हर दौर में अधर्म का प्रारम्भ एक नव-चरण होता रहा l
हर एक युग में “हे रावण” तेरा नव-अवतरण होता रहा l
हर बार अग्नि परीक्षाओं से गुजरी सीता सती सी नरियाँ ,
किसी न किसी रूप में औरत का यूँ अपहरण होता रहा l आखों पर पट्टी बांधकर इन्साफ तो तख़्त पर बैठा रहा ,
भरी सभा में किसी पंचाली का यूँ चीर-हरण होता रहा l
हर दौर में भरोसा तोड़कर पीठ में हैं खँजर उतारे गए ,
हर घर में कोई तो घर का भेदी वभीषण होता रहा l
पाप कितना बलवान हो पर यह बात बिल्कुल सत्य है ,
हर एक युग में राम से ही पराजित यह रावण होता रहा l
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संपादक की पसंद
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हे रावण
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मेरे राम फिर से आओ ना
मेरे राम!
फिर से आओ
मेरे राम!
फिर से आओ ना,
बढ़ चुकी दानवों की
फौज फिर से,
आओ धरती में
चले आओ ना।
पहले दिखता था रावण
मारना आसान था,
अब तो लगता है वह
मस्तिष्क भीतर घुस गया है।
करोंड़ों दिमाग
दूषित कर चुका है।
लूट कर अस्मतें
शराफत की,
दिखावटी शरीफ
बन चुका है।
लूट लेता है
जब मिले मौका
हर तरफ धोखा ही धोखा,
आदमी आदमी से कटने लगा,
सत्य की राह का राही
भी आज थकने लगा।
आदमी राक्षस बना है यह
निरीह बेटियों को मार रहा,
चूर अपने घमंड में होकर
फिर दुराचार आज करने लगा
सैकड़ों मुख लगा के रावण वह
पाप करने लगा है, हंसने लगा।
मेरे राम अब तो आओ,
आओ ना,
धरा में दानव है
उसे मिटाओ ना,
मेरे राम फिर से आओ ना। -
सरहद का रखवाला
हम सरहदों पर रहते हैं
आज ज़माने से ये कहते हैं
भारत माता के वीर सभी हम
हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं।है अगर हिम्मत किसी दुश्मन में
तो आकर टक्कर ले हमसे
हम भारत को अपने दिल में रखते हैं
जज्बा-ए-हिन्दोस्तान लोग इसको कहते हैं।कोई नापाक कदम न आने देंगे इस धरा पर
हम आज सर पे कफ़न बाँध कर ये कहते हैं
दुश्मन कितना ही शातिर क्यों न हो
उसको धुल चाटने की हिम्मत हम रखते है।हम सरहदों पर रहते हैं
आज ज़माने से ये कहते हैं
भारत माता के वीर सभी हम
हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं।कोई लाख भेजे दुश्मन मेरे वतन के लिए
अपनी जान पर खेल कर उनसे लड़ने की ताक़त हम रखते हैं
मेरा वतन मेरा हिन्दोस्तान सदा खुश रहेगा
माँ भारती की कसम हम लेते है।हम सरहदों पर रहते हैं
आज ज़माने से ये कहते हैं
भारत माता के वीर सभी हम
हमको सभी सरहद का रखवाला कहते हैं। -
रोशनी आये
रोशनी आये
भले ही कहीं से भी
मगर वो आये,
अंधेरे को हराने आये।
उसकी किरणें हों
इतनी तीखी सी
आवरण भेद कर
भीतर जहां हो मन
वहां पहुंचें,
मिटा दें सब अंधेरा।
और जितनी भी
लगी हो कालिख
उसे भी साफ कर
चमका दे हुस्न मेरा।
वो हुस्न भीतरी है
दिखता नहीं है बाहर
उसे तो रब ही देखता है,
वो सदा साफ रहे मेरा।
क्योंकि रब ही तो सब है
उसकी बाहर व भीतर
सब तरफ ही नजरें हैं
कहीं वो देख न ले
कालिमा मेरे मन की।
इसलिए रोशनी आये
व भीतर तक समाये
मिटा दे साफ कर दे
कालिमा मेरे मन की। -
जिन्दगी ने दिया है तोहफा हो
जिन्दगी ने दिया है तोहफा हो
प्राणों की हरेक सांस हो तुम,
सजा चमन तुम्हीं से आज मेरा,
कल भी जी लेंगे ऐसी आस हो तुम।
जबसे आई, बाहर लाई हो
लुटाती नेह, चली आई हो,
बनी वनिता मगर बनी सब कुछ
रोशनी बन के खूब छाई हो।
गम हों खुशियां हों चाहे कैसे भी
सभी में साथ तुम बराबर हो,
अंग अर्धांगिनी समाहित हो
धर्म सहधर्मिणी सी शोभित हो।
सारे सुख-दुख समेट लेती हो
अपने आँचल में बांध लेती हो,
ऐसे जीवन संभाल लेती हो
एक उफ्फ तक भी नहीं करती हो।
सात फेरों को अग्नि के लेकर
इतना सच्चा स्नेह करती हो,
सात जन्मों में हम न दे सकते
जितना तुम एक में ही देती हो। -
“किरदारों का रंगमंच”
ना जाने किन खयालों में
खोई रहती है दुनिया
मेरा-मेरा करती रहती है दुनिया
अपनी तो देह भी साथ नहीं देती
सब कुछ यहीं रह जाता है
फिर किस मद में चूर रहती है दुनिया
भाई हो या जीवनसाथी हो
कोई साथ नहीं जाता
बस दो-चार दिन जनाजे पर
रो लेती है दुनिया
कमा-कमाकर नोटों के
गट्ठर लगा लेते हैं सब
एक कौड़ी भी साथ नहीं जाती
जब छूट जाती है दुनिया
ऊपरवाले को कोई याद नहीं करता
जिसने बनाई है ये सुंदर-सी दुनिया
महज छलावा है जग में, सब नश्वर है
किरदारों का रंगमंच बस है दुनिया… -
कुछ मिले इस तरह
जैसे धरा कभी गगन से
मिलके भी मिल पायी नहीं
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
जैसे वन में तृष्णा से व्याकुल
ढूँढती, भटकती, फिरती मृग
मेरी भी मृगमरीचिका कुछ इस तरह
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
खुश होते हैं अकसर,
क्षितिज की ओर देख कर
नभ देखो इठला रहा
मदमस्त है भू को चूमकर
यह भ्रम पलता जिस तरह
हम तुम भी, मिले कुछ इस तरह ।
दुख का इम्तिहां देते रह गये
हर दर्द को सहके रह गये
स्वाति के बूँद की
पपीहे को चाहत जिस तरह
हम तुम भी, मिलें कुछ इस तरह । -
बिटिया हो मेरी
एक हसरत
कुछ करूँ ऐसा
गर्व हो सभी अपने ही नहीं, ग़ैरों को भी
अर्ज करें, हे मालिक!
