धून्ध है चारों तरफ़
रास्ते की खबर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।
फिक्र अब कहाँ
ये जहाँ मिलें
निन्द है कहाँ
जो स्वप्न नया खिले
बढ सकूँ जहाँ
कोई ऐसी डगर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।
कैसे धीर मैं धरूँ
ख़्वाहिश चूङ ऐसे हुयी
शीशे के गिरने से
बिखर के रह गयी
अपना किसी कहें
किसी पे दर्द का असर नहीं
जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
आती मंजिल नज़र नहीं ।
Tag: संपादक की पसंद
संपादक की पसंद
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धून्ध है चारों तरफ़
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सच कहूँ
हम उस मुकाम पर है
जहाँ जिम्मेदारियां
सर चढ़ बोलती हैं
काम के बोझ तले दबी जिन्दगी,
नयी चीजों को
सीखने की प्रवृत्ति उदासीन होती है
पर मेरी उत्कंठा
नित नयी चीजों को सीखने की
जानने की- तृष्णा जगाती है
कुछ अधूरे ख्वाब को
पुनः उङान देने को तत्पर रहतीं हैं
बचत से ज्यादा
ध्यान इस पर केन्द्रित रहता है
हर एक क्षण का
सदुपयोग कैसे करूँ
कैसे कुछ नया ज्ञान अर्जित करूँ
कुछ नया नये रूप में सृजित करूँ
फिक्र में दिन-रात
बेचैनी का आलम रहता है
किसी भी पल का व्यर्थ जाना
सच कहूँ-
बङा खटकता है । -
प्रीत है मेरी राधा जैसी..
गर पढ़ते हो जिस्म मेरा
तो सुन लो
क्या तुम इस लायक हो!
दर्द दिया करते हो मुझको
चैन नहीं आने देते
पढ़ते हो बस रूप मेरा
कभी रूह में क्यों नहीं झांकते !
हाँ, मेरे रूप से ज्यादा सुंदर
रूह है मेरी देखो ना !
पढ़ते हो तुम जिस्म के पन्ने
रूह को पढ़कर देखो ना !
प्रीत है मेरी राधा जैसी
मीरा जैसी इबादत करती हूँ
तू इतना है बेदर्दी
फिर भी तुझे मोहब्बत करती हूँ.. -
अरे ओ रोशनी
अरे ओ रोशनी
क्यों टिमटिमाती हो,
क्यों इस तरह से दर्द में
खुद को रुलाती हो।
समझ लो तुम स्वयं को
एक अदभुत शक्ति हो
मत रहो दुविधा में
तुम तो वाकई में शक्ति हो।
क्यों गंवा बैठी हो पल को
क्यों भुला बैठी स्वयं को
दर्द को यूँ पाल कर
क्यों गलाती हो स्वयं को।
मत रुंधाओ अब गला
आंखों से आंसू मत बहाओ,
दूर फेंको दर्द को
खुशियों की सरिताएं बहाओ।
है भरी भरपूर क्षमता
तुम उसे महसूस कर लो,
राह में खुशियां खड़ी हैं
दौड़ कर उनको लपक लो।
आज से तुम पथ बदल लो
अश्क बिल्कुल भी न निकलें
खुद को करना है सफल तो
भाव खुशियों के ही निकलें।
स्वयं की शक्ति को महसूस कर
आगे बढ़ो जीतो जहां,
एक दिन खुशियां कदम चूमेंगी
आकर खुद यहां। -
**कुर्बानी दो कुत्सित सोंच की**
जो बंदे बकरा-मुर्गा काट
छौंककर खाते हैं
वो मानुष भगवान के घर में
उल्टा लटकाए जाते हैं
निर्जीवों का तो इस जग में
कोई मान नहीं
क्या जीवित जीवों में भी
कोई जान नहीं ?
महसूस तो हैं वह भी करते
प्रेम और नफरत को
तो आखिर क्या कष्ट नहीं
होता होगा उन बकरों को
देते हो कुर्बानी तुम जीवित
जन्तुओं की
और मांगते हो बदले में
रहमत तुम खुदा की !
देनी है यदि बलि तो
अपनी कुत्सित सोंच की दे डालो
जिनको भूनकर खाते हो
उनको अपने घर में पालो
प्यार करेंगे वो इतना की
आँखें नम हो जायेंगी
खुदा से ज्यादा उनके दिल की
दुआएं तुम्हें मिल जायेंगी
बंद करो तुम जीवित
जीव-जन्तुओं को खाना-पीना
वरना किसी दिन तुमको इनकी
बद् दुआएं लग जायेंगी.. -
“जीव हत्या पाप है”
वो छोटे-छोटे मासूम से थे
कमरे में मेरे बैठे थे
मैं गई रात को देर से थी
उस समय थोड़ी-सी सर्दी थी
फिर देखा मैंने उनको तो
मन में हमदर्दी जाग उठी
वह सिकुडे़-सिकुड़े बैठे थे
एक नहीं चार-पांच थे
मैंने उनको अलमारी में बिठाया
ऊपर से कम्बल भी ओढ़ाया
दूध रखा एक प्याली में
रुई के फाहे से उन्हें पिलाया
उनकी सेवा करके एक
शान्ति-सी मन को आई थी
फेंक दिया मैंने फिर झट से
चूहामार जो लाई थी… -
दैव पर विश्वास रखना
मन कभी छोटा न करना
दैव पर विश्वास रखना,
गर कभी मुश्किल समय हो
टूटना मत धैर्य रखना।
जिन्दगी में मुश्किलें
लाखों मिलेंगी आपको,
मुश्किलों में, ठोस बनकर
झेल लेना धैर्य रखना।
गर कभी आंखों के आगे
छा रहा हो घुप्प अंधेरा,
बैठ लेना, शान्त चित्त हो
दैव को तुम याद करना।
मन व्यथित होने न पाये
काम हिम्मत से चलाना
एक दिन कृपालु ईश्वर
चैन देंगे याद रखना।
मन कभी छोटा न करना
दैव पर विश्वास रखना,
गर कभी मुश्किल समय हो
