ पल

    कविता :कुछ पल
    नीला आकाश ,आकाश में उड़ते पंक्षी
    सागर की लहरें ,लहरों पर चलती नाव
    रिमझिम बरसता पानी ,वो ओस की बूंदे
    मानो सब कुछ कह देती हों
    ऐसा लगता है रख लूँ ,समेट लूँ सबको अपने पास
    कहीं खो न जायें डरता हूँ ,बहुत किस्मत से मिलते हैं ये पल
    कभी कभी लगता है इन पलों में ऐसे खो जाऊँ
    किसी भी चीज की रहे न कोई खबर
    सचमुच कितने सुहाने होते हैं ये पल
    ये पल कितने अपने होते हैं
    कितनी ख़ामोशी होती है इन पलों में
    फिर भी मानो कुछ कह देते हैं
    बंद लवों से सब कुछ बयां कर देते हैं
    ये पल

  • क्यों

    रक्त रंग जब एक सा है
    है सूरत सबकी एक सी
    फिर क्यों बाँटी है मानवता ,क्यों सरहद की लकीरें खींची हैं
    क्या ईश्वर ने बनाया है जाति-पाति
    यह सब मानव की करनी है
    एक ही धर्म है दुनियां में
    भिन्न भिन्न अज्ञानियों ने मानी है
    क्यों द्वेष ,अहिंसा और नफरत से
    ये प्यार की दुनिया बाँटी है
    आज इतिहास चित्कार रहा
    हमें लिख दो इतिहासकार सही सही
    हम सब हैं भारत देश के वासी
    फिर क्यूँ किसी धर्म के अनुयायी हैं
    सर्वधर्म आदर भाव बना रहे
    हम सब भाई भाई हैं
    किसी दलित को छू लेने से
    धर्म भ्रष्ट नहीं होता है
    ऐसे विचारों के कारण मंदिर में ईश्वर रोता है
    भ्रष्टाचार वह अंधकूप है ,जिसमें शोषण जल होता है
    इसी कारण इस धरती पर, दुर्बल हीन आज तक रोता है
    नहीं दिखता कि कहीं भी ,प्यार आदर संस्कार है
    क्यों चहुँ ओर फैला व्यभिचार है
    क्यों झोपड़ियों से महलों तक , घनघोर अँधेरा फैला है
    कुंठित हैं सब जन जन ,सूरज भी मटमैला है
    मन्दिर मस्जिद खूब बने हैं ,गिरजा गुरुद्वारों की कमी नहीं
    क्यों मानव ह्रदय स्थल में ,परोपकार की जगह नहीं
    क्यों सांस यहाँ टूटे सपनों सी ,आँखों नींद न आती है
    वेदना की परिभाषा इतनी
    कोई छाँव नहीं भाती है …..

  • नशा

    ये नशा जो युवाओं के रक्त में घुल रहा है
    चलती फिरती लाशों का ये जहान हो रहा है
    जीवन की बगिया में खिलते पुष्पों को दबा रहा है
    कंकालों और हड्डियों की दुनिया बसा रहा है
    अपराध बढ़ रहे हैं ,गृह कलह हो रही है
    असमय सुहागिनें विधवा हो रही हैं
    बच्चे अनाथ हो रहे हैं, बेवक्त बुढ़ापा आ रहा है
    माँ बाप का सहारा ,बोझ बनता जा रहा है
    ये रक्त पी रहा है ,खोखला जिस्म कर रहा है
    मौत अँधेरे की ओर ,जिंदगी ले जा रहा है
    मान सम्मान जा रहा है ,सोंच गर्त में मिला रहा है
    इंसान मन को कुंठित बना रहा है
    नशे की मार से पूरा देश तड़प रहा है
    ये जीवन सुबह को संध्या बना रहा है
    नशा है बुरा ,इससे जीवन में न कोई आस है
    सोंच ले समझ ले ,अभी भी वक्त तेरे पास है
    फिर से खुशमयी जीवन ,पाने की अभी आस है
    गर समय निकल गया तो बाद में पछतायेगा
    नशा मुक्त भारत का सपना ,सिर्फ सपना रह जायेगा ….

