Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • अपना इलाहाबाद

    कविता- अपना इलाहाबाद
    ———————————–
    दिन भर टहल रहे थे,
    पार्क सहित संगम में,
    देख दशा हम शोक में डूबे,
    अपना इलाहाबाद है ऐसा|
    एक तरफ तो न्यायालय है,
    एक तरफ संगम है,
    एक तरफ तो शिक्षा मंदिर,
    एक तरफ जमुना की धारा है|
    यहीं पड़ा-
    स्वराज भवन भी,
    यहीं खड़ी-
    आजाद की मूरत भी|
    सब कुछ मिलेगा जो चाह तेरी,
    प्यार मोहब्बत –
    राजाओं का चिन्ह मिलेगा,
    जहां से आजादी की गूंज उठी,
    वह तुमको स्वराज भवन मिलेगा,
    मिले अतीत से तो ,मन हर्षित होता,
    अपना इलाहाबाद है ऐसा|
    जो सोच रही
    गांधी नेहरू वीर जवानों की,
    रोटी बेटी शिक्षा स्वास्थ्य,
    सब के पास सुरक्षित घर होगा,
    आओ दिखाएं शहरों में,
    कोई नन्हा सा बच्चा कूड़ा बिनता होगा|
    देख दशा-
    शासन से पूछ रहा हूं,
    कैसी व्यवस्था-
    व्यवस्था की क्या परिभाषा है?
    छोटे बच्चे पलते भीख के सहारे,
    जहां पर संगम बसता है,
    देखता हूं अपनी आंखों से,
    कुछ जूठा समोसा खाते हैं,
    भूख मिटाने के खातिर-
    हाथ पसारे पार्कों में घूम रहे,
    मिला नहीं भोजन का टुकड़ा,
    मनमाना गाली पाते रहे,
    एक लड़की दौड़ी अंकल अंकल कह,
    मेरे पास वो आई हाथ पसारे,
    मैले गंदे बालों में
    फटे पुराने कपड़ों में,
    हमें पैसा दे दो ,हमें भूख लगी हैं,
    हम पूछे तेरे घर में कौन-कौन है,
    बोली सब कोई है-
    बस मम्मी ना, पापा है,
    पापा पी के दारु सोते हैं,
    घर का खर्चा भीख सहारे चलता है|
    अब किससे पूछें,
    इसका दर्द सुनाएं|
    जनता को दारू मिल गई,
    इन बच्चों को भोजन नहीं
    लाखों में है भवन बने,
    इनके परिजन में शिक्षा ना,
    कहें ‘ऋषि’ निकलो पूंजीपतियों सब,
    चलो गांव शहर में देखें,
    कोई नंगा भूखा सोया होगा,
    गुरुओं से भी कहता हूं,
    उन्हें भोजन देकर-
    शिक्षा मंदिर में लाना होगा|
    ना फिर कोई कूड़ा उठाएं,
    बच्चों के कंधों से, कूडे का बोझ हटाना होगा,
    शहर गांव के स्कूलों में,
    सस्ती सुंदर रोजगार परक,शिक्षा को लाना होगा,
    फिर चमके फिर महके
    खुशहाल रहें अपना इलाहाबाद हो ऐसा|
    —————————————————
    ***✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——-

  • *बचपन*

    कागज़ की कश्ती चलती थी
    कागज़ का जहाज़ भी उड़ता था,
    थे अमीर बहुत तब हम,
    वो बचपन कितना, अच्छा था
    सखियों संग ,उपवन में जाकर
    आंख-मिचौली खेली थी,
    स्वादिष्ट बहुत लगता था
    वो आम जो थोड़ा कच्चा था,
    हां, बचपन कितना अच्छा था
    मित्र मतलबी ना होते थे,
    अपना टिफिन खिलाते उसको
    जो भूल गया था, लाना घर से
    कक्षा का कोई भूखा बच्चा था,
    वो बचपन कितना अच्छा था..

    *****✍️गीता

  • हवा को मोड़ लो ना तुम

    करेला हूँ मगर इतना भी कड़वा मत समझना तुम,
    जरा सा भून लेना फिर नमक के साथ लेना तुम।
    हवा की कुछ नहीं गलती उसे क्यों दोष देते हो,
    जरा मेहनत करो बहती हवा को मोड़ लो ना तुम।
    जरूरी है नहीं हर चीज अपने मन मुताबिक हो,
    कड़ी मेहनत से जो पाओ वहीं संतोष रखना तुम।
    हजारों लोग होंगे एक भी परिचित नहीं होगा,
    उन्हीं में एक को अपना बनाना प्यार करना तुम।
    प्यार करना, बहुत करना, मगर उस प्यार के खातिर,
    गांव में वृद्ध माता है उसे मत भूल जाना तुम।

  • कर्मठ

    जिन्दगी में भले ही हमें
    आलसी लोग काफी दिखें,
    पर कई इस तरह के हैं कर्मठ
    अंत तक काम करते दिखे।
    एक काकी है दुर्बल मगर
    ऊंचे-नीचे पहाड़ी शहर में,
    सिर से ढोती है भारी सिलिंडर
    हांफती जा रही है वो दिनभर।
    वृद्ध दादा जी फुटपाथ पर
    उस कड़ी धूप में बैठकर
    फर्ज अपना निभाते दिखे
    जूते-चप्पल की मरमत में खप कर।
    वो मुआ तो है चौदह का बस
    जब से होटल में बर्तन घिसे हैं,
    माँ बहन आदि परिवार के
    तब से सचमुच में गेहूँ पिसे हैं।
    एक है हाथ उस आदमी का
    बस उसी से हथौड़ा उठा कर
    पत्थर की रोड़ी बनाता
    परिवार को पालता है।

  • जीवन परिभाषा

    धर्म ईमान -इन्साफ को मानकर
    आदमी बनकर तुम जगमगाते रहो
    त्याग से ही मनुज बन सका देवता
    देवता बन सबों में समाते रहो ||
    न घबराओ तुम संघर्षों से कभी
    तूफानों में भी उगता तारा है
    चलते चलते थक मत जाना कहीं
    विश्वास जगत का एक सहारा है
    पथ की बाधा न होगी कहीं
    सिर्फ आशा का दीप तुम जलाते रहो ||
    शान्ति मिलती नहीं मन को कभी
    काया जब तक ,इच्छाओं की दासी है
    फैलती दीप्ति व्यक्तित्व की ,ढोंग आडम्बरों से नहीं
    ईश्वर अन्तर्यामी ,घट घट वासी है
    धन सम्पत्ति वैभव पास होगा तेरे
    बिन सन्तोष न होती ,दूर उदासी है
    रूप जीवन का तेरा निखर जाएगा
    आत्मदर्पण सदा तुम ,निहारते रहो ||
    तंगदिली के चकमे में न आना कभी
    ठोकरें उसके सर पर जमाते रहो
    धन के मद में न अन्धे बनो भूलकर
    हाथ दुःख में सबों के बंटाते रहो
    ये महल और दुमहले
    बंजारों के डेरे हैं
    दूसरों के लिए चोट खाते रहो ||
    ‘प्रभात ‘ सम्प्रदाओं की सीमाओं का ,न कोई अर्थ है
    रूढ़ियों की कगारों को ढहाते रहो
    न परतंत्र हो साँस नारी की कोई
    अशिक्षित इरादों को मिटाते रहो ||

  • सिलिंडर न मिला

    उज्ज्वला का सिलिंडर
    सबको मिला,
    सब खुश थे,
    मगर वो रात भर सो न पाई।
    यह सोचकर कि –
    कोई मेरा नाम भी
    लिस्ट में जोड़ देता
    एक वोट तो मैं भी थी
    उसकी आंखें भर आईं।
    इधर दौड़ी उधर गई
    गांव के मुखिया के पास गई
    उसने लिस्ट देखी,
    बोला आपका नाम नहीं है,
    गलती मेरी नहीं
    मुझसे पहले वालों की रही है।
    अब तुम जाओ
    जो हो पायेगा करेंगे,
    तुम्हारी चिट्ठी बनाकर
    ऊपर को भेजेंगे,
    खुश होकर घर को आ गई,
    सिलिंडर कभी न मिला
    दूसरी पंचवर्षीय आ गई।