हर घर में जन्म ले, ऐसी ही, बिटिया हो मेरी !
हर जन में पनपे, बेटी की ख्वाहिश
लालसा सिर्फ हो बेटे की नहीं,
कुल के नाम रौशन की
जिम्मेदारी सिर्फ किसी एक पर नहीं
घर-परिवार सब कहें, ऐसी ही बिटिया हो मेरी !
हमने बेटी जने, पर वेबस लाचार हैं नहीं
दहेज़ के नाम पर, दालान मंडी बने नहीं
शादी-विवाह में कहीं, कभी तिज़ारत हो नहीं
किसी पिता की पगङी, किसी के पैरों तले हो नहीं
शान से चलें, गर्व से कहें, ऐसी ही बिटिया हो मेरी !
हर सुता रूप-गुण-ज्ञान से परिपूर्ण हो
स्वाभिमानी ही नहीं, स्वाबलम्बन से पूर्ण हो
वह बाज़ार में सजायी गयीं, सामग्री नहीं
उसे देख परख कर, कोई छोङ जाए नहीं
इन्कार की क़ाबलियत रखे, ऐसी ही बिटिया हो मेरी ! -
भोजपुरी देवी पचरा गीत- आपन तू पूजनवा |
भोजपुरी देवी पचरा गीत- आपन तू पूजनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
शेरवा सवार होके देवी लेला तू असनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
सोनवा के दीयना माई सोनवा के थरिया |
गईया के घिउया माई दरसन देबू कहिया |
होला जय जय कार तोहरो सगरो जमनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
सोनवा के रथवा सोना कंगना माई हथवा |
सोनवा कटार लाली बिंदिया माई मथवा |
रोई चरनिया गिरे माई तोहरे भारती ललनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
निमिया के डार माई झुलवा लगावेली |
फुलवा से सजल मालिन पेगवा लगावेली |
झूमी झूमी मालिन गावे पचरा माई के भजनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
लाल सेनुरवा चमके दमके माई के सुरतिया |
हहरत आवे देवी चहकत देवी के मुरतिया |
पूजी पूजी तोहके लोगवा नाचे होइके मगनवा |
लेला लेला ये मईया आके आपन तू पूजनवा |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
अकेले रह जाते हैं
सुंदरता के आकर्षण में बंध
कोई इतना कैसे भा जाता है
ईश्वर से मांग को हो धन्यवाद
प्रार्थना से जीवन में लाता हैपाकर इच्छित साथी खूब इतराता है
अपनों को ठुकरा उसे अपना बनाता है
नये रिश्ते जुड़ते ्संबंध छूट से जाते हैं
उमंग में लेकिन महसूस कहां कर पाते हैंजीवन पाते खोते आगे बढ़ता जाता है
सुख दुख का आना जाना लगा रहता है
इक दूसरे के आशाओं को समझते हुए
जिंदगी भी इक समझौता सा लगता हैशौक सभी ने पाले थे जो जो
धाराशाई होते चले जाते हैं
कयी हसरतों से पालते बच्चों को
सपने हमेशा टूटते चले जाते हैंखून के रिश्ते होते हैं मजबूत
क्यूं अचानक बिखर से जाते हैं
पर की चाहत रखने के लिए
जननी के आंसू नजर न आते हैंमाता स्वाभिमान को भूल कैसे भी
बच्चों के लिए निज को भुलाती है
संतान की निष्ठुरता को सहकर भी
स्व को बलिदान किये चली जाती हैबचपन से सब रटते पढ़ते कि
इतिहास स्वयं को दुहराता है
भविष्य का फिर भी न डर इनको
इंसान सदा किया हुआ पाता हैभेद परिवार में जो पैदा करते रहते
स्वयं सुखों का हमेशा संधान किया
ऐसी बहुत बेटियां ने स्वयं ही तो
अपने जीवन को श्मशान कियाअपना पेट काट काट कर जो
अपने अनुजों को पालते हैं
उनमें सुधार न पाकर अग्रज
मन ही मन चिन्तित हुए जाते हैंभाई को तिजोरी मानकर जो
उसकी खुशियों को खा जाते हैं
इक दिन तो करनी का फल मिलता
फिर हाथ मलते हुए पछताते हैंमांगने को ही जो निज रिश्तों में
अपना ईमान बनाते चले जाते हैं
खुद को ही धोखा देते रहते
दुनियां में अकेले रह जाते हैं -
पत्नी देवो भव:
राजा दशरथ ने माना कहना,
अपनी पत्नी कैकेई का
एक वचन की खातिर देखो,
बहु-बेटे वन में जाते हैं,
प्राण त्यागने पड़े भले ही,
आज दशरथ जी पूजे जाते हैं।
श्री राम ने माना,
कहना सीता जी का
स्वर्ण-मृग के पीछे दौड़े,
चाहे उस घटना के कारण
राम-सिया दोनों ही बिछुड़े
हम उनके गीत बिछोह
के गाते हैं..
श्री राम पूजे जाते हैं ।
मंदोदरी की कही ना मानी,
रावण था कितना अभिमानी
मारा गया राम के हाथों,
सम्मान नहीं वो पाता है
और,आज तक जलाया जाता है ।
तो बगैर अपना दिमाग लगाए
करो वही जो पत्नी चाहे,
ये सूत्र बड़ा उपयोगी
जीवन सुखमय और यशस्वी बनाए ।
“जन-हित में जारी
आगे मर्ज़ी तुम्हारी”*****✍️गीता
-
लम्हे..
ज़िन्दगी से कुछ लम्हे,
बचाती रही
एक बटुवे में उन्हें,
सजाती रही
सोचा था कि फुरसत से
करूंगी खर्च,
ज़िन्दगी में
इसीलिए बचाती रही,
कुछ लम्हे
कुछ अपने लिए,
कुछ अपने अपनों के लिए
फ़िर ज़िन्दगी बीतनी थी,
बीत गई…
एक दिन सोचा,बटुआ खोलूं
बटुआ खोला….
एक भी लम्हा ना मिला,
कहां गए, मेरे सब लम्हे
कोई जवाब भी नहीं मिला
फ़िर सोचा, चलो आज थोड़ी
सी फुरसत है,
मिलती हूं खुद से ही..