  • चलता जा रहा है सुबह शाम आदमी

    कहीं खो गया है आभासी दुनिया में आदमी
    झुंठलाने लगा है अपनी वास्तविकता को आदमी
    परहित को भूलकर स्वहित में लगा है आदमी
    मीठा बोलकर ,पीठ पर वार करता है आदमी
    चलता जा रहा है सुबह शाम आदमी
    पता नहीं किस मंजिल पर पहुँच रहा है आदमी
    अपनी तरक्की की परवाह नहीं है
    दूसरों की तरक्की से ,जल भुन रहा है आदमी
    मन काला है ,पर ग्रंथों की बात करता है आदमी
    दूसरों को सिखाता है ,खुद नहीं सीखता है आदमी
    अपने अन्दर अहम को बढ़ा रहा है आदमी
    पर सुव्यवहार की उम्मीद,दूसरों से कर रहा है आदमी
    क्यूँ आज भीड़ के बावजूद ,हर कोई है अकेला
    दिलों में बसा हुआ है तू मै का झमेला
    बंट गयी है सारी ज़मीन ,ऊँची ऊँची इमारतों में
    या फिर घिर गयी ज़मीन कोठियों की दीवारों में
    सत्य है ,टूटे ख्वाबों की नीव पर खड़े ये ऊँचे महल
    इस ऊंचाई को भी एक दिन जमीन पर सोना है
    अपनी जरूरतों और इच्छाओं की मत सुन
    सब कुछ पाने के बाद भी इसे खोना है
    धर्म मजहब भी ये कहते हैं
    हर एक प्राणी से तुम प्रेम करो
    गीता ,ग्रन्थ ,कुरान में लिखा है
    नेक चलो सब का भला करो
    जिस शक्ति ने किया है पैदा
    भेद किसी से किया नहीं
    प्रेम ,संस्कारों के सिवाय रब ने कुछ लिया नहीँ
    वक्त की बात मानकर ,अब बदलना होगा हमें
    हर धर्म मजहब का अदब करना होगा हमें
    अभिमान और नफ़रत से सिर्फ मिलता है पतन
    आओ सब मिलकर बनाएं एक सपनों का वतन।।

  • वक़्त

    इंसान एक कठपुतली है ,जो वक्त के हाथों चलती है
    आती जाती सांसों पर ,वक्त की गिनती रहती है
    वक्त जब अंगड़ाई लेता है ,सूर्य ग्रहण लग जाता है
    वक्त सौदागर होता है ,प्रतिपल जीवन संग खेलता है
    समय जब निर्णय करता है ,इंसान सिर्फ बेबस होता है
    अपनापन तो हर कोई दिखाता
    पर अपना कौन है ये वक्त बतलाता
    बिना वक्त की इजाजत के ,कोई काम न जग में होता है
    जान यह सच्चाई सब ,क्यूँ व्यर्थ वक्त को खोता है
    आदर्श विचारों को जग में
    वक्त ने उच्च मुकाम दिलाया है
    मुगलों ,अंग्रेजों के दम्भ को
    मिट्टी में भी मिलाया है
    समय आवाज लगाता है ,असाधारण हूँ बतलाता है
    जब वक्त अच्छा होता है ,इंसान सर्वोपरि होता है
    बुरा समय जब आता है ,राजा रंक बन जाता है
    सोना भी मिट्टी बन जाता है
    जीवन में नैराश्य समाता है
    इंसान की बिसात ही क्या
    समय संम्मुख ,प्रबल पर्वत भी झुक जाता है
    नेता की गद्दी छिन जाती है ,बुद्धिमान की मति फिर जाती है
    समय नहीं है ठहरा पानी
    समय समेटे कई कहानी
    याद दिलाए सबकी नानी
    समय की सीमा आनी जानी….