  • अंत्योदय राशनकार्ड

    उस गरीब माँ का
    अब
    अंत्योदय राशनकार्ड से
    नाम कट गया है,
    क्योंकि उसका बेटा
    पिछले महीने
    अठारह बरस का हो गया है,
    औऱ उसने आठ सौ का
    मोबाइल भी खरीद लिया है।
    डेरी से लोन लेकर
    गाय भी खरीदी है,
    बात सौ आने सीधी है,
    अठारह का बेटा, मोबाइल फोन,
    दुधारू गाय
    ये तीनों मानक उसे
    अमीर की श्रेणी में पहुंचा चुके हैं,
    इसलिए गांव के मुखिया जी उसका
    राशनकार्ड बन्द करवा चुके हैं।

  • वह पत्थर तोड़ती थी

    वह पत्थर तोड़ती थी
    पर दिल की कोमल थी
    अपने सीने से लगाकर
    बच्चों को रखती थी
    भूँख जब लगती थी उसको
    तो बासी रोटियाँ पोटली से
    निकाल कर खा लेती थी
    पर अपने बच्चों को
    छाती का दूध पिलाती थी
    अन्न का दाना जब नसीब होता था
    तो गाना गाते हुए भोजन बनाती थी
    मेरी कविता का जो विषय बनी है आज
    वो मेरे गाँव की काकी कहलाती थी…

  • आँसुओं को लिखती हूँ मैं

    तुम्हारे लिए ही तो गजल,
    नज्में लिखती हूँ मैं
    मैं तो कुरान में भी
    पढ़ती हूँ तुम्हें |
    तुम्हें खो देने का खयाल
    इतना तड़पा देता है मुझे
    रात को जब भी आँख खुलती है
    बस तुझी को ढूंढती हूँ मैं |
    ये कविता ये गीत
    सौगात है बस तुम्हारी
    तेरी बेवफाई से ही तो
    तुलसीदास बनी फिरती हूँ मैं |
    लोग कहा करते हैं
    मैं बहुत अच्छा लिखती हूँ
    उन्हें क्या पता तेरा ही
    दिया दर्द लिखा करती हूँ मैं |
    सब करते हैं तारीफ मेरे
    गीत, गजलों की
    पर तेरी तालियों के साज को
    तरसती हूँ मैं |
    जब नहीं बनती है कोई
    कविता मुझसे तो
    तेरी गली में कदम रखती हूँ मैं |
    लोग बेवजह ही मुझे
    कवयित्री कहते हैं
    तुझसे ही दर्द पाकर
    आँसुओं को लिखती हूँ मैं |
    *********************

  • भोजपुरी कविता- बचावल ना गइल |

    भोजपुरी कविता- बचावल ना गइल |
    होत रहे ज़ोर सरेआम अबला
    केहु मान बचावल ना गइल |
    ले लिहस कातिल जान
    केहु पानी आँख बहावल ना गइल |
    जात धरम देख करे राजनित,
    ई केवन नित चले लागल |
    मर्यादा हिन्दी मुस्लिम एक समान ,
    केहु ज्ञान बतावल ना गइल |
    मजहब पसंद के चाही ,
    छिंक आई त हो हल्ला मचावे लगिहे |
    आपन सरकार सजात गइल इज्जत ,
    केहु धरना लगावल ना गइल |
    मुजरिम गैर जात उनका मूह ना खुली |
    केवनों अबला जानो इज्जत चल जाय ,
    केहु हल्ला मचावल ना गइल |
    बेहू बेटी के इज्जत से का मतलब |
    भोट मिली की ना मिली जरूरी बा |
    अइसन मतलबी बेईमान नेता ,
    केहु लात से लतियावल ना गइल |
    जब जाई इज्जत आपन बहू बेटी के ,
    देखिहे लोग उनकर कुदल फांदल |
    समाज के कलंक कल्लू ,
    केहु बोटी बोटियावल ना गइल |
    औरत आबरु समान हिन्दू मुसलमान ,
    मान बेटी स्वाभिमान देश के बात पते की ,
    केहु साँच पतियावल ना गइल |
    बीच सड़क लूटा जाये इज्जत अबला ,
    देखत रहे तमासा ई कइसन सरकार |
    पकड़ के मुजरिम बेड़ि मे ,
    केहु जेल धकियावल ना गइल |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • मना नहीं कर रही है

    नजारा गजब दिखा
    किसी ऊँचे रसूख की पार्टी में,
    बचा हुआ खाना
    सामने के कूड़ादान में
    फैंका गया,
    कुछ उसके अंदर पड़ा
    कुछ सड़क गिरा,
    फिर जानवरों द्वारा
    इधर उधर
    फेंटा गया,
    सुबह वहां पर पत्थर तोड़ती
    वह माँ,
    अपने नन्हें शिशु के साथ आई,
    उसने बच्चे के लिए चटाई बिछाई,
    वो पत्थर तोड़ने में व्यस्त है
    बच्चा पास में पड़े चावल के दाने
    चाव से खा रहा था,
    वहीं पर एक सांड, कुछ चीटियों
    तमाम तरह के कीड़े-मकोडों को
    पार्टी के भोजन का
    आनंद आ रहा था।
    लोग बोल रहे थे कैसी है,
    बच्चा गिरा हुआ खा रहा है,
    मना नहीं कर रही है।

  • आज चार रोटी मिली हैं

    करीब पांच बरस के राज
    के आंखों में उस वक्त
    खुशी का ठिकाना
    नहीं दिख रहा था,
    ऐसा लग रहा था जैसे
    उस कूड़े के ढेर में
    कोई खजाना हाथ
    लग गया था।
    थैली लेकर उछला
    माँ मिल गया
    मिल गया आज का गुजारा,
    आज चार रोटी मिली हैं,
    एक बहन एक मैं
    दो आप खा लेना,
    नमक है ही
    पानी है ही,
    चल माँ पहले खा लेते हैं।
    माँ का बुलंद स्वर-
    तुम इसे लेकर
    झोपड़े में जाओ बेटा
    बहन और तुम
    दो दो खा लेना,
    मैं फिर खा लूँगी।

  • जीवन भर यह पाप करूँगा

    स्वयं टूटकर स्वयं जुडूँगा सब कुछ अपने आप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    मेरी त्रुटि थी किया भरोसा मैंने अपने यारों पर।
    समझ न पाया पग रख बैठा मैं जलते अंगारों पर।
    यदि स्नान पड़े करनी अब असहनीय पीड़ा के सर में
    करे विधाता दंड नियत यह किंचित नहीं विलाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूले की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    भेदभाव की फसल उगाकर धरा कहीं से धन्य नहीं है।
    ऊँच-नीच है धर्मकर्म तो धर्मकर्म भी पुण्य नहीं है।
    मैं शोषित वर्गों को उनका हक दिलवाकर ही दम लूँगा
    पुण्य ! क्षमा कर देना मुझको जीवन भर यह पाप करूँगा।
    विगत दिवस जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    दागी छबि का पहनावे से धवल दिखावा अर्थहीन है।
    मानवता से मुड़े मुखों का काशी काबा अर्थहीन है।
    यदि दुखियों को हँसा सका तो मैं अपने दुख विसरा दूँगा
    व्यथित नहीं हो हृदय किसी का ऐसे क्रियाकलाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    करुनाहीन चक्षु के सम्मुख करुणामय विनती क्या करना।
    निर्दयता ने जो हिय को दी पीड़ा की गिनती क्या करना।
    क्या गिनती करना नेकी की परहित अथवा हरि सुमिरन की
    बिखरा दूँगा कर की मनका फिर अनगिनती जाप करूँगा।
    विगत दिनों जो भूलें की हैं उनका पश्चाताप करूँगा।।

