प्यार भरे वो दिन

क्या तुम्हे याद है कब हम-तुम मिले थे,
काॅलेज के गलियारों में यूँ ही बतियाते चले थे,
हल्की सी मूँछों वाले,कमसिन से तुम,
जवानी की दहलीज़ पर खङीं,कोमल से हम,
वो एक दूसरे से नज़रें चुराना,
दूसरों की नज़र बचाकर,नज़रें मिलाना,
वो भोले से,मस्ती भरे दिन सुहाने,
अपने दिल के नग़में,होंठों पर अपने ही तराने।

ना जाने कैसे हम आयें पास,बनने को एक जान,
दोनों थें कितने अलग,कुछ भी ना था एक समान,
तुम गुमसुम से,चुप बैठते,हौले से देते हंस,
मै बातूनी चिङिया,एकदम मुँहफट सी बस,
खिलखिलाकर हंसती थी मैं,
क्लास,कैंटीन,हर जगह में,
सहेलियाँ मुझे कोहनी मारती,
जब तुमको मुझे देखती पाती।

एक नाटक में एकबार,एकसाथ हिस्सा लेना,
चरित्रों को निभाने खातिर,इक दूजे का हाथ थामना,
बोलों को रटते-रटते, दोनों का करीब आ जाना,
धीमे-धीमे एक दूसरे के दिल को दिल से करार आना,
फिर रोज़ तुम्हारा किसी बहाने मेरे बस में चढ़ जाना,
फिर बहाने से मुझे घर तक छोङकर आना,
दुनिया से हम छुपते छुपाते,
मुहब्बत के अपने अफ़साने बनाते।

क्लास के बाहर मेरे,तुम्हारा चहलकदमी करना,
डर के मारे कभी अध्यापक को देखना,
कभी किताबों में डर से अपना मुँह छुपाना,
फिर बाहर निकल,तुमपर बस बरस जाना,
मज़ाक मेरा उङाते हुये,तुम्हारा हल्के से मुस्कुराना
और मेरे हर डर,हर गुस्से पर मानों ठंडा पानी फिर जाना,
वह झूठे गुस्से,मान मनौव्वल के दौर थे कितने हसीन,
जब था रिश्ता हमारा रेशमी धागे सा मुलायम और महीन।

हफ्ते भर हमारा कट्टी-कट्टी खेलना,
एक दूसरे से दूर रहना,एक शब्द भी ना बोलना,
फिर यकायक सात दिनों के बाद तुम्हारा सामने आना,
इशारों-इशारों में बहुत कुछ अनकहा कह जाना,
फिर शुरू हुआ साल दर साल साथ चलने का सिलसिला,
बेचैन सी हुई नज़रें, जब दिल हुआ जाता था मनचला,
हर पल,हर घङी करती रहती तुम्हारा इंतज़ार,
नज़रें जब सुकून पातीं,करके तुम्हारे छब का दीदार।

यूँ ही चलते चलते इक रोज़ दो दिल बने इक जान,
रखते हुये एक दूसरे का मान,
बंध गये हम एक, ना टूटने वाले बंधन में,
अग्नि,सितारों और नक्षत्रों के साक्ष्य मे,
धीरे-धीरे दो से हम तीन हुए,तीन से चार,
किंतु बरकरार रहा वैसे ही हमारा प्यार,
परिभाषा ज़रूर बदल गयी थी प्यार शब्द की
पर अब भी हम रह रहे थे एक दूजे में जी।

पर अब कुछ बदल सा गया है कहीं मानो,
तुम अपने काम में खोने से लगे हो ये जानो,
वही मैं हूँ, वही हो तुम भी,
शायद कुछ दोष है इस वक्त का ही,
प्यार भी है और इकरार भी,
कद्र भी है और आभार भी,
फिर भी कुछ ख़लिश सी है ना जाने क्यों,
वो मस्ती भरे पल,वो मनचला सा दिल जाने कैसे खो गया यूँ।

जीवन के चक्रव्यूह में शायद हम फंस गये,
ज़िम्मेदारियों के अहसास तले घुट गये,
हर पल जी लेने की चाह में,
आगे बढ़ने की आस में,
कुछ पल पुराने दूर कहीं छूट गये,
ना जाने कब रेत की भांति,मुट्ठी से निकल गये,
आज भी पुराने वो दो पल भी गर,किसी तरह जी पाऊँ,
तुमको ले साथ में,वो खिलखिलाते,मस्तममौले,प्यार भरे दिन जी आऊँ ।।

-मधुमिता


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4 Comments

  1. Sridhar - May 27, 2016, 9:36 pm

    behatreen kavita

  2. Kavi Manohar - May 28, 2016, 7:32 pm

    Nice

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