  • परिश्रम ही है सफलता की कुंजी

    परिश्रम की अग्नि में तपकर सफलता का रंग बिखरता है
    काटों का भी संग देखो ,फूलों को नहीं अखरता है
    इस दुनिया में कुछ करके दिखाओ
    दिन जल्दी जल्दी ढलता है
    बीज भी तो मिट्टी में मिलने पर ही फलता है
    खुशियों के फल ही मेहनत के वृक्ष पर लगते हैं
    आशाओं के दीपक मेहनत रूपी तेल से जलते हैं
    संग मेहनत के ,ईश्वर भी चलने लगता है
    घोर अंधेरों में भी ,प्रभात निकलने लगता है
    इस जीवन रूपी युद्ध भूमि में
    कीर्ति के लिए ,श्रम करना पड़ता है
    ईश्वर सिर्फ जीवन देता है ,रंग हमको भरना पड़ता है
    जिसे देखा न हो दुनिया ने
    तुम कुछ ऐसा कर जाओ
    पानी है सफलता तो
    मेहनत रूपी पर्वत पर चढ़ जाओ
    किस्मत के सहारे जो चलते हैं
    असफलता ही अंत गले लगती है
    अथक प्रयासों से मिली सफलता ,सदियों तक गूंजती है
    केवल स्वप्न देखने से ,स्वप्न सच नहीं होते हैं
    सपने वो सच होते हैं ,जो मेहनत से सिंचित होते है….

  • : एक ख्वाब एक हकीकत

    मेरे ख्वाबों में है एक तस्वीर
    दिल पर लिखा है एक नाम
    अनदेखी नज़रें मिलने को हैं बेकरार
    जिनमें होगा बस प्यार ही प्यार
    दूर से ही कदमों की आहट सुनाई देती है
    और दिल जोर से धड़क जाता है
    याद करके तुम्हारे हसीन पलों में खोजता है
    तभी एक ठंडी हवा का झोंका
    ख्वाबों से हकीकत में लाता है
    ख्वाबों की परछाइयां फिर भी नहीं जाती हैं
    और बस उन ख्वाबों में खो जाना चाहती हैं
    जुदाई में आग सी तपिश होती है
    मिलन में फूलों की खुसबू होती है
    हर ख्वाब में एक हकीकत होती है.

  • आज देखो दुनिया क्या से क्या हो गयी

    हंसी ख़ुशी कहीं ,गम की वादियों में खो गयी
    आज देखो दुनिया क्या से क्या हो गयी
    दूसरों की सफलता पर ,जो बजती थी तालियाँ
    वो तालियाँ अब कहीं चिरनिद्रा में सो गयी
    दूसरों की ख़ुशी के लिए ,होती थी जो प्रार्थना
    वो प्रार्थना कुरीतियों के छीर में कहीं खो गयी
    छलकती थी आँखें जो औरों के दुःख पर
    वो भावनाएं मद के दलदल में कहीं खो गयीं
    आज देखो दुनिया क्या से क्या हो गयी
    अमन चैन की दुनियां ,क्यूँ वीरान हो गयी
    मिलते नहीं हैं दिल ,आज दूरियां हो गयी
    हीर रांझा सी मोहब्बत ,अब दास्तां हो गयी
    सच्ची मोहब्बत झूठे वादों में खो गयी
    आज देखो दुनिया क्या से क्या हो गयी
    दोस्ती वफ़ा की बहार न जाने कहाँ गयी
    दूरियां इतनी दिलों के दरमियां हो गयी
    आदमी पैसा नहीं ,पाप अर्जित कर रहा
    उन्ही से लोगों की नजदीकियां हो गयीं
    इंसानियत भाईचारा बीते युग की बातें हो गयीं
    हर तरफ बस नफ़रत की बोलियां हो गयीं
    कूदते फांदते अब बच्चे नहीं दिखते
    कमरों में बंद बच्चों की ,अटखेलियां खो गयी
    आज देखो दुनिया क्या से क्या हो गयी