टूटना मत धैर्य रखना। -
तुम
रात अंधियारी थी उसमें
चाँद सी तुम साथ थी,
साँस उलझन में भरी थी,
क्या पता क्या बात थी।
चाहते थे खूब कहना
बोल पाये थे नहीं,
अश्क आये थे उमड़
हम रोक पाये थे नहीं।
तुम न होती तो उजाला
किस तरह दिखता हमें,
चैन उस भारी निशा में
किस तरह मिलता हमें।
तुम दवा सी तुम दुआ सी
जिन्दगी की रोशनी हो,
तुम हो तो जीवन है जीवन
वाकई तुम रोशनी हो। -
अर्धनारीश्वर…
मैं पैदा हुआ तो था कुछ अजीब
फूटा हुआ था मेरा नसीब
शंकर-पार्वती का मिश्रित रूप हूँ मैं
चुप रहो अर्धनारीश्वर हूँ मैं
बचपन से ही मेरे साथ
भेदभाव होता था
शीशे को देखकर मुस्कुराता था
माँ की लिपस्टिक से
मुझे कुछ अलग ही लगाव था
चूड़ी, पायल से मुझे अत्यधिक
प्रेम था
एक दिन बिठा दिया गया मुझे
ऐसे बाजार में
जहाँ रोज मेरी इज्जत
चंद पैसों के लिए लूटी जाती थी
जहाँ से गुजरता था
लोगों की हँसी छूट जाती थी
ताली बजाऊं या चूड़ी
पर तुम सबसे अच्छा हूँ
चुप रहो स्त्री-पुरुष का
गुणगान करने वालों
मैं तुम्हारी दूषित सोंच से
काफी अच्छा हूँ
अपनी बेटी जैसी लड़की
की इज्जत लूट लेते हो
सीना तान कर चलते हो
मर्द कहाए फिरते हो
बस अब बहुत हो चुका
हमको आगे बढ़ना है
तुम सबकी विकलांग सोंच से
हम किन्नरों को अब लड़ना है.. -
बेटी और बहू में फर्क
वो उठा ले झाडू तो सबकी
शामत आ जाती है
मेरे पूरे दिन की मेहनत
ना रास किसी को आती है
हाथ में उसके पानी पकड़ाओ
तब वो मैडम पीती हैं
उम्र में हैं मुझसे छोटी पर
आर्डर देती रहती हैं
हाथ में उसको टिफिन बनाकर
मैं ही प्रतिदिन देती हूँ
एक भी दिन यदि देर हुई तो
ताने सुनती रहती हूँ
वो लाडली है, मुझसे बेहतर है
हर दम यही जताया जाता है
मुझको उसके आगे हरदम
छोटा दिखलाया जाता है
ऐसा क्यों है ?
यह सवाल मैं खुद से करती रहती हूँ
मुझमें ही है खोंट कोई
यह खुद से कहती रहती हूँ
दूध उबल जाए तो फिर
संस्कारों पर मेरे सवाल उठे
धीरे-धीरे काम करो
मेरी बेटी ना जाग उठे
उसको इतना प्यार है मिलता
मुझको हरदम ताने क्यों ?
बेटी और बहू में दुनिया फर्क
इतना माने क्यों ?काव्यगत सौंदर्य और समाज में योगदान:-
यह कविता मैंने बेटी और बहू में अन्तर करने वालों के लिए लिखी है.
मेरा उद्देश्य यह फर्क मिटाकर दोनों के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाने
का है.
जो घर में बहू बनकर आती है वह भी किसी की लाडली बेटी ही है.
वह अपना सब कुछ छोंड़कर आती है उसे प्रेम से अपनाने की आवश्यकता है ना कि किसी उपदेश की.. -
*पाप-पुण्य*
यूं नजरों से ना देख मुझे
रूह में झांक कभी
मैं क्या हूँ उसका परिचय
तू पाएगा तभी
रूप तो मेरा उजला-उजला
बस दिल थोड़ा-सा काला है
बता रही हूँ तुझको नजरों से
क्योंकि तू मेरा शौहर होने वाला है
परख रहा है तू मुझको ऐसे
मुझमें जान नहीं जैसे !
एक-एक कर मेरा इंटरव्यू
ले जो रहे तेरे घरवाले
मुझको ऐसा लगा के जैसे
मेरा भविष्य सुधरने वाला है
मेरे गालों पर तिल जो है
उस पर कई सवाल उठे
बचपन से इस तिल पर
लाखों मजनू अपना दिल हार चुके
कर लो जितनी करनी है तुमको
मेरी झान-बीन
जिस दिन बनकर आई मैं दुल्हन
लूंगी बदले मैं गिन-गिन
अभी तो मैं रोऊंगी साहब !
फिर मेरे हँसने के दिन होंगे
जैसा भी बर्ताव करूंगी
तुम सबके पाप-पुण्य होंगे… -
बेटी को सम्मान कब..??
सब मुझे देख रहे थे ऐसे
जैसे मैं कोई चीज बिकाऊ
कुर्सी, मेज खरीदने जैसे
वो कर रहे थे भाव-ताव
क्या मेरा कोई स्वाभिमान नहीं
क्या मैं कोई इंसान नहीं
लड़कियों का इस देश में
क्या कोई अस्तित्व नहीं ??
क्या लड़की होती है बाजारू
बस एक ‘शो पीस’ बिकाऊ
ना उसकी अपनी मर्जी है
ना उसमें है कोई जान
सीना तान के कहते हैं पुरुष यहाँ
“मेरा भारत देश महान”
देश महान हैं लेकिन देश के
नियम बड़े पौराणिक हैं
हम जैसे लोग इसी कारण से
अभी तक अविवाहित हैं
जितना अधिकार मिले बेटे को
उतना ही बेटी को सम्मान मिले
सीता, रुक्मिणी की तरह ही
पति चुनने का अधिकार मिले
तब बनेगा सुंदर प्यारा-सा
हर घर, हर परिवार
करेगी फिर हर बेटी अपने
परिवार, पति से प्यार… -
“जीवन चुनने का अधिकार”
सब मुझे देख रहे थे ऐसे
जैसे मैं कोई चीज बिकाऊ
कुर्सी, मेज खरीदने जैसे
वो कर रहे थे भाव-ताव
क्या मेरा कोई स्वाभिमान नहीं
क्या मैं कोई इंसान नहीं
लड़कियों का इस देश में
क्या कोई अस्तित्व नहीं ??
