भूल गयी खुद को

बनी बनायी राहों पर चलते-चलते
भूल गयी खुद को, औरों की सुनते-सुनते ।
ज़मीर जिसकी गवाही न दे, क्यूँ बढे अबूझ चिन्हों पर
अच्छी बनकर, खुद से लङकर, सह गयी डरते-डरते ।
अपमान का विष, कब तक पान करूँ
कब तक मूक-चीख से प्रतिकार करूँ
थक गयी, संघर्ष की घङियो से, रार करते-करते ।
खुद को कैसे मशगूल रखू, कबतक आखिर धीर धरूँ
रोजमर्रा की बात है ये,आखिर कैसे वहन यह पीङ करूँ
बिखरी आशाओं की लङियाँ, टूट गये सब सहते-सहते ।।

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता…

Responses

  1. बेबस और गृहस्थ नारी अपने जीवन की विसंगतियों से जब बुझिल होकर टूटती है तो कुछ इसी प्रकार टूटती है उसे अपने आंचल से सभी को प्यार दुलार देना पड़ता है बच्चों को बड़ा करना पड़ता है और एक वृक्ष की तरह अपने हर रिश्ते को पुष्पित फलित करना पड़ता है परंतु जीवन की इस उधेड़बुन में उसकी स्वयं की ख्वाइश है उसका अस्तित्व नष्ट हो जाता है उसे तमाम प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़ते हैं और जब वह अत्यंत पीड़ित हो जाती है तो वह कुछ इसी प्रकार कहती है अपमान का विष कब तक पान करूं

New Report

Close