  • पर्यावरण है धरा का आभूषण ,इसको खूब सजाओ

    पर्यावरण है जीवन हम सब का ,आओ इसका सम्मान करें
    क्यों बिगड़ रहे हालात ,इस बात का ध्यान करें
    हरियाली क्यों ख़त्म हो रही ,धधक रही क्यों सूर्य की ज्वाला
    बढ़ता प्रदूषण बना रहा ,हिम खण्ड को अपना निवाला
    वन उपवन हमने काट दिए ,वायु भी प्रदूषित कर डारी
    है वातावरण भी मैला अब ,छीर सिंधु भी है प्रदूषित भारी
    यमुना मैली ,गंगा मैली ,बादल लाते अब वर्षा मैली
    तुम्हारी उन्नति के धुवों से ,हो रही है यह हवा विषैली
    जहरीले धुवों से अब तो ,प्रदूषण चारों ओर फैला है
    अधाधुंध कटाई से पेड़ों की ,पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है
    खेल किसने है प्रकृति का बिगाड़ा ,किसके लालच ने दुनिया को मारा
    है खतावार कोई नहीं ,आदमी का दोष है सारा
    प्राकृतिक आपदाओं से ,यदि अब बचना है
    छेड़छाड़ उससे मत करिए ,जो कुदरत की रचना है
    पर्यावरण अगर बचाना है ,तो सच्चे मन से यत्न करो
    हरे भरे वृक्षों को पालो ,नव वृक्षारोपण नित्य करो
    वरना वह दिन दूर नहीं
    हमसे यह प्रकृति बदला लेगी
    जीवन जीना मुश्किल होगा ,पल पल सांस घुटेगी ….
    अब भी सम्भव है मेरे भाई ,खुद जागो और जगाओ
    पर्यावरण है धरा का आभूषण ,इसको खूब सजाओ

  • कटु सत्य

    दिल में कुछ ,जबान पर कुछ नजर आता है

    अपनों में भी ,शत्रु नजर आता है

    कुछ पलों की मुलाकात से ,पहचान नहीं सकते

    किसी के ह्रदय में क्या है ,जान नहीं सकते

    हर चेहरे के पीछे ,एक चेहरा छिपा होता है

    जैसा जो दिखता है ,वो वैसा नहीं होता है

    आंखें भी कई बार धोखा खा जाती हैं

    ये भी चेहरों की भाषा ,पढ़ नहीं पाती हैं

    जिंदगी के मंच पर हर किरदार ,एक चेहरे से ढका होता है

    पर जाने क्यों इंसान का चेहरा ,उसके दिल के चेहरे से जुदा होता है

    देखा है मैंने भी दुनियां में ,उन नकली चेहरों को

    जो अपनों में, अपने पन की बातें करते हैं

    दिल में कड़वाहट लेकर ,लोग चेहरे पर मुस्कराहट रखते हैं

    आज की दुनियां में ,इतनी जल्द कुछ नहीं बदलता है

    जितना की इंसान की नियत और नज़रिया बदलता है

    ख्वाहिशें तो ,बादशाहों की भी पूरी हो न सकीं

    फिर न जाने इंसान क्यों दो चेहरे लेकर जीता है

    आज इंसान गिरकिट सा रंग बदलता है ,ठोकरें खाकर ही वो संभलता है

    असली चेहरे के पिछे लोग,चेहरा नकली लगाते हैं

    ज़ख्मों में नमक लगाते है,हाय तौबा मचाते हैं

    तलाश कैसे करें इन्सानियत की,लोग कितने चेहरे पे चेहरे लगाते हैं

    सोंचो तुमसे तो वो जानवर अच्छे ,जो भरोसे के लायक होते हैं

    बहुत प्यार करते हैं हम अपनी,इन नकली सूरतों से

    क्यूंकि हमारे जहां में असली सूरतों सा,जहाँ नहीं होता है

    अगर बदलना है रूप ,तो अच्छाई के लिए बदलो

    यही सोंच तुम्हे आगे ले जाएगी

    तुमको तो ख़ुशी मिलेगी ,दूसरों को भी ख़ुशी दे जाएगी।।

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