क्या लड़की होती है बाजारू
बस एक ‘शो पीस’ बिकाऊ
ना उसकी अपनी मर्जी है
ना उसमें है कोई जान
सीना तान के कहते हैं पुरुष यहाँ
“मेरा भारत देश महान”
देश महान हैं लेकिन देश के
नियम बड़े पौराणिक हैं
हम जैसे लोग इसी कारण से
अभी तक अविवाहित हैं
जितना अधिकार मिले बेटे को
उतना ही बेटी को सम्मान मिले
सीता, रुक्मिणी की तरह ही
पति चुनने का अधिकार मिले
तब बनेगा सुंदर प्यारा-सा
हर घर, हर परिवार
करेगी फिर हर बेटी अपने
परिवार, पति से प्यार… -
सोंच में बदलाव करें
चलो एक नये कोने की तलाश करें
उदासियो को हटा, सोंच में बदलाव करें ।
खुद को नये सिरे से गढ़े
अबतक खुद के लिए जीते रहे
अपने लिए त्योहार मनाते चले
अब एक नयी परिभाषा बने
चलें औरों के स्वप्न लिए,
उदासियो को हटा, सोंच में बदलाव करें ।।
नकारात्मता जो पसरी हुई
वीरानगी कैसी है बनीं हुयी
मायूसी की करें रवानगी
मानवता के लिए हो दीवानगी
नयी सोंच नयी तरह से लिए
उदासियो को हटा, सोंच में बदलाव करें ।।
हर घर में खुशी खुशियाँ बसे
हर दिल उमगो से सजे
मौजों के संग चलें,
गम को ना डगर मिलें
नयी इच्छाओं को संग लिए
उदासियो को हटा, सोंच में बदलाव करें ।। -
दुःख
मैं हमेशा दुःख से कतराती रही,
इसे दुत्कारती रही
मगर ये दुःख हमेशा ही मिला है
मुझसे बाहें पसारे…!!मैं भटकती रही चेहरे दर चेहरे
सुख की तलाश में…
और वो हमेशा रहा एक परछाई की तरह
जो दिखती तो है मगर क़भी कैद
नही होती हाथों में…!!दुःख बारिशों में उगी घास की तरह है जिसे
हज़ार बार उखाड़ कर फेंको मगर ये उग
ही जाता हैं दिल की जमीं पर..!!सुख ने हमेशा छला है मुझे एक
मरीचिका की तरह…
मगर दुःख ने मुझे सिखाया है स्थायित्व,
लाख ठोंकरों के बाद भी
दामन थामे रहना…!!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(09/11/2020) -
माँ मुझे बुला लो अपने पास…
माँ मुझे बुला लो कुछ दिन अपने पास
यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता
प्यार तो सब करते हैं पर फिर भी
कुछ नहीं जचता
गोल-गोल रोटियां बनाकर तू
मुझे जबरदस्ती खिलाती थी
बुरा लगता था तुझको गर
मैं जो रूठ जाती थी
घर में सबसे पहले मुझे ही
खाना परोस कर मिलता था
आज तेरी लाडली सबकी थाली लगाती है
माँ तेरी डाँट बड़ी बुरी लगती थी,
भाभी की आवाज कर्कश थी पर
यहाँ के तानों से अच्छी थी
तेरी डाँट में जो अपनापन था
तेरी कॉफी में जो मीठापन था
वो बहुत याद करती हूँ
वो प्यार तो करते हैं पर वो तेरा वाला
अपनापन नहीं दिखता
वो पति परमेश्वर हैं
पर मुझे यहाँ कोई इंसान भी नहीं समझता
देर से उठने वाली अब
सूर्योदय से पहले उठ जाती है माँ
सच कहूँ तेरी चाय की महक
मुझे बड़ा याद आती है
माँ मुझे बुला लो कुछ दिन अपने पास
यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता
है तो हर कोई पर अपना-सा नहीं लगता.. -
डॉक्टर साहब
कविता- डॉक्टर साहब
——————————-
देखिए डॉक्टर साहब जी,
बेटा क्यों अब रोता हैं|रात अंधेरी काले बादल,
रिमझिम बरसा पानी था,
हाय पिताजी प्रेम तुम्हारा,
कितना अद्भुत अच्छा था,देखा हमकों रोतें जैसे,
रख कंधे पर दौड़े चले,
दवा कराने कई कोश चले तुम,
रात अंधेरी काट चले,इतनी जल्दी पापा तुमको,
नंगे पाव ही दौड़ दिए ,
ठेश सहें पग पग पर,
दर्द कभी ना सहने दिए,हर जन्म में आपका ही मिलना,
‘ऋषि’ बिनती ऐसा करता हैं,
जन्म2 सेवा करके भी,
ना ऋण से मुक्ति पा सकते हैं, देखिये…….
———————————————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’ -
पर वह ना उठी, बड़ी निष्ठुर थी !!
बड़ी ठण्ड है माँ !
बर्फ पड़ रही है
तू क्यों आग-सी तप रही है ?