    संजय नारायण

  • कविता : दर्द

    जब याद तुम्हारी आती है

    दिल यादों में खो जाता है

    आँखों में उमड़ते हैं बादल

    जी मेरा घुट घुट जाता है ||

    प्यार की सूनी गलियों में

    हर वक्त भटकता रहता हूँ

    जिन राहों में साथ थे हम

    उनको ही तकता रहता हूँ

    सारा मन्जर अब बदल गया

    धुंआ धुंआ सा दिखता है

    अब तो रातों का रहजन भी

    दिन में रहबर लगता है ||

    कब तक मैं खामोश रहूँ

    किससे अपना दर्द कहूँ

    प्यार के वादों की डोली को

    कब तक लेकर साथ चलूँ

    अपना कोई बदल गया

    हर शख्स बेगाना लगता है

    उल्फत का ये ताजमहल

    अब खण्डहर लगता है ||

    अरमान भरे दिल से मैंने

    कभी उनकी तस्वीर बनाई थी

    पर भूल से उसको भी मैंने

    बस शीशे में जड़वाई थी

    खुदगर्जी के पत्थर ने

    उस शीशे को तोड़ा है

    उसने प्यार की बहती कश्ती को

    तूफानों संग छोड़ा है

    भूल गया सब ,वह वक्त न भूला

    तेरे संग जो गुजरा है

    गुजरी हुई यादों का बादल

    फिर से मन मष्तिस्क में उमड़ा है

    खुश रहो तुम ,जिओ ज़िन्दगी

    सिर्फ मेरा घर ही उजड़ा है

    प्यार को जो मोल दे सके

    तू ऐसा सौदागर निकला है||

  • कृष्ण कहाँ रोता है…!!

    आज मन में विचित्र-सा खयाल आया
    मेरा मन दुःखा और भर आया
    क्यों सदियों से प्रेंम की परीक्षा होती है
    क्यों पुरुष के पीछे स्त्री रोती है
    होती क्यों है हमेशा एकतरफा मोहब्बत
    क्यों कृष्ण के लिए कोई राधा रोती है ?
    उत्तर बहुत सीधा-सा था
    कुछ जाना पहचाना-सा था
    स्त्री ही जग की दाता है
    स्त्री ही भाग्यविधाता है
    पुरुष कल भी आभारी था
    पुरुष आज भी आभारी कहलाता है
    नारी ही ममता की देवी है
    प्रेम की जीवित मूरत है
    इसीलिए किसी की खातिर
    प्रेम में कोई कृष्ण कहाँ रोता है !!
    मीरा ही गाती है भक्ति के पद
    और कृष्ण चैन की बंशी बजाकर सोता है..

  • इस बार दिवाली में

    पापा! दिवाली आने वाली है
    इस बार धनतेरस में क्या लोगे?
    हवेली वाले दोस्त के पापा
    उसके लिए
    गियर वाली साईकल ले रहे हैं।
    पड़ौस के दोस्त के पप्पा, उसके लिए
    बिग कार ले रहे हैं,
    कोई कुछ ले रहा है
    कोई कुछ ले रहा है।
    पापा! आप क्या लेंगे,
    बेटा!!
    जो लेना है
    अगली बार लेंगे,
    जब कोरोना के बाद
    दुबारा कहीं मेरी
    जॉब लग जायेगी,
    तब तक दाल रोटी
    चल जाये,
    संसार से रोग दूर हो जाये,
    शहर में काम शुरू हो जाये,
    तब खूब काम करूंगा
    जो चाहो खरीद लूँगा।

  • भावना-सद् भावना

    भावना सद्भावना
    ( 12-मात्रा )

    स्वच्छंद वितान में
    मानवीय विधान में
    शब्द की झंकार में
    गीत मधुर सुहावना
    भावना सद्भावना ..।

    तन में दिव्य शक्ति हो
    दिल में प्रेम भक्ति हो
    सदा मित्र के भाव हो
    उसे सदा सराहना
    भावना सद्भावना .।

    कालिमा से दूर हों
    सत्कर्म में चूर हो
    भारत का विकास हो
    है यही बस कामना
    भावना सद्भावना..।

    नहीं शोषित वर्ग हो
    मजहब पर न द्वंद हो
    शांति दूत सदा रहे
    यही जीवन साधना ..
    भावना सद्भावना..।

  • यही जिंदगी हो गई उसकी

    गलती उसकी कुछ नहीं थी
    कुदरत की करामात थी,
    बाजार में कालिया के इस बार
    बारह बच्चे हो गए।
    अब उनकी परवरिश में
    लग गई,
    सभी को दूध पिलाना,
    उतनों के लायक दूध बने
    ऐसा पौष्टिक आहार मिलता कहाँ है।
    दिन भर दर्जनों साथियों के साथ
    मुर्गे की दुकान बाहर इंतज़ार में
    बैठे बैठे जब कुछ नहीं मिलता
    जानवर की उस निराशा का
    पार नहीं मिलता।
    बारह को, आज इधर कल उधर ढोना,
    लोगों की भाग भाग सुनना।
    जबरन शब्जी वाले के ठेले के नीचे,
    बच्चे ले जाना,
    फिर उसका लाठी उठाकर
    हट हट कहना,
    फिर बच्चे को मुँह में लेकर
    इधर उधर को दौड़ लगाना,
    बारह के बारह को दुनियादारी दिखाना,
    फिर उनके बड़े होते ही
    दूसरे बच्चों का दुनियाँ में आ जाना,
    यही जिंदगी हो गई उसकी।

  • रोटी का समाधान होगा

    ले लो ना
    खीरा ले लो,
    चटपटा नमक लगा खीरा,
    मसालेदार चना ले लो,
    ले लो जी,
    गुब्बारे ले लो,
    रंग बिरंगे गुब्बारे।
    आप लोगे
    हमारी मजबूरी
    का समाधान होगा,
    आप खीरा, चना लेंगे,
    हमारी रोटी का
    समाधान होगा।

  • लड़के!!

    लड़के!!
    20 नम्बर की चाबी ले आ,
    जा उस गाड़ी के नट खोल,
    टायर में हवा भर,
    जा मोबिल ऑयल ले आ,
    उस गाड़ी में ग्रीस कर ले।
    औजार निकाल,
    औजार संभाल,
    जा ग्राहकों को पानी पिला,
    दौड़ के जा
    अंदर से ट्यूब ले आ।
    यह सब दिन भर कहते रहे
    काश यह भी कह लेते
    ले खाना खा ले।
    थोड़ा सुस्ता ले।

  • फैंका हुआ दाल-चावल

    इस गली में
    नजारा रोज दिखता है,
    प्लास्टिक की थैलियों में
    भर कर फैंका हुआ दाल-चावल
    हर रोज दिखता है।
    खुशबू आती है,
    सोचता है गरीब मन,
    खुदा भी किस तरह की
    किस्मत लिखता है,
    किसी के पेट भरने को
    दो कौर नहीं,
    किसी को फैंकने को मिलता है।

  • *आहट*

    आहटें आती रहें,
    सदा उनके आने की
    सदाएं भी सुनती रहें,
    सदा उनके गाने की
    मैं नज़्म लिखती जा रही थी,
    फ़कत पन्नों पर,
    यही तो बात है
    लफ़्ज़ों के मुस्कुराने की..