जा के आइने के सामने खड़ी हो गई
बालों में कुछ चांदी सी पड़ी थी,
वो कुछ-कुछ मेरे जैसी ही लगी
वो आइने में,पता नहीं कौन खड़ी थी..*****✍️गीता
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सुंदरता
सुंदर दिखना सबको भाता,
हे जीवन के भाग्य विधाता ।
तन की काया कुछ पल सुंदर ,
मन की माया हर पल सुंदर ।
तन सुंदर पर मन न हो कोमल,
वह कुटिल मानव जैसा पुष्प सेमल,
मन कोमल तन है काला,
रहे हरदम मधु पान मसाला ।
सुंदर चित की बात निराली,
तन कलुषित फिर भी साथी यह माली ।
सुंदर दिखना सबको भाता,
हे जीवन के भाग्य विधाता ।
तन के सुंदर, पर मन के जाली,
दुराचार और बने व्यभिचारी ।
तन के कलुषित मन के निराले,
दया करुणा के सागर मतवाले ।
सुंदर दिखना सबको भाता,
हे जीवन के भाग्य विधाता । -
संतान
माया को रचा हमने
प्यार का दीप जलाया
जिनका था सहारा हमें
उन्हें ही किया बेसहारागौ माता को पूजते तब तक
जब तक अमृत धार बहाती
यही स्वार्थ की अंधी भक्ति
अपनों से हमें दूर कर जातीरिश्तेदारों से सम्बन्ध तभी
जब तक धन वे लुटाते
कार्य सिध्ध होते ही अपने
जाने लुप्त कहाँ हो जातेफिर से ये निस्तेज शक्ल
उनको तभी हैं दिखाते
जब नयी वासना के लिए
धन थोड़े कम पड़ जातेअपने भी बन जाते सपने
ये शौख जिन्हे हो जाते
अहसानो को भूल उन्हें बस
अपनों के धन याद रह जातेउनसे अब रिस्ता ही कैसा
माँ को जिसने भुलाया
अब भी प्रार्थना करती नित
संतान को कौन भूल पायाऐसे सन्तानो की प्रभु कभी
शक्ल न किसी को दिखाए
शक्ल दिखाने को जो अपनी
माता को सदा तरसायेजरुरत पड़ने पर ही जिसको
भाई माँ बाप की याद आये
स्वयं सुखों को दूर अपनाये
अपनों के धन को हर्षायेसंतान वही जो क्षण भर को
माँ बाप को भूल न पाए
किसी की नन्ही अहसानो को
जीवन भर भूल न पाएजिसने उसको संसार दिया
उस पर सर्वस्व लुटाये
जान पर भी है हक़ जिसका
हक़ के लिए न उसे बिसराये -
भोजपुरी देवी गीत-चला माई के दुअरिया |
भोजपुरी देवी गीत-चला माई के दुअरिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
लाल अड़हुलवा सेनूर चढ़ईहा ललकी चुनरिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
नव दिन नव रूप मे दुर्गा माई आवेली |
शैलपुत्री ब्रम्हचारिणी चंद्रघंटा उ कहावेली |
कुस्मांडा स्कंधमाई कार्तिकायिनी डलिहे नजरिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
सातवाँ रूप कालरात्रि आठवाँ महागौरी रूप हो |
नौवा सिद्धिदात्री चढ़ावा दिया बाती धूप हो |
सुनर हउवे रूपवा माई बना देवी के पुजरिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
छोड़ा पिया माया मोह लगावा नेह माई मे |
नौ दिन बरत उपवास धियान लगावा माई मे |
दरसन पूजन कइके बना मोर बाँके सवारिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
अबकी अस्टमी नवमी एके दिन आई हो |
हवन आरती कइके नौ कन्या भोगा कराई हो |
खुश होइहे दुर्गा माई करीहे सुफल उमरिया |
मोर करेजउ हो चली चला माई के दुअरिया |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
एक दूजे का प्रेम
प्रेम जिसका इंजन, गाड़ी जिसकी यारी |
इजहार चालक है, खुशियाँ हैं सवारी |वह एक फरिश्ता है, खूबसूरत गुलदस्ता है |
लगता बहुत नाजुक, पर सच्चे दिल से रिश्ता है |वह आस से जीता है, विश्वास से चलता है |
नफरत जिसका दुश्मन, जो प्यार से पलता है |एक दूजे के दर्द को अपना समझ कर,
खुद बीमार होता है |
पर खुशगवार दिल में, इकरार होता है |वो एक शीशा सा नाजुक है, बस इसे सहेजना होता है |
स्वार्थी राक्षस को बस भेदना होता है |सच कहूँ इसमें असीम शक्ति होती है |
अपना पराया हो जाए, पर इसमें सच्ची भक्ति होती है |अगर कोई इसकी मान का, व्याकरण सीख लेता है |
समझो वो आजीवन सच्चे भाव का आवरण ओढ़ लेता है | -
वक्त
सबसे तेज होती है, वक्त की रफ्तार |
वक्त में घुली है, सबकी जीत या हार |
वक्त के दो पहलू, नफरत और प्यार |
वक्त से ही जुड़े हैं, जीवन और मरण के तार |जिसे समझते हैं हम, खुदा का फरिश्ता |
लेकिन वक्त बदलता है, अहिस्ता-अहिस्ता |
कहावत है चली, वक्त ही बलवान |
कोई दाने को मोहताज, तो कोई आलिशान |अच्छा और बुरा, वक्त के दो रूप होते हैं |
वक्त राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है |
शौकीन दुनिया में किया वक्त ने प्रहार |
वक्त वायरस से चढ़ा, फैशन का बुखार |हंसाना और रूलाना, वक्त की नियति है |
अचानक पलट जाना, इसकी मासूमियत है |
वक्त के झोंको से डगमगाती, जीवन की नाव |
वक्त के तूफान से होता प्यार, मोहब्बत, बिखराव |जिसे वक्त की परवाह, वक्त को भी परवाह अपने कद्रदानों की |
जिन्दगी रोशन हो, वक्त के दीवानो की |
जिन्दगी रोशन हो, वक्त के दीवानो की | -
रण शंख का अब नाद हो
प्रज्वलित ज्वाला हुई है
रण शंख का अब नाद हो
शत्रु जो पुलकित हुआ है
उसका करो अब नाश तुम।न रोको अभी तुम भावना को
रक्त का उबाल थमने से पहले
दुश्मन को पंहुचा दो काल के उस गार में
प्रज्वलित ज्वाला हुई है रण शंख का अब नाद हो।वो हमारी भावना को विवशता कहते रहे
उनके दिए हर जख्म को, हमने सदा हंसकर सहे
पर वक़्त है बदलाव का, और आंधी भी अब आयी है
देश के दुश्मन की चालें, इस मूड पर हमको ले है।तुम दिखा दो रास्ता, उसको काल के गार का
नापाक उसकी हरकतों पर, अब अभी अंकुश लगे
रण भेदियों के नाद को, टोको नहीं टोको नहीं
माँ भर्ती के वीर है, उनको अभी रोको नहीं।दुश्मनो की हरकतों का, अब उन्हें ईनाम दो
यह वक़्त है बदलाव का, रण शंख का अब नाद हो
उन शहीदों की आत्मा को, दो यही श्रद्धांजलि
दुश्मन की सांसे छीन लो, दुश्मन की सांसे छीन लो।प्रज्वलित ज्वाला हुई है,रण शंख का अब नाद हो
शत्रु जो पुलकित हुआ है,उसका अब बस शर्वनाश हो। -
प्रभु का इंसाफ़
करके भ्रूण-हत्या
दो बेटियों की,
उसने दो बेटे फ़िर पाए
खुश हो कर मस्त घूमता,
कहता सौभाग्य जगाए
बड़े हुए जब बेटे उसके,
दो बहुएं घर में आईं
सास-ससुर की अवहेलना
करने में, कोई कसर ना उठाई
बेटे भी अब मुंह चढ़ाकर,
घर में घूमा करते
क्या हुआ है,सबको अचानक
दोनों पति-पत्नी सोचा करते
हर दिन, क्लेश होता था घर में,
सब मान-सम्मान गंवाया
एक दिन दुखी मन से,
वो बोला प्रभु से..
