कवि तो उड़ता पंछी है

सारे पिंजरे तोड़ चुका वो
. मन की मर्जी से जीता है.
कवि तो उड़ता पंछी है जो
उमंगो के आसमान मे उड़ता है
कवि तो बहुत ही प्यासा है
बस भावनाओ मे बहती नदी का पानी पीता है
शान से वो रहता है
कलम की डाल पर बैठकर
सकून के पल वो जीता है

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3 Comments

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 11, 2019, 10:15 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

  2. देवेश साखरे 'देव' - September 12, 2019, 12:25 am

    वाह

  3. Poonam singh - September 12, 2019, 1:51 pm

    Nice

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