बारिश

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एक दफा बारिश का आनंद लेने की ठानी,
यही कर दी हमने सबसे बड़ी नादानी |
घर के बाहर ही कीचड का ढेर था ,
और उस ढेर में फंसा मेरा पैर था |
फिर भी मैंने हार ना मानी ,
आगे बढ़ने की दिल में थी ठानी |
शूकर पानी का आनंद ले रहे थे ,
जाने कैसे विचार मेरे मन में बह रहे थे |
आगे बढ़ा तो कार वाले ने नहला दिया ,
मेरे कपड़ो पर कीचड ही कीचड फैला दिया |
यह सब तो मेरे लिए आम था ,
क्योंकि मैं एक आम इंसान था |
सड़क पर ही तालाब की अनुभूति थी ,
पर मेरी ख़ुशी भी उतनी ही झूठी थी |
तभी पब्लिक चिल्लाई अबे ये कहाँ गया ,
मैं एक पल में खुले मैनहोल में समा गया |
व्यवस्था परखने की ललक मौत बन के आई थी ,
पर हमारे व्यवस्थापकों की रूह भी न लजाई थी |
खुद के बंगले के आगे की सड़क तो पक्की करा ली ,
और यह कह दिखा के उन्होंने शहर की तरक्की करा ली |

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5 Comments

  1. Panna - November 22, 2015, 1:55 am

    Ekdam sahi baat kahi aapne

  2. पंकजोम " प्रेम " - November 22, 2015, 10:25 am

    क्या ख़ूब लिखा है आपने \” जॉनी \”
    लिख ही दी , अपने लफ़्जो में …..
    बारिश की कहानी ……mstttttt

  3. Sumit Nanda - November 22, 2015, 2:45 pm

    kya baat he vikas ji…उम्दा

  4. Anirudh sethi - November 22, 2015, 3:32 pm

    जनाब आपने तो माहोल बना दिया
    हमें अपना बचपन याद दिला दिया

  5. anupriya sharma - November 22, 2015, 7:47 pm

    nice poetry

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