    *****✍️गीता

  • कविता : जीवन की सच्चाई ,एक कटु सत्य

    दुनियां में किसकी मौत और किसकी जिन्दगी
    है जिन्दगी ही मौत और मौत जिन्दगी
    जीवन मिला तो तय है ,मरना भी पड़ेगा
    हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
    जीवन तो खाना -वदोश है
    संभव इसका नहीं होश है
    झांक ले उस पार भी
    नहीं कोई रोक टोक है
    अच्छाई और बुराई का भी
    उस पार द्वन्द है
    नेकी और सच्चाई
    अगले जन्म का मापदण्ड है
    निश्चय ही यह पंचमहल
    कल खाली करना पड़ेगा
    हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
    अमीर हो या गरीब हो या हो कोई सतवन्त
    यदि जन्म सबका आदि है तो मौत है सबका अन्त
    पता नहीं किस दिन ढह जाये ,यह माटी का ढेरा
    किसे पता कब उखड़ चलेगा ,यह चलताऊ डेरा
    सब कुछ देर के मेहमान है ,इक दिन जाना पड़ेगा
    राम नाम सत्य है ,अन्त में वर्वस रटना पड़ेगा
    हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
    ‘प्रभात ‘ जीवन है उड़ती चिड़िया ,उसे फंसा न सकोगे
    जाल पर ही जाल तुम ऐसे बुनते रहोगे
    पाप की गठरी तुम्हारी हो सके हल्की
    दोष औरों के सिर तुम मढ़ते रहोगे
    अभी भी वक्त है बन्धु
    पाठ जीवन के ठीक से पढ़ लो
    वरना अभी और चौरासी घाट भटकते रहोगे ||

  • हार हुई आज नारी की

    हार हुई आज नारी की,
    चढ़ी भेंट दुराचारी की
    सारे-आम कत्ल कर गया,
    ना आई उसे कुछ दया
    बेहया घूम वो रहा है,
    समाज क्यूं सो रहा है
    मानवता मर रही है,
    दानवता फली फूलती,
    मानवता क्यूं डर रही है
    ये भारत पर अभिशाप है,
    होता निश-दिन यहां पाप है
    जिस मुल्क में, कातिलों के खिलाफ
    फांसी की सज़ा ना हो,
    तो ये कैसा इंसाफ़
    फ़िर क्यूं होगा इन्हें खौफ
    कातिल घूम रहे बेख़ौफ़
    कभी चार्ज-शीट दाखिल हुई,
    कभी बयान गवाहों के
    कभी कैसी लगी अर्जी,
    कभी नासूर लगे अफवाहों के
    फ़िर भी मासूम के घरवाले,
    कई-कई वर्षों तक ,
    राह तकें नतीजों की
    कभी निर्भया कभी ,
    कोई और बहन बेटी
    क्यूं भेंट चढ़ी दुराचारी की..

    *****✍️गीता

  • हँसना मेरी मजबूरी

    18-हँसना मेरी मजबूरी

    ( मुक्त छंद 16 मात्रा )
    फूलों में आज सुगंध नहीं
    खुशियों का कोई भाव नहीं
    न चेहरे पर मुस्कान कहीं
    पर हँसना मेरी मजबूरी..।

    विनय रूप कायरता बनती
    आंखों से जलधारा बहती
    हुई ध्वस्त हमारी आशा
    पर हँसना मेरी मजबूरी..।

    अहम भाव का ताज जहाँ हो
    इंतिहान पल पल होता हो
    उम्मीद वफा के टूट गई
    पर हंसना मेरी मजबूरी…।

  • प्रदूषण की मार

    प्रदूषण की मार,
    सह रहा संसार
    रोको इस प्रदूषण को मनुज,
    वरना फिर पछताओगे
    दूषित होती रही धरा यूं ही
    तो कैसे रह पाओगे
    वायु प्रदूषण यूं ही होता रहा तो,
    शुद्ध पवन की सांस कहां से आएगी
    दूषित पवन से बीमार होते जाओगे
    वन कटे, उपवन हटे
    हरियाली कम होती गई,
    गर्मी का स्तर बढ़ा गर,
    जलवायु प्रदूषण ,ऊष्मीकरण होगा
    मनुज कैसे तुम सह पाओगे
    जल प्रदूषण किया तो,
    धरती बंजर हो जाएगी
    फ़िर क्षुधा मिटाने की खातिर
    फल, फूल कहां से लाओगे
    ध्वनि प्रदूषण के चलते,
    मानसिक शांति नहीं मिल पाएगी,
    ऐसा ही रहा तो एक दिन
    मानसिक रोगी बन जाओगे
    तो जाग हे मनुज,
    आने वाली भावी पीढ़ी की ही खातिर
    कुछ संयम से कुछ नियंत्रण से
    लगा ले लगाम इस प्रदूषण पर
    दे दे सौगात नई पीढ़ी को..

    *****✍️गीता

  • तेरा मेरे लिए होना

    तेरा मेरे लिए होना,
    उतना जरूरी,
    जितना जरूरी ,
    ज़हान को हवा पानी है,
    तू अंजाम है,
    मेरे इश्क का ,
    तू सुकून है ,
    मेरी बैचेनी का,
    कम शब्द में कहुं तो
    दिल की हसरतें,
    तेरी दीवानी है
    सांसों के बिना,
    कोई कैसे रहे
    तू मेरे हाले-दिल की,
    कहानी है
    तेरा मेरे लिए होना
    उतना जरूरी
    जितना जरूरी
    ज़हान को हवा पानी है
    हंसी हो, खुशी हो,
    गम हो या दर्द की झड़ी हो
    वक्त की बदहाली में भी ,
    तेरी मौजूदगी से ,
    मौज-ए-रवानी है
    तेरा मेरे लिए होना
    उतना जरूरी
    जितना जरूरी
    ज़हान को हवा पानी है
    फर्क नहीं पड़ता
    लोगों की चुगलियों का,
    तानों का,
    बहानों का,
    मेरे होठों की थरथराहट की ,
    तू ही महज़ जुबानी है
    तेरा मेरे लिए होना
    उतना जरूरी
    जितना जरूरी
    ज़हान को हवा पानी है
    Specially for my wife….

  • कविता : पतित पावनी गंगा मैया

    देवी देवता करते हैं गंगा का गुणगान
    इसके घाटों पर बसे हैं ,सारे पावन धाम
    गंगा गरिमा देश की ,शिव जी का वरदान
    गोमुख से रत्नाकर तक ,है गंगा का विस्तार
    भागीरथी भी इन्हे ,कहता है संसार
    सदियों से करती आई लोगों का उद्धार
    शस्य श्यामल गंगा के जल से ,हुआ है ये संसार
    जन्म से लेकर मृत्यु तक ,करती है सब पर उपकार
    लेकिन बदले में मानव ने ,कैसा किया व्यवहार ||
    आज देवी का प्रतीक
    प्लास्टिक प्रदूषण के जाल में फंस गई
    बड़े बड़े मैदानों में दौड़ने वाली
    न जाने क्यों सिकुड़ गई
    दूसरों की प्यास बुझाने वाली
    आज खुद ही प्यासी हो गई
    अन्धे विकाश की दौड़ में
    आज गंगा, खूँटे से बंधी गाय हो गई
    ज्यों ज्यों शहर अमीर हुए
    गंगा गरीब हो गई
    बेटों की आघातों से
    गंगा मैया रूठ गईं ||
    ‘प्रभात ‘ क्यों लोग ना समझ हो जाते हैं
    गंगा मैली कर जाते हैं
    सुजला -सुफला वसुधा ऊपर
    जन जीवन इससे सुख पाते हैं
    आओ सब मिल प्रण करें
    गंगा मैया को बचाना है
    पावन निर्मल शीतल जल में
    कूड़ा करकट नहीं बहाना है
    कल कल छल छल करती निनाद
    फिर से मिल ,अमृत कलश बहाना है ||

