अलख जगा आकाश

जंगल नाचत मोर है, अंगना नाचत भोर !

मैं नाचत-नाचत थका, तब तनि हुआ अंजोर !!

 

मनुआ माया में फंसा, भूला अपनी राह !

गहरी खाई में गिरा, राम मिले न राह !!

 

साधु तपता धूप में, मल-मल आग नहाय !

सत्य नाम को ना गहे, राम कहाँ से पाय !!

 

जोग जतनबहु विधि किया, घर में रखा छिपाय !

न जाने कैसे घुसा, कब ले गया उड़ाय !!

 

शबनम गिरी आकाश से, बिखरी धरती आय !

कुछ मेरे अंगना गिरी, अंगना हुआ प्रकाश !!

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3 Comments

  1. Sridhar - May 25, 2016, 10:05 pm

    nice

  2. Ajay Nawal - May 26, 2016, 9:26 am

    bahut khoob!

  3. Priya Bharadwaj - May 26, 2016, 3:54 pm

    Awesome poetry 🙂 🙂

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