मुकाम

साम दाम दण्ड भेद से मुकाम तो पा लोगे।
पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे?

काबिलियत कितनी है, गिरेबां में झाँक लो,
काबिल हकदार से उसका हक तो चुरा लोगे।
पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे?

मुकाम पाना आसान है, वहाँ ठहरना कठिन,
गलत की जोर पे अपनी जगह तो बना लोगे।
पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे?

ज़मीर जानता है, मुझसे भी बेहतर यहाँ पर,
ज़मीर को मारकर, खुद को बेहतर बना लोगे।
पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे?

देवेश साखरे ‘देव’

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18 Comments

  1. Neha - September 29, 2019, 12:43 pm

    वाह

  2. ashmita - September 29, 2019, 1:19 pm

    Nice

  3. Mohit Sharma - September 29, 2019, 1:27 pm

    बहुत खूब

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 29, 2019, 1:27 pm

    वाह बहुत सुंदर

  5. NIMISHA SINGHAL - September 29, 2019, 2:33 pm

    Great

  6. Poonam singh - September 29, 2019, 8:33 pm

    Bahut khub

  7. nitu kandera - October 4, 2019, 11:06 am

    Bore

  8. DV - October 4, 2019, 5:57 pm

    साम दाम दण्ड भेद से मुकाम तो पा लोगे।
    पर आईने में खुद से, क्या नजरें मिला लोगे?

    बेहद खूबसूरत भाव …सुंदर शब्दों का चयन … आपका अभिनंदन

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