प्रभु, कहां चूक हुई है मुझसे,
ये कैसा संकट आया
रोता था दिन-रात तड़पता,
पूछा करता प्रभु से
प्रभु, मेरे साथ ये क्या हुआ
मैनें तो अपने जीवन में,
किसी का दिल भी नहीं दुखाया
एक दिन प्रभु सपने में आए,
उसको ये समझाया,
तेरा पाप ही तेरे आगे,
दुर्दिन बन कर आया
जिन दो बेटियों की तुमने
भ्रूण-हत्या करवाई है,
वे ही अब बहुएं बनकर बदला
लेने आई हैं, वे बदला लेने आईं हैं..*****✍️गीता
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हिन्दी देवी गीत – भक्ति दान दे दो |
हिन्दी देवी गीत – भक्ति दान दे दो |
हे प्रमेशवरी हे दुर्गेशवरी भक्ति दान दे दो |
काली कपालिनी दैत्य दलिनी शक्ति दान दे दो |
जगत जननी माँ अम्बे जगदम्बे तुम हो |
दुख हरनी सुख करनी माँ अम्बे तुम हो |
हे प्रकाशीनी आनंद करनी मुक्ति दान दे दो |
हे प्रमेशवरी हे दुर्गेशवरी भक्ति दान दे दो |
माँ शारदा कालिका कमला तेरा ही रूप है |
वैषणों बिंध्यवाशिनी काम रूप अद्द्भुत है |
हे माँ छिन्नमस्तिका मुझे रक्षित दान दे दो |
हे प्रमेशवरी हे दुर्गेशवरी भक्ति दान दे दो |
भय हारिणी कस्ट निवारिणी तुम ज्ञान दायिनी |
भक्त भव तारिणी जग कल्याणी सिंह वाहिनी |
चंड मुंड दामिनी मुझ संकट युक्ति दान दे दो |
हे प्रमेशवरी हे दुर्गेशवरी भक्ति दान दे दो |
कर कमल शंख चक्र कटार धर तुम आओ |
नैन विशाल काली केस कमर कर तुम आओ |
चरण धुली मस्तक भारती अर्पित दान दे दो |
हे प्रमेशवरी हे दुर्गेशवरी भक्ति दान दे दो |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
“दो मुट्ठी आसमां”
तमाम ख्वाहिशें नहीं हैं मेरी
बस ‘दो मुट्ठी आसमां’ की ख्वाहिश है
पंख हों उड़ने का हौसला हो
और हों बेहिसाब मंजिलें
उड़ चलूं जिसमें मैं अकेली
ना हो कोई मुश्किलें..
चाहें जिस राह पर चलूं मैं
मगर सफर कभी खत्म ना हो
आसमान में चाँद-सितारे हों रौशन
नाकामयाबी का धुंधलापन ना हो…. -
कागज
कागज!!
बड़े काम के हो आप
युगों युगों से
आप पर कलम
अंकित करते आई है,
तमाम तरह का साहित्य।
आप में अब तक का
दुख-सुख, उत्थान-पतन,
आशा-निराशा,
उत्साह-अवसाद,
इतिहास,
सब कुछ अंकित है।
मानव क्या था, क्या है
जीवन कैसा था, कैसा है
सब कुछ आप पर ही
अंकित है।
आप न होते तो
कैसे हम अपना
बीता कल जानते।
आप न होते
कैसे हम सहेजा हुआ
आत्मसात कर पाते।
आप न होते तो
कैसे हम अपनी संवेदना
को अंकित कर पाते।
आप पर अंकित भंडार ही तो
भावी पीढ़ी के लिए
वरदान है,
जीवन जीने का ज्ञान है।
कागज
आपका होना
हमारे लिए वरदान है
आपकी महत्ता का
हमें भान है।
——— डॉ0 सतीश पाण्डेय -
मिट्टी में मिल जाना है
स्वारथ की खातिर दूजे का
दिल नहीं दुखाना है,
आज नहीं तो कल सबने
मिट्टी में ही मिल जाना है।
धुँवा धुँवा होकर उड़ना है,
बचा हुआ जल में बहना है,
शेष नहीं रहना है कुछ भी
यादों को ही रह जाना है।
यादें भी कुछ वर्षों तक
रहती हैं फिर मिट जाती हैं,
वेदों का कहना है,
संगी बन कर्मों को जाना है,
आज नहीं तो कल सबने
मिट्टी में ही मिल जाना है।
दूजे उन्नति होने पर
चिंता में क्यों जलना है,
चार दिवस जीवन है
चिर निद्रा में सो जाना है।
कर्म नहीं छोड़ना है,
सच्ची राहों पर चलना है,
अपना करना कर देना
बिंदास भाव से जीना है।
ज्यादा तू तू मैं मैं करके
हासिल ज़ीरो हो जाना है
आज नहीं तो कल सबने
मिट्टी में ही मिल जाना है।
—– डॉ0 सतीश पाण्डेय,
——– चम्पावत, उत्तराखंड -
धरती सचमुच माता है
धरती तो सचमुच माता है
सारा बोझ इसी पर तो है,
जन्म इसी पर मरण इसी पर
सारा बोझ इसी पर तो है।
हम अपने स्वारथ की खातिर
पाप कर्म में रत रहते हैं,
कभी जरा सा पुण्य कर दिया,
गर्वित मन में रहते हैं।
जरा किसी को दान कर दिया
हम समझे राजा बलि खुद को
धरती सारा दान कर रही
कभी जताती नहीं है खुद को।
अज्ञानी हम इसके तल पर
बुरे कर्म करते रहते हैं,
इसका सीना छलनी करके
अपना हित साधा करते हैं।
मगर धरा का धैर्य जिसे
वेदों ने भी गुणगान किया,
उसी धैर्य की मानव ने
अनदेखी की, अपमान किया।
प्राण बचाने को भोजन
देती है, धरती माता है,
तरह तरह के मधुर फलों को
हमें खिलाती माता है।
अपने तल पर हमें सुलाती,
प्राणवायु से थपकी देती,
हर इच्छा पूरी करती है
धरती सचमुच माता है। -
बिटिया रानी
छोटी सी है बिटिया रानी
ऐसी लगती बड़ी सयानी,
अपनी ही भाषा में जाने
क्या कहती है गुड़िया रानी।
वॉकर में बैठाओ कहती
उसमें पांव टिकाकर चलती
खड़े नहीं हो पाती है पर
करती है काफी शैतानी।
कहती है बस गोदी में लो
इधर घुमाओ उधर घुमाओ,
चीजों को मुंह में लेती है,
धूम मचाती गुड़िया रानी।
थोड़ी देर पकड़ती गुड़िया
छम छम छम झुनझुना बजाती,
जिससे खेल लिया फिर उससे
ऊबने लगती गुड़िया रानी।
भूख लगी तो सायरन देती
प्यास लगी तो होंठ बताते,
मम्मी उसकी समझ लेती है
चाहती क्या है गुड़िया रानी। -
जिंदगी
कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे,
उम्र ढल रही है ऐसे, मानो रेत हाथ से जैसे |कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे,
काश समय की इस रफ्तार को रोक पाता, समेट लेता पलों को आहिस्ता – आहिस्ता |
होश संभाला था जब, तब कुछ भी तो न था |
अब वास्ता है तुझसे तो वक्त की कमी सी लग रही है |कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे,
कुछ और खूबसूरत लम्हों को जीना बाकी है, कुछ और हसरतें अभी अधूरी हैं |
मुद्दे बहुत से हैं जिन्हें पूरा करना है, सफर के सिलसिले की रफ्तार अभी बाकी है |कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे,
कब से सपनों की चाह थी मन में, अभी – अभी तो फुर्सत के कुछ लम्हें मिले हैं,
जिम्मेदारियों के बोझ तले छटपटाहट थी कुछ ऐसी, उमर की बढ़ती गिनती में मानों जीना भूल से गए |कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे,
आज न जी सके गर वो लम्हा नापाक होगा, किसी के हौसलों का फिर से मखौल होगा |
आज पूछ रहा है वक्त दर्द – ए – दिल का हाल, अब तू ही बता जिंदगी कैसे उसे समझाऊं |कैसे बताऊ जिंदगी कितना प्यार है तुझसे |
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प्रेम की गाड़ी
एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी पटरी पर पटरी बदलता हूं
क्या कहूं मैं प्रेम की गाड़ी में रोज सफर करता हूं
इन गाड़ियों के डिब्बों से, रोज दिल मेरा मचलता है
कभी नीला, कभी सफेद, कभी सतरंगी जेहन में आता हैप्लेटफार्म पर उतर कर, जब राह मैं अपनी बदलता हूं
सामने से हार्न – गाड़ी का सुन, फिर विचलित हो जाता हूं
कशमकश सी लगी है भीतर, दिल के किसी कोने में
साथ दूं किस – किसका, जीवन के इस क्षणभंगुर मेंउम्र भी अब इजाज़त नहीं देती, रोज राह-ए-सफ़र का
आंखें भी अब थक चुकी हैं, गाड़ियों के होते बदलाव का
अब कि गाड़ियां नये स्टेशनों पर, सरपट दौड़ने वाली हैं
क्या करूं प्लेटफार्मों से, वो पुरानी आवाज न आती है | -
मै परियाई श्रमिक हू
रोज़ 9 बजे से 5 की ड्यूटी
फिर ओवरटाइम
बचता इतना सा समय जब लिखता हूँफिर आया लॉक डाउन जब घर मे बंद
काम बंद सब बंद
भूख से बदहाल ज़िन्दगीसपने जो थे सब गलत हो गए
याद आया तोह सिर्फ अपना गाओं
मीलों का फासला तय करने निकल पड़े
क्यों की घर पे बैठे मरने से बेहतर रास्ते मे दम तोडनाकागज़ के बिना राशन कौन देगा
कौन बिटिया को चलने लायक चप्पल देगा
हाथ मे गुड़िया लिए मेरी गुड़िया चली
मज़े की बात देखो साहब जो हाथ कभी नहीं फैली
पहली बार कुछ भी लेने के लिए फैली हैतुम इन सब से जुदा
सोशल मीडिया मे डालगोना कॉफ़ी के रेसिपी मे मग्न हो
एक्टर एक्ट्रेस की ज़िन्दगी झूठे राष्ट्रवाद मे मस्त हो
मेरा देश जल रहा है बेरोज़गारी किसान आत्महत्या से जूझ रहा है
खबर यह नहीं बनती की भूख से लोग मर रहे है
कोरोना जान लेवा है पर भूख उस्से ज्यादा डरावनी हैबोलोगे मै अकेले कैसे मदत कर सकता हू
खुद से पूछो क्या यह सच है -
एक तरफा प्यार
यूं मेरे प्यार पर बेवजह शक न जताया कर,
खामोश हूँ, बेवफ़ाई का इलज़ाम न लगाया कर |जमाने में हँसी हो मुझे ऐसे नज़रअंदाज़ न कर,
चाहत हो तुम मेरी इस बात का इक्तिराफ कर |अब तक जमाने की रूसवाई से बचाया है तुझको,
सरेआम तमाशा न हो, इस दिल में छुपाया है तुझको |जमाने में चाहने वालों का, सिलसिला बदस्तूर जारी है,
आज भी उनकी आँखों में, वो प्यास तेरे लिए बाकी है |खुद को संभाल पाऊं, अब मुझमें वो साहस नहीं,
शिकायतों का दौर था वो, अब उसकी भी इल्तिजा नहीं |मिलकर भी तुझसे मैं कई बार बिछड़ा हूं,
कैसे कहूं तन्हाई में कितनी बार मैं रोया हूं |फूलों भरा दिल जो था कभी, अब बिखर चुका है,
नदिया का पानी अब खारा हो गया है | -
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो
देवी माँ का पूजन कर लो
लेकिन अपनी मां मत भूलो,
जिसने जनम दिया तुमको
वृद्धाश्रमों में ठूँसो।
थोड़ा सा सोचो-समझो,
बुजुर्गों की इज्जत कर लो,
अपने संतोष की खातिर उनको
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
जींर्ण शरीर क्षीण ताकत को
एक सहारा वांछित है,
बनो ठोस सहारा तुम
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो।
पूजन कर लो खुश रहो मगर
मां-बाप त्याग कर क्या पूजन
मां-बाप हैं ईश्वर यह समझो
वृद्धाश्रमों में मत ठूँसो। -
चालान
झूमे जा रहा था मस्ती में कि उनसे नजरें चार हुई
ब्रेक गाड़ी पर उसने लगवाया, और इनायत दिल की हुई
खुद को संभाल पाता कि शिकार नजरों का हो गया
कहना कुछ और था कि सरेआम तमासा हो गया
जाने क्या ये मुझसे अचानक हो गया…
अरे .. रे ..रे .. ये तो चालान हो गया….अब उससे फरियाद लगाने की मेरी बारी थी
चालान की रकम कुछ कम कराने की तैयारी थी
तकरार हो गई उससे कुछ भारी ऐसी
वर्दी पर उतर आई जब मैडम एस.आई. हमारी
यूं तो पारा थोड़ा मेरा भी गरम था
