सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है
ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है
आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की
और हमें सच बोलते आईनों की इल्लत से बैर है
देखिये उस तरफ फिर कोई मकां जल रहा है
शायद वहीँ अपने अपने हिस्से की आदमियत का शोर है
हर्फ़ निकलते ही लब से, बन जाते है अफ़साने कई
कौन देखेगा यहाँ किस अफ़साने से मिटा कोई दौर है
चल कोई ऐसी फिज़ा इफ़्फ़त भरी तलाश करें ‘अरमान’
या तो पहले ही से फैला फिज़ाओं में हर तरफ जहर है
राजेश ‘अरमान’
इफ़्फ़त= शुद्धता, पवित्रता
इल्लत= दोष, बुरी आदत,
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