बाहर इतनी धुंध छाई है
माँ मेरी जान पर बन आई है
लगाकर छाती से माँ बोली
आ बेटा ! गर्म कर दूं बदन तेरा
कल सुबह उठना
ढूंढ लूंगी स्वेटर तेरा
रात बीती माँ की हड्डियों से
चिपककर बेेटे की
सुबह मिलेगा स्वेटर
यह स्वर्णिम स्वप्न था आँखों में बेटे की
सुबह हुई तो नजारा ही कुछ और था
बेटा माँ से लिपटकर रो रहा था
और कह रहा था
उठ जा माँ ! तेरा बदन बिल्कुल बर्फ है
आग दाऊ घर जल रही
उठ भूमि से मौसम सर्द है…
पर वह ना उठी, बड़ी निष्ठुर थी !! -
किन्नर
प्यार दूर की बात
सम्मान कभी सपने में भी ना सोचूं
तुम तो देखने से भी कतराए
देख कर नज़र फेर ली
फिर कहते हो
मेरी दुआओं मे बड़ी ताकत हैं
जल्दी कबूल हो जाती है
अगर तुम कहो
दुआओं के मैं बादल बरसा दूं
बस एक बार
जो जन्म से मिला अधूरापन
तुम उसे भुला
इन्सान समझ लेना
कभी बदन से नजरें उठा
तानों से छलनी रूह को निहारना
कभी सम्मान की नजरों से देख
पड़ना हमारी नज़रों की बेबसी
किन्नर नही हमें हमारे नाम से पुकारना
भगवान् ने बनाया होगा कुछ सोच
उसका मान रख
हमें इज्जत से जीने का हक दे देना। -
खिलौना मत बनाना
कविता-खिलौना मत बनाना
————————————–
हे कुम्हार,
मत बना खिलौना हमें,
जमाना खेलें , तोड़ के,
मिटा दे मेरी हस्ती को,
बेचे किसी बाजार में,
कोई खरीदें मुझे,
बाजार की सबसे
सस्ती वस्तु समझ,
मिट्टी से बना हूं,
मिट्टी में ही मिल जाऊंगा,
किसी के घर की शोभा,
किसी बच्चें की मुस्कान,
किसी मेले की शान,
आपस में लड़े बच्चें,
कोई हंसे तो कोई रोए,
किसी के लिए सस्ता,
किसी के लिए महंगा,
वो जरा
सून कुम्हार,
हमें ऐसी वस्तु मत बना|
मैं गीली मिट्टी हूं,
तेरे हाथ चाक की काया हूं
तू चाहे जैसा ,आकार दे दे,
खड़े खड़े बाजार में ही ,चाहे तो बेच दे,
बना जानवर चाहें,
मंदिर के चौखट को,
घर के ओसार को,
सदा सदा प्रकाश दे ,
वह मुझे दीपक बना,
जब कुछ भी ,ना समझ आए,
मिट्टी को आकार देने की,
ठहर जाना वही कुम्हार,
फिर छोटा सा आकार देकर-
जला देना-
आग की भट्टी में,
बेरहम होकर पका देना,
इस बार खिलौना मत बनाना,
दर्द बहुत होता हैं-
हमें कोई तोड़े ,कोई फेंके|
इस बार मुझे-
ईट बनना,
किसी मंदिर की सीढ़ी,
किसी मस्जिद की गुंबद,
किसी शहर में मीनार बनू,
यह सब बनने से पहले,
इन सब का नीव बन जाऊं ,
क्यों अस्तित्व में आए,
जग को अपनी पहचान बताएं,
छुपा रहूंगा मिट्टी में दफन होकर,
अहसान समझेगा महल भी,
खड़ा आज जिसके ऊपर|
———————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—- -
*अहोई-अष्टमी के तारे*
बच्चों का मंगल मनाती,
आई अहोई-अष्टमी
चांदी के मनकों की,
मां, मंजुल माला पहनती
मां दिन भर व्रत है करती
चांदी के मोती-मनके पिरोकर
बच्चों की शुभ-कामना करती
हलवा-पूरी का भोग बनाकर,
अहोई माता की हो वन्दना
दीप जलाकर करें कथा,आरती
सुत-सुता हेतु, शुभ-कामना
हर मां की है, यही भावना
आंखों के तारों के शुभ हेतु,
आसमान के तारों को जल देती मां
दीप जलाकर करे आरती,
कितना शगुन मनाती मां
मां, सी कोई और ना होगी,
कितनी प्यारी होती मां ।*****✍️गीता
-
देश में कुछ ऐसा बदलाव होना चाहिए
जीवन में बुलन्दियों को छूना है अगर
कुछ कर दिखाने का दिल में,जुनून होना चाहिए
दामन को रखिए दूर ,दलदलों से पाप की
शालीनता और स्वच्छता को ,जीवन में होना चाहिए ||
अधिकार गर समान सभी के लिये नहीं
अब ऐसी व्यवस्था में,बदलाव होना चाहिए
पीढ़ी है दिग्भ्रमित ,यहाँ निर्णय हैं खोखले
अब शिक्षा व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए ||
अज्ञान वश ही आज तक ,हम आपस में लड़े हैं
अब शिक्षित ,सुयोग्य समाज होना चाहिए
है जज्बा और जुनूँ ,लक्ष्मीबाई सा जिनमें
उन्ही की हांथ में तलवार होना चाहिए ||
वासना से लिप्त हैं ,क्यों आज की पीढ़ियां
इस विषय पर सबसे पहले ,शोध होना चाहिए
ऑनर किलिंग के नाम पर क्यों मरती हैं बेटियां
प्यार मगर क्या है ,हमें बोध होना चाहिए ||
‘प्रभात ‘ क्यों आज मतभेद के गड्ढे हैं ,और मजहब की खाइयां
दिल चीज मिलाने की है ,दिल को मिलाना चाहिए
उठा दे जो गिरती हुई मानसिकता
देश में कुछ ऐसा बदलाव होना चाहिए || -
*सूर्य-देव का रथ आया*
सात रंग की किरणें लेकर,
सूर्य-देव का रथ आया
सूर्य-रश्मि की सौगात लेकर,
रौशन करता पथ लाया
नई आशाएं लाता है प्रतिदिन,
जीवन कुछ नहीं,आशा के बिन
आशा पर ही दुनियां अडिग है,
ये सुखद संदेशा है लाया
सात रंग की किरणें लेकर,
सूर्य-देव का रथ आया
तम से घबराया,जब जग सारा,
सूर्य-रथ लाया दिवस सुनहरा
लाल,पीली,बैंगनी आदि किरणों से,
फैलाया है उजियारा
नभ की आभा का, सौन्दर्य देखो
उषा-काल की बेला में,
अम्बर पर लालिमा छाई
नई उमंग लेकर आई अंशु,
मानो मेला सा है आया
सात रंग की किरणें लेकर
सूर्य-देव का रथ आया,*****✍️गीता
-
वाह !! कहीं कहीं…..