पर उसकी आंखों का घाव थोडा गहरा थाबैठ गई अब तो वो जिद पर अपने
धारा कानून की सारी लगी गिनाने
कितना भी मैं सही हूं अब उसे परवाह नहीं
चालान कटने से कम पर अब वो तैयार नहीं
हार मान बैठा अब उसकी जिद के आगे
पांच सौ का नौट रखा जब उसके सामनेआंखों में थी सरारत उसकी अब जान गया
जाने से पहले उसको दो – दो सलाम किया
अब सफ़र पर ध्यान न भटके इशारा हुआ
नजरें सड़क पर रहेगी उससे वादा किया
जाने क्या ये मुझसे अचानक हो गया…
अरे .. रे ..रे .. ये तो चालान हो गया…
अरे .. रे ..रे .. ये तो चालान हो गया… -
क्रोध ना किया करें, क्रोध से रहें परे
क्रोध ना किया करें,
क्रोध से रहें परे
गुस्सा है माचिस की तीली सा,
औरों को जलाने से पहले
खुद को जलना पड़ता है
ये वो विष हैं जो,
औरों को पिलाने से पहले
खुद को पीना पड़ता है
अगर आप हैं सही तो,
गुस्सा करने की ज़रूरत नहीं
यदि गलती से हो जाए गलती,
तो गुस्सा करने का हक ही नहीं
शांति भी एक शक्ति है,
इस शक्ति की पहचान करें
स्व-चिंतन से सोचें सब कुछ,
फ़िर इसका रस-पान करें
प्रतिबिंब ना देख सकें,
हम कभी खौलते पानी में
सच्चाई ना दिखलाई देगी,
कभी क्रोध की अग्नि में
क्रोध में विध्वंस छिपा है,
शांति में सुख का है वास
आज अभी अपना कर देखो,
मिट जाएंगे सारे त्रास*****✍️गीता
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यात्रा मां वैष्णो देवी की
कर के शेर की सवारी,
आई माता रानी प्यारी
आई शुभ नव-रात्रि,
मांग लो मुरादें ,माता रानी से
ऊंचे पर्वत पर मंदिर मां का,
बेहद लंबा रस्ता है, यहां का
बाण-गंगा का शीतल जल,
करता रहता है कल-कल
पौड़ी-पौड़ी चढ़ते जाओ,
जय माता की कहते जाओ
देखो ये है अर्धकुमारी,
यहां कुछ खा-पी लें,
सब नर और नारी
ऊंचे पहाड़ और गहरी खाई,
हाथी-मत्था की आई चढ़ाई
समाप्त हुई अब चढ़ाई भारी,
ये सुंदर साझी छत है सारी
आगे चलें तो दिखलाई दिया
माता-रानी का भव्य भवन,
ले पूजा-प्रशाद यहां पर,
लाल चुनरी माथे पर,बांध रहे सब जन
भव्य आरती शुरू हो गई,
जयकारे से गूंज उठा मां का भवन
यही है माता रानी का द्वार,
दर्शन कर को अपरम्पार
नारियल चढ़ा कर ज्योत जलाएं,
मां के पिंडी रूप में,दर्शन पाएं
*******जय माता की************✍️गीता
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कविता : माँ दुर्गा
क्यों न होगा दूर तम ,माँ को याद करके देखिये
भावनाओं के भवन से भय भगाकर देखिये
ज़िंदगी खुशियों से भरी नज़र आयेगी
जागती ज़िन्दादिली से ,माँ को हृदय में बसाकर तो देखिये ||
माँ की भक्ति से जिंदगी जाफरानी लगे
पूस की धूप जैसी सुहानी लगे
माँ की कृपा है दवा ज़िन्दगी के लिये
आशीष अपरिमित माँ का ,पाकर तो देखिये ||
जीवन में जब दुःख सताने लगे
चहुँ ओर अंधेरा नजर आने लगे
उम्मीदों के दिये जब बुझने लगें
बर्बाद ख्वाबों का शहर जब दिखने लगे
माँ की भक्ति है शक्ति ,तब हौसलों के लिये
गीत माँ की भक्ति का ,गुनगुनाकर तो देखिये ||
जी रहे हैं सभी सुख शान्ति के लिये
पी रहे हैं गरल समृद्धि के लिये
ज़िंदगी खुशियों से भर जायेगी
दरबार माँ के जाकर तो देखिये ||
जब आप अपनों से धोखा खाने लगें
लुटा वफ़ा जख्म हज़ार पाने लगें
जगमगाते दीप प्यार ,स्नेह के बुझने लगें
अमन चैन चाह की हवा सब भगने लगे
माँ की कृपा है किरण ,तब ज़िन्दगी के लिये
‘प्रभात ‘ दीपक माँ के नाम का जलाकर तो देखिये
ज़िंदगी खुशियों से भरी नजर आयेगी
जागती ज़िन्दादिली से ,माँ को हृदय में बसाकर तो देखिये || -
आईना
चुपके से रोज मैं उससे सवाल करता हूं,
स्टेटस पर तस्वीर देखकर, उसे प्यार करता हूं |गोल सी आंखों में सपने उसने जो सजाए हैं,
लगता है मेेरी कल्पनाओं से बड़ा मेल खाए हैं |अभी तक तो बातें इशारों में किया करता हूं,
उसके जेहन में क्या है ये विचार रखता हूं |पलभर न देखूं उसे तो जी ये मचलता है,
आईना सामने से अब मुझसे सवाल करता है |कश्मकश में अब हर रोज मैं जीये जा रहा हूं,
कैसे बयां करूं उससे मैं दर्द में मरे जा रहा हूं |काश जो वो मेरी कल्पनाओं को मंजूर करती है,
सच कहूं जमाने भर से स्वीकार उसे करता हूं | -
उतार – चढा़व
दरिया के किनारों पर ख़्वाहिशे नहीं पनपती,
डूबी हुई कस्ती को कभी शाहिल नहीं मिलती |उठना पड़ता है तल से सतह पर कुछ बयां करने को,
यूं पानी के नीचे मंजिलें आसमानों को नहीं छूती |उतार – चढ़ाव आते हैं जीवन में, ये जीवन का हिस्सा हैं,
गर पाना हो पार इनसे तो बेफिक्र राह पर चलना है |दुनियादारी के तानों से खुद को लज्जित न करना कभी,
घी टेढ़ी उंगली से निकलता है ये बात याद रखना सभी |रेखा को बिना मिटाये, छोटी करना सीखा था जैसे कभी,
रुतबा अपना बढा़कर समाज में ईज्जत पाना सभी है | -
उम्र प्यार की
इन सुर्ख अधरों को
मेरे गालों तक मत लाना
चाहत और बढ़ जाएगी
प्यार की ।
अपनी जुल्फों को अब
और मत लहराना
रात लंबी हो जाएगी