  • सभी सो रहे

    कविता- सभी सो रहे
    —————————-
    सभी सो रहे हैं,
    घरों में पड़े हैं|
    हम ही हैं दीवाने,
    अभी जग रहे हैं|
    बड़ा दुख है हमको
    जो जग रहे हैं।
    दिखे ना किनारा,
    चले जा रहे हैं।
    सभी के घरों पर,
    समय पर है भोजन|
    हम है छात्र,
    धुले ना है बर्तन|
    बजे बारह रात जब,
    सब्जी बन रही है|
    लिए हाथ कॉपी,
    पढ़ाई हो रही है|सभी…..
    कई वर्ष बाद में,
    पेपर है आया|
    नकल हुआ भारी,
    न्यूज़ पेपर रद्द बताया|
    बड़े-बड़े माफिया,
    नकल कराते हैं
    रिश्ते में पड़कर टीचर,
    वजूद बेच देते हैं|
    देख के घटना हम
    बैठे रो रहे हैं |सभी…
    हमारा क्या होगा,
    पापा कर्ज भर रहे,
    छात्र जीवन में,
    कुछ भूखे सो रहे |
    छोटे-छोटे रुम में,
    कई रह रहे हैं|
    डिग्री भी भारी लेकर,
    जहर खा रहे क्यूं|
    PHD धारी देखो,
    बेरोजगार क्यूं|
    नेता सभी बैठे,
    मजा कर रहे हैं|
    अपराधी माफिया,
    मंत्री बन रहे हैं|सभी….
    —————————-
    **✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’

  • कविता : भ्रष्टाचार बेलगाम हो रहा है

    आज कथनी का कर्म से
    कोई मेल नहीं है
    कहने को बातें ऊँची
    करने को कुछ नहीं है
    गीता रामायण की धरती पर
    हिंसा का संगीत चढ़ा है
    कैसे बचेगी मानवता
    दानवता का दल बहुत बड़ा है
    अब प्रेम का पथ
    शूल पथ हो रहा है
    अब सत्य का रथ ध्वस्त हो रहा है
    अब बांसुरी का स्वर लजीला हो रहा है
    अब काग का स्वर ही सुरीला हो रहा है
    नयी सभ्यता आचरण खो रही है
    बिष बीज अपने ही घर बो रही है
    मंहगाई दावानल सी दिन ब दिन बढ़ रही है
    फिक्र है किसे
    जनता किस तरह जी रही है
    देश की बन्धुता विषाक्त सी बन रही है
    राजनीति शनै शनै
    स्वार्थ में सन रही है
    सुरक्षित नहीं है बेटी
    नफरती सैलाब उमड़ रहा है
    लोग बौने हो रहे हैं
    दुःशासन हंस रहा है
    अब रोटी के टुकड़ों को
    दूर से दिखा रहे हैं
    ये कैसा नंगा भूंखा
    समाजवाद ला रहे हैं
    अन्तस से असन्तोष
    जन जन में उमड़ रहा है
    झूठा आश्वासन ही केवल
    शासन चला रहा है
    ‘प्रभात ‘ सामन्ती युग से इस वर्तमान युग तक
    परिवर्तन इतना ही हो रहा है
    राजा तो आधुनिकतम बन गया
    भ्रष्टाचार बेलगाम हो रहा है||

  • जल रहा है आज रावण

    जल रहा है आज रावण
    राम जी के वाण से,
    उड़ रही हैं खूब लपटें
    देखता जग शान से।
    गा रहे हैं जोश से सब
    राम राघव की बड़ाई
    अबकी ऐसा वाण मारो
    दूर भागे सब बुराई।
    लाल लपटें आग ले
    कहती बुराई भाग ले,
    सब धुँवा सा हो गया
    भस्म रावण आग से।
    कुछ मिले शिक्षा हमें
    रावण बुराई को लिए था
    इसलिए राघव के वाणों ने
    उसे छलनी किया था।
    ईश के वाणों का भय लो
    अब बुराई त्याग दो,
    सब रहें खुश सब जियें
    सबको बराबर भाग दो,
    आज अपनी सब बुराई
    को निकालो आग दो।

  • कलयुग का रावण

    – ** कलयुग का रावण -**
    *********************

    हे राम रमापति अजर अमर
    रावण से ठाना महासमर
    ले आए जग की जननी को
    अपनी प्रिय अर्धांगिनी को ..।

    वह रावण की मर्यादा थी
    नहीं नजर लगा मान में
    सीता भी महाकाली थी
    लंका ढल जाती श्मशान में ..।

    अब इस भारत में भी
    हरण रोज ही होते हैं
    कोई रामकृष्ण नहीं आता
    अबला नयना रोते हैं ..।

    रावण दुशासन सिर नहीं कटते
    वह स्वयं काट ले जाते हैं
    कहीं पर लाश पड़ी होती है
    रावण जिंदा रह जाते हैं ..।

  • लतड़ पतड़ स्यां स्यां (गढवाली हास्य)

    लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    बल लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    हाई रे मेरी फ्वां फ्वां

    नोना बेरोजगार छन
    अभी नि आई कालो धन
    लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    बल लतड़ पतड़ स्यां स्यां

    मंत्री जी की गाडी बल
    दिनी छाई फुल होरन
    सड़की मा बल क्वी नि घूमा
    साइड दी दिया तुम फ़ौरन

    लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    बल लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    हाई रे मेरी फ्वां फ्वां

    कुर्सी मा बिराजमान
    उत्तराखंड का बड़ा पधान
    दारू की फ़ैक्टरी लागली
    जनता को बल कुञ्ज घाण

    लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    बल लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    हाई रे मेरी फ्वां फ्वां

    छुटी गयी घर बार
    अभी तक नि आई रोजगार
    कैसे आस लगोली जनता
    चुपचाप स्यूणी अत्याचार

    लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    बल लतड़ पतड़ स्यां स्यां
    हाई रे मेरी फ्वां फ्वां

  • श्री राम जी के नाम एक पाती

    विजयादशमी का यह पावन पर्व
    वर्षों से समाज को सच्चाई का सबक सिखाऐ
    पर आज यह एक प्रश्न उठाये
    आज प्रतयंजा कौन चढ़ाऐ
    कौन बाण आज छुड़ाए
    इस युग में कोई काबिल नहीं
    जो रावण का संहार करे
    आज कोई राम नहीं
    हर और रावण ही रावण छाऐ
    दशानन कहलाता ज्ञानी अभिमानी
    डंके की चोट पर युद्ध को ललकारे
    आज मानव छद्म वेश धार
    अपनों के पीठ पीछे वार करे
    आज मंथरा घर-घर छाई है
    विभीषण ने ही दुनिया में धूम मचाई है
    अब राम कैसे आए
    कोई शबरी ना बेर खिलाए
    केवट बिन दक्षिणा ना नदिया पार कराऐ
    कौन भ्राता प्रेम में राज सिंहासन का त्याग करे
    हनुमान जैसा सेवक कहाँ से आऐ
    अब राम कैसे आए
    हाय, अब रावण का कौन संहार करे
    तो क्या रावण ही रावण को मार गिराऐ
    मानव कब तक कागद पुतला बना मन बहलाऐगा
    कब तक समाज नारी की अग्नि-परीक्षा लेता जाएगा
    प्रश्न के उत्तर देने प्रभु आपको आना होगा
    इस युग के मानव को मर्यादा का पाठ पढ़ाना होगा
    नारी को अग्नि-परीक्षा से मुक्त कराना ही होगा
    नर को नारी शक्ति और समर्पण का एहसास कराना होगा
    अचल अटल विश्वास हमें, तुम आओगे
    मानव के सुप्त आदर्शों को नई राह दिखाओगे
    फिर विजयादशमी के सन्देश को मन-द्वार पहुचाओगे
    सुदृढ़ विश्वास हमें, तुम आओगे, तुम आओगे।