कहीं दीप जले तो कहीं ,
गरीब के घर में चूल्हा न जले।
हम खुशियाँ मनाते रहे और वो,
अंधेरे में माचिस खोजते रहे।।
कहीं दीपावली की धूम तो कहीं
पापी पेट में भूख की शहनाई।
गगन में देखो रंग बिरंगी पटाखे
वाह रे दुनिया क्या मस्ती है छाई ।। -
अश्क मेरे
अश्क जो बहे नयनों से
लुढ़के गालों पे मेरे
किसी ने ही देखे
अनदेखे ही हुऐ
अश्क जो अटके गले में
गटके हर सांस में
ना देखे किसी ने
अनदेखे ही रहे
तोड़े मुझे हर बार भीतर से
च़टके कुछ ज़ोर से
बिन किसी शौर के।सुधार के लिए सुझाव का स्वागत है।
-
इक हद होती है
हर बात की आखिर
इक हद होती हैसच लगता था कभी
झूठ आज साबित हुआ
अँधेरे में थी जिंदगी
उजाले पर काबिज हुआभविष्य देखने का दावा
अब तो खोखला पड़ा
जिसकी हथेली थी खाली
वो ही सिंघाशन चढ़ालगता था कभी जंगलराज
खत्म न हो पायेगा
इक चायवाला आसमा को
जमी की हकीकत दिखायेगाअब तो लगता असंभव
कुछ भी नहीं है यहाँ
कुछ भी मुमकिन है
ये है अपना हिंदुस्तानउम्मीद की किरण जागी
सत्ताधारी दहशत में है
सरकारी कुर्षीधारी की अकड़
लम्बी आकस्मिक छुट्टी पर हैसमर्थ की ही होती परीक्षा
नयी चुनौती आती है
असमर्थ की सुस्ती देख
मुश्किल भी शर्माती हैहिम्मतवाले से हार परास्त
एकता बढ़ती जाती है
दबे कुचलों को मिलता बल
मानवता उठती जाती है -
सिसकियां अब कमरे में ही बंद रहती हैं..
हम आदतों से अब बाज आने लगे
तुमसे दूरियां बनाने लगे
रोया करते थे रात भर तुम्हें
याद करते हुए
अब हम अपने आँसू छुपाने लगे
सिसकियां अब कमरे में ही
बंद रहती हैं
बाहर नहीं जाती !
अब हम झूंठी हँसी दिखाने लगे
कोई फर्क नहीं पड़ता हमें
तुम्हारी मौजूदगी से
ये झूठी दिलासा दिल को दिलाने लगे
देख ना ले कोई मेरे गहरे जख्म़
इसलिए बेवजह मुस्कुराने लगे.. -
“प्यार वाली खिड़की”
एक ही तो खिड़की थी
जिससे दीदार हो जाता था
खिड़की खोलने-बंद करने में
ही इजहार हो जाता था
आज वो भी बंद कर दी तुमने.!
अब वो हंसी नजारे कैसे होंगे ?
भेजा करते थे जो एक खिड़की से
दूसरी खिड़की पर हम चिट्ठियां
अब वो इशारे कैसे होंगे ?
रात भर देखते थे उठ-उठकर
तुम्हें खिड़की से
अब तो तुम्हारे दीदार को
तरसते चाँद-तारे होंगे
खोल दो ना वो प्यार वाली खिड़की*
तुम्हें रब का वास्ता’
वरना हम भगवान को प्यारे होंगे || -
चाँद अलसाया हुआ था !!
चाँद ने गोद में जाकर
हिमालय की
बिछाया बिस्तर सोने के लिए
तभी एक टिमटिमाता तारा
आकर रोने लगा
कहने लगा ऐ चाँद !
आज कोई तेरा इन्तजार कर रहा है
भूखा प्यासा रहकर
उपवास कर रहा है
तू नहीं गया गर तो वह
छत पर ही बैठा रह जाएगा
किसी की रातों का चाँद
तेरे इन्तजार में मर जाएगा
चाँद अलसाया हुआ था !!
थोड़ा इतराया हुआ था
पर जब देखा उसने जमीं पर
हजारों चाँदनी
अपनी छत पर ही खड़ी हैं
तब उसे कुछ होश आया
आज तो करवाचौथ की
घड़ी है
भागा सरपट चाँद फिर
नंगे ही पैरों आ गया
तारा भी फिर खुश हुआ
प्रज्ञा’ ने जब पूरा व्रत किया || -
न कहो बेटी पराई है
किसने कहा कि,
बेटी पराई है
ये वो शख्सियत है,
इस दुनियां की
जो मायके और ससुराल,
दोनों जगह ही छाई है
ससुराल में सब कहें,
क्या रौनक लगी है,
देखो, घर में बहू आई है
रसोई की महक से,
घर में हुई चहक से
पड़ोसी भी जान जाएं,
कि बेटी घर आई है
तो, न कहो कि बेटी पराई है*****✍️गीता
-
“सौभाग्यवती भवः”
हाथों में मेंहदी खूब रचाई है
लाल चूनर से सिर की शोभा बढ़ाई हैशादी का लहंगा-चूड़ी पहनकर
माथे पर सिंदूर की लम्बी रेखा बनाई हैचमकती बिंदी और लाली से
घर में फैली है रौनकबनी हूँ आज फिर से दुल्हन
करवाचौथ की बेला जो आई हैमैं सजी हूँ अपने सुहाग की
दीर्घायु के लिएगौरी माँ के आशीर्वाद से
अटल सुहाग की बेंदी सजाई हैसास-ससुर के चरणस्पर्श करके
“सौभाग्यवती भव” का प्रज्ञा
आज आशीर्वाद ले आई है.. -
गुड मॉर्निंग भेजा
कविता- गुड मॉर्निंग भेजा
———————————-
गुड मॉर्निंग भेजा,
हमकों एकSMS मिला,
क्षण भर हम ठहर गए थें,
हाय कोरोना तेरे कारण भूल गए थें,
अपने सभी बिछड़ गए थें,
जब से आया कोरोना हैं,
याद रहा हमकों सब कुछ,
बस भूल गए थें-
जन्मदिन आज तुम्हारा हैं,
क्या दे सकता हूं
क्या ले सकता हूं
इस खुशी के पल में हम,
बस चंद शब्द हैं उपहार हमारे,
परहित स्वहित,
स्वीकार करो यह उपहार हमारें|
वर्ष मिला जो जीवन में,
ईश्वर का धन्यवाद करों,
मात पिता गुरु चरणों का,
जब तक जिंदा हो सम्मान करों,
विश्वास रखों ईश्वर में भी,
रोज काम को करतें जाना,
लगन ,स्नेह, प्रयोग, से कुछ बढ़ कर ना,
भूलों जब भी राह अगर,
अनुभव शिक्षा काम ना आए,