इंतजार की ।
तड़पते रहेंगे उम्र भर मगर
जुबां से कुछ ना कहेंगे
उनको भी तो खबर होगी
दिल ए बेकरार की ।
तुम्हारी यादों को शब्दों में
किस तरह ढालूं
सुबह की धूप हो या
कली अनार की ।
कभी सावन कभी भादो
जैसी लगती हो तुम
सच क्या है देखूं
एक बार उम्र प्यार की।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज -
कागज़ और कलम
कागज़,कलम की बातें सुनकर,
मैं लिखना सा भूल गई
कागज़ ने कहा कलम से,
जब तुम चलती हो मुझपे
कहो ये कैसा अहसास है,
कलम ने कहा……
हमें भी नहीं पता,
बस यही लगता है हमें
कि आप हमारे पास हैं..*****✍️गीता
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अर्शे बाद…
मैं दोस्तों के अंजुमन में, अर्शे बाद आया हूँ।
खुद को थाम लीजिए मैं फिर वही दिल लाया हूँ।। -
वो लड़का
उसके आँसू का संचय कर ईश्वर
समंदर रचता है।
प्रतीक्षा की पावन अग्नि में वो
आहुतियों सा जलता है…!!जिसकी उदासी के रंग में ढलकर
हुई ये रातें काली हैं,
बीतें लम्हों की सोहबत में जिसने
इक लंबी उम्र गुजारी है..!!वो जब भी कलम उठाता है, दर्द
संवर सा जाता है,
जिसकी मोहब्ब्त का सुरूर पल-पल
बढ़ता जाता है…!!वो हर दिन हर पल चाहत की
नई इबारतें गढ़ता है
वो लड़का न कमाल मोहब्ब्त
करता है..!!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
-
मोहब्बत
ये ही तो मोहब्बत
का रोना हो गया
मोहब्बत तो जैसे
कोरोना हो गया,
एक को हुई, तो
दूजे को भी ही गई
इस दिल का यही
तो रोना हो गया*****✍️गीता
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मुस्कुराना छोड़ना मत
तुम भले ही मुंह फुला दो
मुस्कुराना छोड़ना मत,
गीत गायें हम कभी तो
गुनगुनाना छोड़ना मत।
यदि बताएं बात दिल की
बीच में ही टोकना मत,
जो कदम आएं हमारी ओर
उनको रोकना मत।
जब कभी इजहार करना हो
तुम्हें चाहत का अपनी
बोल देना खुल के सब कुछ
क्या कहूँ यह सोचना मत।
गर रही सच्ची मुहोब्बत
वो झुका देगी अकड़
दूसरा पत्थर का हो तो
तुम स्वयं को कोसना मत।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत -
मुट्ठी भर सामान***
आज लॉकडाउन खत्म हुए
तमाम दिन हुए
और आज मैं इतने
महीनों बाद बाजार गई
कुछ कपड़े खरीदने
बाजार पहले की तरह ही
सजा था
लग ही नहीं रहा था कि
कोरोना भी चला रहा था
सब व्यस्त थे
अपने-अपने में सब लगे थे
चाट, मटर, बताशे खूब बिक रहे थे
हलवाई तो सेठ लग रहे थे
कपड़ों की दुकानों पर भी
खचाखच भीड़ लगी थी
चूड़ी, बिंदी, लिपस्टिक भी
खूब बिक रही थी
सब्जी, फल वाले भी
आवाज लगा रहे थे
खरीददार भी उनसे
भाव-ताव कर रहे थे
मैं जब अपनी जानी-पहचानी दुकान पर
खस्ता खा रही थी
एकाएक मेरी नजर
एक बाबा पर गई
वो फुटपाथ पर डमरू बजा रहे थे
कोई उनकी दुकान पर भी
नजर डालेगा भगवान से
मना रहे थे
उनकी छोटी-सी दुकान पर
मुट्ठी भर सामान था
एक भी ग्राहक ना था
भरा-पूरा बाजार था
मेरा दिल भर आया
मन में सोंचा ये क्या कमाते होंगे
अपने घर का खर्चा कैसे चलाते होंगे !
मैं गई और भावुक होकर
पूँछा उनका हाल
वो बोलते-बोलते रूक गये
उनकी आँखों में भर आये अश्क अपार
मैंने खरीद लिया सब कुछ
कर दिया उन्हें खाली हाथ
कुछ गाड़ी थीं कुछ घोड़े थे
और तमन्चे, गुब्बारे थे
वो बाबा खुश थे और मेरा मन भी
मैं अपने घर वापस चल दी
कुछ खरीदने गई थी पर कुछ ना खरीदा
कुछ दुआएं और कुछ खिलौने लेकर
वापस आ गई
सच कहूँ अब मैं खुश हूँ, शान्त हूँ
कुछ भी खरीदने का मन अब नहीं है
पहली बार मैं बाजार करके तृप्त और संतुष्ट हूँ.. -
कविता- प्रेम रस – दिल मे रहता हूँ |
कविता- प्रेम रस – दिल मे रहता हूँ |
दुनिया के दुखो से तुम्हें कही दूर लिए चलता हूँ |
आओ प्रिये हर नजर के असर दूर किए चलता हूँ |
चाँदनी रात है खुला आसमान ठंडी हवा बह रही |
सितारो की महफिल मिल जाओ फिजाँ कह रही |
हर तरफ शांती सकुन खुशबू रात रानी महकी है |
बना लो सेज नर्म हरी घास जुलफ़े तेरी बहकी है |
उतर आया चाँद गोद मेरी दावे से मै कहता हूँ |
भूल जाओ गम सारे आओ आज दूरिया मिटा दो |
समा लो मुझे जुल्फों के साये गोद सिर लिटा दो |
डूब जाऊँ तेरी गहरी झील सी आंखो की गहराई |
नजरो से उतर तूने दिल मे मेरी जगह है बनाई |
हसीन वादियो तेरी गजल को दिल से पढ़ता हूँ |
तेरे बदन की खुशबू को और भी महक जाने दो |
सोये हमारे अरमानो को और भी बहक जाने दो |
पूनम की चाँद हो तुम लरजते लबो फरियाद हो |
हुश्न ए मल्लिका तुम आज हर बंधनो आजाद हो |
नहीं कोई दोनों के बीच मै तेरे दिल मे रहता हूँ |
एहसास तेरी गर्म साँसो का हो रहा है मुझे बहुत |
मदहोसी का आलम अब छा रहा है तुझमे बहुत |
पाक मोहब्बत हमारी जज़बातो को संभाले रखना |
हो जाये गुनाह कोई दोनों खुद को संभाले रहना |
मोहब्बत और मोहब्बत सिर्फ मै तुमसे करता हूँ |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
ज़िन्दगी क्या है..