  • दशहरा विशेष

    दशहरा का पर्व है आया

    अच्छाई ने बुराई को हराया

    विजय गीत सब मिल गाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    सोंचो तरक्की के जुनून में

    हम खुद से हो गए पराए

    हमको लगे जकड़ने ,ख्वाहिशों के मकड़ी साए

    तज कुरीतियां अन्तस्तल में प्रेम दीप जलाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    लूटपाट और छीना झपटी तोड़ फोड़ को छोड़ो

    विघटनकारी घृणित भावना से अपना मन मोड़ो

    अब नैतिक पथ पर चलो चलाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    रक्त विषैला दौड़ रहा है नर की नस नस में

    कर्म घिनौना भरा हुआ है उर की हर धड़कन में

    वाणी विष का वमन कर रही कर की गति अति उलझन में

    ला परिवर्तन सभी क्षेत्र में सुरभित देश बनाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    लोग झगड़ रहे स्वार्थपरत हो ,भूलकर देश की उन्नति को

    अन्दर कुछ है ,बाहर कुछ है

    भावना यही ,रोकती प्रगति को

    घिरते तम में कुछ धैर्य बंधे ,ऐसी अलख जगाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    रिश्वतखोरी ,भृष्टाचार ,भूलो तुम सीनाजोरी

    निज पौरुष कर्तव्य दिखाओ ,करो न बातें कोरी

    अब हर जन मानवता अपनाओ

    कुछ ऐसा पर्व मनाओ ||

    ‘प्रभात ‘ शिक्षा मन्दिर में बिकती है ,ईमान बिकता गलियों में

    सुख सुविधा सब मिलकर बंट गई देश के ढोंगी छलियों में

    रावण कर रहा उन्माद ,अब संसद की प्राचीरों में

    आओ सब मिल, इन ढोंगी छलियों का पुतला जलाएं

    कुछ ऐसा पर्व मनाएं ||

  • नहीं मरेगा रावण

    61-नहीं मरेगा-रावण

    अहम भाव में बसता हूं मैं
    कभी न मरता रावण हूं मैं
    स्वर्ण मृग मारीच बनाकर
    सीता को भी छलता हूं मैं..।

    किसे नहीं है खतरा सोचो
    केवल अपनी सोच रहे हो
    रावण वृत्ति कभी न मरती
    यह सुनकर क्यों भाग रहे हो..।

    दुख का सागर असुर भाव है
    क्या राम धरा पर आएंगे
    सुप्त हुए सब धर्म-कर्म जब
    रावण कैसे मर पाएंगे..।

    धर्म बहुत होता त्रेता युग
    तक केवल लंका में रहता
    कलयुग पाप काल है ऐसा
    रावण अब घर-घर में बसता.।

  • रावण हूं

    कविता- रावण हूं
    ———————-
    रावण हूं,
    राम नही ,
    राक्षस हूं,
    भगवान नही,
    अब की बार दशहरे में,
    पहले खुद राम बनो
    फिर आग लगाना मुझे|
    रघुकुल की पता होगी
    वे सत्य वचन पर,
    अटल रहे,
    चक्रवर्ती-
    विश्व विजेता,
    धर्म सत्य गौ,
    विप्र पूजक रहे।
    उस घर की,
    मर्यादा थी,
    वचन के कारण,
    जिस राजा ने
    मरघट पर काम किया,
    उसी का स्वाभिमान था –
    राम,
    मर्यादा उनसे,
    निकलती हैं,
    पिता प्रेम,
    कुल की मर्यादा,
    के कारण
    छोड़ दिया सिंहासन सारा,
    पग पग बढ़ते,
    चरण जिधर,
    ले गुरु चरणों का,
    आशीष उधर,
    एक मौका दिए,
    भाई भाई का दिल मिल जाए,
    बाली बल में मस्त रहा,
    झट प्रभु उसका अन्त किया,
    अंगद आया, संदेशा लाया,
    हे रावण क्यों तकरार बढाया,
    माफी मिलेगी सुन रावण,
    गर सीता को वापिस करेगा,
    लेकिन उसने
    अपमान किया,
    झूठी शानों शौकत में,
    राम से लड़ने का एलान किया,
    दया करुणा सत्य-
    युद्ध नीति जिसमें समाई हो,
    वैसा राम बनो फिर आग लगाना|
    मुझसे बढकर,
    पापी लोभी,
    हठी इंसान हैं यहाँ,
    दो वर्ष की बेटी रोये
    ऐसे हैं शैतान यहाँ,
    मेरे पुतले से नेता दूर रहें,
    चुगलखोर भ्रष्टाचारी,
    रेपिस्ट दलबदलू,
    संसद के इंसान यहाँ|
    कहें “ऋषि” सुन जनता,
    हर घर में रावण,
    नहीं हो सकता,
    ज्ञानी महारथी,
    ग्रथों का ज्ञाता,
    अब कोई नहीं बन सकता|
    हर के लाए हरि कि पत्नी,
    बिना इच्छा छू नहीं सकता,
    बिषगड़ गये खुद खून के रिश्ते,
    रावण जैसा कौन यहाँ बन सकता है
    क्या देखा,
    क्या देख रहा हूं,
    भाई छूटा, भाई मरा,
    बेटा मेघनाथ भी सो गया
    हाथ लगाना,
    आग लगाना,
    राम जरा-
    बनकर दिखना,
    हे जन तब मुझे आग लगाना।
    —————————–
    **✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—

  • नहीं मरेगा रावण

    61-नहीं मरेगा-रावण

    अहम भाव में बसता हूं मैं
    कभी न मरता रावण हूं मैं
    स्वर्ण मृग मारीच बनाकर
    सीता को भी छलता हूं मैं..।

    किसे नहीं है खतरा सोचो
    केवल अपनी सोच रहे हो
    रावण वृत्ति कभी न मरती
    यह सुनकर क्यों भाग रहे हो..।

    दुख का सागर असुर भाव है
    क्या राम धरा पर आएंगे
    सुप्त हुए सब धर्म-कर्म जब
    रावण कैसे मर पाएंगे..।

    धर्म बहुत होता त्रेता युग
    तक केवल लंका में रहता
    कलयुग पाप काल है ऐसा
    रावण अब घर-घर में बसता.।

  • “रावण दहन”

    दशहरे का रावण सबसे पूछ रहा है

    हर वर्ष देखा है मैंने स्वयं को दशहरे पर
    श्रीराम के हाथों से जलते हुये,

    सभी को बुराई पर अच्छाई की जीत बताते हुये।

    उस लंकेश को तो मर्यादा पुरुषोत्तम ने मारा था,

    प्रभु श्रीराम ने उसकी अच्छाईयों को भी जाना था।

    सभी इकट्ठे होते हैं रावण को जलाने के लिए,

    दुनिया से पूरी तरह बुराईयों को मिटाने के लिए।

    आज रावण स्वयं पूरी भीड़ से यह कह रहा है,

    तुम में से कौन श्रीराम जैसा है यह पूछ रहा है?

    क्या तुम अपने अन्दर की बुराइयों को मिटा पाये हो ?

    क्या तुम सब अंशमात्र भी स्वयं को श्रीराम-सा बना पाये हो?

    यदि उत्तर नहीं है तो क्यों मुझे बुरा मानकर रावण दहन करने आते हो?

    तुम स्वयं ही हो बुरे तो क्यों मुझे हर वर्ष जलाने
    आ जाते हो ?