ठहर वहीं पर पूछ किसी से,
फिर आगें कदम बढ़ाना,
आई हों जिस उम्मीदों से,
जल्द ही उसको छीन के लेना,
मात-पिता कुल का गौरव बन जाओ,
देश समाज हित कुछ कर जाओ,
त्याग करो,
बलिदान करो,
सब जन से स्नेहा करो,
अपना अध्ययन ऊपर रखकर,
सबसे बढ़कर ,अध्ययन से ही प्रेम करो|
राह में लाखों मिलेंगे तुमको,
सुन कष्ट तुम्हारें-,
आंखों से-
राह का कांटा चुनने की बात करें,
हंसी मजाक के संग,
सपनों में चांद पर चलने की बात करें,
सच चांद सा रोशन हो,
रात अंधेरी का बनो चांदनी,
करो संघर्ष मिले सफलता,
भटके दुश्मन का बच्चा भी,
पाएं मुकाम ,जब पढ़े कहानी,
हो बहुत सौभाग्यशाली,
अब औरों का सौभाग्य बनो,
रूहानी नूर बनो,
कदम बढ़ाओ पथ पर ऐसा,
भटके हुए राही का नूर बनो,
नूर बनोगी एक दिन सब का,
विश्वास से ‘ऋषि’ भी कहता हैं,
उपहार नहीं हैं कुछ पास मेरे देने को,
यह चंद शब्द भेट तुम्हें करता हूं|
———————————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—– -
*सौभाग्य मांग लूं चंदा से*
आज सजूं साजन की खातिर,
ओढ़ के सुर्ख चुनरिया
हाथों में मेंहदी पिया नाम की,
पहनूं लाल चूड़ियां
माथे पर बिंदी चमके सदा,
साजन तेरे नाम की
तेरी हो गई साजन मैं तो,
जबसे बाहें तुमने थाम ली
मांग सिंदूर सदा चमके,
पैरों में पायल भी खनके
साजन व्रत रखूं तुम्हारे लिए,
चंदा को अर्घ्य चढ़ाऊं मैं,
सौभाग्य मांग लूं, चंदा से
साथ सदा साजन का पाऊं मैं*****✍️गीता
-
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना
आज ,अखण्ड सौभाग्यवती का
माँ उमा से है वर पाना
ऐ चाँद, तुम जल्दी आ जाना ||
आज पिया के लिये है सजना संवरना
अमर रहे सदा मेरा सजना
ऐसा वर तुम देते जाना
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना ||
अहसानों के बोझ तले
मुझे मत दबाना
आज आरजू है यही
इबादत में मोहब्बत का विस्तार कराना
रहे सदा साथ सजना का
ऐसा वर तुम देते जाना
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना ||
पिया ही तो है मेरा गहना
उसके लिए है ,आज गजरे को पहना
मेरे गजरे को , है चांदनी से नहलाना
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना ||
तू है नटखट बड़ा
न मुझे तू सताना
बादलों के पर्दों में
कहीं छिप न जाना
चलेगा न तेरा ,अब कोई बहाना
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना ||
दिखाऊंगी तुझे ,कैसा पहना है कंगना
पीली सरसों सा दमकता मेरा गहना
गीत सौभाग्य का तुम ऐसा गुनगुनाना
जीवन की बगिया में मृदुल सुख महकाना
प्राण उपवन खिला कर ,मत मुरझाना
नित्य मधुमास जीवन में,आज कलियाँ खिलाना
ऐ चाँद ,तुम जल्दी आ जाना ||
-
सरगी लेकर आई है
उठ जा लाडो सरगी लेकर
तेरी सासु अम्मा आई है।
हाथ दिखाओ मेंहदीवाली
कित प्रीत पिया की पाई है।।
पहिला रंग पिया का प्यार ।
दूजा सास-ससुर का लाड़।।
तीजे गण गौरी की भक्ति
बीच हथेली छाई है।। उठ जा….
उपवास रखेगी लाडो मेरी
गणपति जी की भक्ति में।
रहो सुहागन सुख शांति से
धन आयु बल बुद्धि में।।
पौ बारह नित रहे पिया की
भावना हृदय समाई है।। उठ जा…
सास बहू में अन्तर कैसा
दोनों नारी ममता की मूरत।
एक पति की एक बेटे की
बनी हितैषी और जरूरत।।
‘विनयचंद ‘ की लेखनी भी
एक माँ की ममता गाई है।। उठ जा… -
लाॅकडाउन ने खाया सब
यूँ हीं बैशाखी चली गई
बिन भंगरा बिन गिद्दा के।
फीके सारे पर्व पर गए
बिना खीर -मलिद्दा के।।
लाॅकडाउन ने खाया सब
हम क्या खाऊँ मुँह को बांध।
धूंधली रह गई रात पूनम की
करवा में क्या करेगा चांद।।
दिन में तारे देखे सौहर
बीबी को है चाँद का इन्तजार।
कपड़े गहने मेंहदी मेकअप
बिन कैसा करवा का त्यौहार।।
फीके रह गए करवा जो तो
धनतेरस भी फीका होगा।
दिवाली की खुशहाली बिन
कैसा ‘ विनयचंद ‘टीका होगा।। -
अविलंब चले आओ
अब और नहीं कर देर
देखो फैला कैसा अंधेर
और नहीं भटकाओ
अविलंब चले आओ ।
उम्मीद की कोई पून्ज नहीं
डगर कहाँ, जहाँ तेरी गुन्ज नहीं
विश्वास की डोर बढ़ा जाओ
अविलंब चले आओ ।
तेरा-मेरा कोई ताल्लुकात नहीं
भा जाऊँ, वो मुझमें बात नहीं
चाह मेरे इस हारे मन की
उम्मीद की किरण बन जाओ
अविलंब चले आओ । -
*पर फ़ैला ले भारती*
शस्त्र उठा लो अब सीते,
श्री राम नहीं आएंगे
करनी होगी खुद अपनी रक्षा,
श्री रघुनाथ नहीं आएंगे
शस्त्र उठा लो हे द्रौपदी,
श्री श्याम नहीं आएंगे
सभा में अपने भी,अपने ना रहे
बिगुल बजा, कर शंख-नाद,
श्री श्याम नहीं आएंगे
झांसी की रानी सम बन जा,
तीर, तलवार उठा ले अपने
लड़ना होगा तुझे अकेले,
मोती भाई, रघुनाथ सिंह दीवान नहीं आएंगे
