भूल गयी खुद को

बनी बनायी राहों पर चलते-चलते
भूल गयी खुद को, औरों की सुनते-सुनते ।
ज़मीर जिसकी गवाही न दे, क्यूँ बढे अबूझ चिन्हों पर
अच्छी बनकर, खुद से लङकर, सह गयी डरते-डरते ।
अपमान का विष, कब तक पान करूँ
कब तक मूक-चीख से प्रतिकार करूँ
थक गयी, संघर्ष की घङियो से, रार करते-करते ।
खुद को कैसे मशगूल रखू, कबतक आखिर धीर धरूँ
रोजमर्रा की बात है ये,आखिर कैसे वहन यह पीङ करूँ
बिखरी आशाओं की लङियाँ, टूट गये सब सहते-सहते ।।

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close