    यदि वास्तव में विजयादशमी मनानी है तो
    मुझ जैसे कागज के बने रावण को मत जलाओ,

    बल्कि अपने अन्दर के पापी रावण को मिटाओ
    निर्भया और सीता जैसी नारी की लाज बचाओ

    मत बनो विभीषण सम कपटी
    लक्ष्मण सम भाई बन जाओ

    ना करो लालसा बालि की तरह कुर्सी की
    तुम भरत, अंगद सम बन जाओ

    राजा दशरथ की तरह तुम अपने वचन
    पर अडिग हो जाओ

    शिक्षा प्राप्त कर प्रभु श्रीराम के व्यक्तित्व से फिर आना विजयादशमी मनाने तुम

    अपने अन्तर्मन के रावण का दहन करके फिर आना मुझे जलाने तुम…

    काव्यगत सौन्दर्य एवं विशेषताएं:-

    यह कविता मैंने प्रतियोगिता की फोटो को ध्यान में रखते हुए लिखी है जिसका विषय ‘रावण दहन’ है.
    मैंने इस कविता के माध्यम से सामज में व्याप्त बुराईयों के ऊपर कटाक्ष किया है.
    रावण के माध्यम से समाज में फैली समस्याओं, कुरीतियों और हर मनुष्य के अन्दर छुपी बुराईयों को दर्शाया है.
    मेरा आशय रावण को श्रेष्ठ दिखाने का नहीं वरन् समाज को एक अच्छा संदेश देने की है जिससे वह अपने अन्तर्मन को स्वच्छ करके राम के चरित्र से सीख ले और कुपथ को छोंड़कर अच्छे पथ पर अग्रसर हो.
    समाज में नई चेतना आए और रामराज्य की स्थापना हो सके.

  • धनुष उठा श्री राम का

    धनुष उठा श्री राम का,
    रावण की अब खैर नहीं
    चलो आज विजय की बात करें,
    हो कहीं किसी से,बैर नहीं
    त्रेता युग में रावण ने,
    श्री राम को ललकारा था
    सीता माता का हरण किया,
    अतएव राम ने मारा था
    आज के युग में देखो,
    रावण ही रावण आए हैं
    तू राम बन, संघार कर
    संकट के बादल छाए हैं
    अपने भीतर का राम जगा,
    भारत में फैला तिमिर भगा
    नारी पर हुए जुल्मों का,
    हे युवा, तू ही इंसाफ़ दिला
    अशोक-वाटिका में भी सीता,
    रही सुरक्षित उस युग में..
    कभी,अपने ही घर
    कभी आते-जाते
    कोई सीता नहीं सुरक्षित
    बड़ी असुरक्षित, कलियुग में
    बलात्कार,कहीं भ्रूण हत्या
    कहीं एसिड अटैक की खबर सुनी,
    भारत की नारी, कब तक झेलेगी
    कोई तो आए, राम सा गुणी
    ये सब सम्भव कैसे होगा
    कुछ विचार मन में आए,
    साझा करती हूं, समाज से
    एक प्रण लिया जाए..
    जो उंच-नीच और संस्कार के,
    अब तक पाठ पढ़ाए पुत्री को
    वहीं पाठ और संस्कार ,
    अब पुत्रों को भी दिए जाएं..

    *****✍️गीता

  • जूठे बर्तन हैं नन्हें हाथों में

    बाल श्रम पर कविता
    ****************
    यही तो बात हुई,
    कलम,-दवात नहीं,
    न उजाला है कहीं,
    जूठे बर्तन हैं पड़े,
    नन्हें हाथों में मेरे,
    यहीं से सच कहूं तो
    जिंदगी की मेरी,
    सच्ची शुरुआत हुई।
    इनमें चिपका हुआ है
    जीवन रस,
    उसको पा लूँ
    उसी से जी जाऊं,
    काले कोयले से
    इन्हें चमका कर,
    अपनी किस्मत को
    जरा महका लूँ।
    मुझे न देखो
    इतने अचरज से,
    मेरी मजबूरियां इधर लाई,
    ये साधन मिला है
    जीना का,
    कुछ तो मिला है खाने का,
    वरना भूखे थे
    कई रोज रहे भूखे ही,
    मिल गया जूठी पतीली में
    पता जीने का।
    —– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
    चम्पावत, उत्तराखंड।

  • दौड़ते रहता है समय

    निरंतर चलते रहता है
    दौड़ते रहता है समय,
    वो देखो भाग रहा है समय
    दौड़ रहा है समय।
    हम कितना ही चाहें
    नहीं रोक सकते
    उसकी गति को,
    वक्त की पटरी पर
    हमें दौड़ना पड़ता है।
    रुकना नहीं
    दौड़ना पड़ता है,
    रात बीती, दिन बीता
    महीने बीते, साल बीता,
    इसी तरह जीवन बीत जाता है,
    कल करूँगा का सपना
    सपना ही रह जाता है।
    विद्वान राजा भ्रतुहरि ने
    ठीक कहा था,
    कि “समय को हम नहीं भोगते हैं
    बल्कि हम समय द्वारा भोगे जाते हैं,
    समय व्यतीत नहीं होता है,
    बल्कि हम व्यतीत हो जाते हैं।”
    व्यतीत ही तो हो रहे हैं
    दिन हमारे,
    आज-कल-परसों,
    जनवरी-फरवरी—दिसम्बर।
    समय भागता जा रहा निरन्तर।
    हमें भी उसकी गति अनुरूप
    बढ़ाने होंगे कदम
    तभी अभीष्ट हासिल
    कर पायेंगे हम।

  • बंजर पे बसेगी फिर बहार

    बे-कार हूं बे-रोजगार नहीं
    आदतों का शिकार नहीं
    शौक से नहीं परहेज मुझे
    तेरी तरह शौक का गुलाम नहीं

    इक सुई का किया आविष्कार नहीं
    उसे हर नई खोज की दरकार है
    मेरी जरूरतों का है ईल्म मुझे
    तेरी तरह दुष्-स्पर्धा का बीमार नहीं

    मेरे अपनों को जो सुख हासिल नहीं
    उसका न लेना है हमेशा स्वाद मुझे
    तेरे सुख के लिए खड़े हैं कयी महल
    बाबा की झोपड़ी की मुझे दरकार है

    भरा आंगन ही था भाता मुझे
    अकेलेपन का उपहार तूने दिया
    अब तो इसकी भी आदत हो चुकी
    भीड़ में भी लक्ष्य से न हटता ध्यान है

    माली ज़मीं के सूनेपन को
    भरता कई तरह के फूलों से
    उन्हें अलग मंदिरों की तलाश है
    हर घर को विखराव का शाप है

    ये कैसी यात्रा है हर घर की
    विखराव न चाहता बचपन
    टूटता शिशु का कोमल मन
    परिवार के सोंच में बिलगांव है

    कहां गया वो समय कि जब
    बड़ों की कहीं हुई बातों को तब
    छोटे करते रहते थे संधान सदा
    न हो पाते थे वो कभी गुमसुदा

    तलाश है फिर उस बसंत की
    बंजर पे बसेगी फिर बहार
    अवयबों के आशियानें अलग
    इकजूट होंगें फिर एक बार

    इक रितु कभी तो आयेगी
    इतिहास फिर दुहराया जायेगा
    स्वार्थ से सब ऊंचे उठकर
    एकता मंत्र फिर अपनायेगा

  • भोजपुरी देवी पचरा गीत- खपरवा के धार |

    भोजपुरी देवी पचरा गीत- खपरवा के धार |
    काली मईया करबे ना हो पूजनवा तोहार |
    तोहके देइब हम खपरवा के धार |
    काली बा सुरतीया बाकी बाडु तू दयालु |
    रुपवा भयावह माई कमवा कृपालु |
    लेई ला पूजनवा ना हो करा मोर उद्धार |
    तोहके देइब हम खपरवा के धार |
    लाली लाली जीभिया लंबी काली केसिया |
    मथवा पर बिंदिया सोहे बड़ी बड़ी अँखिया |
    जग कल्यानी मईया खोला ना हो केवाड़ |
    तोहके देइब हम खपरवा के धार |
    रक्त बीज खुनवा माई खप्पर मे पियलु |
    भगतन के दुखवा माई पल मे हर लिहलु |
    देवी मईया करतू ना हो भारती विचार |
    तोहके देइब हम खपरवा के धार |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर)
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो झारखंड मोब -9955509286