पर फ़ैला ले भारती,
उड़ जा ऊंची उड़ान
बन जा क्षितिजा तू,
ये कलियुग है, मेरी जान
तुझे संभालने अब कोई,
भगवान नहीं आएंगे…*****✍️गीता
*भारती का अर्थ है — भारतीय नारी -
दुनियाँ तो जहरीली है
सोंच समझकर कदम बढ़ाओ राह बहुत पथरीली है।
साथी मीठे सुर गुंजाओ, दुनियाँ तो जहरीली है।।ख़ुशी परायी देख ख़ुशी से किसका हृदय मचलता है।
कौन हृदय है जिसके भीतर प्रेम- पपीहा पलता है।
बिना कपट के किस कोकिल के स्वर का जादू चलता है।
स्वार्थ न हो तो तुम्हीं बताओ, किसकी कूक सुरीली है।साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।
मोहक कलियाँ मिल जाती हैं राहों में आते जाते।
कुछ के अधर इशारा करते कुछ के नैना मुस्काते।
मृग मरीचिका ये आकर्षण सम्मोहन ही बिखराते।
इस मद की जद में मत आओ, वनिता नयन नशीली है।साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।
जीवन एक दौड़ स्पर्धा ठहर गए तो हार गए।
बाधाओं के गहरे सागर जो उतरे वो पार गए।
चलते चलते थके वही जो नहीं समय की धार गए।
समझो सँभलो बढ़ते जाओ पगडण्डी रपटीली है।साथी मीठे सुर गुंजाओ दुनियाँ तो जहरीली है।।
संजय नारायण
-
*बेला*
मेरा नाम बाबूजी ने,
बड़े लाड से रखा था
बेला……
मेरे जन्म पर एक
पौधा भी रोपा था,
बेला का…..
बेला के फूल की तरह,
खिलती रही, बढ़ती रही
यौवन की दहलीज चढ़ती रही,
बेला का पौधा, तो बाबूजी ने रखा
अपना घर महकाने को,
मुझे भेज दिया,ससुराल
उनका घर महकाने को,
पति के घर में, पहले-पहले,
ज्यादा मन ना लगता था
फ़िर हौले-हौले,
जब हुआ प्यार
जीवन में आने लगी बहार
दो फूल खिले जीवन में,
पहले अंश आया, फिर गुड़िया आई
घर-आंगन महक गया ,
जीवन में आने लगा निखार
बेला नाम भी लगने लगा साकार..*****✍️गीता
-
राम राज्य
अजीब है यह दुनिया
जिनोंहने बात बैर की की, लोगों को बाटने की की
बात वह राम राज्य की करते हैजिनके बिरियानी खा कर हम लखनऊ की
नवाबी ठाठ के गुण गाते है
बात जब मज़हब की हो उनको मारने मे हम
नहीं कतरातेबात रसूल की हो या उसूल की
हम समझौता नहीं करते
काफिर जो अंदर बसा है
बाहर उसको हम ढूंढ़तेतेरा खुदा मेरा भगवान हम करते
एक ही रब के हज़ारों नाम हम जपते
बात जब देश को अंदर से खोखला करने वाली हो
राष्ट्रवाद का नाम लेते
तोड़ने वाले को जोड़ने की ज़िम्मेदारी हम देतेबात तोह हम शांती की करते है
आस पास कही वह रहती होंगी
क्यों की भारत मे जाती धर्म के नाम पर हज़ारो भारत
बस चुके है
शांती किसी लड़की का नाम ही होगा शायद
क्योंकी मुसलमान अमन या हिन्दू शांती को हमने कब लव जिहाद के नाम पर मार डाला है -
अपनी भूख मिटाने के लिए
कविता-अपनी भूख मिटाने के लिए
———————————————
भूख मिटाने के लिये,
परिवार चलाने के लिए,
लेबर चौराहे पर जाते हैं,
आतें हैं मालिक कई
मजदूरी की मोल भाव करते हैं |
मजदूरी मिलती ना,
गाली मिल जाती है,
बड़े नसीब से काम मिले,
मालिक तानाशाह ,निकल जाते हैं
मनमानी से काम कराते हैं
सम्मान नही देते हैं,
मजदूर समझ इंसानों को,
गाली दे देकर काम कराते हैं,
महलों में रहने वाले,
मजदूरों की कदर करो,
सोचो जरा मजदूर न होगा,
तुम्हारे घर की सजावट कौन करेगा|
दस मंजिल की बिल्डिंग पर,
एक रस्सी सहारे चढ़ जाते हैं
लटक लटक – झूल झूल कर
पेंटिंग पुट्टी करते हैं,
बड़ा दुख होता उस क्षण उसको,
पत्नी के प्रसवकाल में
जब पैसा ना पाता हैं|
फोन लगाता है,
मालिक पैसा दे दो,
घर में आई बड़ी समस्या हैं,
बिक रहा सब कुछ
बीवी की दवाई में,
पैसे का इंतजाम करो,
डॉक्टर ने फरमान सुनाया हैं|
मजदूरी कुछ कर्ज अभी दे दो,
एक-एक पैसा लौटा दूंगा,
जब लौटे शहर आपके,
आकर बिल्डिंग में काम लगा दूगां,
बेटा दुख है मुझको सुन दुख तेरे,
हजार बचे हैं बस पैसे तेरे,
रामू श्यामू राजू भी मांग रहे हैं,
साहब पैसा दे दो घर वाले मांग रहे हैं,
मजदूर बेचारा
किससे जाएं दर्द सुनाएं,
उम्र गुजारी परदेस में रहकर,
गांव में किससे कर्जा उठाएं
वक्त वक्त की बात हैं यारों,
राजा भी कभी बिक जाए,
आए मुसीबत ना ,दुश्मन घर भी,
नहीं घर का तवा भी बिक जाए,
—————————————–
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—— -
खुशियां गरीब की
झरने झर-झर बह रहे थे,
समीर के शोर कुछ कह रहे थे
कितना आनन्द आता होगा उन्हें,
जो यहां पे रह रहे थे
ये सोचती-सोचती मैं चली जा रही थी,
वहीं कहीं अंदर को, एक गली जा रही थी
एक घर के आगे रूकी यूं ही
वहां, मंद-मंद सी रौशनी आ रही थी
एक बालक ख़ुशी से बोल रहा था,
ख़ुशी-ख़ुशी नाचता सा डोल रहा था
अरे, सुन ओ कलुआ..