जन्म लेने पर बंटी मिठाई,
श्राद्ध हुआ तो खीर खिलाई
जन्म की मिठाई से,
शुरू हुआ एक मेल
श्राद्ध पर आ कर,
ख़त्म हुआ वो खेल
और विडम्बना ये है कि,
जिसके नाम का मीठा आता है,
दोनों ही मौकों पर,
वो ही ना खा पाता है
ज़िन्दगी क्या है……..
आकर नहाया…….,…
और नहा कर चल दिया
इन दोनों ही स्नानों के बीच…
कोई ज़िन्दगी जीता है और
कोई ज़िन्दगी मरता है….*****✍️गीता
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धूल में यौवन के सपने- बेरोजगारी
आज है मन खिन्न कवि का
देख चारों ओर अपने
घिर गई बेरोजगारी
धूल में यौवन के सपने।
देखकर उस दुर्दशा को
क्या लिखें, कैसे लिखें,
पढ़ रहे हैं, डिग्रियां हैं,
बस पुलिंदे ही दिखें।
भीड़ है चारों तरफ
अकुशल पढ़ाई हो रही है,
भर्तियों पर कोर्ट में
न्यायिक लड़ाई हो रही है।
एक विज्ञापन की भर्ती
को निपटने में यहां
पांच से छह वर्ष लगते हैं
युवा जाये कहां।
छा रही है बस निराशा
हो गया यौवन दुखी,
सोचता है कुछ करूँ
मेहनत करूँ आगे बढूं।
पर बढ़ेगा किस से
रास्ता तो बन्द है,
देश की आर्थिक परिस्थिति
गिर रही है, मन्द है।
कुछ करो फिर कह रही है
कवि कलम आवाज देकर,
देश की ओ शीर्ष सत्ता
कुछ करो अब ध्यान देकर।
— डॉ0 सतीश पाण्डेय
चम्पावत, उत्तराखंड -
निर्भया
कभी दिशा, कभी निर्भया,कभी मनीषा ,नन्ही बच्ची कोई,
बस नाम अलग-अलग,कहानी सबकी एक,
हर घड़ी डर का साया,
ना जाने मर्द तुझे किस बात का घमंड है छाया,
अबला होने का हर रोज एहसास करवाते हो,
मेरी जान की कीमत बस तुने इतनी-सी लगाई,
तेरी आँखों के सुकून से आगे बढ़ ना पाई,
मेरे शरीर को मांस के टुकड़े से अधिक ना समझा,
मेरी रूह में उतर जाने की तुने औकात ही नहीं पाई,
ना सीता, ना द्रौपदी चल उठ अब बन झांसी की रानी तु,
अब वक़्त नहीं गुहार का,
बहुत हुया, अब आया वक़्त खंजर हाथ में लेने का,
फिर जो होगा देखा जाएगा,
समाज यूं नहीं बदला जाएगा,
अपनी शक्ति को पहचान जरा, सब संभव हो जाएगा।सुधार के लिए सुझावो का सवागत है।
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यादों की परछाईं
आँखों में जब उमड़ है उठता
बीता हुआ अतीत
फिजाओं में तब गूंज हैं
उठते भूले-बिसरे गीत
एक-एक कर स्मृति में
वो पल घुमड़-घुमड़
आ आते हैं
ना जाने अब कहाँ खो गये
वो पल वो मनमीत
यादों की परछाईं जब
धुंधली पड़ जाती हैं
महक उठते हैं सपने प्यारे
तरुणाई मुसकाती है
चल देती हूँ जब मैं
मीठे लम्हों की बारातों में
विरहिणी आँखों से
पावस मचल-मचल
बह जाती है… -
अश्क मेरे, नैन तेरे
अश्क मेरे, नैन तेरे
बूंद निकली, कब गिरी यह,
तू बता दे, बात क्या है,
मैं समझता, हूँ नहीं यह।
चूक मत यूँ, बोल दे अब।
जो हो कहना, आज ही कह।
कल कहेंगे, कल सुनेंगे,
इस तरह , उलझे न रह।
यह विदाई, है क्षणिक तू
इस विदाई, से न डरना,
बैठ दिल में, साथ हूँ मैं
बस कभी भी, याद करना।
तार दिल के, जुड़ चुके हैं,
दूर हों या, पास हों हम।
अब नहीं है, डर जुदाई,
एक हैं हम, नेक हैं हम।
मधुमालती छंदाधारित कविता – शीर्षक – मन
(कुल 14 मात्रा, विन्यास 2212, 2212) -
भोजपुरी देवी गीत (धोबी गीत ) – होई माई के नजरिया |
भोजपुरी देवी गीत (धोबी गीत ) – होई माई के नजरिया |
मुंहवा काहे फुलवलु गोरी चला मेला के डहरिया |
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |
सड़िया ले अइली तोहके काजर टिकुली ले अइली |
अलता पावडर संगवा तोहके चानी पायल ले अइली |
ले अइली तोहके ना रानी चम चम चमके चदरिया |
हम ले अइली तोहके ना |
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |
लागल लोक डाउन गोरी असो मेलवा ना लगिहे |
दुर्गा पूजा होई बाकी झूला खेलवा ना होइहे |
कहा घुमाइब तोहके ना गोरी मेला के बजरिया |
कहा घुमाइब तोहके ना|
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |
मेलवा ना चला गोरी तोहके मूर्ति हम देखाइब |
दुर्गा माई के चरनिया केरा नारियर चढ़ाइब |
मन से पुजवा करिहा ना होई माई के नजरिया |
मन से पुजवा करिहा ना |
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |
साल भर पर आइल गोरी माई दुर्गा के पुजनवा |
नवरातन भूखा तू हु गावा देवी माई के भजनवा |
मनसा पूरा होइहे ना भरी खाली तोर अंचरिया |
मनसा पूरा होइहे ना |
हम घुमाइब तोहके ना झारखंड बोकारो के शहरिया |श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286