  • *दोस्ती*

    *****हास्य – रचना*****
    कछुए और खरगोश की,
    पांच मील की लग गई रेस
    तीन मील पर खरगोश ने देखा,
    कछुआ तो अभी दूर बहुत है
    थोड़ा सा आराम करूं
    ना…ना वो सोया नहीं
    ये पुरानी नहीं, ये तो है कहानी एक नई
    खरगोश ने लगाया दीवार पर एक टेका
    उसे सामने ही दिख गया एक ठेका
    दो-तीन लिटिल-लिटिल
    पीने के बाद…
    खरगोश को आई, कछुए की याद
    कछुआ भी धीरे-धीरे , आ गया करीब
    खरगोश ने कहा कछुए से
    थोड़ी सी लिटिल-लिटिल पीने से
    थकान दूर होती है….
    कछुआ भी मान गया
    और लगा ली लिटिल-लिटिल
    दोस्ती देख कर खरगोश की,
    कछुए के चेहरे पे आया नूर
    भर के बोला वो..
    अपनी आंखों में सुरूर
    मैं लोगों की बातों में आया,
    तुम संग मैं क्यूं रेस लगाया
    हम दोनों दोस्त रहेंगे सदा
    मिलते रहना ,फोन भी करेंगे यदा-कदा
    दोस्ती की फिर खाई कसमें,
    दोस्त हुए फिर दोनों पक्के
    पी कर थोड़ा लिटिल-लिटिल

    *****✍️गीता

  • गर हेल्मेट होता बच जाता

    रोज है सुनने में यह आता
    गर हेल्मेट होता बच जाता,
    फिर भी बाइक पर चलने पर
    हेल्मेट को टांगे रहते हैं।
    दुर्घटना हो जाने पर फिर
    सारे लोग यही कहते हैं
    गर हेल्मेट होता बच जाता।
    लापरवाही जिसने भी की
    गँवा जिन्दगी उसने ही दी,
    सिर की रक्षा को हैल्मेट है
    उसे पहन लो क्या दिक्कत है।
    ईश्वर न करे गर कभी
    अचानक दुर्घटना हो जाती है,
    हैल्मेट यदि सिर पर होगा तो
    जान वहां पर बच जाती है।
    नियम और कानून सड़क के
    बने हैं जीवन की रक्षा को,
    इनका अक्षरशः पालन हो,
    बाइक पर सिर पर हैल्मेट हो।

  • अपने आप से मिल लेता हूँ कभी कभी

    अजीब आदत है अपने आप से,
    मिल लेता हूँ कभी कभी
    सच है ! अब वो दौर नही रहा
    जहाँ फुरसत हुआ करती थी
    अब तो खुद ही में उलझ गए है
    फिर भी फुरसत मिल जाती है
    दूसरों को सलाह देने की
    याद है वो दीवार जहाँ लिखा करते थे
    किताबे तो बिना लिखी अच्छी लगती थी
    किस्से भुला नहीं वो शरारत के
    घर से निकलते ही गलियों मैं झगड़े
    वो रंगबिरंगे पतंगों की लूट
    याद है बचपन की आज़ादी की छूट
    गर्मियों में नंगे पैर बाहर घूमना
    बारिशों में कीचड़ मैं खेलना
    याद है ठंड़ीयों में मुँह से धुँए निकालना
    कोई रिश्ता ना था दूर दूर शिकायत से
    अपने आप से गिरना फिर संभलना
    अपने आप में रोना फिर मुस्कुराना
    सच है ! अब वो दौर नही रहा
    जहाँ फुरसत हुआ करती थी
    याद है वो झूठी कट्टी बुच्ची
    झगड़े होते ही कट्टी किया करते थे
    बुच्ची के बहाने मिल लिया कर ते थे
    खेल के स्वयं नियम बनाना
    याद है नियमों को तोड़ना
    मिट्टी के बर्तनों के साथ घर घर खेलना
    याद है खेल में एक दिन पूरा घर संभालना
    पता नहीं कब थक के सो जाया करते थे
    अच्छी नींद आती थी माँ के आँचल में
    अब तो खुद ही में उलझ गए है
    अजीब आदत है अपने आप से
    मिल लेता हूँ कभी कभी

    दीपराज वर्मा (मुम्बई)

  • धनुष उठायें रामचंद्र

    अधर्म का हो खत्म राज
    धर्म को विजय मिले,
    धनुष उठाएं रामचंद्र
    विश्व को निर्भय मिले।
    दैत्य दम्भ खत्म हो
    अहं की बात दूर हो,
    घमण्ड भूमि पर गिरे,
    बचे जो बेकसूर हो।
    अशिष्टता समाप्त हो
    अभद्र बात बन्द हो,
    असंत सच की राह लें,
    कदर मिले जो संत हो।
    राम शर उसे लगे
    गरल हो जिसकी जीभ पर,
    वर्तमान शुद्ध हो व
    गर्व हो अतीत पर।
    रोग व्याधियां न हों
    समस्त विश्व स्वस्थ हो,
    हरेक तन व मन सहित
    प्रकृति साफ स्वच्छ हो।
    संतान हो तो इस तरह की
    मातृ-पितृ भक्त हो,
    सम्मान, प्रेम, त्याग की
    भी भावना सशक्त हो।
    धनुष उठायें रामचंद्र,
    विश्व को निर्भय मिले,
    अधर्म का हो खत्म राज,
    धर्म को विजय मिले।
    ——– डॉ0सतीश चंद्र पाण्डेय
    चम्पावत, उत्तराखंड।

  • श्रीराम के मार्ग पर चलो

    श्रीराम को
    आदर्श मानते हो ना,
    तो चलो उनके आदर्शों पर,
    गुरु का सम्मान,
    माता की इच्छा
    और पिता के वचन की रक्षा को
    राजगद्दी का त्याग,
    चौदह बरस तक
    वनवास ग्रहण करना।
    राक्षसों का संहार,
    पत्नी का वियोग,
    कितना कुछ,
    त्याग, आदर्श, पुरुषार्थ,
    के उच्च मानक ग्रहण करो।
    आओ श्रीराम के
    मार्ग पर चलो,
    दम्भ रूपी रावण का
    संहार करो।
    —— डॉ0सतीश चन्द्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

  • राम बन जा आज तू

    ओ युवा!!
    भारत के मेरे,
    राम बन जा आज तू,
    खुद हरा भीतर का रावण,
    धर्म धनु ले हाथ तू।
    बढ़ रहे हैं नित दशानन
    हम जला पुतला रहे हैं,
    जल गया रावण समझ कर
    खूब मन बहला रहे हैं।
    बम-पटाखे फोड़ कर
    रावण नहीं मर पायेगा
    अब मरे सचमुच में रावण
    कौन यह कर पायेगा।
    अब भरोसा एक ही है
    जाग तू प्यारे युवक
    तू नया बदलाव ला दे
    मार दे रावण युवक।
    पापकर्मों में लगे हैं
    सैकड़ों रावण यहां,
    दस कहाँ लाखों मुखौटे
    ढक रहे रावण यहाँ।
    दम्भ में, अभिमान में
    मद में, भरे रावण यहां,
    पीसते कमजोर को हैं
    लूटते रावण यहां।
    नारियों पर जुल्म करते
    दिख रहे रावण यहां,
    भ्रूण हत्या पाप करते
    सैकड़ों रावण यहाँ।
    अब उठा ले तू धनुष
    ओ युवा!! भारत के मेरे,
    राम बन जा आज तू,
    रावण मिटा दे आज रे।
    —– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
    चम्पावत, उत्तराखंड।

New Report

Close