आज पर्यटक बहुत मिले थे
मां की हो गई बहुत कमाई,
आज तो घर में बनेगा हलुआ
आज तो घर में बनेगा हलुआ ।*****✍️गीता
-
बदनाम हो गये
बदनाम हो गये
————————
बदनाम हो गये जमाने के नजरों में,
वजूद खो दिया खुद का उसे मनाने में,
इल्जाम लगता है इसे कोई और मिल गई,
क्या पता उसे –
रोते-रोते मेरी जिंदगी खाक हो गई,
वह हस्ती है किसी के हाथों में हाथ रखकर,
हम रो रहे हैं माथे पर हाथ रखकर,
शायद उसे –
आज नहीं तो कल समझ आ जायेगा,
आज जिसके साथ हूं मैं,
वह सिर्फ होटल सिनेमा पार्क तक ले जायेगा,
जो पपीहा बनकर जी रहा
वह मेरी मांग का सिंदूर बन जायेगा,
आये मिलन में कोई बाधा तो,
सागर की लहर या –
तूफान बन कर निकल जायेगा,
लांग जायेगा हिमालय को भी,
छोड़ जायेगा घर की चौखट भी,
कभी नहीं हमें अकेला छोड़ पायेगा,
अब हम क्या करें ,
उसने अपने चंद खुशियों के लिए हमें छोड़ा है,
मेरा काम था
पानी में डूबती बिच्छू को बचाना,
डंके मिले या दर्द मिले,
देख लगाव कोई पागल कह दे,
जब तक दर्द को भी सहकर जिंदा हूं,
तब तक बिच्छू तुझे बचाना है
———————————————-
**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—– -
तस्वीर
वो तस्वीर बिक गई,
कई हज़ार में साहब,
जिसमें एक गरीब का बच्चा,
देखे था सुहाने ख्वाब ।*****✍️गीता
-
खुदा लिखने चले थे..!!
वो हुनर में हमारी बराबरी करने चले थे
अरे ! वो नासमझ हैं ये क्या करने चले थे
हमने तो तबाह कर दिया खुद को मोहब्बत में
तब जाकर लिखना आया है
वो तो जल्दबाजी में हमें
खुदा’ लिखने चले थे
यूं तो लिखने को कुछ भी लिख सकते हैं वो
पर वो तो हमारी ही कथा लिखने चले थे
कोई जाकर रोंको उन्हें
मत लिखें हम पर
वरना हम सरेआम बन जाएंगे एक तमाशा
हम तो दिलजले हैं
दिल के जख्म लिखा करते हैं
पर वो तो हमें बेवफा लिखने चले थे… -
मुलाकात के सिलसिले
उनका नंबर भी है
और मुलाकात के सिलसिले भी होते रहते हैं
मुकद्दर ऐसा है
हम फिर भी रोते रहते हैं
बात सदियों से नहीं हुई उनसे
ना हम उनकी तरफ देखते हैं
आ भी जाएं गर वो सामने तो हम
नजरें अपनी झुका के रखते हैं
ना खबर हो कहीं मेरे दिल की
अपने जज्बात छुपा के रखते हैं
हाँ, हुई थी एक बार गुफ्तगू उनसे
वो मुस्कुराये थे हमें छूकर
मारा था थप्पड़ जोर से हमने
क्योंकि हम फरेबी उन्हें समझते हैं….. -
मदद करनी होगी
जो कर सकता है उसने
उनकी मदद करनी ही होगी,
जो कड़कड़ाती ठंड में भी
खुले में सोते हैं।
छोटे छोटे बच्चे
ठिठुरते हैं तो
भीतर ही भीतर रोते हैं।
आने वाला है ठंड का मौसम
सोच कर ही उनकी
रूह कंपकंपाने लगती है।
हमें महलों में दो रजाई के बाद भी
ठंड लगती है,
वे खुले में
कम वस्त्रों में
किन शस्त्रों से
ठंड का मुकाबला करेंगे।
मदद करनी होगी।
सरकार को अभी से
व्यवस्था करनी होगी,
अन्यथा फिर वही पुराने
समाचार सुनने को मिलेंगे। -
वो आया था..!!
मैं थककर चूर थी
जा बिस्तर पर लेटी थी
साँसें तेज थीं
बदन में अकड़न थी
आँखें अधखुली थीं
शायद नींद थी
कुछ पुरानी-सी यादें
कर रही बेचैन थी
वो बहुत देर से देख रहा था
ना हिल रहा था
ना डुल रहा था
अपनी जुगनू जैसी आँखों से
एकटक मुझको घूर रहा था
भाभी से पूँछा मैंने ये
असली है या नकली है
जरा इसे छूकर देखो
भाभी बोलीं तू पगली है
यह तो बिल्कुल असली है
शायद तेरा पूर्वजन्म का आशिक है
या प्रिय का संदेशा लेकर आया है
या फिर कोई मजनू है
जो वेश बदलकर आया है
यह सुनकर वह भाग गया
जा छुपा पर्दे के पीछे
मुझको उंगली में काटा
मैं जब थी अँखियां मीचे
वह कौन था बस एक “चूहा” था !! -
ना भूली वो रात…!!
बीत गईं लाखों शामें
पर ना भूली वो रात अभी तक |
तुमने छोंड़ दिया था जिस पथ पर
मैं बैठी हूँ उस राह अभी तक |
तुम हो धड़कन तुम ही हो दिल
मेरा तो जो भी हो तुम ही हो
यह छोटी-सी बात तुम्हें मैं
समझाने में रही नाकाम अभी तक |
तुमने जो भेजी थी पायल
पहनी नहीं पर अब भी रख्खी है
तुझ तक ना पहुंचा पाई मैं
दिल का ये पैगाम अभी तक |
तुम मुझको पागल कहते थे
प्यार में जब डूबे रहते थे
तुमने कहना छोंड़ दिया पर
लेते हैं सब वो नाम अभी तक |